04 जनवरी 2013

इसलिये कम नहीं होते 37 वर्ष


25 nov 2012 को मेरी गाङी तेजी से आगरा से दूर जा रही थी । कुछ समझ में नहीं आ रहा था । यात्रा उद्देश्य पूर्ण है । या निरुद्देश्य । कोई 1 महीना पुरानी गाङी जब नई नई शो रूम से बाहर आयी थी । तभी उसे 1 पहचान नम्बर और मालिकी का पंजीकरण दे दिया था । गाङी लगभग बेआवाज हल्की सर सर सी करती हुयी सङक पर तैर सी रही थी । बिलकुल मेरी तरह ही । जैसे मेरी सांसों का स्पंदन ही मेरे जीवित होने का अहसास कराता है । सङकों पर तीवु सांसारिक हलचल फ़ैली हुयी थी । मिश्रित ध्वनियों का वही परिचित सा शोर । और जैसी कि मेरी अजीव सोच है । मैं खिङकी से बाहर के आकर्षक दृश्यों के बजाय इस गाङी के बारे में सोच रहा था । इसकी आयु । इसका नया पुराना होना । और कहाँ कहाँ जायेगी ये ? क्या इसका अपना कोई उद्देश्य है ? या मालिक जिधर स्टेयरिंग घुमा दे । अपनी कोई इच्छा नहीं । जैसे अपना 

कोई वजूद नहीं । ये बहुत कुछ मुझसे मेल खाता है । आधी जिन्दगी खत्म हो चुकी है । 43..वर्ष यात्रा पूरी हो चुकी है । 37 वर्ष और तय करने हैं । कम नहीं होते 37 वर्ष । यदि यात्रा का कोई उत्साह न बचा हो । यात्रा खत्म हो गयी हो । कहीं कोई रस नहीं । आगरा से आश्रम तक का सफ़र सिर्फ़ 3 घण्टे का है । यधपि दूरी 70 Km ही है । पर देहाती सङकें 125 की गति पर चलने की इजाजत नहीं देती । टूंडला की मुख्य सङक से कार " नारखी " की  देहाती सङक पर मुङ गयी । और ग्रामीण जन जीवन की झलक सामने आने लगी । पतली सी कमजोर सङक और उसके दोनों तरफ़ जंगली झाङियाँ । इसलिये कम नहीं होते 37 वर्ष । है ना कुछ अजीव सा ?  सांसारिक दृष्टि से यह 1 रोमांचक यात्रा है । कोई भी देशी विदेशी पर्यटक इस पर ढेरों वीडियो क्लिप बना सकता था । पर मैं कभी नहीं । क्योंकि ये मुझे अन्दर से रोमांचित नहीं करते । क्योंकि मुझे कुछ भी रोमांचित नहीं करता । रोमांच शब्द ही मेरे शब्दकोश में नहीं है । बस कुछ नये नये बर्ताब जैसे हैं सब । बस नये रूप रंग । नये नये दृश्य । और वही पुरानी रामलीला । अति सुहावने दृश्यों के बाबजूद भी मैं ऊब कर आँखे बन्द कर लेता हूँ । और हठात अपनी 1 बृह्माण्डीय यात्रा पर मेरा ध्यान जाता है । ध्वनि और वायु ( गैस ) की तकनीक पर आधारित दिव्य लोक में अति तीवृ गति से उङता दिव्य विमान । इसकी बनाबट लगभग इसी प्रथ्वी के विमानों जैसी थी । बेहद लम्बा पर एकदम डैने रहित । बस इसमें डैने के नीचे इंजिन होने के बजाय लगभग 75% पीछे पूँछ के समीप था । और इसकी वर्ट्रीकल टेल भी यहाँ की अपेक्षा कम ऊँची थी । सवसे वङी वात ध्वनि ऊर्जा से चलने वाला यह विमान एकदम ध्बनि रहित उङता था । 
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 इसलिये उन्हें बात रुचती नहीं है । उन्हें बड़ी अड़चन होती है । उन्हें यह स्वीकार ही नहीं हो पाता कि नृत्य का और ध्यान से कोई संबंध हो सकता है, कि संगीत का और ध्यान से कोई संबंध हो सकता है । उन्हें यह बात समझ में नहीं आती । और निश्चित ही तब वे मेरे प्रति क्रोध से भर जाते हैं । इस अपूर्व स्थल के प्रति उनके मन में सिवाय द्वेष के और दुश्मनी के कुछ भी पैदा नहीं होता । उन्होंने अपने दुख को खूब मजबूती से पकड़ा है । वे दुख को छोड़ने को राजी नहीं हैं । और जब तक इस देश से दुख की यह आदत न टूटेगी । तब तक इस देश के सौभाग्य का उदय होने वाला नहीं ।
और मैं तुमसे कहता हूं कि धर्म का यह आदेश नहीं है कि तुम दुखी हो जाओ । धर्म आनंद की खोज है । तभी तो हमने परमात्मा को सच्चिदानंद कहा है । धर्म परम आनंद की खोज है । और इस जगत के आनंद, छोटे छोटे आनंद, उस मंदिर की सीढ़ी बना लेने हैं । इस जगत के सुखों को छोड्कर सच्चिदानंद मिलेगा । यह बात गलत है । क्योंकि जो इस जगत के आनंद लेने को भी राजी नहीं है । वह परमात्मा को झेलने का साहस कब जुटा पायेगा ? जो छोटे छोटे सुख नहीं ले पाता । वह उस बड़े सुख को कैसे झेल पायेगा ? जो चुल्लू भर पानी नहीं पी पाता । जब सागर उसके कंठ में उतरेगा । तो कैसे पी पायेगा ? नहीं । वह डूब जायेगा । मर जायेगा ।
मेरे हिसाब में यह संसार पाठशाला है । यहां हमें छोटे छोटे पाठ पढ़ाये जा रहे हैं । देखो फूलों को । खिलो फूलों जैसे । देखो इंद्रधुनषों को । रंगो अपने जीवन को इंद्रधनुषों जैसा । सुनो संगीत । बनो संगीत । उठने दो गीत तुम्हारा भी ।
पक्षियों में तुमने कोई महात्मा देखा है ? कि बैठे हों धूनी लगाये । रेत पोते. रो रहे हैं । त्रिशूल गड़ाये हैं । उपवास कर रहे हैं । तुमने कोई वृक्ष देखा है । जिसको तुम महात्मा कह सको ? वृक्ष ने फैलाई हैं अपनी जड़ें भूमि में । पी रहा है रस । खिलाये हैं फूल । कर रहा है गुफ्तगू चांद तारों से । मनुष्य को छोड्कर तुम्हें कहीं महात्मा मिलते हैं ? मनुष्य को छोड्कर तुम्हें कहीं दुख मिलता है ?
जरा सोचो तो, प्रकृति जो कि मनुष्य से पीछे है । पशु पक्षी और पौधे भी तुमसे ज्यादा सुखी हैं । तुम्हें क्या हो गया है ? तुम्हें कौन सी प्लेग लग गयी ? तुम्हारे चित्त पर रुग्ण लोग सवार हो गये हैं । तुम्हारे चित्त पर विक्षिप्त लोगों ने साम्राज्य स्थापित कर लिया है । जो सुखी नहीं हो सकते । उन्होंने दुख की महिमा गायी है । जो सुख की कला नहीं जानते । ऐसे हीन लोग दुख का गुणगान करते रहे हैं । और उन्होंने यह बात तर्क पूर्वक तुम्हारे चित्त में बिठा दी है कि तुम दुखी होओगे । तो परमात्मा के प्यारे होओगे ।
गोरख कुछ और कहते हैं । मैं कुछ और कहता हूं ।
हसिबा खेलिबा धरिबा ध्यान । अहनिसि कथिबा ब्रह्मगियान ।
फिर तुम्हारा उठना बैठना, बोलना, श्वास लेना, सब तुम्हारे ब्रह्मज्ञान की अभिव्यक्ति हो जायेगी ।
हंसै षेलै न करै मन भंग । ते निहचल सदा नाथ के संग ।
फिर जुड़ जायेगा सत्संग । फिर प्रभु के साथ ही हो । फिर वह तुम्हारे साथ है । फिर भेद नहीं है ।
छांडै आसा रहै निरास । कहै ब्रह्मा हूं ताका दास ।
और आदमियों की तो क्या बात । वह जो ब्रह्मा है । वह भी आकर तुम्हारे आनंद से भरे हुए जीवन को नमस्कार करेगा । कहेगा - कहै ब्रह्मा हूं ताका दास । देवता भी उसकी स्तुति करते हैं । जो मनुष्य आनंदमग्न हो जाता है । देवता भी उसके प्रति ईर्ष्या से भरते हैं ।
अभी तो तुम्हारी दशा ऐसी हो गयी कि नरक में जो नारकीय हैं । वे भी तुम पर दया करते होंगे । वे भी सोचते होंगे कि कहीं कोई हमसे पाप न हो जाये । नहीं तो पृथ्वी पर पैदा होना पड़े । और विशेष कर पुण्‍यभूमि भारत में । कोई पाप न हो जाये नरक में । नहीं तो पुण्य भूमि भारत भेजे जायें । ऐसी नरक में अफवाहें दें उड़ी हैं । ओशो        
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