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16 अप्रैल 2012

hallo scientist

कभी कभी जब भारतीय लोग मुझसे पूछते हैं - भूत प्रेत होते हैं ? तब मैं बङा आश्चर्य में पङ जाता हूँ । लेकिन उससे भी ज्यादा आश्चर्य  तब होता है । जब बहुत लोग पूरे confidence से कहते हैं - अरे ! भूत प्रेत जैसा कुछ नहीं होता । सब बकबास । लगभग बहुत सी बातों में भारतीयों का ये confidence मुझे हैरान करता है । चाहे उस विषय की A B C D न मालूम हो । पर किसी भी विषय पर पूरे confidence से ही बात करते हैं । मानों Ph.D कर रखी हो ।
खैर..छोङिये । मैं एक बात सोच रहा था । इस तरह की उत्सुकता के मामले में अमेरिका यूरोप आदि देशों का नजरिया हमसे आगे हैं । लेकिन बस उनको एक बात की सनक ज्यादा सवार है । जो भी चीज देखेंगे । science के दृष्टिकोण से ही  देखेंगे । वही भौतिक बिज्ञान ।.. आध्यात्म बिज्ञान या योग बिज्ञान जैसी कोई चीज होती भी है । शायद वे सोच नहीं पाते । शायद जान नहीं पाते । लेकिन मैं उनकी गलती भी नहीं मानता । जब भी वेद उपनिषद आदि भारतीय धर्म ग्रन्थों में वर्णित perfect yoga science के प्रति आकर्षित होकर वे इसकी खोज में भारत आये । हरिद्वार बनारस आदि जैसे किसी स्थान पर लंगोटा बाबाओं से टकरा गये । और लगभग खाली हाथ लौटे । कुछ भटकते  भटकते मथुरा वृंदावन जैसे स्थानों पर पहुँच गये । और हरे रामा हरे कृष्णा की बीन बजाने लगे । असली बात ही भूल गये ? हम क्यों आये थे । फ़िर भी yes i repeat फ़िर भी अलौकिकता को जानने के मामले में उनकी उत्सुकता लगन और परिश्रम सराहनीय है । मंगल चाँद पर जाने की कल्पना ।

वहाँ पर बसने की कल्पना । और उसके प्रयास लगभग सभी जानते हैं ।
लेकिन अफ़सोस इस बात का भी है कि - उनके ये सपने कभी सच नहीं होंगे । दरअसल उनकी theory वास्तविकता से एकदम भिन्न है । अब चाँद को लीजिये । वे वहाँ पानी जीवन रहने आदि के अवसर तलाशते हुये खोज रहे हैं । जबकि सब कुछ खोजा हुआ तैयार रखा है । भारतीय धर्म ग्रन्थों में । चाँद । एक पुरुष । उसकी पत्नियाँ । उसका परिवार । उसके अन्य सम्बन्ध । सभी कुछ फ़ुल डिटेल में । पूरा विवरण विस्तार से मौजूद है । कुछ भी नहीं खोजना । हाँ चाँद पर जीवन भी है । पानी भी है । सब कुछ है । पर वह सूक्ष्म जीवन है । micro life । अदृश्य । यही बात सूर्य पर । मंगल पर । अन्य पर । और सबसे बङी बात - प्रथ्वी पर भी लागू होती है । जी हाँ । इसे सिर्फ़ मिट्टी जल गैसों आदि का एक बङा गोला पिण्ड न समझें । ये बाकायदा स्त्री रूप देवी भी है ।
फ़िर पहले वाली बात करते हैं । दरअसल MODERN SCIENCE में जो भी प्रयोग और विकास आप देखते हो । मेरा मतलब । अंतरिक्ष और अलौकिकता को जानने के सम्बन्ध में । यह सब भी ईश्वरीय सत्ता की मर्जी से ही होता है । अब पूछिये । इसके फ़ायदे क्या हैं ? जब वो सफ़ल ही नहीं होगा ।

इससे आप प्रथ्वी और प्रकृति के बहुत से रहस्य कृमशः जानने लगते हो । उदाहरण देखें । भले ही NASA की  दूरबीन अंतरिक्ष में राजीब बाबा को नहीं देख पायी । पर उसी technique से कृतिम उपग्रहों पर लगे कैमरों आदि से प्रथ्वी पर क्या क्या  सुविधायें उपलब्ध हुयीं । भले ही कोई राकेट किसी एलियन को बैठाकर आज तक नहीं लौटा । पर राकेट की तकनीक ने वैमानिकी आदि की प्रगति में क्या क्या योगदान दिया । दूसरे परमाणु आदि अन्य कार्यकृमों से कम खर्च में जीवन की अन्य दूसरी सुविधाओं में भारी बढोत्तरी हुयी । यूँ कह सकते हैं । किसी दूसरे उद्देश्य को लेकर किया गया कार्य दूसरी जगह के लिये सफ़ल हो गया ।
यूँ तो दुनियाँ में गजल गो बहुत हैं । पर गालिब का अंदाज ए बयां कुछ और ही है की तर्ज पर मैं अक्सर एक बात

सोचता हूँ । जो कि सुरति शब्द बिज्ञान के अनुसार मुझे असमंजस में डालती है । क्योंकि फ़िर जो बात होनी चाहिये । वो क्यों नहीं होती ? इन लोगों के साथ । दरअसल जब भी कोई इंसान बहुत गहरायी से किसी चीज पर सोचता है । तो उसकी सुरति उधर ही जाने लगती है । और तब उसके रहस्य प्रकट होने लगते हैं । उधर की यात्रा अनजाने में ही आरम्भ हो जाती है । इस बात का कोई मतलब निकालने से पहले बैज्ञानिकों की गहन सोच । या अंग्रेजों आदि की तीवृ उत्सुकता को ध्यान में रखना । मेरा मतलब उतना ‍% होने पर ।
और मैंने इसका उत्तर भी तलाश कर लिया । ऐसा क्यों नहीं होता ? सर्वप्रथम - माँसाहारी होना । जीव हत्या में प्रवृति । क्योंकि इससे तमोगुण की वृद्धि होती है । 


जो आत्म उत्थान की बजाय । आत्म पतन करता है । दूसरे भौतिकवाद पर अधिक विश्वास होना । जो हो । सो प्रत्यक्ष ही होना चाहिये । तीसरे सब कुछ बाहर ही खोजने की सनक । अन्दर की सोचते तक नहीं । खोज के ही मानेंगे । आदि आदि ऐसे कारण हैं । जो खुद उनके लिये रुकावट बन जाते हैं । वरना निश्चय ही वे अन्दर की तरफ़ जाने लगें ।
अब थोङा भारतीय लोगों की इस मामले में पात्रता पर बात करें । इनकी समृद्ध परम्परा इनका समृद्ध आध्यात्म बिज्ञान इनके पूर्वज आदि सभी कुछ इस बात को निश्चित कर देते हैं । मृत्यु क्के बाद फ़िर जीवन । आत्मा । ईश्वर । स्वर्ग । नरक । कर्म योग । भक्ति योग आदि सब कुछ  सिद्ध है । बल्कि वो कैसे है ? इसकी स्पष्ट theory भी लिखी मौजूद है । फ़िर भी इनके कान पर जूँ तक नहीं रेंगती । श्रीमान ! मैं उसी उत्सुकता के बिन्दु पर बात कर रहा हूँ । पश्चिमी देशों के पास ऐसा सोचने ऐसी भावना का कोई ठोस आधार नहीं हैं ।  ये उनकी परम्परा भी नहीं है । ये उनकी संस्कृति भी नहीं 


है । पर हम तो जीवन की पहली सांस भी भक्ति के पर्यावरण में लेते हैं । आप समझ रहे हैं ना । फ़िर तुलनात्मक हममें वह उत्सुकता क्यों नहीं ? जबकि मजे की बात है । परलोक के लिये हमारी सारी ही कोशिशें स्वर्ग प्राप्त करने की होती हैं । और हम इसके प्रति इतने आश्वस्त भी हैं कि - अपने किसी के भी मर जाने पर उसे सीधा स्वर्ग ही भेज देते हैं । शोक सन्देश में - स्वर्गवासी हुये । अखबार उठावनी में - स्वर्गवासी हुये । पहले तो यही समझ में नहीं आता । जब दुनियाँ की कांय कलेश से निकल कर आदमी स्वर्गवासी  हो गया । तो ये शोक सन्देश हुआ । या हर्ष सन्देश हुआ । बहुत खुशी की बात हुयी ना ? ना ?? हाँ ! शोक सन्देश ये यूँ हो सकता है । हम जाने कब मरेंगे ? जब हम भी स्वर्गवासी होंगे ? सोचिये क्या होना चाहते हैं आप - स्वर्गवासी ? या वाकई confidence है - ताऊ स्वर्ग ही गयो ।

खैर..छोङिये । भारत महान की महानता कम शब्दों में बताना संभव नहीं है । इसलिये फ़िर बात अंग्रेजों की ही करते हैं । इसलिये देखिये । कुछ अंग्रेज विद्वानों की मान्यतायें ।


- हम अपने दिमाग का 1% से भी बहुत कम उपयोग कर पाते हैं । इसको सरलता से समझने में यूँ भी कह सकते हैं । हमारी पहुँच दिमाग के बहुत ( बहुत ही कम ) कम भाग में है । यदि हम पूरे दिमाग का उपयोग कर पायें । तो बहुत से रहस्य जान सकते हैं ।
- हम दिमाग के सिर्फ़ बायें हिस्से का ही उपयोग करते हैं । जबकि दाँयें हिस्से में अपार संभावनायें छुपी हुयी  हैं । विलक्षण प्रतिभाशाली लोगों के दिमाग का दाँया भाग सक्रिय पाया गया ।
- बैज्ञानिकों ने डिजटिल (  ध्वनि रूप । लय में । निरन्तर बजने वाली काफ़ी समय की आडियो फ़ाइल ) ॐ..ऽऽ ॐ..ऽऽ को अपनी क्षमता अनुसार अंतरिक्ष में विभिन्न तरीकों से प्रक्षेपित किया है । स्थापित किया है । ( अज्ञात अनजान सभ्यताओं के लिये ) सन्देश रूप में भेजा है । ताकि कभी किसी को प्राप्त हो । तो वो हमसे सम्पर्क करें । क्या आपको पता है ? वर्षों से ऐसे कई अंतरिक्ष केन्द्र प्रतीक्षारत है कि प्रथ्वी से इतर किसी सभ्यता किसी जीवन से कोई सम्पर्क हो । सन्देश मिले ।
- संक्षेप में और भी तरह के अंतरिक्ष यान इस प्रकार के विभिन्न खोजी अभियानों पर लगे हुये हैं । अक्सर जाते ही रहते हैं ।
अब देखिये । मैं बताता हूँ कि - ये समस्त अभियान अपने असल उद्देश्यों में क्यों नहीं सफ़ल होंगे ।


दिमाग - सरलता से समझें । हमें ये लगता ही है कि दिमाग हम नियंत्रित कर रहे हैं । वास्तव में जीव ( सामान्य मनुष्य ) अवस्था में दिमाग ही हमें नियंत्रित कर रहा है । इसलिये ये बात ही लगभग उलटी हो जाती है कि हम दिमाग के बहुत कम हिस्से में जा पाते हैं । वास्तव में हमें वहाँ से command मिलती है । और हम विभिन्न कार्य करते हैं । मनुष्य की गति अधोगति ( नीचे की ओर ) है । और दिमाग में जाने के लिये ऊर्ध्वगति ( ऊपर की ओर ) होना आवश्यक है । ये सिर्फ़ योग और ध्यान की क्रिया से संभव है । जबकि आप उसमें पारंगत भी हों ।
- एक और भी दिक्कत है । जीव ( मनुष्य ) के विचरण के लिये इस बाडी में बहुत थोङा परिपथ circuit ही खोला गया है । बाकी सभी लाक्ड है । इसलिये आप आँखों से ( भौंहों से नीचे ) से लेकर नाभि तक के गिने चुने स्थानों पर ही आते जाते हो । कहाँ - गले में । ह्रदय में । और नाभि में । इसी भाग को पिण्ड कहते हैं । लिंग योनि क्षेत्र । और कमर से पैरों के प्रारम्भ होने से लेकर नीचे पैर की उँगलियों तक भी आपकी पहुँच नहीं । आँखों से ऊपर भी आपकी कोई पहुँच नहीं । मेरा मतलब आप वहाँ सिर्फ़ देख सकते हैं । जा नहीं सकते ।  समझें । हम आसमान को देख तो सकते हैं । पर बिना साधन उपाय जा नहीं सकते । जबकि प्रथ्वी पर हम कहीं भी बिना अतिरिक्त उपाय जा सकते हैं । क्योंकि वो हमारी पहुँच में है । उतना मनुष्य के लिये तय भी है इसलिये । तो जब आँखों से ऊपर का हिस्सा लाक्ड ( भौंहों के मध्य । बृह्माण्डी द्वार ) ही है । तो जाने का कोई सवाल ही नहीं । और यही पर 3rd EYE भी है । क्योंकि ऊपर  3rd EYE और 3rd ear ही काम आता है ।


ॐ ध्वनि भेजने की बात - इस पर तो मुझे बहुत ही हँसी आती है । दरअसल इलावृत ( प्रथ्वी ) के बैज्ञानिक नहीं जानते । अंतरिक्ष में कई स्थानों पर ऐसे zone हैं । जहाँ ॐ सोहं जैसे बीज मंत्र स्वयं ही गूंज रहे हैं । बहुत सी ध्वनियाँ । कल्पनातीत । अब यहाँ एक मजे की बात । point की बात देखें । आपने कभी सोचा है कि हम जो बातचीत करते हैं । विभिन्न अन्य loud ध्वनियाँ तरह तरह से करते हैं । ये आखिर कहाँ जाती हैं । कहाँ विलीन होती हैं । नष्ट कैसे होती हैं ? अगर ये सब वातावरण में ही फ़ैली रहती । तो जीवन एक दिन चलना मुश्किल हो जाता ना ? इनकी दो गतियाँ हैं । विभिन्न इच्छित मनुष्य अंतकरणों में record हो जाना । और बाह्य रूप से ये सब आकाश ( फ़िर आगे महा आकाश आदि ) में जाती हैं । वहाँ जिस शब्द की गूँज ( vibration ) से ये सब उत्पन्न हो रही हैं । उसी में नष्ट हो जाती हैं । तो ऐसे ॐ ..गणपत बाप्पा मोरया । झूलेलाल का वहाँ क्या मतलब हुआ ?
अब चलिये मान लेते हैं । आपके द्वारा भेजी वह ध्वनि क्योंकि निरन्तर हो रही है । इसलिये बीच में कोई catch कर ले । पर वो कोई कौन ? मैंने पहले ही बताया । आपकी जितनी फ़्लायटें उङती हैं । उससे हजारों गुना लाखों गुना विकसित बिज्ञान के विमान अंतरिक्ष में निरन्तर उङते ही रहते हैं । वे आपके ॐ को  सुनकर क्या करेंगे ? भेजते तो शकीरा बेबी का न्यू सोंग भेजते । दूसरे वे आपसे क्या सम्पर्क करेंगे । जबकि हमेशा से उनकी पचासों फ़्लायट रोज ही earth पर लैंडिंग करती हैं । अपने विभिन्न कार्यों से । आपसे भी सम्पर्क करते हैं । ऐसी बात नहीं । पर तब । जब उसके बाद आप किसी को बता ही नहीं पाते - चल भाई ! बहुत हुआ । बहुत मस्ती कर ली । अब तेरा खेल खत्म । लो जी हो गया सम्पर्क । अब अनुमान लगाना

। कितने लोगों का रोज ही सम्पर्क होता होगा ? है कोई आयडिया ?
हाँ ! बैज्ञानिकों की एक बात तथ्य पर आधारित है । किसी दूसरी प्रथ्वी के लोग ? पर भईया ! ये दूसरी प्रथ्वी ( या प्रथ्वियाँ ) आपकी पहुँच से इतनी दूर हैं कि - न तो कभी आपका ॐ वहाँ जा पायेगा । और न ही कोई अंतरिक्ष यान । क्योंकि अंतरिक्ष के रास्तों के बीच बीच में black hole जैसे तमाम दुष्ट और तमाम अन्य स्थान ऐसे हैं । जो यान की ऊर्जा सोख लेंगे । खत्म कर देंगे । यान को ही नष्ट कर देंगे । क्योंकि यान धातुओं से ही तो बना है । और वे धातुओं को ही गलाने पर उतारू हैं । अब बोलो क्या करोगे ? बोलो बोलो ?
चलिये आपका यान किसी तरह इन सब बातों को चकमा देकर किसी  दूसरी प्रथ्वी तक पहुँच भी गया । तो क्या पता । वे भले आदमी अभी नंगे ही घूम रहे हों । मतलब वहाँ आदि मानव युग चल रहा हो । अब मैं आज एक बहुत महत्वपूर्ण बात बैज्ञानिकों को बताता हूँ । यदि वे समझ पायें तो ? इस अखिल सृष्टि का नक्शा । map । आपने डाक्टर की दुकान पर टंगा वो कलेंडर कभी  देखा है । जिसमें अन्दर से भी नंगे आदमी के उर्जे पुर्जे खास कर नसें नाङियाँ लाल और नीले कलर में दिखाई गई होती हैं । यहीं है - अखिल सृष्टि का नक्शा । जो नीली लाल नाङियाँ हैं । ठीक यही तो बृह्माण्डी रास्ते हैं । लेकिन उस पुराने कलेण्डर के जमाने गये । आजकल किसी जीवित आदमी को Magnetic resonance imaging ( M R I ) गुफ़ा में डाल दो । उससे भी अधिक स्पष्ट नक्शा विभिन्न एंगल से घुमा फ़िराकर 3D देखो ना ।


चलिये नक्शा जान गये । अब मैं आपको ये भी बता देता हूँ । आपका हवाई जहाज इस नक्शे में किस हवाई अड्डे से उङेगा ? आप मल और मूत्र ( नक्शे में देखें । या फ़िर अपनी बाडी में ही देख लें ) जहाँ से करते हैं । इन दोनों के बीच एक स्थान है । मल स्थान । विभिन्न नर्कों में जाने का द्वार है । बस इससे ठीक ऊपर लिंग योनि की ओर ( बीच में ) आपकी प्रथ्वी है । यहीं से आपका अंतरिक्ष यान उङता है । अब ले जाइय़े । किस ओर ले जाना है ?
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सत्यसाहिब जी सहजसमाधि, राजयोग की प्रतिष्ठित संस्था सहज समाधि आश्रम बसेरा कालोनी, छटीकरा, वृन्दावन (उ. प्र) वाटस एप्प 82185 31326