12 अक्तूबर 2016

इश्क शरा दा वैरी

आओ मित्रो, हमें मिलो हमारा दुख सुख जानो । स्वपन में हम एक दूसरे से बिछुङ गये थे । अब तुम्हारा कोई पता नही लग पा रहा है । 
मेरे स्वामी, मैं वन में अकेली हूँ और तरह तरह के (धार्मिक) लुटेरों से लुट रही हूँ । मुल्ला और काजी तरह तरह के कर्मकांडी राह दिखाते हैं । जिससे दीन (इस्लाम) और धर्म (हिन्दू) सम्बन्धी भ्रम पैदा होते हैं । ये तो चिङीमार ठग की भांति हैं जो संसारी जीवों को फ़ंसाने को जाल बिछाते हैं ।
ये लोग बाहरी कर्मकांड और शरीअत को धर्म (आंतरिक अध्यात्म) बताते हैं और इस तरह से पैरों में जंजीरें डाल देते हैं । खुदा के इश्क के दरबार में कोई धर्म (सम्प्रदाय) के विषय में प्रश्न नही पूछता । सच कहूँ तो सच्चे इश्क का शरीअत से वैर है । 
प्रिय का देश नदी (भवजल) के पार है । नदी में लोभ की तरह तरह की लहरें उठ रही हैं । सतिगुरु (मुर्शिद) नाव लेकर खङे हैं । उसी के सहारे पार हो सकते हो । तब नाव में चढ़ने में देरी क्यों कर रहे हो ?
बुल्लेशाह कहते हैं कि (नाव में चढ़ जाओ) तुम्हें प्रिय अवश्य मिलेंगे । दिल में भरोसा रखो, प्रिय तो तुम्हारे पास ही है । तब तुम भरी दोपहरी के समय उसे खोजने की भूल क्यों कर रहे हो ?
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आ मिल यारा सार लै मेरी, मेरी जान दुखां ने घेरी ।
अन्दर ख्वाव बिछोङा होया, खबर न पैंदी तेरी ।
सुज्जी वन विच लुट्टी साइयां, चोर-शंग ने घेरी ।
मुल्लां काजी राह बतावण, दीन धरम दे फ़ेरे ।
एह तां ठग ने जग दे झांवर, लावण जाल चुफ़ेरे ।
करम शरां दे धरम बतावण, संगल पावण पैरी ।
जात मजब एह इश्क न पुछदा, इश्क शरा दा वैरी ।
नदियों पार ए मुलक सजण दा, लोभ लहर ने घेरी ।
सतिगुरु बेङी पङी खलोत, तैं क्यों लाई ए देरी ।
बुल्ले शाह शौह तैंनूं मिलसी, दिल नू देह दलेरी ।
प्रीतम पास ते टोलणा किस नूं, भुलिओ सिखर दुपहरी ।
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