14 दिसंबर 2015

20% सत्य और 80% असत्य

अगर आप बेहोशी की नींद में नही हैं तो सिर्फ़ शास्त्र ही नही राजनीति, समाज आदि जगत व्यवहार में प्रचलित 80-90% व्याप्त असत्य का अक्सर ही आभास होगा । दरअसल 20% सत्य में 80% असत्य का निरन्तर घुलनशील मिश्रण का नाम ही सृष्टि है । सृष्टि ! जगत नहीं लिखा मैंने । क्योंकि जगत सिर्फ़ सृष्टि खंड का आभास देता है ।
अतः यदि 20% सत्य और 80% असत्य को जाना जाये । महसूस किया जाये । तो बहुत से आधारहीन प्रश्न बचते ही नही हैं । और ये अनावश्यक प्रश्न ही बाधक बने हुये हैं । बंधन हैं । जन्म मरण, पाप पुण्य, सुख दुख, ज्ञान माया भी हैं ।
लेकिन मेरा विषय बिन्दु अध्यात्म है और अध्यात्म का स्पष्ट हो जाना ही सृष्टि रहस्य का मूल है - एकहि साधै सब सधै ।
वर्तमान उपलब्ध सतसाहित्य तथ्यों को लेकर असत्य से भरपूर तो है ही । उसमें पतनकारी सामग्री भी समाहित है । यह बात वैश्विक है ।
ऐसे सत्य असत्य के मिश्रण के पीछे कई प्राकृतिक कारण स्व स्फ़ूर्त होते हैं । जो गलत लगते हुये भी पूर्णतया सही हैं । असत्य में रहना ही परिवर्तनशील सृष्टि है । और जाग्रत होकर शोधन से सत्य का प्रकट होना शाश्वत चैतन्यता है । यही खेल मात्र है ।
उपजा ग्यान बचन तब बोला । नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला ।
अतः ऐसे में असत्य में से सत्य का शोधन करने का एक सरल सा सूत्र है । उन तथ्यों, विवरणों में से सिर्फ़ विज्ञान और क्रियात्मक व्यवहार अलग कर परस्पर अन्य सभी को मिलाकर शोधित किया जाये ।
भारतीय हिन्दू समाज में भी प्रमुख राम, कृष्ण, विष्णु, हनुमान, शंकर, दुर्गा शक्ति आदि को लेकर बहुत सी मिथ्या धारणायें अधिक प्रचलित हैं । ऐसा ही अद्वैत भक्ति या निर्गुण निराकार शाखा में प्रमुख कबीर नानक जी आदि को लेकर हुआ है । ऐसा ही भारत से कोई सम्बन्ध न होते हुये भी दो प्रमुख यीशु और मुहम्मद के प्रति तथ्यों को लेकर चलन है ।

अब यहाँ मूल की बात की जाये । तो धर्मग्रन्थ सम्मत भी अद्वैत ज्ञान ही मूल है । जिसमें कबीर, नानक आदि सन्त आते हैं । साकार द्वैत फ़िर इसका सृष्टि विस्तार है । जिसमें राम, कृष्ण आदि देवी देव आते हैं । बाइबल कुरआन जैसी पुस्तक धर्म आधारित सिर्फ़ गुण सूत्र है । जो बेहद सीमित और प्रारम्भिक सी चर्चा करते हैं ।
इसमें भी ध्यान रखना होगा । मैं मूल वाणियों की बात कह रहा हूँ । अभी प्रचलित मिलावटी और लगभग नकली की नहीं । और गुण शब्द को विशेष ध्यान में रखना । क्योंकि तमो गुण द्वैत, अद्वैत और किसी भी धर्म पदार्थ का एक अभिन्न अंग है । सिर्फ़ देवत्व ही धर्म नही है । दानव भी एक धर्म है । और मनुष्य सृष्टि में यह बृह्मा का ही एक वंश है । लेकिन खास अद्वैत और तम का सम्बन्ध विशेष विचारणीय है । जो एकदम अटपटा भी है । पर अनिवार्य है । क्योंकि सत और रज तो आदि, मध्य में सहज स्वीकार हैं ।
चाहे वो विषय राम, कृष्ण आदि के बारे में हो या कबीर नानक के, सही सहज और सरल सत्य के बजाय भ्रामक अधिक है ।
राम का जन्म आदि कुछ घटनायें, कबीर और नानक का जन्म आदि घटनायें सहज से अधिक चमत्कारिक बनाकर पेश की गयीं । उनके सन्देश निर्देश को कुछ का कुछ मान लिया गया । वो भी उनके कट्टर अनुयायियों द्वारा ।
अगर अंतरज्ञानियों में से कोई या कुछ गोरखनाथ को मछन्दर नाथ का पुत्र बतायें । तो कोई मानने सुनने को तैयार नहीं होगा । हनुमान का सुग्रीव के साथ पर्वत पर आने से पूर्व विवाहित जीवन था । पत्नी हनुमान जी के पर्वत पर जाने के बाद में अपने सम्बन्धियों के पास चली गयीं । मुश्किल है स्वीकारना । मछली द्वारा मानव पुत्र स्वीकृत है । पर वास्तविक सत्य नहीं । कबीर समाधिस्थ ऋषि और हिमालय गयी कुंवारी के गर्भ से उत्पन्न थे । इसको स्वीकारना कठिन है । पर आकाश से सीधा सरोवर कमल पर प्रकट हुये । यह सहज स्वीकार्य है । क्योंकि हमें सिर्फ़ चमत्कारी अस्तित्व पसन्द आते हैं ।
यद्यपि उन्हीं कबीर साहब ने कहा था कि - हाजिर की हुज्जत गये की तलाशी, का जमाने का पुराना चलन है ।
अतः हम एक चमत्कारिक मगर गढी हुयी छवि से सम्मोहित होकर सत्य से दूर हो गये । हम उन्हें तो मानते हैं । पर उनकी ही वाणी आदर्श और चलन को नहीं मानते ।
हाँ, मानते हैं मगर अपनी सुविधा और शर्तों पर और यह हरगिज सत्य नही है ।
पौराणिक कथायें, वेद की ऋचायें और उपनिषद के सूत्रों को पढने रटने मात्र से किसी चमत्कार या किसी चमत्कारिक पुरान पुरुष की या किसी दुर्लभ या अन्तिम प्राप्ति की अपेक्षा रखते हैं । तो यह सिर्फ़ मृग मरीचिका भर ही है । क्योंकि सत्य को पाने हेतु सत्य भेदन करना होगा ।
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