26 जुलाई 2016

बच्चे न पढ़ें न सही..पर

बाल्यावस्था में ऐसी ही एक कहानी पढ़ी थी । जिसमें एक युवा चोर को न्यायालय में न्यायाधीश द्वारा सजा सुनाई जा रही थी । वाद निर्णय के दौरान चोर की माँ भी उपस्थिति थी । चोर को सजा होने के बाद न्यायाधीश ने उससे पूछा - तुम कुछ कहना चाहते हो ?
चोर ने कहा - हाँ, वह बात मैं अपनी माँ के कान में कहना चाहता हूँ ।
चोर अपनी माँ के पास गया । और उसका कान काट कर बोला - यदि बचपन में ही तू मुझे चोरी करने पर रोकती । प्रताङित करती । तो आज यह दिन नहीं आता । 
फ़िर कुछ ऐसे ही मिले जुले भावों की और भी कहानियां पढ़ीं । जिनमें किसी छोटे गांव, छोटे कस्बे जैसे स्थान पर किसी छोटे से ही स्कूल में अचानक किसी उच्चाधिकारी का वाहन रुकता है । उच्चाधिकारी वाहन से उतरकर प्राथमिक विद्यालय के उन गुरु को आदर से चरण स्पर्श करता है । तो सहमे से और झेंपे से वह गुरु चौंक कर उस अधिकारी से उसका परिचय पूछते हैं ।
और वह कहता है - गुरुजी, मैं आपका वही नालायक शिष्य चिन्टू पिन्टू ( आदि ) हूँ । जिसे आपने झूठ बोलने, चोरी करने, पाठ याद न करने पर ( वह ) दण्ड दिया था आदि । आज आपके कठोर अनुशासन, नियम कानून और शिक्षा से ही मैं तुच्छ इस स्थान पर पहुँचा हूँ ।
प्रातःकाल उठकर रघुनाथा । गुरु पितु मातु नवावै माथा ।
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छठी के छात्र छेदी ने छत्तीस की जगह बत्तीस कहकर जैसे ही बत्तीसी दिखाई । गुरुजी ने छङी उठाई । और मारने वाले ही थे कि छेदी ने कहा - खबरदार ! अगर मुझे मारा तो । मैं गिनती नहीं जानता । मगर RTE की धाराएँ अच्छी तरह जानता हूँ । गणित में नहीं, हिंदी में समझाना आता है ।
गुरुजी चौराहों पर खड़ी मूर्तियों की तरह जङवत हो गए । जो कल तक बोल नहीं पाता था । वो आज आँखें दिखा रहा था ।
शोरगुल सुनकर प्रधानाध्यापक भी उधर आ धमके । कई दिनों से उनका कार्यालय से निकलना ही नहीं हुआ था । वे हमेशा विवादों से दूर रहना पसंद करते थे । इसी कारण से उन्होंने बच्चों को पढ़ाना भी बंद कर दिया था ।
आते ही उन्होंने छङी को तोड़ कर बाहर फेंका । और बोले - सरकार का आदेश नही पढ़ा ? प्रताड़ना का केस दर्ज हो सकता है । रिटायरमेंट नजदीक है । निलंबन की मार पड़ गई । तो पेंशन के फजीते पड़ जाएँगे । बच्चे न पढ़ें, न सही ? पर प्रेम से पढ़ाओ । उनसे निवेदन करो ? अगर कही शिकायत कर दी तो ?
बेचारे गुरुजी पसीने पसीने हो गए । मानो हर बूँद से प्रायश्चित टपक रहा हो । इधर छेदी गुरुजी ‘हाय हाय’ के नारे लगाता जा रहा था । और बाकी बच्चे भी उसके साथ हो लिए ।
प्रधानाध्यापक ने छेदी को एक कोने में ले जाकर कहा - मुझसे कहो, क्या चाहिए ?
छेदी बोला - जब तक गुरुजी मुझसे माफी नही माँग लेते हैं । हम विद्यालय का बहिष्कार करेंगे । बताए कि शिकायत पेटी कहाँ है ?
समस्त स्टाफ आश्चर्यचकित और भय का वातावरण हो चुका था । छात्र जान चुके थे कि उत्तीर्ण होना उनका कानूनी अधिकार है ।
बड़े सर ने छेदी से कहा कि - मैं उनकी तरफ से माफी माँगता हूँ ।
पर छेदी बोला - आप क्यों मांगोगे ? जिसने किया । वही माफी माँगे । मेरा अपमान हुआ है ।
आज गुरुजी के सामने बहुत बड़ा संकट था । जिस छेदी के बाप तक को उन्होंने दंड, दृढ़ता और अनुशासन से पढ़ाया था । आज उनकी ये तीनों शक्तियां परास्त हो चुकी थी । वे इतने भयभीत हो चुके थे कि एकांत में छेदी के पैर तक छूने को तैयार थे । लेकिन सार्वजनिक रूप से गुरुता के ग्राफ को गिराना नही चाहते थे । 
छङी के संग उनका मनोबल ही नहीं, परंपरा और प्रणाली भी टूट चुकी थी । सारी व्यवस्था, नियम कानून एक्सपायर हो चुके थे । कानून क्या कहता है ? अब ये बच्चों से सीखना पङेगा ।
पाठयक्रम में अधिकारों का वर्णन था । कर्तव्यों का पता नही था । अंतिम पड़ाव पर गुरु द्रोण स्वयं चक्रव्यूह में फँस जाएँगे । वे प्रण कर चुके थे कि कल से बच्चे जैसा कहेंगे । वैसा ही वे करेंगे ।
तभी बड़े सर उनके पास आकर बोले - मैं आपको समझ रहा हूँ । वह मान गया है । और अंदर आ रहा है । उससे माफी माँग लो । समय की यही जरूरत है ।
छेदी अंदर आकर टेबल पर बैठ गया । और हवा के तेज झोंके ने शर्मिन्दा होकर द्वार बंद कर दिए ।
कलम को चाहिए कि - यही थम जाए । कई बार मौन की भाषा संवादों पर भारी पड़ जाती है ।
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ये व्यंग्य चित्र और व्यंग्य शब्द दोनों किन्हीं अज्ञात सृजकों के ‘प्रतिलिपि चेपन’ यानी आंग्ल भाषा में ‘कापी पेस्ट’ हैं । 
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