06 अक्तूबर 2010

मन का कोई अस्तित्व नहीं होता

मन का कोई अस्तित्व नहीं होता । पहली तो बात यह है । सिर्फ विचार होते हैं । दूसरी बात । विचार तुमसे अलग होते हैं । वे ऐसी वस्तु नहीं हैं । जो तुम्हारे स्वभाव के साथ एकाकार हो । वे आते हैं । और चले जाते हैं । तुम बने रहते हो । तुम स्थिर होते हो । तुम ऐसे हो । जैसे कि आसमान । यह कभी आता नहीं । कभी जाता नहीं । यह हमेशा यहां है । बादल आते हैं । और जाते हैं । वे क्षणिक घटना हैं । वे अनंत नहीं हैं । तुम विचार को पकड़ने का प्रयास भी करो । तुम लंबे समय तक रोक नही सकते । उसे जाना ही होगा । उसका अपना जन्म और मृत्यु है । विचार तुम्हारे नहीं हैं । वे तुम्हारे नहीं होते हैं । वे आगंतुक की तरह आते हैं । लेकिन वे मेजबान नहीं हैं । गहरे से देखो । तब तुम मेजबान बन जाओगे । और विचार मेहमान हो जाएंगे । और मेहमान की तरह वे सुंदर हैं । लेकिन यदि तुम पूरी तरह से भूल जाते हो कि तुम मेजबान हो । और वे मेजबान बन जाते हैं । तब तुम मुश्किल में पड़ जाते हो । यही नर्क है । तुम घर के मालिक हो । घर तुम्हारा है । और मेहमान मालिक बन गए हैं । उनका स्वागत करो । उनका ध्यान रखो । लेकिन उनके साथ तादात्म्य मत बनाओ । वरना वे मालिक बन जाएंगे । मन समस्या बन गया है । क्योंकि तुमने विचारों को अपने भीतर इतना गहरे ले लिया है कि तुम अंतराल को पूरी तरह से भूल गए हो । भूल गए कि वे आगंतुक हैं । वे आते हैं । और जाते हैं । हमेशा ध्यान रहे कि जो है । वह तुम्हारा स्वभाव है । तुम्हारा ताओ । हमेशा उसके प्रति सजग रहो । जो न कभी आता है । न कभी जाता है । ऐसे ही जैसे - आकाश । गेस्टाल्ट को बदलो । आगंतुक पर ध्यान मत दो । मेजबान के साथ बने रहो । आगंतुक आएंगे । और जाएंगे ।
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उनमनि चढ़ा गगन रस पीवै । और अब मैं चढ़ गया हूं - उन्मन में । वहां पहुंच गया हूं । जहां मन नहीं है । वहां चढ़ गया । जहां मन नहीं । तुम्हारे भीतर वह जगह है । जहां मन नहीं है । और वहीं तुम हो । जहां तक मन है । वहां तक संसार है । जहां तक मन है । वहां तक बाहर बाहर । जहां मन समाप्त होता है । वहीं भीतर की शुरुआत है । वहीं से अंतर्यात्रा शुरू होती है । मन यानी बाहर । उन्मन यानी भीतर । थोड़ा सोचो । जब तक तुम्हारे मन में विचार चलता है । तब तक तुम बाहर ही रहोगे । क्योंकि सब विचार बाहर के हैं । भीतर का कोई विचार ही नहीं होता । मेरे पास लोग आते हैं । वे कहते हैं - हम ध्यान करते हैं । हम आत्मा का विचार करते हैं । मैं उनसे कहता हूं - आत्मा का विचार कैसे करोगे ? आत्मा का अनुभव होता है । विचार कैसे करोगे ? अगर विचार करोगे । तो उसका आत्मा से कोई संबंध ही न रहा । शास्त्र में पढ़ लिया होगा सिद्धांत, कि आत्मा क्या है ? फिर उसका तुम विचार कर सकते हो । वह तो बाहर की बात हो गई । शास्त्र बाहर है । सत्य भीतर है । आत्मा का तुम विचार कैसे करोगे ? परमात्मा का विचार कैसे करोगे ? ये कोई विचार की बातें हैं ? जब तुम निर्विचार हो जाते हो । तभी तुम्हारा जोड़ बनता है । तभी सांधा बैठ जाता है । उनमनि चढ़ा गगन रस पीवै । और जैसे जैसे तुम ऊपर चढ़ते हो । वैसे वैसे गगन का रस बरसता है - ओशो ।
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एक पहुंचे हुए सन्यासी का एक शिष्य था । जब भी किसी मंत्र का जाप करने बैठता । तो संख्या को खडिया से दीवार पर लिखता । किसी दिन वह लाख की संख्या छू लेता । किसी दिन हजारों में सीमित हो जाता । उसके गुरु उसका यह कर्म नित्य देखते । और मुस्कराते । एक दिन वे उसे पास के शहर में भिक्षा मांगने ले गये । जब वे थक गये । तो लौटते में एक बरगद की छांह बैठे । उसके सामने एक युवा दूधवाली दूध बेच रही थी । जो आता । उसे बर्तन में नापकर देती । और गिनकर पैसे रखवाती । वे दोनों ध्यान से उसे देख रहे थे । तभी एक आकर्षक युवक आया । और दूधवाली के सामने अपना बर्तन फैला दिया । दूधवाली मुस्कराई । और बिना मापे बहुत सारा दूध उस युवक के बर्तन में डाल दिया । पैसे भी नहीं लिये । गुरु मुस्करा दिये । शिष्य हतप्रभ । उन दोनों के जाने के बाद । वे दोनों भी उठे । और अपनी राह चल पडे । चलते चलते शिष्य ने दूधवाली के व्यवहार पर अपनी जिज्ञासा प्रकट की । तो गुरु ने उत्तर दिया - प्रेम वत्स, प्रेम ! यह प्रेम है । और प्रेम में हिसाब कैसा ? उसी प्रकार भक्ति भी प्रेम है । जिससे आप अनन्य प्रेम करते हो । उसके स्मरण में या उसकी पूजा में हिसाब किताब कैसा ? और गुरु वैसे ही मुस्कराये व्यंग्य से ।
- समझ गया गुरुवर । मैं समझ गया । प्रेम और भक्ति के इस दर्शन को । 
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