27 जून 2010

कुन्डलिनी महामाया

सर्व संसार में एक शक्ति काम कर रही है । संसार की समस्त रचना उसी के द्वारा हुयी है । इस शरीर में भी कार्य करने वाली वही शक्ति है । उसको कुन्डलिनी महामाया कहते है ।
इसका स्थान नाभि के नीचे है । पेट में मांस का एक कमल है । इस कमल के बीच ही ह्रदय कमल स्थिति है । इस कमल में सूर्य और चन्द्रमा स्थित है । इस कमल के अन्दर दो और कमल हैं ।
एक कमल नीचे और दूसरा ऊपर है । एक कमल आकाश रूप और दूसरा प्रथ्वी रूप है । ऊपर के कमल में सूर्य का निवास और नीचे के कमल में चन्द्रमा का निवास है ।
इन दोनों के मध्य में ही कुन्डलिनी महामाया रहती है । और साँप के समान साढे तीन लपेटे मारकर बैठी है । वह उज्जवल मोतिंयो के भन्डार के समान प्रकाशित है ।
इससे स्वतः जो वायु निकलती है । वह साँप की फ़ुफ़कार के समान " प्राण " और " अपान " रूप में स्थित रहती है ।
यह दोनों वायु आपस में टकराती हैं । तो इनसे एक प्रकार की संघर्ष शक्ति पैदा होती है । उसका दूसरा नाम जठरागिन है । यह पेट में इस तरह रहती है । जैसे सागर में बङबानल अग्नि का वास होता है । यह दोनों ही जल सुखाती हैं ।


प्राण और अपान परस्पर टक्कर खाती हैं । उससे ह्रदय में बङा प्रकाश होता है । इस ह्रदय में एक भंवरा सोने के रंग का है । उस भंवरे के दर्शन से योगी की दृष्टि लाख योजन तक देखने की क्षमता वाली हो जाती है । शीतल वायु को चन्द्रमा और गर्म वायु को सूर्य कहते हैं ।
इसके मुख से फ़ुँकार की आवाज निकलती है । इस आवाज को " शब्द " प्रणव " ॐ " या मन इत्यादि भी कहते हैं । यह वासनाओं से भरी हुयी होती है । भांति भांति की सांसारिक वासनायें उसका विषय है ।
जब कुन्डलिनी में स्फ़ुरण पैदा होता है । तब " मन " प्रकट होता है । जब निश्चय भाव हुआ । तब बुद्धि उत्तपन्न हुयी । जब " अहं " भाव हुआ । तब अहंकार पैदा हुआ । जब चिन्तन होता है । तब चित्त उत्पन्न होता है । " रस " लेने की इच्छा से " जल " सूँघने की इच्छा से प्रकृति । इसी तरह पाँचों तन्मात्रा । चारों अंतकरण चौदह इन्द्रियां और सब नाङियां इसी कुन्डलिनी से ही उत्पन्न होती हैं ।
मन से तीनों लोक और चारों वेद उत्पन्न होते हैं ।सब कर्म धर्म इसी से प्रकट होते हैं । यह स्थूल

रूप से ब्रह्माण्ड में विराजमान है। पिंड से ब्रह्माण्ड के लिये सुष्मणा नाङी से होकर मार्ग जाता है । प्राण और अपान दोनों तरह की वायु को योगेश्वर सुष्मणा नाङी के मार्ग से ब्रह्माण्ड में पहुँचाते हैं । एक क्षण इस स्थान पर वायु ठहराने से
सिद्ध पुरुषों का दर्शन होता है ।
सुष्मणा के भीतर जो ब्रह्मारन्ध्र है । उसमें पूरक द्वारा कुन्डलिनी शक्ति स्थित होती है । अथवा रेचक प्राणवायु के प्रयोग से बारह अंगुल तक मुख से बाहर अथवा भीतर ऊपर एक मुहूर्त तक एक ही बार स्थित होती है । तब पाँच कोषों में सिद्धों का दर्शन होता है ।
विशेष--अगर आप किसी प्रकार की साधना कर रहे हैं । और साधना मार्ग में कोई परेशानी आ रही है । या फ़िर आपके सामने कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको न मिला हो । या आप किसी विशेष उद्देश्य हेतु कोई साधना करना चाहते हैं । और आपको ऐसा लगता है कि यहाँ आपके प्रश्नों का उत्तर मिल सकता है । तो आप निसंकोच सम्पर्क कर सकते हैं ।
" जाकी रही भावना जैसी । हरि मूरत देखी तिन तैसी । "
" सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू बाधा । "

24 जून 2010

पति होना उसकी मजबूरी है

प्रेम और प्रार्थना का आनंद उनमें ही है - उनके बाहर नहीं । जो उनके द्वारा उनसे कुछ चाहता है । उसे उनके रहस्य का पता नहीं है । प्रेम में डूब जाना ही प्रेम का फल है । और प्रार्थना की तन्मयता और आनंद ही उसका पुरस्कार है ।
ईश्वर का एक प्रेमी अनेक वर्षो से साधना में था । एक रात्रि उसने स्वप्न में सुना कि कोई कह रहा है - प्रभु तेरे भाग्य में नहीं । व्यर्थ श्रम और प्रतीक्षा मत कर । उसने इस स्वप्न की बात अपने मित्रों से कही । किन्तु न तो उसके चेहरे पर उदासी आई । और न ही उसकी साधना ही बंद हुई । उसके मित्रों ने उससे कहा - जब तूने सुन लिया कि तेरे भाग्य का दरवाजा बंद है । तो अब क्यों व्यर्थ प्रार्थनाओं में लगा हुआ है ?
उस प्रेमी ने कहा - व्यर्थ प्रार्थनाएं ? पागलों ! प्रार्थना तो स्वयं में ही आनंद है । कुछ या किसी के मिलने या न मिलने से उसका क्या संबंध है ? और जब कोई अभिलाषा रखने वाला एक दरवाजे से निराश हो जाता है । तो दूसरा दरवाजा खटखटाता है । लेकिन मेरे लिए दूसरा दरवाजा कहां हैं ? प्रभु के अतिरिक्त कोई दरवाजा नहीं ।
उस रात्रि उसने देखा था कि प्रभु उसे आलिंगन में लिए हुए हैं ।
प्रभु के अतिरिक्त जिनकी कोई चाह नहीं है । असंभव है कि वे उसे न पा लें । सब चाहों का एक चाह बन जाना ही मनुष्य के भीतर उस शक्ति को पैदा करता है । जो कि उसे स्वयं को अतिक्रमण कर भागवत चैतन्य में प्रवेश के लिए समर्थ बनाती है ।
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अभी के द्वार में प्रवेश करो । और सब कुछ उदघाटित हो जाता है । तत्काल खुल जाता है । इसी क्षण प्रकट हो जाता है । जीवन कंजूस नहीं है । यह कभी भी कुछ भी नहीं छुपाता है । यह कुछ भी पीछे नहीं रोकता है । यह सब कुछ देने को तैयार है । पूर्ण और बेशर्त । लेकिन तुम तैयार नहीं हो ।
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गुरु बिना घोर अंधेरा रे साधो भाई । 
जब तक कन्या रहे कंवारी । ना ही पति का बेरा । 
ब्याही गई जब पति के संग में । खेले खेल घनेरा । 
तो जब तक भीतर का गुरु नही मिले । तब तक ही अन्धेरा है । शरीर से चैतन्य का मिलन ही शरीर की रोशनी है । जब तुम जागो । तभी सवेरा । हर एक घटना जिन्दगी की याद दिलाती है । जैसे ही जोत जगती है । चाहे गुरु से, ज्ञान से, ध्यान से, कर्म से, भाव से, भक्ति से सब उस निराकार की जोत तक पहुंचाती है । सब जगे हुए है । पीछे से, अतीत से, आज डर लगता है - अतीत से । जिस रोशनी को मुझे बताया गया । वो बुझ ना जाये । लेकिन वो तो किसी और की थी । जिस दिन खुद की रोशनी जगेगी । तब मालूम होगा - मैं कौन था ? क्योंकि तुम खुद रोशनी हो । चैतन्य हो । कृष्ण हो । अंधेरे में अन्धकार ही रह सकता है । अंहकार । वैसे ही चेतना में सिर्फ कृष्ण ही रह सकते हैं ।
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पुरुष की उत्सुकता किसी भी स्त्री में तभी तक होती है । जब तक वह उसे जीत नहीं लेता । जीतते ही उसकी उत्सुकता समाप्त हो जाती है । जीतते ही फिर कोई रस नहीं रह जाता । नीत्शे ने कहा है कि - पुरुष का गहरे से गहरा रस विजय है । कामवासना भी उतनी गहरी नहीं है । कामवासना भी विजय का एक क्षेत्र है । इसलिए पत्नी में उत्सुकता समाप्त हो जाती है । क्योंकि वह जीती ही जा चुकी । उसमें कोई अब जीतने को बाकी नहीं रहा है । इसलिए जो बुद्धिमान पत्नियां हैं । वे सदा इस भांति जीएंगी पति के साथ कि जीतने को कुछ बाकी बना रहे । नहीं तो पुरुष का कोई रस सीधे स्त्री में नहीं है । अगर कुछ अभी जीतने को बाकी है । तो उसका रस होगा । अगर सब जीता जा चुका है । तो उसका रस खो जाएगा । तब कभी कभी ऐसा भी घटित होता है कि अपनी सुंदर पत्नी को छोड़कर वह एक साधारण स्त्री में भी उत्सुक हो सकता है । और तब लोगों को बड़ी हैरानी होती है कि यह उत्सुकता पागलपन की है । इतनी सुंदर उसकी पत्नी है । और वह नौकरानी के पीछे दीवाना हो । पर आप समझ नहीं पा रहे हैं । नौकरानी अभी जीती जा सकती है । पत्नी जीती जा चुकी । सुंदर और असुंदर बहुत मौलिक नहीं हैं । जितनी कठिनाई होगी जीत में । उतना पुरुष का रस गहन होगा । और स्त्री की स्थिति बिलकुल और है । जितना पुरुष मिला हुआ हो । जितना उसे अपना मालूम पड़े । जितनी दूरी कम हो गई हो । उतनी ही वह ज्यादा लीन हो सकेगी । स्त्री इसलिए पत्नी होने में उत्सुक होती है । प्रेयसी होने में उत्सुक नहीं होती । पुरुष प्रेमी होने में उत्सुक होता है । पति होना उसकी मजबूरी है । स्त्री का यह जो संतुलित भाव है । विजय की आकांक्षा नहीं है । यह ज्यादा मौलिक स्थिति है । क्योंकि असंतुलन हमेशा संतुलन के बाद की स्थिति है । संतुलन प्रकृति का स्वभाव है । इसलिए हमने पुरुष को पुरुष कहा है । और स्त्री को प्रकृति कहा है । प्रकृति का मतलब है कि जैसी स्थिति होनी चाहिए स्वभावतः । ओशो ।

19 जून 2010

असली दीक्षा के बारे में और जानें..


दीक्षा के बारे में मेरे ब्लाग पाठकों की जिग्यासा अक्सर बनी ही रहती है । दीक्षा को लेकर उठने वाले सवालों के बारे में जानने के लिये मेरे पास अक्सर email और फ़ोन काल्स भी आते हैं । इस सम्बन्ध में मैंने संक्षेप में कई लेखों में जरूरत के अनुसार जिक्र भी किया है । पर अध्यात्म जिग्यासा एक ऐसी बात है..एक ऐसी उत्सुकता है ।जिसके बारे में जितना बताओ । जिग्यासा उतनी ही बङती जाती है । वास्तव में जो लोग जीवन में धर्म अर्थ और काम तीनों को भरपूर रूप से प्राप्त कर चुके हैं । वे भी उस अजीव बैचेनी को महसूस करते हैं । जो यह फ़ीलिंग देती है कि इस सब प्राप्ति के बाद भी कुछ ऐसा है । जो कहीं खो गया है । हम ने जीवन भर तमाम चीजों में आनन्द की तलाश में ही तो अपनी समस्त ऊर्जा का इस्तेमाल किया है । फ़िर भी हम आनन्द ? वास्तविक आनन्द के पास फ़टक भी नहीं सके । हमारी ये " कुछ खोया सा लगता है " वाली तलाश कब और कहाँ और किस तरह और किसके माध्यम से परवान चङेगी ? ये लगभग प्रत्येक जीव के मन में एक शाश्वत प्रश्न है । ये बात मैं किसी अनुमान के आधार पर नहीं कह रहा । बल्कि विगत 25 सालों में हजारों लोगों से मिलने । उनको निकट से जानने के बाद स्व अनुभव के
आधार पर कह रहा हूँ । स्त्रियां या लङकियों को ज्यादातर लोग काम भावना से देखते है । और पता नहीं क्यों उन्हें शास्त्रों में मुक्ति मार्ग में एक बङी बाधा के रूप में बताया गया है ।
मैं जबसाधु जीवन में शामिल हुआ । तो इस बात को लेकर बहुत सचेत था । पर बाद में अनुभव से मैंने जाना कि स्त्रियों में भी भक्ति को लेकर बेहद उत्साह और जिग्यासा होती है । और वे भी प्रभु प्राप्ति और दर्शन और मुक्ति क्या और कैसे ..जैसे विषयों में बेहद दिलचस्पी रखतीं हैं । दीक्षा एक ऐसा विषय है । जिस पर एक पूरा दिलचस्प ग्रन्थ लिखा जा सकता है । मैंने अपने साधना जीवन में पाया कि दीक्षा जैसी महत्वपूर्ण बात के बारे में भी लोग बहुत कम जानते हैं । और जो जानते हैं वह उन्हें कोई राह दिखाने के बजाय उल्टा दिग्भ्रमित करता है । अपने ऐसे ही जिग्यासुओं की खातिर मैं दीक्षा के कुछ और रहस्य बता रहा हूँ । वैसे तो जैसा गुरु मिले और गुरु का जैसा ग्यान हो उसके आधार पर दीक्षा हजारों प्रकार की ( क्योंकि दीक्षा के ढेरों मन्त्र हैं और अनेकों प्रकार के ग्यान और सिद्धियां हैं ) होती है । पर एक दीक्षा जो सबके लिये महत्वपूर्ण है । वो आत्म ग्यान की दीक्षा होती है । वास्तविक मुक्ति देने वाली । मुक्ति मार्ग दिखाने वाली यही एकमात्र दीक्षा है । इसकी चार मन्जिलें तय करनी होती हैं । और स्पष्ट जान लें । कि दीक्षा का अर्थ ही दिखाना या तीसरा नेत्र खोलना है । यदि दीक्षा के तीन महीने बाद भी । साधना और ध्यान का अभ्यास लगभग ठीक करने के बाद भी आपको कोई अलौकिक अनुभव नही हुआ । जैसे अन्तर में
किसी देवी देवता का दर्शन । किसी सूक्ष्म लोक की यात्रा । किसी दिव्य लोक की यात्रा । तो निश्चय ही आपके गुरु में कोई खोट है । आप समय खराब कर रहें हैं । कोई दूसरा गुरु तलाशें ।
1-- पहली दीक्षा मन्त्र दीक्षा होती है । यह ढाई अक्षर का मन्त्र होता है । और वाणी से नहीं जपा जाता । बल्कि गुरु के द्वारा प्रकट किया जाता है । यही वास्तविक हरि का नाम है । । अगर आपने विधिवत तरीके से दीक्षा ली है । तो दीक्षा के समय ही आप दिव्य प्रकाश को देख लेते हैं । किसी किसी को पहली ही बार में देवताओं के दर्शन या किसी स्वर्ग आदि छोटे लोक की यात्रा भी जाती है । किसी किसी को तीन या चार अनुभव पहली बार में ही लगभग एक घन्टे के अन्दर हो जाते हैं । मन्त्र दीक्षा से मन की शांति प्राप्ति होती है ।
2-- दूसरी हंस दीक्षा होती है । हंस के बारे में प्राय लोगों को यह पता ही है कि हंस नीर क्षीर को अलग कर देता है । यानी यह उत्तम और सार को ही ग्रहण करता है । आपने जनमानस में अक्सर बहुप्रचलित यह कहावत सुनी ही होगी । कि " के हंसा मोती चुगे..के भूखन मर जाय " इस सम्बन्ध में उच्चकोटि के संत कबीर साहब ने भी लिखा है । " बगुली नीर बिटालिया..सागर लगया कलंक..घने पखेरू पी गये हंस न बोबे चंच " वास्तव में यह आत्मा जब " सचखन्ड " से नीचे उतरा । तो यह हंस ही था । और बहुत शक्तिशाली और उच्च स्थिति वाला था । पर नीचे के खन्डों में उतरते उतरते । उन जगहों की विषय वासनाओं में आकर्षित होकर..उलझकर यह काग वृति यानी कौए के समान विष्ठा प्रेमी हो गया । और अपनी उच्च स्थिति को भूल गया । जिस प्रकार किसी कुलीन और उच्च खानदान का धनाढय व्यक्ति शराब , जुआ , और वैश्यावृति आदि बुरी लतों का शिकार होकर दुर्गति को प्राप्त होता है । और इस तरह यह " अविनाशी आत्मा " दुर्गति को प्राप्त होकर जनम मरण धरमा " जीवात्मा " हो गया । और तबसे निरंतर भटक रहा है । और अपनी उसी स्थिति को प्राप्त करने हेतु व्याकुल है । इसको उसी स्थिति में वापस
पहुँचाने की शक्ति केवल सच्चे संतो के पास है । परमात्मा के विधान के अनुसार " सच्चे संत ? " जीवात्मा को उसका " असली नाम और वास्तविक परिचय " याद दिला देते हैं । और एक विशेष तरीके का उपयोग करते हुये उसकी " जङ चेतन " की गाँठ खोल देते है । इस तरह जङ से बन्धा हुआ यह जीवात्मा उसी क्षण मुक्ति को प्राप्त होकर वापस नीचे से ऊपर की यात्रा शुरू कर देता है । इसका अर्थ ये न निकाल लेना । कि दीक्षा प्राप्त कर लेने वाला मर जाता है । इसका अर्थ ये है । कि वो ध्यान समाधि आदि की विभिन्न मंजिलों को तय करता हुआ अपनी खोई हुयी " अमरता " को पुनः प्राप्त करता है । पर शर्त यही है । कि ये दीक्षा आपको किसी सच्चे संत द्वारा प्राप्त हुयी हो । दीक्षा सच्चे संत से प्राप्त है । या नहीं । इसकी पहचान मैंने अपने ब्लाग्स में कई जगह लिखी है । फ़िर भी इसी पोस्ट में मैंने उसका स्पष्ट खुलासा किया है । यह सूत्र हमेशा ध्यान रखे " सिंहो के लेहङ नहीं साधु न चले जमात.." यानी सच्चा साधु या संत सिंह ( शेर ) के समान होता है । और निर्भय होकर स्वछंद विचरण करता है । उसके आगे पीछे भीङ नहीं होती । और न ही किसी प्रकार के ताम झाम या ढोंग आडम्बर होते है । मैंने आज दिन तक अपनी किसी भी साधना में अगरबत्ती तक नहीं जलायी । केवल सुमरन । केवल भाव कनेक्टिविटी । परमात्मा भाव का भूखा है । उसे इन फ़ालतू चीजों की कोई आवश्यकता नहीं । इस तरह जीवात्मा " हंस " ग्यान को पाकर सार असार , सत्य असत्य , विनाशी अविनाशी , के फ़र्क को जानने लगता है ।
एक महत्वपूर्ण बात " हंस दीक्षा " स्त्री पुरुष बालक वृद्ध ग्रहस्थ..वैरागी..किसी को भी दी जा सकती है । हमारे मंडल में छह साल के बच्चे इस दीक्षा से दीक्षित है । अगर हंस दीक्षा आपको सच्चे गुरु से प्राप्त हुयी है । तो आपका अगला जन्म मनुष्य का निश्चित हो जाता है । और यदि आपने लगभग " बीस साल " हंस का " सच्चा ध्यान " लगन से कर लिया । तो आप देवताओं से ऊँची स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं ।
3-- हंस से ऊपर उठने के बाद । यानी हंस जब ऊर्ध्व में उठता है । और कुछ मंजिले तय कर लेता है । तब " अणु दीक्षा " होती है । इसके अनुभव..अपलक समाधि..सूक्ष्म शरीर से यात्रा करना..यानी स्थूल शरीर से निकलने की कला..सूक्ष्म लोकों की यात्रा..उच्च मंडलो के देव पुरुषों से भेंट..महाशक्तियों से भेंट होना..विभिन्न प्रकार की महा शक्तियों का साधक में लय होना । इसीलिये इसे लय योग भी कहा जाता है । इस स्थिति में प्रकृति कैसे कार्य कर रही है ..यह आपको खुली आँखो और बन्द आँखो से भी दिखाई देता है । साधक ध्यान में हो । या साधारण बैठा चाय आदि पी रहा हो । प्रकृति के रहस्य उसके सामने खुली किताब की तरह होते हैं । इसमें मुख्य बात ये होती है । कि अद्रश्य अणु परमाणु आसानी से दिखायी देते है । यहाँ तक पहुँचने बाला साधक अत्यंत शक्तिशाली हो जाता है । और जनसामान्य की निगाह में साधारण जीवन जीते हुये वह वास्तव में परमात्मा का प्रतिनिधि हो जाता है । और बङे से बङे कार्य करने में सक्षम होता है । जो आमतौर पर देवताओं की भी शक्ति से बाहर होते हैं । इससे अधिक इस दीक्षा के रहस्य नहीं बताये जा सकते ।
4-- यह परीक्षा संयम और सदाचार से उत्तीर्ण कर लेने के बाद " परमहंस दीक्षा " होती है । यहाँ पहुँचकर साधक " संत " स्थिति से ऊपर उठ जाता है । और फ़क्कङ स्थिति में पहुँच जाता है । बङी बङी शक्तियां हाथ जोङे उसके पीछे पीछे चलती है ( अद्रश्य रूप में ) " हद टपे से औलिया..बेहद टपे सो पीर..हद बेहद दोनों टपे उसका नाम फ़कीर " वास्तव में फ़क्कङ स्थिति के बारे में लिखना आसान बात नहीं हैं । केवल इतना समझ लें कि इसका आदेश टाल सके । ऐसी शक्ति किसी के पास नहीं होती । यह " मौजी फ़कीर " सारा ग्यान ध्यान छोङकर निरंतर परमात्मा के टच में होता है । और अपनी मर्जी का मालिक होता है । इसका आदेश हर हालत में महाशक्तियों तक को मानना होता है । इस पर किसी का कोई नियम कानून नहीं चलता । पर यह गुप्त होता है । आपके सामने या आपके पङोस में रह रहा हो । पर आप इसकी मर्जी के बिना इसको नहीं जान सकते ।..परमहंस ग्यान अंत में परमात्मा से " एकीकरण " कर देता है । इसके बीच में " सार शब्द " आदि बहुत सी बातें हैं । जो गुप्त है । जो स्थिति प्राप्त साधक को ही बतायी जातीं हैं । अंत में " जब हंसा " परमहंस हुय जावे..तब पारब्रह्म परमात्मा साफ़ साफ़ दिखलावे । "

17 जून 2010

कशमकश

anoop joshi ने आपकी पोस्ट " महाराज जी का संक्षिप्त परिचय और तस्वीर " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
sar kuch swal apni post me puche hai kripa kar ke jabab de de....| " कशमकश " ब्लागर " श्री अनूप जोशी " ने मुझसे किये कुछ प्रश्न ।

कुछ सवाल जो मुझे झिंझोड़ते है:-
प्रश्न--१) यदि आत्मा अमर है, ना वो जन्म लेती है, ना वो मरती है. तो जनसख्या क्यों बढ़ रही है ? नयी जनसख्या के लिए आत्मा कहाँ से आ रही है.??


उत्तर-- वास्तव में आत्मा न जन्मती है । न मरती है । इसके साथ जो जीव भाव जुङकर जीवात्मा वन गया है । वही जन्मता और मरता है । आप कभी चींटियों के झुन्ड , तमाम कीट पतंगे , अन्य तमाम चौरासी के जीवों को देखे । यह अनन्त हैं । आत्मा में ही अनंत होने की शक्ति है । इसलिये इस प्रकार एक योनि से दूसरी योनि में आना जाना होता रहता है ।
कभी चौरासी के जीवों की अधिकता होती है । तो मनुष्य कम हो जाते हैं । आप देखें कि तमाम तरह की चिङिया । कीट पतंगे अन्य जंगली प्रजातियाँ जिनकी आवादी करोंङों अरबों में होती है । आज लुप्त प्राय है । दूसरे जिस प्रकार एक शिशु जन्म से मृत्यु तक(1 to 100 कहते हैं ) की यात्रा क्रमशः बङते हुये करता है ।
उसी प्रकार मनुष्य की आवादी भी प्रत्येक युग में शिशु की तरह बङती हुयी अपने अंत पर आते आते काफ़ी हो जाती है । आप " प्रलय " वाली पोस्ट में पङ ही चुके हैं । जनसंख्या रूपी यह बालक अपनी आयु के अंत पर आ गया है । और अंतिम सांसे गिन रहा है ।
दूसरे इतनी जनसंख्या बङती नहीं हैं । जितनी मालूम होती है । आज तमाम गाँव ..छोटे कस्बे..शहर खाली हो जाते हैं । और बङे शहरों में लोग बस जाते हैं । इसलिये भी जनसंख्या अधिक मालूम होती है । मैं तमाम ऐसे स्थानों को जानता हूँ । जहाँ मुफ़्त में रहने के लिये लोग तैयार नहीं हैं । आपका ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं । इसलिये इसकी बारीक पङताल वाली पोस्ट मैं शीघ्र ही लिखने की कोशिश करूँगा ।


प्रश्न--२) भगवान् ने भारत में ही जन्म क्यों लिया?क्या पूरी पृथ्वी उनकी नहीं है ??
उत्तर-- कल को आप कह सकते हैं । कि प्रधानमंत्री दिल्ली में ही क्यों रहते हैं । झुमरीतलैया में क्यों नहीं ? क्या झुमरीतलैया भारत में नहीं है ? पहली बात तो ये कि भगवान जन्म नही लेते । उनका अवतार होता है । भगवान साधारण जीव की तरह गर्भवासा नहीं करते ।
फ़िर ये किस तरह प्रकट होते है..इसकी जानकारी के लिये आपको ग्यानप्रकाश के " महामन्त्र " की दीक्षा लेनी होगी । साधारण जीवों को ये बताना वर्जित है । यदि आप दीक्षा ले चुके हैं । तो अपने गुरु से पूछें ।
प्रत्येक युग में प्रथ्वी की भौगोलिक स्थिति में परिवर्तन हो जाता है । और भगवान ने कई देशो में अवतार लिया है । पर आम लोगों को उसकी जानकारी नहीं होती । राम ..कृष्ण ने जब अवतार लिया था । तव गिने चुने लोगों को छोङकर ज्यादातर उन्हें सामान्य इंसान ही समझते थे..ऐसा इंसान जो गुणों में श्रेष्ठ है । और ग्यान की ऊँचाईयों पर है ।
कल्पना करें । किसी भी युग में उसी समय आदमी को पता चल जाय कि ये भगवान हैं । तो लोग भगवान का जीना हराम कर देंगे । और किया भी है । भगवान या देवता या भूत प्रेत या दूसरे ग्रह के वासी आज भी अक्सर प्रथ्वी पर मनुष्य रूप में भ्रमण करते हैं । पर उनको पहचानने के लिये दिव्य दृष्टि होना आवश्यक है । ये महामन्त्र से प्राप्त होती है ।


भारत में ही क्यों ..? दरअसल भारत प्रथ्वी पर ऐसे स्थान पर स्थिति है..जहाँ से देवलोक आदि ग्रहों से " तरंगो " का आवागमन उचित तरीके से होता है । इसलिये भगवान ने भारत को अपनी राजधानी बनाया ।..जैसे अमेरिका इसी लालच में तो पाकिस्तान की चमचागीरी और धन देता है..कि वह पाकिस्तानी भूमि का हवाई अड्डों और अन्य सामरिक उद्देश्यों के लिये भरपूर उपयोग कर सके ।
अब ये पाकिस्तान का भाग्य ही है । कि वो ऐसी जगह पर है..जहाँ से अमेरिका एशिया आदि पर केन्द्र के रूप में नियन्त्रण किया जा सकता है । बस भारत को भी आध्यात्म क्षेत्र में इसी भोगोलिक स्थिति की वजह से चुना जाता है ।
प्रश्न--३) यदि भगवान् ने प्रक्रति कि रचना कि है तो, अपने प्रिय स्थान(भारत) को प्राकृतिक सम्पदा से क्यों दूर रखा. सोना दक्षिण अफ्रीका, हीरा कनाडा, खनिज तेल खाड़ी देश और भारत को कोयला और अब्रक और पता नहीं क्या क्या?
उत्तर-- भारत प्राकृतिक सम्पदा से हमेशा भरपूर रहा है । सोने की चिङिया..दूध की नदियाँ वाला देश इसको कहा जाता है । पारा जैसी महत्वपूर्ण धातु के शंकर द्वारा प्रदत्त चार कूप सिर्फ़ भारत में ही हैं । पहले भारत अफ़गानिस्तान तक था । जम्बू नद ( नदी ) में सोना प्राप्त होता है ।यह सब लगभग तीन चार सौ साल में ऐसी स्थिति हुयी है । क्योंकि आंशिक प्रलय के समय बहुत कुछ गायब हो जाता है । कृपया विस्त्रत उत्तर हेतु गरुण पुराण पढें । आज भी बहुत कुछ मौजूद है । पर उसका ग्यान नहीं है ।
प्रश्न--४) यदि हमारी संस्कृति दुनिया में सबसे अच्छी है तो.लोग इससे दूर क्यों जा रहे है ? और कुछ एक संस्कृति के ठेकेदारों को डंडा लेकर इसकी रखवाली क्यों करनी पड़ती है ?
उत्तर-- समय समय पर तरह तरह के बदलाब हर चीज में होते है । आपके अन्दर जन्म से लेकर अब तक कितने बदलाव हो चुके हैं ।यह सब लीला है । दरअसल हर चीज को अपने नजरिये से देखना आपका स्वभाव मालूम होता है । ज्यादा कमी आपके अन्दर है । बाहर इतना गलत है नहीं । जितना आपको नजर आता है ।


प्रश्न--५) क्या सिर्फ 'मेरा भारत महान" कहने से भारत महान हो जायेगा
.उत्तर-- सभी अपने अपने देश को महान कहते है । सभी देशों में आदर्श महान बेईमान सब तरह के लोग होते हैं । किसी के पास कोई ग्यान या सम्पदा अधिक है । तो दूसरे के पास कुछ और है । और ये सिर्फ़ आज के समय में नहीं प्रत्येक युग में होता है
प्रश्न--६) मन कहाँ होता है, शरीर में ?
 उत्तर-- मन की शेप लगभग इतनी बङी o बिंदी जैसी होती है । इसमें मन , बुद्धि , चित्त , अहम चार छिद्र होते हैं । जिनसे हम संसार को जानते और कार्य करते हैं । मन शब्द प्रचलन में अवश्य है । पर इसका वास्तविक नाम " अंतकरण " है ।
ये चारों छिद्र कुन्डलिनी क्रिया द्वारा जब एक हो जाते हैं तब उसको सुरती कहते है । इसी " एकीकरण " द्वारा प्रभु को जाना जा सकता है । अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं हैं । मन को बिना चीर फ़ाङ के ध्यान अवस्था में देखा जा सकता है । नियन्त्रित किया जा सकता है । इसका स्थान भोंहों के मध्य एक डेढ इंच पीछे है ।
जीवात्मा का वास इससे " एक इंच " दूर बांयी तरफ़ है । हमारे शरीर के अंदर पाँच तत्वों की पच्चीस प्रकृतियाँ ( एक तत्व की पाँच ) हैं । तो 25 प्रकृति + 5 ग्यानेन्द्रिया + 5 कर्मेंन्द्रियां + 5 तत्वों के शरीर का नियंत्रणकर्ता और राजा मन है । इसी आधार पर 40 kg weight को एक मन कहने का रिवाज हुआ था । 25 प्रकृतियों के बारे में मैं पहले ही ब्लाग पर लिख चुका हूँ । फ़िर भी उदाहरण के तौर पर " जल " की प्रकृति देखें । 1 रक्त 2 लार 3 पसीना 4 वीर्य 5 मूत्र..किसी भी शरीर में जल इन्हीं रूपों में उपस्थित है ।


प्रश्न--७) विज्ञान हर चीज को सिद्ध करता है. लेकिन भगवान् के लिए ये क्यों कहा जाता है कि ये सृधा है.
उत्तर-- ये बात सिर्फ़ अग्यानी कहते हैं । आत्मा , अलौकिक ग्यान या देवी देवता या भगवान से सम्बन्धित बातों या क्रियायों का ग्यान " कुन्डलिनी ग्यान " के अंतर्गत आता है । जिसमें सिर्फ़ बातें नहीं होती । बल्कि इन लोगों से मिला जा सकता है । फ़ायदा लिया जा सकता है ।
भूतकाल में लोगों ने लिया था और आज भी ले रहे हैं । दूसरी बात कुन्डलिनी ग्यान नहीं " विग्यान " के अंतर्गत आता है । क्योंकि कुन्डलिनी पूरा प्रक्टीकल पर ही आधारित है । आपको ध्यान होगा कि आपने " प्रेतकन्या " के तथ्यों को कहानी शब्द दिया था । वास्तव में इस प्रकार की यात्रा का अनुभव आप छह महीने में स्वयं कर सकते है । और ये कोई ज्यादा बङी बात नहीं । इससे ज्यादा नहीं कह सकता । आप मेरे गुरुदेव से डायरेक्ट फ़ोन 0 9639892934 पर बात कर सकते हैं ।
अनूप जोशी का सवाल--आपने सत्यनारायण भगवान की कथा में, लीलावती की कहानी सुनी होगी, की उसका पति,सत्यनारायण भगवान की कथा के लिए कहता रहता है, और उसके सभी काम सफल होते रहते है.अंत में जब वो कथा नहीं करता तो, उसको जेल में डाल दिया जाता है. तब उसकी पत्नी और बेटी कथा करती है, और सब कुछ सही हो जाता है. मेरा एक सवाल है अगर हमारे यहाँ इस कथा में, कलावती है. तो जब कलवती ने जो कथा कराई थी, तो उसकी कथा में कौन था?
उत्तर-- सत्य नारायण कथा में संभवत पाँच कहानियों का जिक्र आता है । जिन्हें सत्यनारायण कथा में " प्रेरक " के रूप में लिया गया है । लेकिन कथा अगर आपने ध्यान से सुनी हो । तो कथा ये कहती है कि कलावती आदि ने सत्यनारायण का पूजन किया था ।( वो पूजन या मन्त्र आदि जो कथा के प्रारम्भ और अंत में होते हैं ।)
पुराण का अर्थ पुराना या इतिहास भी है । समस्त वेद पुराण इसी टेकनीक पर आधारित हैं कि किस राजा ने । या किस देवता ने । या किस मनुष्य ने ।कब और किस मन्त्र का उपयोग किस परेशानी के लिये किया और उसे क्या लाभ हुआ । जैसे आज विग्यान या कम्प्यूटर सांइस या किसी भी प्रक्टीकल के लिये किताबों में थ्योरी उपलब्ध कर संग्रहित कर दी जाती है ।
कहने का आशय " कलावती " आदि का जिक्र एक प्रेरक परम्परा के रूप में होता है । वास्तविक मतलव " सत्यनारायण " के पूजन से है । अब वास्तविक सत्यनारायण क्या है । इसको जाने ? सत्य + नार +अयन = सत्यनारायण । यानी । सत्य ( जो सत्य है ) नार ( जल से कहते हैं ) अयन ( यानी निवास स्थान ) यानी जल में जिसका निवास स्थान है । ऐसा सत्य देव पुरुष । यानी भगवान विष्णु । आपको पता होगा कि विष्णु जी का निवास क्षीर सागर में है । तो कलावती आदि ने जो कथा करायी थी । वो वास्तव में " सत्यनारायण " का पूजन था ।


प्रश्न--क्या भगवान् की, डर या लालच देकर ही, पूजा करने के लिए प्रेरित किया जाता है. ??
उत्तर-- आप अपने छोटे बच्चे को पढाने..स्कूल भेजने..में डराते है..टाफ़ी आदि का लालच देते हैं । उद्देश्य यही होता है कि बच्चा " मजबूत " बने । ग्यान के क्षेत्र में अधिकांश बच्चे ( 90 year के भी ) ही होते है ।
" भाव कुभाव अनख आलस हू । नाम जपत मंगल सब दिस हू । " भगवान को किसी भी तरह याद करो । वो आपको अच्छा ही फ़ल देंगे । उदाहरण-- रावण , कंस आदि ने वैर भक्ति से भक्तों वाली स्थिति प्राप्त की थी ।
तीसरा सवाल-- भगवान की अगर पूजा ना की जाये या भगवान को ना मना जाये, तो उसका भगवान गलत क्यों करेंगे? क्योंकि वो तो भगवान है हिर्न्याकस्य्प देत्या नहीं जो उनकी पूजा नहीं करेगा उसका गलत करेंगे."??
कोऊ न काऊ सुख दुख कर दाता । निज करि कर्म भोग सब भ्राता । " भगवान न तुमसे पूजा की कहे । न अच्छा कहे । न बुरा कहे । जीव अपने कर्मों के लिये स्वयं उत्तरदायी है । अच्छा करोगे । पुरस्कार । बुरा करोगे । पङेगी मार । संविधान के अनुसार फ़ल है ।
प्रश्न--असल में भगवान को लालच ओर डर का एक बिंदु बना दिया है कुछ स्वार्थी लोगो ने, वे ये तो कहते हैं की, १२ साल बाद कुम्भ आया है,जरुर स्नान करिएँ, लेकिन ये नहीं कहते है की, सास्त्रो में लिखा है " मन चंगा तो कठोती में गंगा" अगर कोई नहीं जा सके तो कोई बात नहीं.??
उत्तर-- इसका उत्तर तो आपने स्वयं ही ( कुछ स्वार्थी लोगो ने..) दे दिया है । वास्तव में ये " स्वार्थी " दिग्भ्रमित और अग्यानी " कुछ नहीं बहुत " लोगों की वजह से हुआ । वास्तव में 12 साल बाद आने वाले " बाह्य कुम्भ " को नहाने का भी महत्व है । पर शास्त्रों में इशारे से " आंतरिक कुम्भ " को नहाने की बात कही है । जो तुम्हारे अंदर है । और " भृकुटि मध्य " में इङा पिंगला सुषमना , के मिलने पर होता है ।
रामदेव जो " अनुलोम विलोम " क्रिया कराता है । वही वास्तविक कुम्भ स्नान है । इससे मन स्वच्छ होता है । यानी विकार यानी पाप धुल जाते है । संस्कृत की डिक्शनरी में देखना कुम्भ यानी घट यानी घङा यानी शरीर एक ही बताये गये हैं ।
" मन चंगा तो कठोते में गंगा " शास्त्रों में नहीं लिखा । बल्कि रैदास जी ने इस कहावत रूपी चमत्कार को घटित किया था । ये पूरी घटना अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने " गंगा का रहस्यमय दिव्य कंगन " नामक पोस्ट में लिखी है । उचित समझें तो अवलोकन करें ।(" अगर कोई नहीं जा सके तो कोई बात नहीं ? ") भक्त का भाव होना चाहिये..इतिहास का अवलोकन करें तो कई लोगो ने तालाव में नहाकर गंगा या कुम्भ या रामेश्वरम जैसा पुण्य प्राप्त किया था ।
प्रश्न--वे ये तो कह देते हैं की, चार धाम यात्रा करो, लेकिन ये नहीं कहते की हमारे हर्दिया में भगववान है, उसकी आराधना से भी, वही सुख मिलेगा.??
उत्तर--( आपके ये " वे " कौन है । आप ही भली प्रकार जानते होंगे ।) बाकी संतों ने तो यही कहा है कि आप प्रेम पूर्वक प्रभु का सुमरन जहाँ हो । वहीं करो । ना में मन्दिर । ना में मस्जिद । ना कावा कैलास में । मुझको कहाँ खोजे है । बन्दे मैं तो तेरे पास मैं ।
प्रश्न--वे ये तो कह देते है, मंगल वार को जीव हत्या करके ( मांस ) ना खावों.लेकिन ये नहीं कहते की रोज, जो इंसान इंसानियत की हत्या कर रहा है वो ना करे.??
उत्तर-- हमारे " वे " तो मंगलवार क्या किसी भी वार को । जीव हत्या छोङो । अनजाने में चींटी न मर जाये । इस तरह सचेत रहने की सलाह देते हैं । इंसानियत की हत्या की बात छोङो । साधु संतो ने सङे गधों ( घाव आदि से ) की सेवा कर उन्हें स्वस्थ किया है । समाज द्वारा घृणा के पात्र कुष्ठियों की सेवा की है । ऐसा आचरण करने वाले तमाम लोग आज भी हैं । दरअसल सृष्टि में सब तरह के लोग होते हैं ।
प्रश्न--वे ये तो कहते हैं की, काम सफल करना है तो इस वार(सोम,मंगल,सनि) के इतने उपवास करो, लेकिन ये नहीं कहते की उस दिन किसी भूखे का पेट भर दे.??
उत्तर-- हा..हा..हा..अब मैं क्या कहूँ । आप या तो किसी ठग के चक्कर में पङ गये हो ( या थे ) या फ़िर ये सब धारणायें आपकी खुद की हैं । आपकी अच्छे संतों क्या निम्न संतों से भी मुलाकात नहीं हुयी है । दयालु प्रभु आपको ग्यान का मार्ग दिखाये ।
प्रश्न-- वे ये तो कहते है की उस भगवान् के इतनी बार माला जपो, लेकिन ये नहीं कहते की एक बार अपने माँ- बाप को याद कर लो. ??
उत्तर-- " प्रातकाल उठकर रघुनाथा । मात पिता गुरु नावहि माथा । " त्वमेव माता पिता च त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव..इस तरह के मैं आपको दस लाख उदाहरण बता सकता हूँ । जिनमें माता पिता भाई बन्धु आदि सभी से भगवान की तरह प्रेम और सम्मान करने की सलाह दी गयी है । एक चींटी तक में भगवान को देखने की बात की है । और ये सत्य भी है । वास्तव में वही परमात्मा अनेक रूपों में लीला कर रहा है । राम जन्म के हेत अनेका । अति विचित्र एक ते एका ।
प्रश्न--पता नहीं ओर क्या क्या आडम्बर इन स्वार्थी लोगो ने हमें अपने स्वार्थ हित करने के लिए कहते है, ओर हम फंस जाते है उनके मकड़ जाल में.??
उत्तर-- अगर रास्ते में टट्टी पङी हो । और आप जानबूझ कर सन जाओ । तो दोष टट्टी का है या आपका ? आपकी बुद्धि विवेक किसलिये है ? आप ( शायद ) इंजीनियर है । और बहुत से इंसान " मजदूरी " कर मुश्किल से रोटी चला पा रहे हैं । तो ये किसके द्वारा संभव हुआ । निश्चित ही बुद्धि और ग्यान से । उसी ग्यान का उपयोग आप संत या भगवान या आत्मा को जानने में करें ।(हम फंस जाते है उनके मकड़ जाल में. )
प्रश्न--भगवान डर या लालच नहीं है ओर ना ही ये कोई ट्रोफी है? जो दूर पैदल चलकर, मंदिर जाकर या उपवास कर के मिलेंगे, ये एक भाव है जो हमें खुद पहचान के ही मिलते है. जैंसा गौतम बुध ने किया.??
मेरा उत्तर-- गौतम बुद्ध या महावीर या अन्य संतो को भगवान को जानने हेतु बहुत पापङ बेलने पङे । ऐसा प्रतीत होता है । कि गौतम बुद्ध या धर्म के बारे में आपका ग्यान अत्यंत सीमित है । कृपया स्थायी सुख शान्ति हेतु एक घन्टा " धार्मिक अध्ययन " हेतु निकालें । जल्दी प्राप्त करना चाहे तो मुझसे बात करें । क्योंकि मुझे 25 वरसों का समस्त शास्त्रों और अनेक साधनाओं का अनुभव है । " उपवास " शब्द का वास्तविक अर्थ उप+ वास यानी जीव स्थिति से ऊपर रहना है ।
अनूप जोशी--कृपा करके आपसे अनुरोध है की, भगवान को माने, पर स्वार्थी लोगों के बनाये हुए आडम्बर को नहीं, और हाँ में कोई उप्देसक नहीं हूँ. में भी आस्तिक हूँ , लेकिन आँख बंद कर के सब कुछ नहीं मानता और ना मनवाता हूँ.

महाराज जी का संक्षिप्त परिचय और तस्वीर

मेरे ब्लाग्स के बहुत से पाठकों ने यह इच्छा जतायी है कि मेरे गुरुदेव कौन है । और मैंने उनका कोई चित्र क्यों नहीं एड किया है । इसलिये मैं अपनी इस कमी को दूर कर रहा हूँ । श्री महाराज जी " अद्वैत ग्यान " के संत है । इनके सम्पर्क में मैं पिछले सात वर्षों से हूँ । इससे पूर्व मैंने अनेकों प्रकार की साधनाएं की । पर मेरी जिग्यासा और शंकाओं का समुचित समाधान नहीं हुआ । पर श्री महाराज जी के सम्पर्क में आते ही मेरा समस्त अग्यान नष्ट हो गया । मैं इस बात के लिये जोर नहीं देता कि आप मेरी बात को ही सत्य मान लें । पर आत्मा या आत्म ग्यान को लेकर यदि आपके भी मन में कोई ऐसा प्रश्न है । जिसका उत्तर आपको नहीं मिला है । या मेरी तरह आप भी जीवन के रहस्य और अनगिनत समस्यायों को लेकर परेशान हैं ( जैसे मैं कभी था ) तो " निज अनुभव तोहि कहूँ खगेशा । विनु हरि भजन न मिटे कलेशा । " वो कौन सा हरि का भजन है । जिससे जीवन के सभी कलेश मिट जाते है । " सुखी मीन जहाँ नीर अगाधा । जिम हरि शरण न एक हू व्याधा । " वो कौन सी हरि की शरण है । या आप आत्मा परमात्मा की असली भक्ति या असली ग्यान के बारे में कोई भी प्रश्न रखते हैं । तो महाराज जी से बात कर
सकते हैं । महाराज जी का सेलफ़ोन न . 0 9639892934
विशेष- महाराज का कहीं कोई आश्रम नहीं है । वे अक्सर भ्रमण पर रहते हैं । और किसी किसी समय एक गाँव के बाहर बम्बा के पास कुटिया में रहते हैं ।

16 जून 2010

प्रलय 2012..?

भारत में तो मैंने इतना नहीं देखा । पर 2012 को लेकर अमेरिका आदि कुछ विकसित देशों मे हल्ला मचा हुआ है । हाल ही में हुये मेरे एक परिचित स्नेहीजन त्रयम्बक उपाध्याय साफ़्टवेयर इंजीनियर ने अमेरिका ( से ) में 2012 को लेकर मची खलबली के बारे में बताया । उन्होनें इस सम्बन्ध में मेरे एक अन्य मित्र श्री विनोद दीक्षित द्वारा लिखी पोस्ट end of the world.. 2012 को भी पढा था ।
इस तरह की बातों में मेरा नजरिया थोङा अलग रहता है । मेरे द्रष्टिकोण के हिसाब से यह पोस्ट भ्रामक थी लिहाजा इस ज्वलन्त मुद्दे को लेकर मेरे पास जब अधिक फ़ोन आने लगे ।तो मैंने वह पोस्ट ही हटा दी । पहले तो मेरे अनुसार यह उस तरह सच नहीं है । जैसा कि लोग या विनोद जी कह रहे हैं । दूसरे यदि इसमें कुछ सच्चाई है भी तो " डाक्टर भी मरणासन्न मरीज से ये कभी नहीं कहता कि तुम कुछ ही देर ( या दिनों ) के मेहमान हो " यदि हमारे पास किसी चीज का उपाय नहीं है । तो " कल " की चिन्ता में " आज "को क्यों खराब करें । यदि प्रलय होगी भी । तो होगी ही । उसको कौन रोक सकता है । जब हम " लैला " सुनामी " हैती " के आगे हाथ जोङ देते है । तो प्रलय तो बहुत बङी " चीज " है । लेकिन तीन दिन पहले जब मैं इस इंद्रजाल ( अंतर्जाल ) internet पर घूम रहा था । तो किसी passions साइट पर मैंने लगभग 40 साइट इसी विषय पर देखी । जिनमें " एलियन " द्वारा तीसरे विश्व युद्ध द्वारा आतंकवाद , प्राकृतिक आपदा ..आदि किसके द्वारा " प्रथ्वी " का अंत होगा । ऐसे प्रश्न सुझाव आदि थे । जो लोग मेरे बारे में जानते हैं और जिन्हें लगता है कि मैं " इस प्रश्न " का कोई संतुष्टि पूर्ण उत्तर दे सकता हूँ । ऐसे विभिन्न स्थानों से लगभग 90 फ़ोन काल मेरे पास आये । और मैंने उनका गोलमाल..टालमटोल..उत्तर दिया । इसकी वजह वे लोग बेहतर ढंग से समझ सकते हैं । जो किसी भी प्रकार की कुन्डलिनी या अलौकिक साधना में
लगे हुये हैं । मान लीजिये कि किसी साधक ने इस प्रकार की साधना कर ली हो कि वह भविष्य के बारे में बता सके । और वह पहले से ही सबको सचेत करने लगे । तो ये साधना का दुरुपयोग और ईश्वरीय नियमों का उलंघन होगा । परिणामस्वरूप वह ग्यान साधक से अलौकिक शक्तियों द्वारा छीन लिया जायेगा । क्योंकि ये सीधा सीधा ईश्वरीय विधान और प्रकृति के कार्य में हस्तक्षेप होगा ।
हाँ इस या इन आपदाओं से बचने के उपाय अवश्य है । और वे किसी को भी सहर्ष बताये जा सकते हैं । पर यदि कोई माने तो ? क्योंकि जगत एक अग्यात नशे में चूर है । " झूठे सुख से सुखी हैं , मानत है मन मोद । जगत चबेना काल का कछू मुख में कछु गोद । " जीव वैसे ही काल के गाल में है । उसकी कौन सी उसे परवाह है । तो खबर नहीं पल की और बात करे कल की । वाला रवैया चारों तरफ़ नजर आता है । खैर..जगत व्यवहार और विचार से साधुओं को अधिक मतलब नहीं होता । फ़िर भी एक अति आग्रह रूपी दबाब में जब बार बार ये प्रश्न मुझसे किया गया । तो मुझे संकेत में इसका जबाब देना पङा ।
ये जबाब मैंने " श्री महाराज जी " और कुछ गुप्त संतो से प्राप्त किया था । अलौकिकता के " ग्यान काण्ड " और " बिग्यान काण्ड " में जिन साधुओं या साधकों की पहुँच होती है । वे इस चीज को देख सकते हैं । 2012 में प्रलय की वास्तविकता क्या है । आइये इसको जानें ।
" संवत 2000 के ऊपर ऐसा योग परे । के अति वर्षा के अति सूखा प्रजा बहुत मरे ।
अकाल मृत्यु व्यापे जग माहीं । हाहाकार नित काल करे । अकाल मृत्यु से वही बचेगा ।
जो नित " हँस " का ध्यान धरे । पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण । चहुँ दिस काल फ़िरे ।
ये हरि की लीला टारे नाहिं टरे ।
अब क्योंकि संवत 2000 चल ही रहा है । इसलिये प्रलय ( मगर आंशिक ) का काउंटडाउन शुरू हो चुका है । मैंने किसी पोस्ट में लिखा है कि गंगा यमुना कुछ ही सालों की मेहमान और है । 2010 to 2020 के बाद जो लोग इस प्रथ्वी पर रहने के " अधिकारी " होंगे । वो प्रकृति और प्रथ्वी को एक नये श्रंगार में देखने वाले गिने चुने भाग्यशाली लोग होंगे । और ये घटना डेढ साल बाद यानी 2012 में एकदम नहीं होने जा रही । बल्कि इसका असली प्रभाव 2014 to 2015 में देखने को मिलेगा । इस प्रथ्वी पर रहने का " हक " किसका है । ये रिजल्ट सन 2020 में घोषित किया जायेगा । यानी आपने सलामत 2020 को happy new year किया । तो आप 65 % का विनाश करने वाली इस प्रलय से बचने वालों में से एक होंगे । ऊपर जो " संतवाणी " मैंने लिखी है । उसमें ऐसी कोई कठिन बात नहीं है । जिसका अर्थ करना आवश्यक हो । सिवाय इस एक बात " अकाल मृत्यु से वही बचेगा । जो नित " हँस " का ध्यान धरे । " के । " हँस " ग्यान या ध्यान या भक्ति वही है । जो शंकर जी , हनुमान , राम , कृष्ण , कबीर , नानक रैदास , दादू , पलटू ..आदि ने की । यही एकमात्र " सनातन भक्ति " है । इसके बारे में मेरे सभी " ब्लाग्स " में बेहद विस्तार से लिखा है । अतः नये reader और जिग्यासु उसको आराम से देख सकते हैं । और कोई उलझन होने पर मुझे फ़ोन या ई मेल कर सकते हैं ।
लेकिन अभी भी बहुत से प्रश्न बाकी है । ऊपर का दोहा कोई विशेष संकेत नहीं कर रहा । ये सब तो अक्सर प्रथ्वी पर लगभग होता ही रहा है । तो खास क्या होगा और क्यों होगा ? ये अब भी एक बङा प्रश्न था । तो आप लोगों के अति आग्रह और दबाब पर मैंने " श्री महाराज जी " से विनम्रता पूर्वक निवेदन किया । और उत्तर में जो कुछ मेरी मोटी बुद्धि में फ़िट हुआ । वो आपको बता रहा हूँ ।
बाढ , सूखा , बीमारी , महामारी और कुछ प्राकृतिक आपदायें रौद्र रूप दिखलायेंगी । और जनमानस का झाङू लगाने के स्टायल में सफ़ाया करेंगी । लेकिन...? इससे भी प्रलय जैसा दृष्य नजर नहीं आयेगा । प्रलय लायेगा धुँआ..धुँआ..हाहाकारी...विनाशकारी..धुँआ..चारों दिशाओं से उठता हुआ घनघोर काला गाढा धुँआ..। और ये धुँआ मानवीय अत्याचारों से क्रुद्ध देवी प्रथ्वी के गर्भ से लगभग जहरीली गैस के रूप में बाहर आयेगा । यही नहीं प्रथ्वी के गर्भ में होने वाली ये विनाशकारी हलचल तमाम देशों को लीलकर उनका नामोंनिशान मिटा देगी । प्रथ्वी पर संचित तमाम तेल भंडार इसमें कोढ में खाज का काम करेंगे । और 9 / 11 को जैसा एक छोटा ट्रेलर हमने देखा था । वो जगह जगह नजर आयेगा । प्रथ्वी में आंतरिक विस्फ़ोटों से विकसित देशों की बहुमंजिला इमारते तिनकों की तरह ढह जायेगी । हाहाकार के साथ त्राहि त्राहि का दृष्य होगा । समुद्र में बनने वाले भवन और अन्य महत्वाकांक्षी परियोजनायें इस भयंकर जलजले में मानों " बरमूडा ट्रायएंगल " में जाकर गायब हो जायेगीं । nasa के सभी राकेट बिना लांच किये । विना तेल लिये । बिना बटन दबाये " अंतरिक्ष " में उङ जायेंगे । और वापस नहीं आयेंगे ।
और बेहद हैरत की बात ये है । कि इस विनाशकारी मंजर को देखने वाले भी होंगे । और इस से बच जाने वाले भी लाखों (हाँलाकि कुछ ही ) की तादाद में होंगे । और प्रथ्वी की आगे की व्यवस्था भी उन्हीं के हाथों होगी । इस भयानक महालीला के बाद प्रथ्वी के वायुमंडल में सुखदायी परिवर्तन होंगे । और आश्चर्य इस बात का कि जिन घटकों से ये तबाही आयेगी । वे ही घटक प्रथ्वी से बाहर आकर तबाही का खेल खेलने के बाद परिवर्तित होकर नये सृजन की रूप रेखा तैयार करेंगे ।
अब अंतिम सवाल । ये सब आखिर क्यों होगा ?
तो इसका उत्तर है । डिसबैलेंस । यानी प्राकृतिक संतुलन का बिगङ जाना । ये बैलेंस बिगङा कैसे ? इसका आध्यात्मिक उत्तर और कारण बेहद अलग है । वो मैं न समझा पाऊँगा । और न आप इतनी आसानी से समझ पायेंगे । सबसे बङा जो मुख्य कारण है । वो है कई पशु पक्षियों की प्रजाति का लुप्त हो जाना । मनुष्य का अधिकाधिक प्राकृतिक स्रोतों का दोहन । और मनुष्य के द्वारा अपनी सीमा छोङकर प्रकृति के कार्यों में हस्तक्षेप करना आदि ..?
अब एक आखिरी बात..पशु पक्षियों के लुप्त होने से प्रलय का क्या सम्बन्ध ?
जो लोग अमेरिका आदि देशो के बारे में जानकारी रखते हैं । उन्हें एक बात पता होगी । कि एक बार जहरीले सांपो के काटने से आदमियों की मृत्यु हो जाने पर वहाँ सामूहिक रूप से सांपो की हत्या कर दी गयी । ताकि " आदमी " निर्विघ्न रूप से रात दिन विचरण कर सके । और कुछ स्थान एकदम सर्प हीन हो गये...कुछ ही समय बाद । वहाँ एक अग्यात रहस्यमय बीमारी फ़ैलने लगी । तब बेग्यानिकों को ये बात पता चली कि सर्प हमारे आसपास के वातावरण से जहरीले तत्वों को खींच लेते है । और वातावरण स्वच्छ रहता है । सर्प हीनता की स्थिति में वह विष वातावरण में ही रहा । और जनता उस अदृष्य विष की चपेट में आ गयी । ये सिर्फ़ एक घटित उदाहरण भर था । आज प्रथ्वी के वायुमंडल और वातावरण से जरूरत की तमाम चीजें गायब हो चुकी हैं ? इसलिये प्रथ्वी पर मूव होने वाली इस साक्षात " मूवी " का मजा लेने के लिये तैयार हो जाये । और घबरा रहें हैं तो अभी भी मौज लेने
enjoy करने के लिये आपके पास तीन साल तो हैं ही । तो डू मौज । डू एन्जोय । गाड ब्लेस यू ।
rajeev kumar kulshrestha

12 जून 2010

छलावा..बच के रहना..?

छलावा या छिराया या छहराया एक बेहद छोटी किस्म की बेहद मामूली हैसियत रखने वाली प्रेत की एक किस्म होती है । मेरे लिये प्रेत की ये किस्म हमेशा इसलिये रहस्यमय रही । क्योंकि अक्सर इसका उद्देश्य क्या और क्यों होता है । ये मेरी समझ में नहीं आया । दूसरे इसके द्वारा गिनी चुनी घटनाओं को छोङकर । मैंने बहुत कम लोगों का इसके द्वारा अहित होते देखा है ।
लेकिन कुछ एक मामलों में इसके द्वारा स्त्री पुरुषों को प्रेरित कर मार डालने की घटनायें भी देखी गयी हैं । इसकी सबसे बङी खासियत ये होती है कि ये किसी को भी प्रेत भाव से लम्बे समय के लिये आवेशित नहीं करता । और न ही कभी ये आवाहन मैं अपने को प्रकट करता है । क्योंकि इसका आवाहन करने की नौबत ही नहीं आती ।
इसकी सबसे बङी वजह ये होती है  कि ये मुश्किल से दस पन्द्रह मिनट के लिये किसी को प्रभावित करता है । इसका शिकार इसकी मर्जी के अनुसार कार्य करे तो भी । और न करे तो भी । ये बाह्य रूप से उसको प्रभावित करके । अपने नाम के अनुसार । छलावे की तरह गायब हो जाता है ।
मेरी हैरत और दिलचस्पी की सबसे बङी वजह ये थी कि ये विश्व के किसी भी कोने में समान रूप से कभी घनी बस्ती और कभी पाश कालोनी और कभी निर्जन स्थानों पर याने कहीं भी कभी भी किसी भी स्थान पर ये समान रूप से प्रकट होता है । और अपना काम करके नौ दो ग्यारह ।
दूसरे ये उमर ,लिंग , समय आदि किसी भी चीज की परवाह नहीं करता । एक दूध पीते बच्चे से लेकर मरणासन्न वृद्ध इसके शिकार होते हैं ।


इसको ठीक से समझने के लिये एक ऐसे चालाक चोर की भी कल्पना की जा सकती है । जो बेहद चतुराई से चोरी करता है । और सबूत भी नहीं छोङता । एक और बात है । मैंने उल्लेखनीय प्रेत लोकों में कभी इस प्रेत का अस्तित्व नहीं देखा ।और क्योंकि मैंने कभी इस पर किसी प्रकार का न कोई काम किया और न ही वैसा अवसर कभी मेरे सामने आया । कि मुझे छलावा से किसी तरह के " टच " की जरूरत होती ।
फ़िर भी जो भी मैंने इसके बारे में जाना । उसके अनुसार ये प्रथ्वी पर ही रहता है । और छलावा की जो सात आठ किस्में मेरी जानकारी में आयी । इनमें सबसे खतरनाक मेरे अनुसार वो है । जो जीव को आत्महत्या के लिये प्रेरित करती है । अब मेन बात ये देखिये । कि मेरे अनुभव के अनुसार प्रथ्वी पर बहुत कम लोग लोग ऐसे होंगे । जो कभी न कभी किसी न किसी रूप में इससे प्रभावित न हुये हों ।
और उस पर हैरत की बात ये कि वे समझ तक नहीं पाते कि हम अभी अभी किसी छोटे मोटे प्रेत भाव से प्रभावित हुये थे । आईये देखें । छलावा किस प्रकार मनुष्य को प्रभावित करता है । इसकी एक किस्म जो बेधङक हमारे घरों में घुस आती है । और विश्व में लगभग प्रत्येक को प्रभावित करती है । इस तरह से कार्य करती है ।
जब हम गहरी नींद में सो रहे होते हैं । और अचानक बेहद डरावना सपना देखते हैं । इस सपने में कोई भी चाहे वो जंगली जानवर हो या कोई आतंकवादी या कोई भूत प्रेत चुङैल जैसी डरावनी आकृति या कोई हमारा जाना अनजाना दुश्मन कहने का आशय ये कि दुश्मन के माध्यम के रूप में कोई भी हो ।
सपने की उस स्थिति में हमें इस बात का भय हो जाता है  कि सामने वाला हमें मार डालने पर आमादा है । या हमारा गला दवा रहा है । या हमारे किसी परिजन या प्रिय बच्चे को मार डालने पर आमादा है..? और सपने की उस स्थिति में हम बेतहाशा अपने किसी परिजन को पुकार रहे होते हैं । हमें लगता है कि हम काफ़ी जोर से चिल्ला रहे मम्मी..पापा..भैया...आदि और हमारे परिजन हमारे पास ही दूसरे कमरे में या आंगन आदि में है ।
पर जाने क्यों वे हमारी आवाज सुन नहीं पा रहे । जबकि हम काफ़ी जोर लगाकर पुकार रहे हैं । वास्तविकता ये होती है कि हमारी आवाज ही नहीं निकल रही होती । इसी तरह ये सपना क्लायमेक्स पर पहुँचकर हमारी आंख खुल जाती है..और आँख खुल जाने के बाद भी ..अलग अलग मनुष्यों की स्थिति के अनुसार हमें सामान्य होने में दस से बीस मिनट लग जाते है ।


अब देखिये । छलावा अपना काम कर गया और आपको पता तक नहीं चला । अब यहीं पर एक विरोधाभास भी है । इसी से मिलती जुलती एक स्थिति । और इसी से मिलता जुलता एक सपना । ऐसा भी होता है । जिसमें छलावा का कोई रोल नहीं होता । ये स्थिति तब होती है । जब हम सीने पर हाथ रखकर । या किसी अन्य प्रकार का दवाव लेकर सो जाते है । या हमारे शरीर का कोई भी कमर से ऊपर का हिस्सा हल्का या कुछ ही अधिक दवाव में लगभग पन्द्रह से बीस मिनट के लिये आ जाता है । और शरीर में निर्वाध रूप से होते रक्त संचार में बाधा आती है । और तब शरीर का स्वचालित सिस्टम एक " डरावने अलार्म " के स्टायल में हमें सचेत करता है ।
मैं खुद दावे से कहता हूँ कि ये भूतिया स्थिति नहीं होती । बेहद थकान में अस्त व्यस्त अवस्था में सो जाने पर । या बेहद गर्मी या बेहद सर्दी में भी सो जाने पर भी ये स्थिति होती है । और गारन्टिड ये भूतिया नहीं होती ।
दरअसल छलावे का प्रभाव और गलत (मुद्रा आदि में ) सोने की स्थिति से हुआ प्रभाव । एक समान प्रतीत होते हुये भी इन दोनों के अनुभव में काफ़ी अन्तर है । गलत ढंग से सोने से हुआ डरावना अनुभव मुश्किल से एक मिनट या उससे भी कम समय के लिये होता है ।
इसमें दुश्मन माध्यम के रूप में जो भी होता है । हमारा परिचित होता है । दूसरे सबसे बङी खास बात अक्सर ये होती है कि इसमें हम लम्बे समय तक चिल्लाने या सहायता के लिये पुकारने का अनुभव नहीं करते । जाग जाने के बाद हमें कोई खास भय महसूस नहीं होता । इसका प्रभाव अक्सर जागते ही समाप्त हो जाता है । जबकि छलावे के आक्रमण में स्थितियाँ ठीक विपरीत होती हैं । हम एक छोटी सी घटना टायप कोई कहानी देखते हैं । और उस वक्त वो कहानी हमारे लिये अनजानी नहीं होती । यानी जो हो रहा है ।
और हम जिस स्थान पर हैं । वो हमारे लिये उस वक्त परिचित होता है । भले ही ऐसी घटना और ऐसे स्थान से इस वर्तमान जीवन में हमारा कोई वास्ता न पङा हो । फ़िर अचानक कहानी चलते चलते ऐसा मोङ लेती है कि मान लो हमारे ऊपर मृत्यु के समान कोई खतरा है । और हम डरते हैं । बेतहाशा भागते हैं । परिजनों को पुकारते हैं । यह सब भय अनुमानतः हम दस से लेकर कभी कभी बीस मिनट तक महसूस करते हैं । और अन्त में बेहद घबराहट की स्थिति में जागते हैं और जागने के बाद भी भय और बैचेनी महसूस करते है । अगर ऐसे अनुभव से आप गुजरे हैं ।


और जब आप जागे । तब आपने देखा कि आप सामान्य स्थिति में ही सो रहे थे । यानी रक्त संचरण में कोई बाधा नहीं थी । यह निसंदेह छलावा था । ये छलावा इससे ज्यादा और कुछ नहीं करता । आप को किसी तरह की इससे कोई हानि नहीं होती । सिर्फ़ एक डरावने सपने के अनुभव के अतिरिक्त और कुछ नुकसान नही होता । दूसरे ये फ़िर आपकी जिन्दगी में दोबारा नहीं आता । यदि इसी से मिलता जुलता आपको फ़िर कोई अन्य अनुभव होता है । तो वो दूसरा छलावा है ।(
लेकिन यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूँ । कुछ लोग बार बार एक ही तरह का डरावना या कोई रहस्यमय सपना देखते हैं । और अक्सर वो सपना उन्हें याद रहता है । यह छलावा नहीं होता ।) यही वो सामान्य छलावा है । जिसका प्रत्येक जीव अपने जीवन में कभी न कभी अनुभव करता है ।
इसके अतिरिक्त जो छलावे होते हैं वो कम या अधिक स्तर पर मनुष्य को नुकसान पहुँचाते हैं । दूसरे किस्म का एक छलावा अक्सर निर्जन स्थानों पर । खासकर निर्जन स्थानों में जहाँ नदी नहर तालाव या झील आदि होते हैं । वहाँ होता है । ये ऐसा द्रष्य क्रियेट करता है कि आपके अन्दर एक कौतूहल पैदा हो जाय । और आप लगभग सम्मोहित स्थिति में इसके पीछे पीछे चले जाँय ।
जैसे आपको ऐसे निर्जन स्थानों पर कोई घरेलू बकरी , भैंस या कुत्ता इस रूप में आकर्षित करेगा । मानों भटककर आ गया हो । उस वक्त वो आप को इस तरह आकर्षित करता है कि आप न चाहते हुये भी उसके पीछे चल देते हैं । और अपने अपेक्षित क्षेत्र में ले जाकर वो रूप अचानक गायब हो जाता है । कभी कभी इससे प्रभावित लोग नदी नहर या झील तक में उतर जाते हैं । भले ही वो ढंग से तैरना नहीं जानते ।


इसके दो प्रमुख उद्देश्य मेरी स्टडी में आये । एक तो ये अपने नाम और स्वभाव के अनुसार निरुद्देश्य आपको परेशान कर मजा लेता है । दूसरा ये अक्सर आपको प्रेत प्रभावित क्षेत्र में ले जाता है । छलावे की एक तीसरी किस्म मेरे हिसाब से खतरनाक होती है । पर राहत की बात ये है कि ये ज्यादातर बस्ती से दूरस्थ स्थानों जैसे किसी नहर आदि का पुल , जैसे प्रयोग में न लाया जाने बाला शमशान स्थल , कोई खन्डित हो चुका निर्जन देवालय के समीप का स्थल..आदि कई प्रकार के स्थान हो सकतें हैं ।
 बस खास पहचान ये है  कि स्थान लगभग निर्जन होगा और किसी प्रकार से दोष युक्त होगा ..जैसे आसपास किसी की हत्या या आत्महत्या हुयी हो । किसी ने गलत तरीके से किसी शव का संस्कार किया हो । किसी प्रकार के देवी देवता पूजन विधान में किसी से भारी गलती हुयी हो । ऐसे अनेकों कारण हो सकते हैं ।
अब ये छलावा क्या करता है । कोई शराब में धुत..या मांसाहार का सेवन करके..या किसी विशेष पूजा में जानवूझकर कोई गलती करता है । जैसे विशेष वृतों आदि में अभक्ष्य भोजन का सेवन । स्त्री या पुरुष किसी के द्वारा उस वृत या पूजा में वर्जित होने के बाबजूद सहवास कर लेना । तो ये उस दोषी व्यक्ति की बुद्धि हरण कर लेता हैं ।
और मनुष्य में अचानक एक भारी हताशा का जन्म हो जाता है । और वैसी अवस्था में मनुष्य सोचता है कि जीवन बेकार है..? और आत्महत्या कर लेता है । यदि भाग्यवश बच भी जाता है । तो भी वह अपने शरीर को काफ़ी नुकसान पहुँचा लेता हैं । ये आत्महत्या आदि मनुष्य उन्हीं दूषित स्थानों पर पहुँचकर करता है । जिनका मैंने ऊपर वर्णन किया है ।
पर आप लोग डरें नहीं । अरबों की आवादी वाली इस प्रथ्वी पर एक मोटे अनुमान के मुताविक ( आंकङे नहीं हैं । ये दर ऊपर नीचे हो सकती है ) यदि एक करोङ मत्यु प्रतिदिन होती है । तो पूरी प्रथ्वी पर दो या तीन हजार लोग प्रेतभाव से प्रभावित होकर मरते हैं । वो भी तब जब उन्होंने खुद कोई गलती की हो और " आ बैल मुझे मार " जैसा काम जाने या अनजाने कर बैठे हों । और जो सात्विक भाव के हैं । और केवल हनुमान चालीसा आदि जैसी कोई छोटी मोटी पूजा भी करतें हैं । उनसे इस तरह की बलांए चार कोस दूर भागती हैं ।
प्रेतों से बचने के कुछ उपाय ये हैं । किसी भी इस प्रकार के निर्जन क्षेत्र से यदि आपको गुजरना पङें तो एकदम नये और सफ़ेद वस्त्र हरगिज न पहनें । किसी प्रकार की खुशबू या परफ़्यूम का उपयोग न करें । उस क्षेत्र से गुजरते वक्त काम विचारों से एकदम दूर रहें और हो सकें तो अपने इष्ट का चिंतन करें ।
यदि किसी कारणवश आपको ऐसे क्षेत्र से गरमागरम भोजन चाहे वो शाकाहारी हो या माँसाहारी के साथ ( जिसमें खाने की मनमोहक खुशबू आ रही हो या न भी आ रही हो ) गुजरना पङे तो उस भोजन में से एक टुकङा खाकर उसे झूठा कर दें । भोजन और कामवासना के विचारों से प्रेतावेश के मामले सर्वाधिक देखने को मिलते हैं । भोजन में से उङने वाली खुशबू प्रेतों का आहार होती है ।

05 जून 2010

बैल को सरकार ने खरीद लिया है


आप समाजवाद और साम्यवाद में क्या फर्क महसूस करते हैं ?
- वही फर्क करता हूं मैं । जो टी.बी. की पहली स्टेज में और तीसरी स्टेज में होता है । और कोई फर्क नहीं करता हूं । समाजवाद थोड़ा सा फीका साम्यवाद है । वह पहली स्टेज है - बीमारी की । और पहली स्टेज पर बीमारी साफ दिखाई नहीं पड़ती । इसलिए पकड़ने में आसानी होती है । इसलिए सारी दुनिया में कम्युनिज्म ने सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर दिया है । कम्युनिज्म शब्द बदनाम हो गया है । और कम्युनिज्म ने पिछले 50 सालों में दुनियां में जो किया है । उसके कारण उसका आदर क्षीण हुआ है । 50 वर्षों में कम्युनिज्म की प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल गई है । इसलिए अब कम्युनिज्म सोशलिज्म शब्द का उपयोग करना शुरू कर किया है । अब वह समाजवाद की बात करता है । और यह भी कोशिश कर सकता है कि हम समाजवाद से भिन्न हैं । लेकिन समाजवाद और साम्यवाद में कोई बुनियादी भेद नहीं है । सिर्फ शब्द का भेद है । लेकिन शब्द के भेद पड़ने से बहुत फर्क मालूम पड़ने लगते हैं । शब्द को भर बदल दें । तो ऐसा लगता है । कोई बदलाहट हो गई । कोई बदलाहट नहीं हो गई है ।
समाजवाद हो । या साम्यवाद हो । सोशलिज्म हो । या कम्युनिज्म हो । एक बात पक्की है कि व्यक्ति की हैसियत को मिटा देना है । व्यक्ति को पोंछ डालना है । व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त कर देना है । संपत्ति का व्यक्तिगत अधिकार छीन लेना है । और देश की सारी जीवन व्यवस्था राज्य के हाथ में केंन्द्रित कर देनी है । लेकिन हमारे जैसे मुल्क में, जहां कि राज्य निकम्मे से निकम्मा सिद्ध हो रहा है । वहां अगर हमने देश की सारी व्यवस्था राज्य के हाथ में सौंप दी । तो सिवाय देश के और गहरी गरीबी, और गहरी बीमारी में गिरने के कोई उपाय न रह जाएगा ।
आज मेरे 1 मित्र मुझे 1 छोटी सी कहानी सुना रहे थे । वह मुझे बहुत प्रीतिकर लगी । वे मुझे 1 कहानी सुना रहे थे कि 1 आदमी ने रास्ते से गुजरते वक्त 1 खेत में 1 बहुत मस्त और तगड़े बैल को काम करते हुए देखा । वह पानी खींच रहा है । और बड़ी शान से दौड़ रहा है । उसकी शान देखने लायक है । और उसकी ताकत, उसका काम भी देखने लायक है । वह जो आदमी गुजर रहा था । बहुत प्रशंसा से भर गया । उसने किसान की बहुत तारीफ की । और कहा कि बैल बहुत अदभुत है । 6 महीने बाद वह आदमी फिर वहां से गुजर रहा था । लेकिन बैल अब बहुत धीमे धीमे चल रहा था । जो आदमी उसे चला रहा था । उससे उसने पूछा कि - क्या हुआ ? बैल बीमार हो गया ? 6 महीने पहले मैंने उसे बहुत फुर्ती और ताकत में देखा था । उस आदमी ने कहा कि - उसकी फुर्ती और ताकत की खबर सरकार तक पहुंच गयी । और बैल को सरकार ने खरीद लिया है । जबसे सरकार ने खरीदा है । तब से वह धीमा चलने लगा है । पता नहीं सरकारी हो गया है । 6 महीने और बीत जाने के बाद वह आदमी फिर उस जगह से निकला । तो देखा कि बैल आराम कर रहा है । वह चलता भी नहीं । उठता भी नहीं । खड़ा भी नहीं होता । तो उसने पूछा कि - क्या बैल बिलकुल बीमार पड़ गया । मामला क्या है ? तो जो आदमी उसके पास खड़ा था । उसने कहा - बीमार नहीं पड़ गया है । इसकी नौकरी कन्फर्म हो गई है । अब यह बिलकुल पक्का सरकारी हो गया है । अब इसे काम करने की कोई भी जरूरत नहीं रह गई है । बैल अगर ऐसा करे । तब तो ठीक है । आदमी भी सरकार में प्रवेश करते ही ऐसे हो जाते हैं । उसके कारण हैं । क्योंकि व्यक्तिगत लाभ की जहां संभावना समाप्त हो जाती है । और जहां व्यक्तिगत लाभ निश्चित हो जाता है । वहां कार्य करने की इनसेंटिव, कार्य करने की प्रेरणा समाप्त हो जाती है । सारे सरकारी दफ्तर, सारा सरकारी कारोबार मक्खियां उड़ाने का कारोबार है । पूरे मुल्क की सरकार नीचे से ऊपर तक आराम से बैठी हुई है । और हम देश के सारे उद्योग भी इनको सौंप दें । ये जो कर रहे हैं । उसमें सिवाय हानि के कुछ भी नहीं होता ।
मेरा अपना सुझाव तो यह है कि जो चीजें इनके हाथ में हैं । वे भी वापस लौटा लेने योग्य है । अगर हिन्दुस्तान की रेलें हिन्दुस्तान की व्यक्तिगत कंपनियों के हाथ में आ जाएं । तो ज्यादा सुविधाएं देंगी । कम टिकट लेंगी । ज्यादा चलेंगी । ज्यादा आरामदायक होंगी । और हानि नहीं होगी । लाभ होगा । जिस जिस जगह सरकार ने बसें ले लीं अपने हाथ में । वहां बसों में नुकसान लगने लगा । जिस आदमी के पास 2 बसें थीं । वह लखपति हो गया । और सरकार जिसके पास लाखों बसें हो जाती हैं । वह सिवाय नुकसान के कुछ भी नहीं करती । बहुत आश्चर्यजनक मामला है ।
मैं अभी मध्यप्रदेश में था । तो वहां मध्यप्रदेश ट्रांसपोर्टेशन बसों की व्यवस्था के जो प्रधान हैं । अब तो वे सब सरकारी हो गई हैं । उन्होंने मुझे कहा कि पिछले वर्ष हमें 23 लाख रुपये का नुकसान लगा है । उन्हीं बसों से दूसरे लोगों को लाखों रुपये का फायदा होता था । उन्हीं बसों से सरकार को लाखों का नुकसान होता है । लेकिन होगा ही । क्योंकि सरकार को कोई प्रयोजन नहीं है । कोई काम्पिटीशन नहीं है ।
दूसरा सुझाव मैं यह भी देना चाहता हूं कि अगर सरकार बहुत ही उत्सुक है धंधे हाथ में लेने को । तो काम्पिटीशन में सीधा मैदान में उतरे । और बाजार में उतरे । जो दुकान 1 आदमी चला रहा है । ठीक उसके सामने सरकार भी अपनी दुकान चलाए । और फिर बाजार में मुकाबला करे । एक कारखाना आदमी चला रहे है । ठीक दूसरा कारखाना खोले । और दोनों के साथ समान व्यवहार करे । और अपना कारखाना चलाकर बताए । तब हमको पता चलेगा कि सरकार क्या कर सकती है ।
सरकार कुछ भी नहीं कर सकती है । असल में सरकारी होते ही सारे काम से प्रेरणा विदा हो जाती है । और जहां सरकार प्रवेश करती है । वहां नुकसान लगने शुरू हो जाते हैं ।
समाजवाद और साम्यवाद दोनों ही, जीवन की व्यवस्था को राज्य के हाथों में दे देने का उपाय हैं । जिसे हम आज पूंजीवाद कहते हैं । वह पीपुल्स कैपिटलिज्म है । वह जन पूंजीवाद है । और जिसे समाजवाद और साम्यवाद कहा जाता है । वह स्टेट कैपिटलिज्म, राज्य पूंजीवाद है । और कोई फर्क नहीं है । जो चुनाव करना है । वह चुनाव यह है कि हम पूंजीवाद व्यक्तियों के हाथ में चाहते हैं कि राज्य के हाथ में चाहते हैं । यह सवाल है । व्यक्तियों के हाथ में पूंजीवाद बंटा हुआ है । डिसेंट्रलाइज्ड है । ओशो
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मैं अखबार नहीं । जो दूसरे दिन पुराना हो जाऊँ । जिंदगी का वो पन्ना हूँ । जहां लम्हे ठहर जाते हैं - ओशो ।
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भीतर की यात्रा - सत्य स्वयं के भीतर है । उसे पहचान लेना भी कठिन नहीं । लेकिन उसके लिए अपने भीतर यात्रा करनी होगी । जब कोई अपने भीतर जाता है । तो अपने ही प्राणों के प्राण में । वह सत्य को भी पा जाता है । और स्वयं को भी । पहले महायुद्ध की बात है । एक फ्रांसीसी सैनिक को किसी रेलवे स्टेशन के पास क्षत विक्षत स्थिति में पाया गया था । उसका चेहरा इतने घावों से भरा था कि उसे पहचानना कठिन था कि वह कौन है । उसे पहचानना और भी कठिन इसलिए हो गया कि उसके मस्तिष्क पर चोट आ जाने से वह स्वयं भी स्वयं को भूल गया था । उसकी स्मृति चली गई थी । पूछे जाने पर वह कहता था - मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूं । और कहां से हूं ? और यह बताते ही उसकी आंखों से आंसुओं की धार लग जाती थी । अंतत: 3 परिवारों ने उसे अपने परिवार से संबंधित होने का दावा किया । वह तीनों परिवारों से हो । यह तो संभव नहीं था । इसलिए उसे क्रमश: तीनों गांवों में ले जाकर छोड़ा गया । 2 गांवों में तो वह किंकर्तव्यविमूढ़ की भांति जाकर खड़ा हो गया । किंतु तीसरे गांव में प्रविष्ट होते ही उसकी फीकी आंखें 1 नई चमक से भर गई । और उसके भाव शून्य चेहरे पर किन्हीं भावों के दर्शन होने लगे । वह स्वयं ही 1 छोटी गली में गया । और फिर 1 घर को देखकर दौड़ने लगा । उसके सोये से प्राणों में कोई शक्ति जैसे जग गई हो । वह पहचान गया था । उसका घर उसकी स्मृति में आ गया था । उसने आनंद से विभोर होकर कहा था - यही मेरा घर है । और मुझे स्मरण आ गया है कि मैं कौन हूं ।
ऐसे ही हममें से प्रत्येक साथ हुआ है । हम भूल गये हैं कि कौन हैं ? क्योंकि हम भूल गये हैं कि हमारा घर कहां है ? अपना घर दीख जावे । तो स्वयं को पहचान लेना सहज ही हो जाता है । जो व्यक्ति बाहर ही यात्रा करता रहता है । वह कभी उस गांव में नहीं पहुंचता । जहां कि उसका वास्तविक घर है । और वह न पहुंचने से वह स्वयं तक ही नहीं पहुंच पाता है । बाहर ही नहीं । भीतर भी 1 यात्रा होती है । जो स्वयं तक । और सत्य तक ले जाती है ।

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