04 जनवरी 2014

तस्वीरों से प्रत्युत्तर नहीं आते

ऐसे ही समझो । जैसे दीया शब्द लिखकर और दीवाल पर टांग दो । तो रात कोई प्रकाश थोड़े ही हो जायेगा । अंधेरी रात है । सो अंधेरी रहेगी । दीये की बातों से रोशनी तो नहीं होती ।
पिकासो से 1 महिला ने कहा कि कल आपके द्वारा बनाई गई आपकी ही तस्वीर, सेल्फ पोट्रेंट, मैंने 1 मित्र के घर में देखा । इतना सुंदर, इतना प्यारा कि मैं अपने को रोक न पायी । मैंने उसे चूम लिया ।
पिकासो ने कहा - फिर क्या हुआ ? उस तस्वीर ने तुम्हें चूमा या नहीं ?
उस स्त्री ने कहा - आप भी क्या बात करते हैं । नहीं चूमा ।
तो पिकासो ने कहा - फिर वह मेरी तस्वीर न रही होगी ।
मुल्ला नसरुद्दीन को उसके पड़ोसी ने कहा कि आपके साहबजादे को सम्हालो । अभी से ज्या है । कल मेरी पत्नी को पत्थर मारा ।
मुल्ला ने पूछा - लगा ? उसने कहा कि नहीं । तो उसने कहा - वे किसी और के साहबजादे होंगे । मेरे साहबजादे का निशाना तो लगता ही है । वे किसी और के होंगे । तुम गलती समझे । ऐसा ही पिकासो ने कहा कि फिर वह मेरी तस्वीर न रही होगी । मैं तो नहीं था वह । चुंबन का उत्तर ही न आया । तो क्या खाक बात बनी । प्रत्युत्तर आना चाहिए ।
तस्वीरों से प्रत्युत्तर नहीं आते । इसलिये तस्वीरे भी छोटी पड़ जाती हैं । हमारे गीत भी छोटे पड़ जाते हैं । हमारे शब्द भी, शास्त्र भी छोटे पड़ जाते हैं । इस जगत में जो हम जानते हैं । वह भी कहा नहीं जा सकता । किसी मां ने अपने बेटे को प्रेम किया । कैसे कहो । प्रेम शब्द में क्या है ? कोई भी दोहराता है । कहो कि मुझे अपने बेटे से बहुत प्रेम है । या अपनी पत्नी से बहुत प्रेम है । क्या मतलब ? यहां तो लोग हैं । जो कहते हैं - आइस्क्रीम से प्रेम है । कोई कहता है - मुझे मेरी कार से बहुत प्रेम है । जहाँ आइस्क्रीम और कारों से प्रेम चल रहा है । प्रेम शब्द का अर्थ क्या रह गया ? जब तुम कहते हो - मुझे अपनी पत्नी से बहुत प्रेम है । तुम्हारी पत्नी है या आइस्क्रीम ? प्रेम का अर्थ क्या रहा ? हमारे शब्द छोटे हैं । उन्हीं छोटे शब्दों का हम सब तरह से उपयोग करते हैं । सीमा है उनकी । जगत में जो अनुभव में आता है । वह भी उनमें नहीं समाता । तो वह जो परम अनुभव है । आत्यंतिक अनुभव है । जहां सब विचार शून्य 0 हो जाते हैं । शांत हो जाते हैं । जहां व्यक्ति भाषा के पार निकल जाता है । जहाँ तर्क जाल पीछे छूट जाते हैं । जहा निर्विचार होता है । उसमें जिसकी प्रतीति होती है । उसे कह न सकोगे ।
जे जानति ते कहति नहिं - इसलिये जिन्होंने जाना है । वे नहीं कह पाये । आज तक कोई भी नहीं कह पाया । तुम सोचते हो । मैं तुमसे रोज कहता हूं । कह पाता हूं ? नहीं । और सब कह लेता हूं । मगर वह अगम्य अगम्य ही रह जाता है । उसके आसपास बहुत कुछ कह लेता हूं । लेकिन कोई तीर शब्द का उस निशान पर नहीं लगता । और सब कहा जा सकता है । लेकिन सब कहना इशारों से ज्यादा नहीं है ।
जो मैं कहता हूं । उसको मत पकड लेना । जो कहता हूं । वह तो ऐसा ही है । जैसे मील का पत्थर । और उस पर तीर का निशान लगा है कि दिल्ली 100 मील दूर है । उसी को पकड़कर मत बैठ जाना कि आ गए दिल्ली । मैं जो कहता हूं । वह तो ऐसे ही है । जैसे कोई अंगुली से चांद दिखाये । अंगुली को मत पूजने लगना । सारे शास्त्र चांद को बताई गयी अंगुलियां हैं । चांद को कोई अंगुली प्रगट नहीं करती । लेकिन जो समझदार हैं । वे इशारे को पकड़ लेते हैं । समझदार को इशारा काफी । ओशो

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