24 फ़रवरी 2013

दिल को सही और गलत से कोई वास्ता नहीं - प्रेम कुल्हरी


नमस्ते राजीव अंकल । आदरणीय राजीव जी ! मैं आपके ब्लाग को सितम्बर 2011 से पढ रहाँ हुँ । आज पहली बार आपको रिप्लाई कर रहा हुँ ।एक दिन इन्टरनेट पर सर्च करते करते अनायास ही आपके ब्लाग पर पहुँच गया । आपके बहुत से लेख मुझे बहुत अच्छे लगे । आपकी लिखी कहानियों से मैं बहुत प्रभावित हुआ । और फिर कुछ दिनों बाद आपके ब्लाग पर ओशो के बारे में पढा । गूगल पर ओशो को सर्च किया । और एक बार ओशो से टच हुआ । तो बस ओशो में ही डुब गया । लगा जैसे सब कुछ जो चाहिए था । मिल गया ।
राजीव जी ! मै आपको धन्यवाद देना चाहता हुँ कि आपके जरिये मैं ओशो तक पहुँचा । । इसलिये मैंने आपको ये मेल किया । मुझे ओशो तक पहुँचाने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद । कभी कभी आप कहते हैं कि ओशो अपने उद्देश्य में सफल नहीं हुये । पर यहाँ तो

बात ही अलग है । मैंने आज तक किसी ओशो संगठन या सन्यासी से सम्पर्क नहीं किया । सिर्फ ओशो को पढा । और सुना । केवल ओशो को सुनने से इतना परिवर्तन मुझमें हुआ । जिसकी मैने कल्पना भी नहीं की थी ।
जो लङका हमेशा गुमसुम, उदास और डरा हुआ रहता था । वो अब फुलों कि तरह खिलखिलाने लगा ।
कभी मैं अच्छे समय में भी कमियाँ ढुढ लेता था । आज कठिन समय में भी अच्छाई और खुशी ही नजर आती है ।
पहले मैं भगवान से डरता था । या किसी डर । या इच्छा पूर्ति हेतु भगवान को याद करता था । आज बिना किसी कारण परम पिता और प्रकृति से प्रेम करने लगा हुँ ।
और ये मेरे बाबा ( हनुमान जी ) कितने अच्छे हैं । उन दिनों मैं बाबा से कहता था कि या तो मेरे लिऐ भी गुरू भेज । या तू खुद ही आजा । खुद तो नहीं आये । पर आपके जरिये ओशो से मिला दिया । thankyou so much
अगर ओशो को सुनकर कोई बदल सकता है । तो वो खुद क्या होंगे । कितना विराट अस्तित्व होगा उनका । कितने सौभाग्यशाली होंगे उनके साथी ।
यह बात जरूर है कि ओशो ने अपने जैसा ओशो एक भी नहीं बनाया ।अपना एक अँश भी नहीं ।पर ये ओशो की असफलता तो नहीं ।क्योंकि ओशो केवल लोगों को जागृत होना सिखाते थे । ओशो होना नहीं ।उनके कई शिष्यों ने परम लक्ष्य को प्राप्त किया । पर ओशो जैसा गुरू कोई नहीं बन पाया । ओशो हमेशा कहते थे कि - संबुद्ध होना सर्वज्ञ होना नहीं है ।
राजीव जी ! आपके कई लेख मुझे बहुत अच्छे लगे ।कई लेख अच्छे नहीं भी लगे। आपके अनुसार मैंने कबीर साहेब की " अनुराग सागर " भी पढी । पर उसे मैं समझ नहीं पाया । इतना ही समझ आया कि या तो अनुराग 

सागर कबीर जी ने नहीं लिखी । अगर कबीर जी ने लिखी है । तो इसके बहुत गहरे अर्थ हैं । जो मैं समझ नहीं पाया । । हाँ इतना तो तय है कि सत्य पुरूष । कालपुरूष । महामाया । सृष्टि रचना आदि आदि । ये सब सच नहीं । या तो ये बहुत गहरे प्रतीक हैं । या फिर उस समय के जनमानस को जागृत करने के लिए कबीर जी की एक युक्ति है । खैर.. जो भी मैं इसे नहीं समझ पाया ।
आप जन जागृति का महान कार्य कर रहे हैं । मैं आपका बहुत बहुत आभारी हुँ । इस सँदेश में मैंने जो कुछ भी गलत लिखा । उसके लिये क्षमा चाहता हुँ । क्योंकि ये सब मैने दिमाग से नहीं । दिल से लिखा है । और दिल को सही और गलत से कोई वास्ता नहीं हैं । उसे तो बस अपने आपको खोलकर रख देना होता है ।
आपका - प्रेम कुल्हरी । B.Sc. का एक student
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