06 जनवरी 2014

आस्तिक नास्तिक में कोई भेद नहीं

आस्तिक और नास्तिक में जरा भी भेद नहीं है । 
एक विधायक रूप से भयभीत है । एक नकारात्मक रूप से भयभीत है  बस ऋण और धन का फर्क है । मगर भय दोनों का है । 
नास्तिक डर के कारण कह रहा है - ईश्वर नहीं है । क्योंकि ईश्वर को मानना तो फिर उसके पीछे और बहुत कुछ मानना पड़ता है । जो उसे कंपाता है । आस्तिक कह रहा है - ईश्वर है । विधायक रूप से भयभीत है । वह कह रहा है - ईश्वर है  अगर मैं उसको न मानूं । उसकी स्तुति न करूं प्रार्थना पूजा न करूं । उसको मनाऊं न तो सताया जाऊंगा ।
धार्मिक व्यक्ति कहता है - ईश्वर के दोनों रूप हैं । ईश्वर आस्तिक और नास्तिक दोनों की धारणाओं और विश्वासों के पार है ।
बसती न सुन्यं - न तो वह है ऐसा कह सकते न कह सकते कि नहीं है ।

सुन्यं न बसती - न कह सकते कि शून्य है  न कह सकते कि पूर्ण है । अगम अगोचर ऐसा ।
ऐसा अगम्य है । हमारा कोई शब्द उसको माप नहीं सकता । हमारे शब्द छोटी छोटी चाय की चम्मचों जैसे हैं । वह सागर जैसा है । इन चाय की चम्मचों में सागर को नहीं भरा जा सकता और न सागर को नापा जा सकता है । हमारे सब माप बड़े छोटे हैं । हमारे हाथ बड़े छोटे हैं हमारी सामर्थ्य बड़ी छोटी है । उसका विस्तार अनंत है । वह असीम है अगम अगोचर ऐसा ।
रहिमन बात अगम्य की । कहनि सुननि की नाहिं ।
जे जानति ते कहति नहिं । कहत ते जानति नाहिं ।
रहिमन बात अगम्य की ।
वह इतना अगम्य है । अगम्य शब्द का अर्थ समझना । अगम्य का अर्थ होता है - जिसकी हम थाह न पा सकें, अथाह । लाख करें उपाय और थाह न पा सकें क्योंकि उसकी थाह है ही नहीं और जो उसकी थाह लेने गये हैं । वे धीरे धीरे उसी में लीन हो गये हैं ।
कहते हैं 2  नमक के पुतले 1 बार सागर की थाह लेने गये थे । छलांग लगा दी सागर में । भीड़ इकट्ठी हो गयी थी । मेला भरा था सागर के तट पर । सारे लोग आ गये थे । फिर दिनों तक प्रतीक्षा होती रही । फिर मेला धीरे धीरे उजड़ भी गया । वे नमक के पुतले न लौटे । सो न लौटे । नमक के पुतलों को थाह भी न मिली और खुद भी मिट गये ।
हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराइ ।
गये थे खोजने, खो गये । नमक के पुतले सागर की खोज में जायेंगे । कब तक बचेंगे ? गल गये होंगे । सागर के ही हिस्से थे । इसलिये नमक के पुतले का खयाल है । हम भी नमक के पुतले हैं । वह सागर है । उसे खोजने जायेंगे । खो जायेंगे ।
अगम्य का अर्थ होता है - सिर्फ अज्ञात नहीं । क्योंकि अज्ञात वह है जो कभी ज्ञात हो जाएगा । आज जो ज्ञात हो गया है । कभी अज्ञात था । चांद पर आदमी नहीं चला था । अब आदमी चल लिया । अभी तक चांद अज्ञात था । अब ज्ञात हो गया । हमें अणु का रहस्य पता नहीं था अब पता हो गया ।
परमात्मा अज्ञात नहीं है । यही धर्म और विज्ञान का भेद है ।
धर्म कहता है - जगत में 3 तरह की बातें हैं -
ज्ञात, जो जान लिया गया । 
अज्ञात, जो जान लिया जाएगा । 
और अज्ञेय, जो न जाना गया है और न जाना जायेगा । 
विज्ञान कहता है - जगत में सिर्फ 2 ही चीजें हैं । ज्ञात और अज्ञात ।
विज्ञान 2 हिस्सों में बांटता है - जगत को । जो जान लिया गया और जो जान लिया जाएगा । बस उस 1 अज्ञेय शब्द में ही धर्म का सारा सार छुपा है । कुछ ऐसा भी है । जो न जाना गया और न जाना जाएगा । क्योंकि उसका राज यह है कि उसे खोजने वाला खो जाता है उसमें ।
रहिमन बात अगम्य की, कहनि सुननि की नाहिं ।
और जब खोजने वाला ही खो गया । तो कौन कहे  क्या कहे कैसे कहे ? 
सब शब्द बड़े छोटे हैं । बड़े ओछे हैं । तुम जीवन में भी अनुभव करते हो तो पाओगे । उठे सुबह सुबह, बगीचे में सूरज उगने लगा । वृक्ष जगने लगे । धरती की सौंधी सौंधी सुगंध उठने लगी । अभी अभी वर्षा हुई होगी । घास के पत्तों पर ओस की बूंदें मोतियों जैसी चमकने लगीं । पक्षी गीत गाने लगे । कोई मोर नाचा । कोई कोयल कूकी । फूल खिले । कमलों ने अपनी पंखुड़ियां खोल दीं । 
यह सब तुम देख रहे हो यह अगोचर भी नहीं है गोचर है । यह अज्ञात भी नहीं है  तुम्हें, ज्ञात है । यह सारा सौंदर्य तुम अनुभव कर रहे हो । तुमसे कोई पूछे । कह डालो 1 शब्द में । क्या कहोगे ? 
इतना ही कहोगे - सुंदर था । बहुत सुंदर था । 
मगर यह भी कोई कहना है ? इस "बहुत सुंदर" में न तो सूरज की कोई किरण है । न माटी की सौंधी सुगंध है  न कमल की खिलती हुई पंखुड़ियां हैं न पक्षियों के गीत हैं न शबनम के मोती हैं । न वृक्षों की हरियाली है न मुक्त आकाश है । कुछ भी तो नहीं ।
बहुत सुंदर में क्या है ?
कुछ भी तो नहीं । वर्णमाला के थोड़े से अक्षर हैं ।
ओशो
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