02 अक्तूबर 2015

अस्तित्व

अक्टूबर के प्रारम्भ के साथ ही हल्की हल्की सर्दी की दस्तक शुरू हो गयी । यह मिश्रित है । शाम से रात 11 तक कुछ गर्मी कुछ उमस सी रहती है । इसके बाद जैसे सर्दी शरीर से लिपटना शुरू हो जाती है । ठीक ऊपर घूमता सीलिंग पंखा जैसे इसमें चार चाँद लगाता हो । 
रात का सताया हुआ योगी कुनमुनाता हुआ अधमरा सा होने वाली नयी सुबह की प्रतीक्षा करता है । जो अगले 12 घन्टे उसे राहत देगी । और फ़िर वही 12 घन्टे की काली रात । दुखिया दास कबीर जागे और रोवे ।
वैसे अपवाद को छोङकर कसौटी शिष्य का कोई भी क्षण सुखमय नहीं होता - सेवक धर्म कठोरा । अहर्निश तपती रेगिस्तानी यात्रा में जैसे छांव फ़ल फ़ूल पत्ती की कोई आस नहीं । अपना कुछ नहीं । सपना भी कुछ नहीं । जीना भी नहीं । मरना भी नहीं ।
खिङकी से बाहर शान्त खङे आम्र वृक्षों को देखकर अक्सर सोचता हूँ - शायद ऐसे ही चला जाऊंगा । कहीं अज्ञात में..जहाँ मुझसे पहले इसी पथ के पथिक गये हैं । और मेरे साथ मेरा जाना हुआ भी ।
शब्द स्पंदित होने लगे । धीरे धीरे वायु संकुचन हुआ । एक अज्ञात स्फ़ुरणा किसी प्रबल प्रवाह वाली जलधार सी अलक्ष्य फ़ूटने लगी । शब्द बहने लगे । बनने लगे । बिगङने लगे । कोई तारतम्य नहीं । कोई व्याकरण नहीं । कोई ज्ञान विज्ञान नहीं । कोई कृम नहीं । कोई अर्थ नहीं । सब बेतरतीब ।
चट्टानी पत्थरों से टकराती अनियंत्रित पहाङी जलधार..कलकल..हलहल..चलचल..गलगल..क्या है इनका स्वर..क्या है इनका आशय..क्या है इनका बोध, कौन जानता है ? शायद ये खुद भी नहीं ।
इस अदम्य अलक्ष्य प्रवाह में वासना वायु के बने अस्तित्व लेते बुलबुले उछल रहे हैं । गिर रहे हैं । टूट रहे हैं । और किसी जिद में फ़िर बारबार बन रहे हैं ।
फ़िर सरस हुये शब्द जैसे आकार लेने लगे । विचारों के पंख फ़ङफ़ङाने लगे । मन पक्षी कल्पित खुले आकाश में उङ गये । एक सुन्दर सृष्टि विस्तार लेने लगी । जन्म मृत्यु, सुख दुख, उजाले अंधेरे से आँख मिचौली सी खेलती वैचारिक सृष्टि ।
लेकिन प्रवाह निर्लेप था । कर्ता उद्देश्यहीन था । अकर्ता था । अवैचारिक था । कुछ उदासीन सा । कुछ उदासीन सा..क्योंकि उदासीन भी न था । उमंग न थी तो उदासी भी क्या ?
मैं यही सोचता हूँ । मेरा अस्तित्व ? निर्लेप कर्ता से हुयी जीव सृष्टि में मेरा क्या अस्तित्व । क्या गति । क्या होना । क्या न होना ।
कभी अदभुत सा कभी चिङचिङापन सा जो महसूस होता है कभी । कभी सुखद सा कभी दुखद सा जो अनुभूत होता है कभी । वही मैं हूँ - सोहंग । अलग मैं हूँ - ओहंग । खोजी मैं हूँ - कोहंग । खोज मैं हूँ - निःहंग । अलग भी । एक भी । एकोह्म द्वितीयोनास्ति । एकोह्म बहुष्यामि ।
एक मैं हूँ । अनेक मैं हूँ । सब कुछ मैं हूँ । कुछ नहीं मैं हूँ । जाग्रत मैं हूँ । सोया मैं हूँ । चैतन्य मैं हूँ । निष्क्रिय मैं हूँ । तुरीया मैं हूँ । तुरीयातीत भी मैं हूँ - हुं..हुं..हुं । अंततः निशब्द मैं हूँ । जिसे कहना शब्द से पङता है ।
आश्रम दिन की गतिविधियों से क्रियाशील हो उठा है । साधु सन्तों स्थानीय लोगों आगन्तुक की चहल पहल जारी है । पर जैसे मैं इस सबसे अछूता हूँ । और पदार्थ अपदार्थ प्रतिपदार्थ में विचरता हूँ । वायु से उङते रंगों की रंगीन फ़ुहारें सी । शब्दों को उछालते फ़ुरणा । एक निर्वाध शून्य । और उसमें होता विछोभ । उठता उछाह । जो कभी मुझे होने कभी न होने का मिश्रित अहसास देता है ।
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