17 जुलाई 2016

अष्टावक्र महागीता 2

अध्याय 6
अष्टावक्र कहते हैं -
आकाश के समान मैं अनंत हूँ और यह जगत घड़े के समान महत्वहीन है । यह ज्ञान है । इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।1।
मैं महासागर के समान हूँ और यह दृश्यमान संसार लहरों के समान । यह ज्ञान है । इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।2।
यह विश्व मुझमें वैसे ही कल्पित है जैसे कि सीप में चाँदी । यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।3।
मैं समस्त प्राणियों में हूँ । जैसे सभी प्राणी मुझमें हैं । यह ज्ञान है, इसका न त्याग करना है और न ग्रहण । बस इसके साथ एकरूप होना है ।4।
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अध्याय 7
जनक कहते हैं -
मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी जहाज अपनी अन्तः वायु से इधर उधर घूमता है पर इससे मुझमें विक्षोभ नहीं होता है ।1।
मुझ अनंत महासागर में विश्व रूपी लहरें माया से स्वयं ही उदित और अस्त होती रहती हैं । इससे मुझमें वृद्धि या क्षति नहीं होती है ।2।
मुझ अनंत महासागर में विश्व एक अवास्तविकता (स्वप्न) है । मैं अति शांत और निराकार रूप से स्थित हूँ ।3।
उस अनंत और निरंजन अवस्था में न ‘मैं‘ का भाव है और न कोई अन्य भाव ही, इस प्रकार असक्त, बिना किसी इच्छा के और शांत रूप से मैं स्थित हूँ ।4।
आश्चर्य मैं शुद्ध चैतन्य हूँ और यह जगत असत्य जादू के समान है । इस प्रकार मुझमें कहाँ और कैसे अच्छे (उपयोगी) और बुरे (अनुपयोगी) की कल्पना ।5।
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अध्याय 8
अष्टावक्र कहते हैं -
तब बंधन है । जब मन इच्छा करता है । शोक करता है । कुछ त्याग करता है । कुछ ग्रहण करता है । कभी प्रसन्न होता है । या कभी क्रोधित होता है ।1।
तब मुक्ति है । जब मन इच्छा नहीं करता है । शोक नहीं करता है । त्याग नहीं करता है । ग्रहण नहीं करता है । प्रसन्न नहीं होता है । या क्रोधित नहीं होता है ।2।
तब बंधन है । जब मन किसी भी दृश्यमान वस्तु में आसक्त है । तब मुक्ति है । जब मन किसी भी दृश्यमान वस्तु में आसक्ति रहित है ।3।
जब तक ‘मैं’ या ‘मेरा’ का भाव है । तब तक बंधन है । जब ‘मैं’ या ‘मेरा’ का भाव नहीं है । तब मुक्ति है । यह जानकर न कुछ त्याग करो और न कुछ ग्रहण ही करो ।4।
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अध्याय 9
अष्टावक्र कहते हैं -
यह कार्य करने योग्य है अथवा न करने योग्य और ऐसे ही अन्य द्वंद्व (हाँ या न रूपी संशय) कब और किसके शांत हुए हैं । ऐसा विचार करके विरक्त (उदासीन) हो जाओ । त्यागवान बनो । ऐसे किसी नियम का पालन न करने वाले बनो ।1।
हे पुत्र ! इस संसार की (व्यर्थ) चेष्टा को देख कर किसी धन्य पुरुष की ही जीने की इच्छा, भोगों के उपभोग की इच्छा और भोजन की इच्छा शांत हो पाती है ।2।
यह सब अनित्य है । तीन प्रकार के कष्टों (दैहिक, दैविक और भौतिक) से घिरा है । सारहीन है । निंदनीय है । त्याग करने योग्य है । ऐसा निश्चित करके ही शांति प्राप्त होती है ।3।
ऐसा कौन सा समय अथवा उम्र है । जब मनुष्य के संशय नहीं रहे हैं । अतः संशयों की उपेक्षा करके अनायास सिद्धि को प्राप्त करो ।4।
महर्षियों, साधुओं और योगियों के विभिन्न मतों को देखकर कौन मनुष्य वैराग्यवान होकर शांत नहीं हो जायेगा ।5।
चैतन्य का साक्षात ज्ञान प्राप्त करके कौन वैराग्य और समता से युक्त कौन गुरु जन्म और मृत्यु के बंधन से तार नहीं देगा ।6।
तत्वों के विकार को वास्तव में उनकी मात्रा के परिवर्तन के रूप में देखो । ऐसा देखते ही उसी क्षण तुम बंधन से मुक्त होकर अपने स्वरुप में स्थित हो जाओगे ।7। 
इच्छा ही संसार है । ऐसा जानकर सबका त्याग कर दो । उस त्याग से इच्छाओं का त्याग हो जायेगा । और तुम्हारी यथारूप अपने स्वरुप में स्थिति हो जाएगी ।8।
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अध्याय 10
अष्टावक्र कहते हैं -
कामना और अनर्थों के समूह धन रूपी शत्रुओं को त्याग दो । इन दोनों के त्याग रूपी धर्म से युक्त होकर सर्वत्र विरक्त (उदासीन) हो जाओ ।1।
मित्र, जमीन, कोषागार, पत्नी और अन्य संपत्तियों को स्वप्न की माया के समान तीन या पाँच दिनों में नष्ट होने वाला देखो ।2।
जहाँ जहाँ आसक्ति हो । उसको ही संसार जानो । इस प्रकार परिपक्व वैराग्य के आश्रय में तृष्णा रहित होकर सुखी हो जाओ ।3।
तृष्णा (कामना) मात्र ही स्वयं का बंधन है । उसके नाश को मोक्ष कहा जाता है । संसार में अनासक्ति से ही निरंतर आनंद की प्राप्ति होती है ।4।
तुम एक (अद्वितीय) चेतन और शुद्ध हो तथा यह विश्व अचेतन और असत्य है । तुममें अज्ञान का लेश मात्र भी नहीं है और जानने की इच्छा भी नहीं है ।5।
पूर्व जन्मों में बहुत बार तुम्हारे राज्य, पुत्र, स्त्री, शरीर और सुखों का, तुम्हारी आसक्ति होने पर भी नाश हो चुका है ।6।
पर्याप्त धन, इच्छाओं और शुभ कर्मों द्वारा भी इस संसार रूपी माया से मन को शांति नहीं मिली ।7।
कितने जन्मों में शरीर, मन और वाणी से दुःख के कारण कर्मों को तुमने नहीं किया ? अब उनसे उपरत (विरक्त) हो जाओ ।8।
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अध्याय 11
अष्टावक्र कहते हैं -
भाव (सृष्टि, स्थिति) और अभाव (प्रलय, मृत्यु) रूपी विकार स्वाभाविक हैं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकार रहित, दुख रहित होकर सुख पूर्वक शांति को प्राप्त हो जाता है ।1।
ईश्वर सबका सृष्टा है कोई अन्य नहीं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाले की सभी आन्तरिक इच्छाओं का नाश हो जाता है । वह शांत पुरुष सर्वत्र आसक्ति रहित हो जाता है ।2।
संपत्ति (सुख) और विपत्ति (दुःख) का समय प्रारब्धवश (पूर्वकृत कर्मों के अनुसार) है । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला संतोष और निरंतर संयमित इन्द्रियों से युक्त हो जाता है । वह न इच्छा करता है और न शोक ।3।
सुख दुख और जन्म मृत्यु प्रारब्धवश (पूर्वकृत कर्मों के अनुसार) हैं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, फल की इच्छा न रखने वाला, सरलता से कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता है ।4।
चिंता से ही दुःख उत्पन्न होते हैं किसी अन्य कारण से नहीं । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, चिंता से रहित होकर सुखी, शांत और सभी इच्छाओं से मुक्त हो जाता है ।5। 
न मैं यह शरीर हूँ । और न यह शरीर मेरा है । मैं ज्ञान स्वरुप हूँ । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला जीवन मुक्ति को प्राप्त करता है । वह किये हुए (भूतकाल) और न किये हुए (भविष्य के) कर्मों का स्मरण नहीं करता है ।6।
तृण से लेकर ब्रह्मा तक सब कुछ मैं ही हूँ । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला विकल्प (कामना) रहित, पवित्र, शांत और प्राप्त अप्राप्त से आसक्ति रहित हो जाता है ।7।
अनेक आश्चर्यों से युक्त यह विश्व अस्तित्वहीन है । ऐसा निश्चित रूप से जानने वाला, इच्छा रहित और शुद्ध अस्तित्व हो जाता है । वह अपार शांति को प्राप्त करता है ।8।
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अध्याय 12
जनक कहते हैं -
पहले मैं शारीरिक कर्मों से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ | फिर वाणी से निरपेक्ष (उदासीन) हुआ । अब चिंता से निरपेक्ष (उदासीन) होकर अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।1।
शब्द आदि विषयों में आसक्ति रहित होकर और आत्मा के दृष्टि का विषय न होने के कारण मैं निश्चल और एकाग्र ह्रदय से अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।2।
अध्यास (असत्य ज्ञान) आदि असामान्य स्थितियों और समाधि को एक नियम के समान देखते हुए मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।3।
हे ब्रह्म को जानने वाले ! त्याज्य (छोड़ने योग्य) और संग्रहणीय से दूर होकर और सुख दुख के अभाव में मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।4।
आश्रम अनाश्रम, ध्यान और मन द्वारा स्वीकृत और निषिद्ध नियमों को देख कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।5।
कर्मों के अनुष्ठान रूपी अज्ञान से निवृत्त होकर और तत्व को सम्यक रूप से जान कर मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।6।
अचिन्त्य के सम्बन्ध में विचार करते हुए भी विचार पर ही चिंतन किया जाता है । अतः उस विचार का भी परित्याग करके मैं अपने स्वरुप में स्थित हूँ ।7।
जो इस प्रकार से आचरण करता है वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है । जिसका इस प्रकार का स्वभाव है । वह कृतार्थ (मुक्त) हो जाता है ।8।
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अध्याय 13
जनक कहते हैं -
अकिंचन (कुछ अपना न) होने की सहजता केवल कौपीन पहनने पर भी मुश्किल से प्राप्त होती है । अतः त्याग और संग्रह की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।1।
शारीरिक दुःख भी कहाँ (अर्थात नहीं) हैं । वाणी के दुख भी कहाँ हैं । वहाँ मन भी कहाँ है । सभी प्रयत्नों को त्याग कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।2।
किये हुए किसी भी कार्य का वस्तुतः कोई अस्तित्व नहीं है । ऐसा तत्व पूर्वक विचार करके, जब जो भी कर्त्तव्य है । उसको करते हुए सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।3।
शरीर भाव में स्थित योगियों के लिए कर्म और अकर्म रूपी बंधनकारी भाव होते हैं  पर संयोग और वियोग की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।4।
विश्राम, गति, शयन, बैठने, चलने और स्वप्न में वस्तुतः मेरे लाभ और हानि नहीं हैं । अतः सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।5।
सोने में मेरी हानि नहीं है और उद्योग अथवा अनुद्योग में मेरा लाभ नहीं है । अतः हर्ष और शोक की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमानहूँ ।6।
सुख, दुख आदि स्थितियों के क्रम से आने के नियम पर बार बार विचार करके, शुभ (अच्छे) और अशुभ (बुरे) की प्रवृत्तियों को छोड़कर सभी स्थितियों में, मैं सुखपूर्वक विद्यमान हूँ ।7।
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अध्याय 14
जनक कहते हैं -
जो स्वभाव से ही विचार शून्य है और शायद ही कभी कोई इच्छा करता है । वह पूर्व स्मृतियों 
से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है । जैसे कि नींद से जागा हुआ व्यक्ति अपने सपनों से ।1।
जब मैं कोई इच्छा नहीं करता । तब मुझे धन, मित्रों, विषयों, शास्त्रों और विज्ञान से क्या प्रयोजन है ।2।
साक्षी पुरुष रूपी परमात्मा या ईश्वर को जानकर मैं बंधन और मोक्ष से निरपेक्ष हो गया हूँ और मुझे मोक्ष की चिंता भी नहीं है ।3।
आतंरिक इच्छाओं से रहित, बाह्य रूप में चिंता रहित आचरण वाले, प्रायः मत्त पुरुष जैसे ही दिखने वाले प्रकाशित पुरुष अपने जैसे प्रकाशित पुरुषों द्वारा ही पहचाने जा सकते हैं ।4।
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अध्याय 15
अष्टावक्र कहते हैं -
सात्विक बुद्धि से युक्त मनुष्य साधारण प्रकार के उपदेश से भी कृतकृत्य (मुक्त) हो जाता है परन्तु ऐसा न होने पर आजीवन जिज्ञासु होने पर भी परब्रह्म का यथार्थ ज्ञान नहीं होता है ।1।
विषयों से उदासीन होना मोक्ष है और विषयों में रस लेना बंधन है । ऐसा जानकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो वैसा ही करो ।2।
वाणी, बुद्धि और कर्मों से महान कार्य करने वाले मनुष्यों को तत्व ज्ञान शांत, स्तब्ध और कर्म न करने वाला बना देता है । अतः सुख की इच्छा रखने वाले इसका त्याग कर देते हैं ।3।
न तुम शरीर हो और न यह शरीर तुम्हारा है । न ही तुम भोगने वाले अथवा करने वाले हो । तुम चैतन्य रूप हो । शाश्वत साक्षी हो । इच्छा रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो ।4।
राग (प्रियता) और द्वेष (अप्रियता) मन के धर्म हैं और तुम किसी भी प्रकार से मन नहीं हो । तुम कामना रहित हो । ज्ञान स्वरुप हो । विकार रहित हो । अतः सुखपूर्वक रहो ।5।
समस्त प्राणियों को स्वयं में और स्वयं को सभी प्राणियों में स्थित जान कर अहंकार और आसक्ति से रहित होकर तुम सुखी हो जाओ ।6।
इस विश्व की उत्पत्ति तुमसे उसी प्रकार होती है । जैसे कि समुद्र से लहरों की, इसमें संदेह नहीं है ।  तुम चैतन्य स्वरुप हो । अतः चिंता रहित हो जाओ ।7। 
हे प्रिय ! इस अनुभव पर निष्ठा रखो । इस पर श्रद्धा रखो । इस अनुभव की सत्यता के सम्बन्ध में मोहित मत हो । तुम ज्ञान स्वरुप हो । तुम प्रकृति से परे और आत्म स्वरुप भगवान हो ।8।
गुणों से निर्मित यह शरीर स्थिति, जन्म और मरण को प्राप्त होता है । आत्मा न आती है और 
न ही जाती है । 
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