16 जून 2015

अल्लाह बङा या राम

विहिप के नेता प्रवीण तोगडिय़ा ने एक बार फिर विवादित बयान दिया है । तोगड़िया ने कहा -  योग करते हुए अल्लाह शब्द का इस्तेमाल हिन्दू बर्दाश्त नहीं करेंगे । यूपी के बुलंदशहर में आयोजित कार्यक्रम में तोगड़िया ने कहा कि योग में अल्लाह शब्द का इस्तेमाल करने से भगवान शिव का अपमान होगा ।
उन्‍होंने कहा कि सूर्य नमस्कार करते हुए ॐ शब्द का उच्चारण करना योग का अहम हिस्सा है । जिन्हें ॐ शब्द और सूर्य नमस्कार से एलर्जी है । उन्हें बीमारियों के साथ जीना चाहिए । ये बयान ऐसे समय में आया है जब 21 जून को विश्व योग दिवस पर केंद्र सरकार की ओर से आयोजित योग सेशन में हिस्सा लेने के लिए दारुल उलूम देवबंद और कई मुस्लिम धर्मगुरु राजी हो गए हैं ।
http://m.khabar.ibnlive.com/news/politics/vhp-leader-ashok-singhal-controversial-statement-381441.html
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मेरी बात - धर्मों को लेकर इंसानों, देशों, जातियों की गुटबाजी एक सर्वथा अलग चीज है । लेकिन सिर्फ़ धर्म को लेकर इंसानों में ऐसा शाब्दिक, मानसिक, शारीरिक विभाजन एकदम असंभव है । इसीलिये मैंने आरम्भिक पंक्ति में ‘धर्मों’ और उसके बाद की पंक्ति में सिर्फ़ ‘धर्म’ शब्द का उपयोग किया है । बहुत धर्म (का भृम) सिर्फ़ इंसान के अज्ञान की उपज है । एक ही धर्म का होना परमात्मा की उत्पत्ति है ।
यहाँ फ़िर वही बात दोहरानी होगी कि योग करते समय ‘अल्लाह’ कहने से यदि भगवान शिव का अपमान होता है । नमाज अदा करते समय राम या जय सियाराम उच्चारने से अल्लाह नाराज हो जाये । तो या तो सृष्टि रचियता दो या और भी अधिक हैं ।
कबीर साहब की बहुप्रसिद्ध एक वाणी इसी स्थिति पर है । वाणियां तो इस सम्बन्ध में अनेकों हैं पर यह एकदम करीब है ।
हिन्दू कहे मोहि राम प्यारा, तुर्क कहे रहमाना ।
आपस में दोऊ लङ लङ मुए, मर्म न काहू जाना ।
हिन्दू मुस्लिम के इस अज्ञानता पूर्ण शाब्दिक विवाद में सिर्फ़ तीन शब्द - अल्लाह, राम, ॐ हैं और कबीर साहब के इन शब्दों को ध्यान से समझिये । जो उन्होंने हिन्दू मुस्लिम दोनों को कहे हैं - मर्म न काहू जाना ।
क्या है यह - मर्म ?

ना जानकारी के चलते आपको बेहद हैरानी होगी कि अल्लाह, राम, ॐ में धातु और उर्जा के आधार पर अल्लाह शब्द अधिक ठोस और शक्तिशाली है । यदि इसमें कृष्ण या श्रीकृष्ण (इन दोनों में अन्तर है, साकार निराकार का) नाम भी मिलाया जाये । तो भी उच्चता के आधार पर यह कृम बनेगा - अल्लाह, कृष्ण, राम, ॐ
असल में बीज मन्त्र ॐ मैंने सिर्फ़ विवाद का हिस्सा होने से लिया है । वरना इसका पहले तीन नामों से वैसा सम्बन्ध नहीं है । जैसा कि विषय है ।
अब ॐ को लें । तो इसी से मनुष्य शरीर की रचना हुयी है । ॐ के पाँच अंगों में .. चेतन, इच्छाशक्ति, (तीन गुण) सत, रज, तम हैं । इसी को रूपक में कृमशः ..राम, आदिशक्ति, विष्णु, बृह्मा, शंकर कहा जाता है । इसी पाँच का संयुक्त रूप जीव है । यहाँ स्मरण रखें । यह विवरण शास्त्रोक्त भी है ।
मुझे नहीं लगता । दुर्लभ व्यक्तियों को छोङकर किसी ने ॐ को सूक्ष्म रूप में जाना हो या उच्चारा हो । प्रायः बीज मन्त्र के स्थान पर उच्चारण करते समय भी मुझे वैज्ञानिक तरीके से उच्चारण करने वाले नहीं दिखे ।
फ़िर भी यदि ॐ का विधि अनुसार उच्चारण जाप किया जाये । तो यह शरीर के दायरे में आने वाली हर शक्ति को क्रियाशील करके उच्चस्तर पर पहुँचा देगा । लेकिन इससे अधिक लाभ नहीं कर सकेगा ।
अगर राम शब्द की बात की जाये तो इसका अर्थ है - जङ और चेतन । चेतना और माया । र-अ-म ।
यानी चेतन प्रवाह जो बहते हुये निरन्तर सृष्टि क्रिया कर रहा है । इसका मन्त्र रूप सूक्ष्म आंतरिक उच्चारण इससे सम्बन्धित फ़ल देगा ।
अब कृष्ण नाम की बात करते हैं । यह कर्षण क्रिया का हेतु है । कर्षण क्रिया द्वारा चुम्बकत्व का निर्माण होता है । अगर आप आ-कर्षण शब्द को समझें । तो एकदम सटीक समझ आयेगा । इसका वैधानिक उच्चारण करने से यौगिक उर्जा का निर्माण होता है । कृष्ण में समृद्धि या ऐश्वर्य का समानार्थी ‘श्री’ जोङने से, जिस अस्तित्व के लिये यह उपयोग हो रहा है । वह यौगिक उर्जा से पूर्ण और ऐश्वर्य का स्वामी होगा ।
और अब विवादित और अनेकानेक हिन्दुओं के लिये मुस्लिमों के आचरण की वजह से नफ़रत और हेय शब्द बन चुका ‘अल्लाह’ की बात करते हैं । अल-लाह, ये निराकार का द्योतक है (यहाँ विशेष ध्यान ये रखना कोई भी तथ्य मैं प्रचलित बातों या धर्म पुस्तकों के आधार पर न कहकर अक्षर धातु, शरीर विज्ञान और अंतरिक्षीय या आत्मिक उर्जा नियम के आधार पर कह रहा हूँ ।) और उच्चारण के समय एक ठोस शक्ति देता है । उच्चारण में कोई भी इच्छा या भावना संयुक्त कर देने से यह सिद्धि के समान शक्ति सहित कार्य करता है ।
खुदा शब्द मन या अहम भाव के लिये है । यह अभिमान या मन वासनाओं से सम्बन्धित है । इससे अहंकार बढने के अतिरिक्त कुछ नहीं होता । न इसका ऊपर जैसे शब्दों का कोई अन्य अर्थ है ।
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अब उपरोक्त को सिद्ध करने के लिये आप निरन्तर इन शब्दों ॐ राम कृष्ण अल्लाह का शुद्ध और निरन्तर मतलब ॐ ॐ ॐ..फ़िर राम राम राम फ़िर अल्लाह अल्लाह..इस तरह सधे अन्दाज में लय से, बिना बहुत जल्दी जल्दी किये उच्चारण करें ।
तो आप पायेंगे कि ‘अल्ल’ कहते ही आपकी जीभ तालू से उस स्थान पर लगती है । जो चिरंजीविता और बहुत सी अन्य शक्तिशाली सिद्धियों हेतु खेचरी मुद्रा का स्थान है और अल्ल कहते समय शरीर में और मुँह में एक ठोसपन की अनुभूति उसी समय होगी । तुलनात्मक ॐ राम या कृष्ण शब्दों के । तो अल्ल कहते समय यदि गहरा भाव है । तो शरीर और मन एक जबर्दस्त शक्ति ग्रहण करता है और बाद में लाह कहने से वह शक्ति आप में स्थिति हो जाती है ।
ध्यान रहे कि जितना ठोस उच्चारण और भाव होगा । शक्ति और उर्जा उसी अनुरूप होगी ।
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अगर आप अपने स्तर पर ऐसा उतना सटीक नहीं कर सकते । तो दूसरा एक आसान उपाय है । आजकल ऐसे गीत भजन प्रायः बहुत उपलब्ध हैं । जिनमें अल्लाह राम कृष्ण ॐ बारबार दुहराया जाता है । आप वह सुनें । और बारीकी से हरेक का क्या प्रभाव, ये स्वयं अनुभव करें ।
आपको एक और रहस्य बताऊँ । अपने म्लेच्छ आचरण के बावजूद मुस्लिम निराकार और एकेश्वर की गहरी और बेहद कट्टर मान्यता के कारण ही शक्तिशाली रहे हैं । क्योंकि उर्जा तो उर्जा है । वो राम या रावण किसी के पास हो । वह तो अपना कार्य करेगी । अतः यदि मुस्लिम समुदाय कयामत का दिन, स्वर्ग की प्राप्ति और काफ़िर शब्दों का सही अर्थ समझ लेता और तदनुसार आचरण करता । तो विश्व में सनातन के बाद यह सर्वोच्च धर्म होता और सर्वाधिक सनातनी इसी धर्म से होते ।
इन शब्दों का अर्थ इस प्रकार है । कयामत का दिन - मृत्यु । स्वर्ग - इच्छित की प्राप्ति । काफ़िर - धर्म विमुख । या जो धर्मी नहीं है । काफ़िर को मारने का अर्थ है । उसे धर्महीन से धर्मी बनाना ।
अब जैसा कि मैंने ऊपर कहा - आप किसी भी शब्द में भावना या वासना संन्निहित कर देते है । तो उर्जा उसी प्रकार से कार्य करती है । जैसा शब्द तन्त्र निर्मित हुआ ।
अतः मुस्लिमों का पतन उनके मुख्य सिद्धांतों का स्वार्थी और अवसरवादियों के गलत और भ्रामक अर्थ प्रचार प्रसार से हुआ ।
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अब मेरा आशय समस्त मानव जाति से है । आप कोई भी हो । हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आदि । एक बार इस प्रयोग को कुछ दिनों तक बिना किसी भावना के अल्लाह अल्लाह, जैसा कब्बाली गायक करते हैं । करिये अन्दाजा खुद ब खुद लग जायेगा ।
हाथ कंगन को आरसी क्या, पढे लिखे को फ़ारसी क्या ।
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अतः ऊपर के बयान से मुझे यही लगता है कि धार्मिक द्वेष हेतु सिर्फ़ मुसलमान ही दोषी नहीं । वे हिन्दू भी दोषी हैं । जो धर्म के असल स्वरूप से अपरिचित हैं ।
आपस में दोऊ लर लर मुए, मरम न काहू जाना ।
सत साहेब ।
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