17 जुलाई 2016

अष्टावक्र महागीता 1

अध्याय 1
जनक, अष्टावक्र से पूछते हैं - हे प्रभु, ज्ञान की प्राप्ति कैसे होती है । मुक्ति कैसे प्राप्त होती है । वैराग्य कैसे प्राप्त किया जाता है ? ये सब मुझे बताएं ।1।
अष्टावक्र उत्तर देते हैं - यदि आप मुक्ति चाहते हैं तो अपने मन से विषयों (वस्तुओं के उपभोग की इच्छा) को विष की तरह त्याग दीजिये ।
क्षमा, सरलता, दया, संतोष तथा सत्य का अमृत की तरह सेवन कीजिये ।2।
आप न पृथ्वी हैं, न जल न अग्नि न वायु अथवा आकाश ही हैं । मुक्ति के लिए इन तत्वों के साक्षी, चैतन्यरूप आत्मा को जानिए ।3।
यदि आप स्वयं को इस शरीर से अलग करके, चेतना में विश्राम करें । तो तत्काल ही सुख, शांति और बंधन मुक्त अवस्था को प्राप्त होंगे ।4।
आप ब्राह्मण आदि सभी जातियों अथवा ब्रह्मचर्य आदि सभी आश्रमों से परे हैं । तथा आँखों से दिखाई न पड़ने वाले हैं । आप निर्लिप्त, निराकार और इस विश्व के साक्षी हैं । ऐसा जान कर सुखी हो जाएँ ।5।
धर्म, अधर्म, सुख, दुख मस्तिष्क से जुड़ें हैं । सर्व व्यापक आपसे नहीं । न आप करने वाले हैं । और न भोगने वाले हैं । आप सदा मुक्त ही हैं ।6।
आप समस्त विश्व के एकमात्र दृष्टा हैं । सदा मुक्त ही हैं । आपका बंधन केवल इतना है कि आप दृष्टा किसी और को समझते हैं ।7।
अहंकार रूपी महासर्प के प्रभाववश आप ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसा मान लेते हैं । ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’ इस विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो जाईये ।8।
मैं एक, विशुद्ध ज्ञान हूँ । इस निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान वन को जला दें । इस प्रकार शोक रहित होकर सुखी हो जाएँ ।9।
जहाँ ये विश्व रस्सी में सर्प की तरह अवास्तविक लगे । उस आनंद, परम आनंद की अनुभूति करके सुख से रहें ।10।
स्वयं को मुक्त मानने वाला मुक्त ही है और बद्ध मानने वाला बंधा हुआ ही है । यह कहावत सत्य ही है कि - जैसी बुद्धि होती है । वैसी ही गति होती है ।11।
आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक, मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छारहित एवं शांत है । भ्रमवश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है ।12।
अपरिवर्तनीय, चेतन व अद्वैत आत्मा का चिंतन करें और ‘मैं’ के भ्रम रूपी आभास से मुक्त होकर, बाह्य विश्व की अपने अन्दर ही भावना करें ।13।
हे पुत्र ! बहुत समय से आप ‘मैं शरीर हूँ’ इस भाव बंधन से बंधे हैं । स्वयं को अनुभव कर, ज्ञान रूपी तलवार से इस बंधन को काटकर सुखी हो जाएँ ।14।
आप असंग, अक्रिय, स्वयं प्रकाशवान तथा सर्वथा दोष मुक्त हैं । आपका ध्यान द्वारा मस्तिष्क को शांत रखने का प्रयत्न ही बंधन है ।15।
यह विश्व तुम्हारे द्वारा व्याप्त किया हुआ है । वास्तव में तुमने इसे व्याप्त किया हुआ है । तुम शुद्ध और ज्ञान स्वरुप हो । छोटेपन की भावना से ग्रस्त मत हो ।16।
आप इच्छा रहित, विकार रहित, घन (ठोस) शीतलता के धाम, अगाध बुद्धिमान हैं । शांत होकर केवल चैतन्य की इच्छा वाले हो जाइये ।17।

आकार को असत्य जानकर निराकार को ही चिर स्थायी मानिये । इस तत्व को समझ लेने के बाद पुनः जन्म लेना संभव नहीं है ।18।
जिस प्रकार दर्पण में प्रतिबिंबित रूप उसके अन्दर भी है और बाहर भी । उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर भी निवास करता है और उसके बाहर भी ।19।
जिस प्रकार एक ही आकाश पात्र के भीतर और बाहर व्याप्त है । उसी प्रकार शाश्वत और सतत परमात्मा समस्त प्राणियों में विद्यमान है ।20।
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अध्याय 2
जनक कहते हैं -
आश्चर्य ! मैं निष्कलंक, शांत, प्रकृति से परे, ज्ञान स्वरुप हूँ । इतने समय तक मैं मोह से संतप्त किया गया ।1।
जिस प्रकार मैं इस शरीर को प्रकाशित करता हूँ, उसी प्रकार इस विश्व को भी । अतः मैं यह समस्त विश्व ही हूँ अथवा कुछ भी नहीं ।2।
अब शरीर सहित इस विश्व को त्याग कर किसी कौशल द्वारा ही मेरे द्वारा परमात्मा का दर्शन किया जाता है ।3।
जिस प्रकार पानी लहर, फेन और बुलबुलों से पृथक नहीं है । उसी प्रकार आत्मा भी स्वयं से निकले इस विश्व से अलग नहीं है ।4।
जिस प्रकार विचार करने पर वस्त्र तंतु (धागा) मात्र ही ज्ञात होता है । उसी प्रकार यह समस्त विश्व आत्मा मात्र ही है ।5।
जिस प्रकार गन्ने के रस से बनी शक्कर उससे ही व्याप्त होती है । उसी प्रकार यह विश्व मुझसे ही बना है । और निरंतर मुझसे ही व्याप्त है ।6।
आत्मा अज्ञानवश ही विश्व के रूप में दिखाई देती है । आत्मज्ञान होने पर यह विश्व दिखाई नहीं देता है । रस्सी अज्ञानवश सर्प जैसी दिखाई देती है । रस्सी का ज्ञान हो जाने पर सर्प दिखाई नहीं देता है ।7।
प्रकाश मेरा स्वरुप है । इसके अतिरिक्त मैं कुछ और नहीं हूँ । वह प्रकाश जैसे इस विश्व को प्रकाशित करता है । वैसे ही इस ‘मैं’ भाव को भी ।8।
आश्चर्य, यह कल्पित विश्व अज्ञान से मुझमें दिखाई देता है । जैसे सीप में चाँदी, रस्सी में सर्प और सूर्य किरणों में पानी ।9।
मुझसे उत्पन्न हुआ विश्व मुझमें ही विलीन हो जाता है जैसे घड़ा मिटटी में, लहर जल में और कड़ा सोने में विलीन हो जाता है ।10।
आश्चर्य है, मुझको नमस्कार है । समस्त विश्व के नष्ट हो जाने पर भी जिसका विनाश नहीं होता ।
जो तृण से ब्रह्मा तक सबका विनाश होने पर भी विद्यमान रहता है ।11।
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । मैं एक हूँ । शरीर वाला होते हुए भी जो न कहीं जाता है । और न कहीं आता है । और समस्त विश्व को व्याप्त करके स्थित है ।12।
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । जो कुशल है । और जिसके समान कोई और नहीं है । जिसने इस शरीर को बिना स्पर्श करते हुए इस विश्व को अनादि काल से धारण किया हुआ है ।13।
आश्चर्य है । मुझको नमस्कार है । जिसका यह कुछ भी नहीं है । अथवा जो भी वाणी और मन से समझ में आता है । वह सब जिसका है ।14।
ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता यह तीनों वास्तव में नहीं हैं । यह जो अज्ञानवश दिखाई देता है । वह निष्कलंक मैं ही हूँ ।15।
द्वैत (भेद) सभी दुखों का मूल कारण है । इसकी इसके अतिरिक्त कोई और औषधि नहीं है कि यह सब जो दिखाई दे रहा है । वह सब असत्य है । मैं एक, चैतन्य और निर्मल हूँ ।16।
मैं केवल ज्ञान स्वरुप हूँ । अज्ञान से ही मेरे द्वारा स्वयं में अन्य गुण कल्पित किये गए हैं । ऐसा विचार करके मैं सनातन और कारण रहित रूप से स्थित हूँ ।17।
न मुझे कोई बंधन है और न कोई मुक्ति का भ्रम । मैं शांत और आश्रय रहित हूँ । मुझमें स्थित यह विश्व भी वस्तुतः मुझमें स्थित नहीं है ।18। 
यह निश्चित है कि इस शरीर सहित यह विश्व अस्तित्वहीन है । केवल शुद्ध, चैतन्य आत्मा का ही अस्तित्व है । अब इसमें क्या कल्पना की जाये ।19।
शरीर, स्वर्ग, नरक, बंधन, मोक्ष और भय ये सब कल्पना मात्र ही हैं । इनसे मुझ चैतन्य स्वरुप का क्या प्रयोजन है ।20।
आश्चर्य कि मैं लोगों के समूह मंत भी दूसरे को नहीं देखता हूँ । वह भी निर्जन ही प्रतीत होता है । अब मैं किससे मोह करूँ ।21।
न मैं शरीर हूँ । न यह शरीर ही मेरा है । न मैं जीव हूँ । मैं चैतन्य हूँ । मेरे अन्दर जीने की इच्छा ही मेरा बंधन थी ।22।
आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में चित्त वायु उठने पर ब्रह्माण्ड रूपी विचित्र तरंगें उपस्थित हो जाती हैं ।23।
मुझ अनंत महासागर में चित्त वायु के शांत होने पर जीव रूपी वणिक का संसार रूपी जहाज जैसे दुर्भाग्य से नष्ट हो जाता है ।24।
आश्चर्य, मुझ अनंत महासागर में जीव रूपी लहरें उत्पन्न होती हैं । मिलती हैं । खेलती हैं और स्वभाव से मुझमें प्रवेश कर जाती हैं ।25।
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अध्याय 3
अष्टावक्र कहते हैं -
आत्मा को अविनाशी और एक जानो । उस आत्मज्ञान को प्राप्त कर, किसी बुद्धिमान व्यक्ति की रूचि धन अर्जित करने में कैसे हो सकती है ।1।
स्वयं के अज्ञान से भ्रमवश विषयों से लगाव हो जाता है । जैसे सीप में चाँदी का भ्रम होने पर उसमें लोभ उत्पन्न हो जाता है ।2।
सागर से लहरों के समान जिससे यह विश्व उत्पन्न होता है । वह मैं ही हूँ । जानकर तुम एक दीन जैसे कैसे भाग सकते हो ।3।
यह सुनकर भी कि आत्मा शुद्ध, चैतन्य और अत्यंत सुन्दर है । तुम कैसे जननेंद्रिय में आसक्त होकर मलिनता को प्राप्त हो सकते हो ।4।
सभी प्राणियों में स्वयं को और स्वयं में सब प्राणियों को जानने वाले मुनि में ममता की भावना का बने रहना आश्चर्य ही है ।5। 
एक ब्रह्म का आश्रय लेने वाले और मोक्ष के अर्थ का ज्ञान रखने वाले का आमोद प्रमोद द्वारा उत्पन्न कामनाओं से विचलित होना आश्चर्य ही है ।6।
अंत समय के निकट पहुँच चुके व्यक्ति का उत्पन्न ज्ञान के अमित्र काम की इच्छा रखना, जिसको धारण करने में वह अत्यंत अशक्त है । आश्चर्य ही है ।7।
इस लोक और परलोक से विरक्त, नित्य और अनित्य का ज्ञान रखने वाले और मोक्ष की कामना रखने वालों का मोक्ष से डरना, आश्चर्य ही है ।8।
सदा केवल आत्मा का दर्शन करने वाले बुद्धिमान व्यक्ति भोजन कराने पर या पीड़ित करने पर न प्रसन्न होते हैं  और न क्रोध ही करते हैं ।9। 
अपने कार्यशील शरीर को दूसरों के शरीरों की तरह देखने वाले महापुरुषों को प्रशंसा या निंदा कैसे विचलित कर सकती है ।10।
समस्त जिज्ञासाओं से रहित, इस विश्व को माया में कल्पित देखने वाले, स्थिर प्रज्ञा वाले व्यक्ति को आसन्न मृत्यु भी कैसे भयभीत कर सकती है ।11।
निराशा में भी समस्त इच्छाओं से रहित, स्वयं के ज्ञान से प्रसन्न महात्मा की तुलना किससे की जा सकती है ।12।
स्वभाव से ही विश्व को दृश्यमान जानो । इसका कुछ भी अस्तित्व नहीं है । यह ग्रहण करने योग्य है और यह त्यागने योग्य, देखने वाला स्थिर प्रज्ञायुक्त व्यक्ति क्या देखता है ? ।13।
विषयों की आतंरिक आसक्ति का त्याग करने वाले, संदेह से परे, बिना किसी इच्छा वाले व्यक्ति को स्वतः आने वाले भोग न दुखी कर सकते है और न सुखी ।14।
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अध्याय 4
अष्टावक्र कहते हैं -
स्वयं को जानने वाला बुद्धिमान व्यक्ति इस संसार की परिस्थितियों को खेल की तरह लेता है । उसकी सांसारिक परिस्थितियों का बोझ (दबाव) लेने वाले मोहित व्यक्ति के साथ बिलकुल भी समानता नहीं है ।1।
जिस पद की इन्द्र आदि सभी देवता इच्छा रखते हैं । उस पद में स्थित होकर भी योगी हर्ष नहीं करता है ।2।
उस (ब्रह्म) को जानने वाले के अन्तःकरण से पुण्य और पाप का स्पर्श नहीं होता है । जिस प्रकार आकाश में दिखने वाले धुंयें से आकाश का संयोग नहीं होता है ।3।
जिस महापुरुष ने स्वयं को ही इस समस्त जगत के रूप में जान लिया है । उसके स्वेच्छा से वर्तमान में रहने को रोकने की सामर्थ्य किसमें है ।4।
ब्रह्मा से तृण तक, चारों प्रकार के प्राणियों में केवल आत्मज्ञानी ही इच्छा और अनिच्छा का परित्याग करने में समर्थ है ।5।
आत्मा को एक और जगत का ईश्वर कोई कोई ही जानता है । जो ऐसा जान जाता है । उसको किसी से भी किसी प्रकार का भय नहीं है ।6।
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अध्याय 5
अष्टावक्र कहते हैं -
तुम्हारा किसी से भी संयोग नहीं है । तुम शुद्ध हो । तुम क्या त्यागना चाहते हो । इस (अवास्तविक) सम्मिलन को समाप्त कर के ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।1।
जिस प्रकार समुद्र से बुलबुले उत्पन्न होते हैं । उसी प्रकार विश्व एक आत्मा से ही उत्पन्न होता है । यह जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।2।
यद्यपि यह विश्व आँखों से दिखाई देता है परन्तु अवास्तविक है । विशुद्ध तुम में इस विश्व का अस्तित्व उसी प्रकार नहीं है । जिस प्रकार कल्पित सर्प का रस्सी में । यह जानकर ब्रह्म से योग (एकरूपता) को प्राप्त करो ।3।
स्वयं को सुख और दुःख में समान, पूर्ण, आशा और निराशा में समान, जीवन और मृत्यु में समान, सत्य जानकर ब्रह्म से योग ( एकरूपता ) को प्राप्त करो ।4।
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