21 मार्च 2012

किसी दूसरे गुरु के लेख पढना सही है ?

जय गुरुदेव जी की । राजीव भैया सादर प्रणाम । गुरूजी से गुरु दीक्षा लेने के बाद उनके अनुसार तथा आपके मार्ग दर्शन के अनुसार ध्यान के मार्ग पर चलने की कोशिश कर रहे है । अभी हम सुचारू रूप से ध्यान कर नहीं पा रहे है । आगे का रास्ता तो बहुत लम्बा है । आशा करते है कि गुरूजी की उंगली पकड़ कर उसे प्राप्त कर लेंगे । आजकल आपका कोई नया लेख नहीं आ रहा है । मैं और मेरा दोस्त आजकल नए वेब लिंक देख रहे है । जो ओशो से सम्बन्धित है । कृपया ये बताये कि किसी दूसरे गुरु के लेख पढना सही है । या नहीं । हम जल्दी ही गुरूजी के आश्रम में कुछ दिन ( 8-10) आने का प्रोग्राम बना रहे हैं ।
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जैसा कि मैं बहुत पहले ही अपने पूर्व के कई लेखों में स्वीकार कर चुका था कि आत्म ज्ञान की हँस दीक्षा का जो उचित तरीका है । वह फ़िलहाल ( उस समय नहीं था ) हमारे पास नहीं है । जैसे कि आपकी दीक्षा भले ही सतसंगियों के घर में हुयी थी । पर वहाँ आसपास दूसरे घरों की लौकिक वासना तरंगों का जोर अधिक था । दीक्षा के लिये तप युक्त सिद्ध स्थान और उससे भी अच्छा कोई सिद्ध गुफ़ा या अंडर ग्राउण्ड कक्ष अधिक बेहतर होता है । 


अब कुछ महीनों से हमारी यह कमी दूर हो गयी । हमारा आश्रम दीक्षा के लिये एकदम उचित और अति पवित्र पावन स्थल है । जहाँ चहुँ ओर सात्विक तरंगे ही फ़ैली होती है । अगर आपकी दीक्षा मेरे घर या उस घर में जहाँ आपसे मुलाकात हुयी थी । होती । तब इनके % में उसी अनुपात में अंतर आ जाता । मेरे घर कम से कम 70% हमारी मुलाकात वाले घर में 30% और जहाँ आपकी हुयी थी । वहाँ बहुत हद 5% या 10% दीक्षा प्रभावी होती । आपको याद होगा । हमारी बातचीत के समय ही मैंने यह तथ्य स्पष्ट कर दिया था । इसके बाद जब आश्रम सुचारु रूप से चलने लगा । तब मैंने सूचना भी प्रकाशित की थी कि जिन दीक्षित लोगों की ध्यान में सही प्रविष्ट न हुयी हो । वह फ़िर से आकर ध्यान को improve कर सकते हैं । बस इससे ज्यादा  हम लोग कुछ नहीं कर सकते । कुछ पाना है । तो फ़िर श्रम और यात्रा करनी ही होगी । लेकिन जब भी आयें । श्री महाराज जी से पूर्व अनुमति लेकर ही आयें । जो कि वो आपको आश्रम पर ही मिल सकें । और आपका आना व्यर्थ न हो । ये अच्छा है । 8-10 दिन का समय निकाल कर आने से आपकी ध्यान में ठीक प्रविष्ट हो जायेगी ।
नेट से जुङे ऐसे लोगों की अभी दीक्षा हुयी है । और उन्हें अच्छा लाभ मिला । उनका अधिकतर का % 80 % तक

रहा । केवल होली पर आश्रम संस्थापक ( जिनकी 4-5 महीने पूर्व ही मृत्यु हुयी ) की गमी होने से आने जाने वालों की वजह से व्यवधान बना रहा । इधर U P में चुनाव की बहार थी । इसलिये ग्रामीण लोग राजनीतिक चर्चा के लिये भी इकठ्ठे हो जाते थे । वह झमेला अलग था । लेकिन अब ऐसा नहीं है । इसलिये रुके ध्यान वाले । या टुकङा टुकङा ध्यान वाले फ़िर से आ सकते हैं । अन्य लोग जो हमारे से जुङे नहीं है । यानी हमारे शिष्य नहीं है । वे भी आकर सहज योग ध्यान को  improve कर सकते हैं ।
आप ओशो या किसी भी अन्य छोटे बङे गुरु का साहित्य वाणी पढ सुन सकते हैं । उसमें कोई हर्ज नहीं । किसी भी सन्त वाणी से हमेशा लाभ ही होता है । हानि नहीं । और सन्त मत सिर्फ़ 1 परमात्मा की ही बात करता है । आप किसी दूसरे गुरु या साधु सन्त से विचार विमर्श भी कर सकते हैं । वह कुछ अनुभव करा सकें । तो वह भी कर सकते हैं । इस तरह की कोई रोक नहीं । और इसमें कुछ गलत नहीं । दरअसल इसी तरह आप सत्य को और भी अधिक स्पष्ट जानेंगे । और दूसरों और हम में क्या फ़र्क है । यह भी जान जायेंगे । ऐसी रोक टोक की बातें सिर्फ़ वही लोग करते हैं । जिनका ज्ञान नकली और मामूली होता है ।

पर सांच को आंच नहीं होती । सच्चाई छुप नहीं सकती झूठे उसूलों से । खुशबू आ नहीं सकती कागज के फ़ूलों से । हमें अच्छी तरह मालूम है । हमारे फ़ूल असली हैं । और महक रहे हैं । इसलिये हम जो भी कहते हैं । डंके की चोट पर कहते हैं । मैंने अब तो चैलेंज ही कर दिया - आप मेरा इस विश्व में सिर्फ़ कोई 1 विकल्प ही खोज कर दिखायें ।
- अभी पिछले कुछ दिनों से मैं एक बिलकुल अलग हटकर कहानी लिख रहा हूँ । जो बङी भी है । अतः नये लेखों का प्रकाशन नहीं हो पा रहा । पर कोई सूचना । या आवश्यक लेख का प्रकाशन कहानी के लिये कभी नहीं रुकेगा । बीच में ऐसी स्थिति बनने पर कहानी रोक कर उसका प्रकाशन होगा । मेरा एकमात्र उद्देश्य सार नाम और सहज योग का प्रचार करना मात्र है । उसके आगे कहानी जैसी तुच्छ वस्तु का कोई महत्व नहीं । कभी नहीं ।
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उत्तर लेख छपने के बाद प्रतिक्रिया मेल से - जय गुरुदेव जी की ! धन्यवाद । वैसे हम किसी और गुरु के लेख में नहीं जाना चाहते थे । पर आपके


अष्ट्रावक्र गीता के लिंकों के कुछ पार्ट पढने के बाद ही हमने ओशो को सर्च किया । इसमें हमारा किसी दूसरे रास्ते जाने को कोई मन नहीं है । क्योंकि जो अपने गुरु को नहीं समझ सकता । वो आगे तो क्या जाएगा  ? गुरु दीक्षा के बाद में मुझे जो लाभ हुआ है । ये बात मेरी आत्मा ही जानती है । आपसे बहुत मिलेगा । बहुत सी बाते करनी हैं । बहुत कुछ जानना है । लेकिन अभी मेरी परीक्षा चल रही है । ऑफिस से अभी इतना ( 8-10 दिन )  अवकाश भी नहीं मिल सकता । मैं अभी कुछ बिज़नेस डालने का भी प्रयास कर रहा हूँ । आशा है । गुरु जी की कृपा से इसमें सफल हो जाऊँगा । फिर जून में भूपेंद्र की परीक्षा है । तो हम आगे पीछे समय निकाल कर और गुरूजी से बात करके आयेगे । मैं अभी शारीरिक रूप से जयपुर में हूँ । लेकिन मन तो आश्रम में है । 
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