13 दिसंबर 2015

जङ और चेतन

जो इन 3 चित्रों को गहरायी से समझ लेगा । वह परमहंस ज्ञान या जङ चेतन की संयुक्तता और प्रथकता को भी समझ लेगा ।
हरा नारियल - जीव की सर्वाधिक प्रारम्भिक अवस्था है । जिसमें वह निर्मल निर्दोष है ।
कठोर कवच सहित नारियल - लेकिन अभी अधकच्चा हो । यह जीव की घोर अज्ञान अवस्था है ।
कवच से प्रथक हुआ नारियल - पूर्णत मुक्त और ज्ञान अवस्था है ।
( यद्यपि इसका कवच से पूर्णतया अलग गोले का चित्र होना चाहिये । पर वह उपलब्ध नहीं हो सका । इसलिये इसे कवच से अलग मानकर चलें । )

ईश्वर अंश जीव अविनाशी । चेतन अमल सहज सुखराशी ।
जङ चेतन ग्रन्थि परि गयी । जद्यपि मृषा छूटत कठिनई ।
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आपने अक्सर सनातन धर्म की विभिन्न पूजा पद्धतियों में नारियल का प्रयोग होते देखा होगा । लेकिन इसके पीछे क्या कारण है ? यह शायद ज्ञात नहीं होगा । ये तीन चित्र आत्मा के जीव सृष्टि के प्रतीक और फ़िर कृमशः धर्म अर्थ काम का प्रतिनिधित्व करते हुये मोक्ष के प्रतीक है ।
परमहंस ज्ञान की गुप्त पद्धति में तो नारियल मुख्य ही है । आपने कभी गौर किया है । कठोर कवच को तोङकर 

नारियल निकालना एक तरह से कष्टदायक ही है । लेकिन कवच से अलग हुआ नारियल यहाँ मुक्त जीव है और जटिलता से जुङा कवच अज्ञान है । दोनों के अलग होने में जो श्रम, कठिनाईयां, कष्ट आदि आये । वही साधना और भक्ति है ।
तो गहरायी से समझिये इस बन्धन और मुक्ति के सूत्र को ।
इसकी स्पष्ट व्याख्या इसलिये नहीं की । क्योंकि फ़िर उससे अपेक्षित लाभ नहीं होगा ।
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