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17 जुलाई 2016

अष्टावक्र महागीता 1

अध्याय 1
जनक, अष्टावक्र से पूछते हैं - हे प्रभु, ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है । मुक्ति कैसे प्राप्त होती है । वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है ? ये सब मुझे बताएं ।1।
अष्टावक्र उत्तर देते हैं - यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो अपने मन से विषयों (वस्तुओं के उपभोग की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये ।
क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये ।2।
आप न पृथ्वी हैं, न जल न अग्नि न वायु अथवा आकाश ही हैं । मुक्ति के लिए इन तत्वों के साक्षी, चैतन्यरूप आत्मा को जानिए ।3।
यदि आप स्वयं को इस शरीर से अलग करके, चेतना में विश्राम करें । तो तत्काल ही सुख, शांति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे ।4।
आप ब्राह्मण आदि सभी जातियों अथवा ब्रह्मचर्य आदि सभी आश्रमों से परे हैं । तथा आँखों से दिखाई न पड़ने वाले हैं । आप निर्लिप्त, निराकार और इस विश्व के साक्षी हैं । ऐसा जान कर सुखी हो जाएँ ।5।
धर्म, अधर्म, सुख, दुख मस्तिष्क से जुड़ें हैं । सर्व व्यापक आपसे नहीं । न आप करने वाले हैं । और न भोगने वाले हैं । आप सदा मुक्त ही हैं ।6।
आप समस्त विश्व के एकमात्र दृष्टा हैं । सदा मुक्त ही हैं । आपका बंधन केवल इतना है कि आप दृष्टा किसी और को समझते हैं ।7।
अहंकार रूपी महासर्प के प्रभाववश आप ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मान लेते हैं । ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’ इस विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो जाईये ।8।
मैं एक, विशुद्ध ज्ञान हूँ । इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान वन को जला दें । इस प्रकार शोक रहित होकर सुखी हो जाएँ ।9।
जहाँ ये विश्व रस्सी में सर्प की तरह अवास्तविक लगे । उस आनंद, परम आनंद की अनुभूति करके सुख से रहें ।10।
स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है । यह कहावत सत्य ही है कि - जैसी बुद्धि होती है । वैसी ही गति होती है ।11।
आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक, मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छारहित एवं शांत है । भ्रमवश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है ।12।
अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और ‘मैं’ के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें ।13।
हे पुत्र ! बहुत समय से आप ‘मैं शरीर हूँ’ इस भाव बंधन से बंधे हैं । स्वयं को अनुभव कर, ज्ञान रूपी तलवार से इस बंधन को काटकर सुखी हो जाएँ ।14।
आप असंग, अक्रिय, स्वयं प्रकाशवान तथा सर्वथा दोष मुक्त हैं । आपका ध्यान द्वारा मस्तिष्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ।15।
यह विश्व तुम्हारे द्वारा व्याप्त किया हुआ है । वास्तव में तुमने इसे व्याप्त किया हुआ है । तुम शुद्ध और ज्ञान स्वरुप हो । छोटेपन की भावना से ग्रस्त मत हो ।16।
आप इच्छा रहित, विकार रहित, घन (ठोस) शीतलता के धाम, अगाध बुद्धिमान हैं । शांत होकर केवल चैतन्य की इच्छा वाले हो जाइये ।17।

आकार को असत्य जानकर निराकार को ही चिर स्थायी मानिये । इस तत्व को समझ लेने के बाद पुनः जन्म लेना संभव नहीं है ।18।
जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप उसके अन्दर भी है और बाहर भी । उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर भी निवास करता है और उसके बाहर भी ।19।
जिस प्रकार एक ही आकाश पात्र के भीतर और बाहर व्याप्त है । उसी प्रकार शाश्वत और सतत परमात्मा समस्त प्राणियों में विद्यमान है ।20।
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अध्याय 2
जनक कहते हैं -
आश्चर्य ! मैं निष्कलंक, शांत, प्रकृति से परे, ज्ञान स्वरुप हूँ । इतने समय तक मैं मोह से संतप्त किया गया ।1।
जिस प्रकार मैं इस शरीर को प्रकाशित करता हूँ, उसी प्रकार इस विश्व को भी । अतः मैं यह समस्त विश्व ही हूँ अथवा कुछ भी नहीं ।2।
अब शरीर सहित इस विश्व को त्याग कर किसी कौशल द्वारा ही मेरे द्वारा परमात्मा का दर्शन किया जाता है ।3।
जिस प्रकार पानी लहर, फेन और बुलबुलों से पृथक नहीं है । उसी प्रकार आत्मा भी स्वयं से निकले इस विश्व से अलग नहीं है ।4।
जिस प्रकार विचार करने पर वस्त्र तंतु (धागा) मात्र ही ज्ञात होता है । उसी प्रकार यह समस्त विश्व आत्मा मात्र ही है ।5।
जिस प्रकार गन्ने के रस से बनी शक्कर उससे ही व्याप्त होती है । उसी प्रकार यह विश्व मुझसे ही बना है । और निरंतर मुझसे ही व्याप्त है ।6।
आत्मा अज्ञानवश ही विश्व के रूप में दिखाई देती है । आत्मज्ञान होने पर यह विश्व दिखाई नहीं देता है । रस्सी अज्ञानवश सर्प जैसी दिखाई देती है । रस्सी का ज्ञान हो जाने पर सर्प दिखाई नहीं देता है ।7।
प्रकाश मेरा स्वरुप है । इसके अतिरिक्त मैं कुछ और नहीं हूँ । वह प्रकाश जैसे इस विश्व को प्रकाशित करता है । वैसे ही इस ‘मैं’ भाव को भी ।8।
आश्चर्य, यह कल्पित विश्व अज्ञान से मुझमें दिखाई देता है । जैसे सीप में चाँदी, रस्सी में सर्प और सूर्य किरणों में पानी ।9।
मुझसे उत्पन्न हुआ विश्व मुझमें ही विलीन हो जाता है जैसे घड़ा मिटटी में, लहर जल में और कड़ा सोने में विलीन हो जाता है ।10।
आश्चर्य है, मुझको नमस्कार है । समस्त विश्व के नष्ट हो जाने पर भी जिसका विनाश नहीं होता ।
जो तृण से ब्रह्मा तक सबका विनाश होने पर भी विद्यमान रहता है ।11।
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । मैं एक हूँ । शरीर वाला होते हुए भी जो न कहीं जाता है । और न कहीं आता है । और समस्त विश्व को व्याप्त करके स्थित है ।12।
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । जो कुशल है । और जिसके समान कोई और नहीं है । जिसने इस शरीर को बिना स्पर्श करते हुए इस विश्व को अनादि काल से धारण किया हुआ है ।13।
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । जिसका यह कुछ भी नहीं है । अथवा जो भी वाणी और मन से समझ में आता है । वह सब जिसका है ।14।
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता यह तीनों वास्तव में नहीं हैं । यह जो अज्ञानवश दिखाई देता है । वह निष्कलंक मैं ही हूँ ।15।
द्वैत (भेद) सभी दुखों का मूल कारण है । इसकी इसके अतिरिक्त कोई और औषधि नहीं है कि यह सब जो दिखाई दे रहा है । वह सब असत्य है । मैं एक, चैतन्य और निर्मल हूँ ।16।
मैं केवल ज्ञान स्वरुप हूँ । अज्ञान से ही मेरे द्वारा स्वयं में अन्य गुण कल्पित किये गए हैं । ऐसा विचार करके मैं सनातन और कारण रहित रूप से स्थित हूँ ।17।
न मुझे कोई बंधन है और न कोई मुक्ति का भ्रम । मैं शांत और आश्रय रहित हूँ । मुझमें स्थित यह विश्व भी वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है ।18। 
यह निश्चित है कि इस शरीर सहित यह विश्व अस्तित्वहीन है । केवल शुद्ध, चैतन्य आत्मा का ही अस्तित्व है । अब इसमें क्या कल्पना की जाये ।19।
शरीर, स्वर्ग, नरक, बंधन, मोक्ष और भय ये सब कल्पना मात्र ही हैं । इनसे मुझ चैतन्य स्वरुप का क्या प्रयोजन है ।20।
आश्चर्य कि मैं लोगों के समूह मंत भी दूसरे को नहीं देखता हूँ । वह भी निर्जन ही प्रतीत होता है । अब मैं किससे मोह करूँ ।21।
न मैं शरीर हूँ । न यह शरीर ही मेरा है । न मैं जीव हूँ । मैं चैतन्य हूँ । मेरे अन्दर जीने की इच्छा ही मेरा बंधन थी ।22।
आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में चित्त वायु उठने पर ब्रह्माण्ड रूपी विचित्र तरंगें उपस्थित हो जाती हैं ।23।
मुझ अनंत महासागर में चित्त वायु के शांत होने पर जीव रूपी वणिक का संसार रूपी जहाज जैसे दुर्भाग्य से नष्ट हो जाता है ।24।
आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में जीव रूपी लहरें उत्पन्न होती हैं । मिलती हैं । खेलती हैं और स्वभाव से मुझमें प्रवेश कर जाती हैं ।25।
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अध्याय 3
अष्टावक्र कहते हैं -
आत्मा को अविनाशी और एक जानो । उस आत्मज्ञान को प्राप्त कर, किसी बुद्धिमान व्यक्ति की रूचि धन अर्जित करने में कैसे हो सकती है ।1।
स्वयं के अज्ञान से भ्रमवश विषयों से लगाव हो जाता है । जैसे सीप में चाँदी का भ्रम होने पर उसमें लोभ उत्पन्न हो जाता है ।2।
सागर से लहरों के समान जिससे यह विश्व उत्पन्न होता है । वह मैं ही हूँ । जानकर तुम एक दीन जैसे कैसे भाग सकते हो ।3।
यह सुनकर भी कि आत्मा शुद्ध, चैतन्य और अत्यंत सुन्दर है । तुम कैसे जननेंद्रिय में आसक्त होकर मलिनता को प्राप्त हो सकते हो ।4।
सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सब प्राणियों को जानने वाले मुनि में ममता की भावना का बने रहना आश्चर्य ही है ।5। 
एक ब्रह्म का आश्रय लेने वाले और मोक्ष के अर्थ का ज्ञान रखने वाले का आमोद प्रमोद द्वारा उत्पन्न कामनाओं से विचलित होना आश्चर्य ही है ।6।
अंत समय के निकट पहुँच चुके व्यक्ति का उत्पन्न ज्ञान के अमित्र काम की इच्छा रखना, जिसको धारण करने में वह अत्यंत अशक्त है । आश्चर्य ही है ।7।
इस लोक और परलोक से विरक्त, नित्य और अनित्य का ज्ञान रखने वाले और मोक्ष की कामना रखने वालों का मोक्ष से डरना, आश्चर्य ही है ।8।
सदा केवल आत्मा का दर्शन करने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भोजन कराने पर या पीड़ित करने पर न प्रसन्न होते हैं  और न क्रोध ही करते हैं ।9। 
अपने कार्यशील शरीर को दूसरों के शरीरों की तरह देखने वाले महापुरुषों को प्रशंसा या निंदा कैसे विचलित कर सकती है ।10।
समस्त जिज्ञासाओं से रहित, इस विश्व को माया में कल्पित देखने वाले, स्थिर प्रज्ञा वाले व्यक्ति को आसन्न मृत्यु भी कैसे भयभीत कर सकती है ।11।
निराशा में भी समस्त इच्छाओं से रहित, स्वयं के ज्ञान से प्रसन्न महात्मा की तुलना किससे की जा सकती है ।12।
स्वभाव से ही विश्व को दृश्यमान जानो । इसका कुछ भी अस्तित्व नहीं है । यह ग्रहण करने योग्य है और यह त्यागने योग्य, देखने वाला स्थिर प्रज्ञायुक्त व्यक्ति क्या देखता है ? ।13।
विषयों की आतंरिक आसक्ति का त्याग करने वाले, संदेह से परे, बिना किसी इच्छा वाले व्यक्ति को स्वतः आने वाले भोग न दुखी कर सकते है और न सुखी ।14।
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अध्याय 4
अष्टावक्र कहते हैं -
स्वयं को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति इस संसार की परिस्थितियों को खेल की तरह लेता है । उसकी सांसारिक परिस्थितियों का बोझ (दबाव) लेने वाले मोहित व्यक्ति के साथ बिलकुल भी समानता नहीं है ।1।
जिस पद की इन्द्र आदि सभी देवता इच्छा रखते हैं । उस पद में स्थित होकर भी योगी हर्ष नहीं करता है ।2।
उस (ब्रह्म) को जानने वाले के अन्तःकरण से पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता है । जिस प्रकार आकाश में दिखने वाले धुंयें से आकाश का संयोग नहीं होता है ।3।
जिस महापुरुष ने स्वयं को ही इस समस्त जगत के रूप में जान लिया है । उसके स्वेच्छा से वर्तमान में रहने को रोकने की सामर्थ्य किसमें है ।4।
ब्रह्मा से तृण तक, चारों प्रकार के प्राणियों में केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिच्छा का परित्याग करने में समर्थ है ।5।
आत्मा को एक और जगत का ईश्वर कोई कोई ही जानता है । जो ऐसा जान जाता है । उसको किसी से भी किसी प्रकार का भय नहीं है ।6।
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अध्याय 5
अष्टावक्र कहते हैं -
तुम्हारा किसी से भी संयोग नहीं है । तुम शुद्ध हो । तुम क्या त्यागना चाहते हो । इस (अवास्तविक) सम्मिलन को समाप्त कर के ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।1।
जिस प्रकार समुद्र से बुलबुले उत्पन्न होते हैं । उसी प्रकार विश्व एक आत्मा से ही उत्पन्न होता है । यह जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।2।
यद्यपि यह विश्व आँखों से दिखाई देता है परन्तु अवास्तविक है । विशुद्ध तुम में इस विश्व का अस्तित्व उसी प्रकार नहीं है । जिस प्रकार कल्पित सर्प का रस्सी में । यह जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।3।
स्वयं को सुख और दुःख में समान, पूर्ण, आशा और निराशा में समान, जीवन और मृत्यु में समान, सत्य जानकर ब्रह्म से योग ( एकरूपता ) को प्राप्त करो ।4।

अष्टावक्र महागीता 2

अध्याय 6
अष्टावक्र कहते हैं -
आकाश के समान मैं अनंत हूँ और यह जगत घड़े के समान महत्वहीन है । यह ज्ञान है । इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।1।
मैं महासागर के समान हूँ और यह दृश्यमान संसार लहरों के समान । यह ज्ञान है । इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।2।
यह विश्व मुझमें वैसे ही कल्पित है जैसे कि सीप में चाँदी । यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।3।
मैं समस्त प्राणियों में हूँ । जैसे सभी प्राणी मुझमें हैं । यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।4।
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अध्याय 7
जनक कहते हैं -
मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी जहाज अपनी अन्तः वायु से इधर उधर घूमता है पर इससे मुझमें विक्षोभ नहीं होता है ।1।
मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी लहरें माया से स्वयं ही उदित और अस्त होती रहती हैं । इससे मुझमें वृद्धि या क्षति नहीं होती है ।2।
मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता (स्वप्न) है । मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ ।3।
उस अनंत और निरंजन अवस्था में न ‘मैं‘ का भाव है और न कोई अन्य भाव ही, इस प्रकार असक्त, बिना किसी इच्छा के और शांत रूप से मैं स्थित हूँ ।4।
आश्चर्य मैं शुद्ध चैतन्य हूँ और यह जगत असत्य जादू के समान है । इस प्रकार मुझमें कहाँ और कैसे अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की कल्पना ।5।
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अध्याय 8
अष्टावक्र कहते हैं -
तब बंधन है । जब मन इच्छा करता है । शोक करता है । कुछ त्याग करता है । कुछ ग्रहण करता है । कभी प्रसन्न होता है । या कभी क्रोधित होता है ।1।
तब मुक्ति है । जब मन इच्छा नहीं करता है । शोक नहीं करता है । त्याग नहीं करता है । ग्रहण नहीं करता है । प्रसन्न नहीं होता है । या क्रोधित नहीं होता है ।2।
तब बंधन है । जब मन किसी भी दृश्यमान वस्तु में आसक्त है । तब मुक्ति है । जब मन किसी भी दृश्यमान वस्तु में आसक्ति रहित है ।3।
जब तक ‘मैं’ या ‘मेरा’ का भाव है । तब तक बंधन है । जब ‘मैं’ या ‘मेरा’ का भाव नहीं है । तब मुक्ति है । यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही करो ।4।
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अध्याय 9
अष्टावक्र कहते हैं -
यह कार्य करने योग्य है अथवा न करने योग्य और ऐसे ही अन्य द्वंद्व (हाँ या न रूपी संशय) कब और किसके शांत हुए हैं । ऐसा विचार करके विरक्त (उदासीन) हो जाओ । त्यागवान बनो । ऐसे किसी नियम का पालन न करने वाले बनो ।1।
हे पुत्र ! इस संसार की (व्यर्थ) चेष्टा को देख कर किसी धन्य पुरुष की ही जीने की इच्छा, भोगों के उपभोग की इच्छा और भोजन की इच्छा शांत हो पाती है ।2।
यह सब अनित्य है । तीन प्रकार के कष्टों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से घिरा है । सारहीन है । निंदनीय है । त्याग करने योग्य है । ऐसा निश्चित करके ही शांति प्राप्त होती है ।3।
ऐसा कौन सा समय अथवा उम्र है । जब मनुष्य के संशय नहीं रहे हैं । अतः संशयों की उपेक्षा करके अनायास सिद्धि को प्राप्त करो ।4।
महर्षियों, साधुओं और योगियों के विभिन्न मतों को देखकर कौन मनुष्य वैराग्यवान होकर शांत नहीं हो जायेगा ।5।
चैतन्य का साक्षात ज्ञान प्राप्त करके कौन वैराग्य और समता से युक्त कौन गुरु जन्म और मृत्यु के बंधन से तार नहीं देगा ।6।
तत्वों के विकार को वास्तव में उनकी मात्रा के परिवर्तन के रूप में देखो । ऐसा देखते ही उसी क्षण तुम बंधन से मुक्त होकर अपने स्वरुप में स्थित हो जाओगे ।7। 
इच्छा ही संसार है । ऐसा जानकर सबका त्याग कर दो । उस त्याग से इच्छाओं का त्याग हो जायेगा । और तुम्हारी यथारूप अपने स्वरुप में स्थिति हो जाएगी ।8।
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अध्याय 10
अष्टावक्र कहते हैं -
कामना और अनर्थों के समूह धन रूपी शत्रुओं को त्याग दो । इन दोनों के त्याग रूपी धर्म से युक्त होकर सर्वत्र विरक्त (उदासीन) हो जाओ ।1।
मित्र, जमीन, कोषागार, पत्नी और अन्य संपत्तियों को स्वप्न की माया के समान तीन या पाँच दिनों में नष्ट होने वाला देखो ।2।
जहाँ जहाँ आसक्ति हो । उसको ही संसार जानो । इस प्रकार परिपक्व वैराग्य के आश्रय में तृष्णा रहित होकर सुखी हो जाओ ।3।
तृष्णा (कामना) मात्र ही स्वयं का बंधन है । उसके नाश को मोक्ष कहा जाता है । संसार में अनासक्ति से ही निरंतर आनंद की प्राप्ति होती है ।4।
तुम एक (अद्वितीय) चेतन और शुद्ध हो तथा यह विश्व अचेतन और असत्य है । तुममें अज्ञान का लेश मात्र भी नहीं है और जानने की इच्छा भी नहीं है ।5।
पूर्व जन्मों में बहुत बार तुम्हारे राज्य, पुत्र, स्त्री, शरीर और सुखों का, तुम्हारी आसक्ति होने पर भी नाश हो चुका है ।6।
पर्याप्त धन, इच्छाओं और शुभ कर्मों द्वारा भी इस संसार रूपी माया से मन को शांति नहीं मिली ।7।
कितने जन्मों में शरीर, मन और वाणी से दुःख के कारण कर्मों को तुमने नहीं किया ? अब उनसे उपरत (विरक्त) हो जाओ ।8।
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अध्याय 11
अष्टावक्र कहते हैं -
भाव (सृष्टि, स्थिति) और अभाव (प्रलय, मृत्यु) रूपी विकार स्वाभाविक हैं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकार रहित, दुख रहित होकर सुख पूर्वक शांति को प्राप्त हो जाता है ।1।
ईश्वर सबका सृष्टा है कोई अन्य नहीं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाले की सभी आन्तरिक इच्छाओं का नाश हो जाता है । वह शांत पुरुष सर्वत्र आसक्ति रहित हो जाता है ।2।
संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्वकृत कर्मों के अनुसार) है । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है । वह न इच्छा करता है और न शोक ।3।
सुख दुख और जन्म मृत्यु प्रारब्धवश (पूर्वकृत कर्मों के अनुसार) हैं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, फल की इच्छा न रखने वाला, सरलता से कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता है ।4।
चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है ।5। 
न मैं यह शरीर हूँ । और न यह शरीर मेरा है । मैं ज्ञान स्वरुप हूँ । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला जीवन मुक्ति को प्राप्त करता है । वह किये हुए (भूतकाल) और न किये हुए (भविष्य के) कर्मों का स्मरण नहीं करता है ।6।
तृण से लेकर ब्रह्मा तक सब कुछ मैं ही हूँ । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकल्प (कामना) रहित, पवित्र, शांत और प्राप्त अप्राप्त से आसक्ति रहित हो जाता है ।7।
अनेक आश्चर्यों से युक्त यह विश्व अस्तित्वहीन है । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, इच्छा रहित और शुद्ध अस्तित्व हो जाता है । वह अपार शांति को प्राप्त करता है ।8।
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अध्याय 12
जनक कहते हैं -
पहले मैं शारीरिक कर्मों से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ | फिर वाणी से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ । अब चिंता से निरपेक्ष (उदासीन) होकर अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।1।
शब्द आदि विषयों में आसक्ति रहित होकर और आत्मा के दृष्टि का विषय न होने के कारण मैं निश्चल और एकाग्र ह्रदय से अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।2।
अध्यास (असत्य ज्ञान) आदि असामान्य स्थितियों और समाधि को एक नियम के समान देखते हुए मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।3।
हे ब्रह्म को जानने वाले ! त्याज्य (छोड़ने योग्य) और संग्रहणीय से दूर होकर और सुख दुख के अभाव में मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।4।
आश्रम अनाश्रम, ध्यान और मन द्वारा स्वीकृत और निषिद्ध नियमों को देख कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।5।
कर्मों के अनुष्ठान रूपी अज्ञान से निवृत्त होकर और तत्व को सम्यक रूप से जान कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।6।
अचिन्त्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए भी विचार पर ही चिंतन किया जाता है । अतः उस विचार का भी परित्याग करके मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।7।
जो इस प्रकार से आचरण करता है वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है । जिसका इस प्रकार का स्वभाव है । वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है ।8।
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अध्याय 13
जनक कहते हैं -
अकिंचन (कुछ अपना न) होने की सहजता केवल कौपीन पहनने पर भी मुश्किल से प्राप्त होती है । अतः त्याग और संग्रह की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।1।
शारीरिक दुःख भी कहाँ (अर्थात नहीं) हैं । वाणी के दुख भी कहाँ हैं । वहाँ मन भी कहाँ है । सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।2।
किये हुए किसी भी कार्य का वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है । ऐसा तत्व पूर्वक विचार करके, जब जो भी कर्त्तव्य है । उसको करते हुए सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।3।
शरीर भाव में स्थित योगियों के लिए कर्म और अकर्म रूपी बंधनकारी भाव होते हैं  पर संयोग और वियोग की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।4।
विश्राम, गति, शयन, बैठने, चलने और स्वप्न में वस्तुतः मेरे लाभ और हानि नहीं हैं । अतः सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।5।
सोने में मेरी हानि नहीं है और उद्योग अथवा अनुद्योग में मेरा लाभ नहीं है । अतः हर्ष और शोक की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमानहूँ ।6।
सुख, दुख आदि स्थितियों के क्रम से आने के नियम पर बार बार विचार करके, शुभ (अच्छे) और अशुभ (बुरे) की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।7।
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अध्याय 14
जनक कहते हैं -
जो स्वभाव से ही विचार शून्य है और शायद ही कभी कोई इच्छा करता है । वह पूर्व स्मृतियों 
से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है । जैसे कि नींद से जागा हुआ व्यक्ति अपने सपनों से ।1।
जब मैं कोई इच्छा नहीं करता । तब मुझे धन, मित्रों, विषयों, शास्त्रों और विज्ञान से क्या प्रयोजन है ।2।
साक्षी पुरुष रूपी परमात्मा या ईश्वर को जानकर मैं बंधन और मोक्ष से निरपेक्ष हो गया हूँ और मुझे मोक्ष की चिंता भी नहीं है ।3।
आतंरिक इच्छाओं से रहित, बाह्य रूप में चिंता रहित आचरण वाले, प्रायः मत्त पुरुष जैसे ही दिखने वाले प्रकाशित पुरुष अपने जैसे प्रकाशित पुरुषों द्वारा ही पहचाने जा सकते हैं ।4।
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अध्याय 15
अष्टावक्र कहते हैं -
सात्विक बुद्धि से युक्त मनुष्य साधारण प्रकार के उपदेश से भी कृतकृत्य (मुक्त) हो जाता है परन्तु ऐसा न होने पर आजीवन जिज्ञासु होने पर भी परब्रह्म का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है ।1।
विषयों से उदासीन होना मोक्ष है और विषयों में रस लेना बंधन है । ऐसा जानकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा ही करो ।2।
वाणी, बुद्धि और कर्मों से महान कार्य करने वाले मनुष्यों को तत्व ज्ञान शांत, स्तब्ध और कर्म न करने वाला बना देता है । अतः सुख की इच्छा रखने वाले इसका त्याग कर देते हैं ।3।
न तुम शरीर हो और न यह शरीर तुम्हारा है । न ही तुम भोगने वाले अथवा करने वाले हो । तुम चैतन्य रूप हो । शाश्वत साक्षी हो । इच्छा रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो ।4।
राग (प्रियता) और द्वेष (अप्रियता) मन के धर्म हैं और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो । तुम कामना रहित हो । ज्ञान स्वरुप हो । विकार रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो ।5।
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ ।6।
इस विश्व की उत्पत्ति तुमसे उसी प्रकार होती है । जैसे कि समुद्र से लहरों की, इसमें संदेह नहीं है ।  तुम चैतन्य स्वरुप हो । अतः चिंता रहित हो जाओ ।7। 
हे प्रिय ! इस अनुभव पर निष्ठा रखो । इस पर श्रद्धा रखो । इस अनुभव की सत्यता के सम्बन्ध में मोहित मत हो । तुम ज्ञान स्वरुप हो । तुम प्रकृति से परे और आत्म स्वरुप भगवान हो ।8।
गुणों से निर्मित यह शरीर स्थिति, जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है और 
न ही जाती है । 

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