06 अक्तूबर 2016

ईश्वर का सार्थक नाम क्या है ?

अहंवृति के सूत्र को पकङ कर आत्मा का अनुसंधान करना ऐसा है । जैसे कुत्ता सूंघकर अपने मालिक को पा लेता है । मालिक चाहे अनजाने दूर के स्थान में हो । लेकिन यह कुत्ते के मार्ग में विघ्न नही बनता । उस प्राणी के लिये अपने मालिक की गंध ही पर्याप्त संकेत है । उसके वेष की, आकार की ऊँचाई इत्यादि की जानकारी जरा भी आवश्यक नही है । कुत्ता उसे ढ़ूंढ़ते समय उसकी गन्ध को एकाग्रता से सूत्र की तरह पकङे रहता है और अन्त में उसे पाने में सफ़ल होता है ।
-------------
प्रश्न - ईश्वर के कई नामों में सार्थक नाम कौन सा है ?
उत्तर - ईश्वर के कई हजार नामों में ‘अहम’ अथवा ‘अहमस्मि’ जितना कोई भी नाम अन्वर्थ उचित और सुन्दर नही है । क्योंकि वह निर्विचार ह्रदय में इसी रूप में रहता है । ईश्वर के प्रसिद्ध असंख्य नामों में केवल ‘अहम-अहम’ नाम अहंकार नष्ट होने पर आत्मलक्षी पुरुषों के ह्रदयावकाश में मौन, परावाणी के रूप में विजेता की तरह गूंजता है । यदि कोई निरन्तर ‘अहम-स्फ़ुरण’ के प्रति लक्ष रखकर ‘अहम-अहम’ नाम पर ध्यान करता है । तो ऐसा ध्यान उसे विचार के जन्म स्थान पर ले जाकर वहाँ लीन कर देता है । तथा शरीर से जुङा हुआ उसका अहंकार नष्ट हो जाता है ।
-----------------
प्रश्न - साधक प्राणशक्ति को सुष्मणा मार्ग में कैसे ले जा सकता है । जिससे वह ‘श्री रमणगीता’ में कही हुयी ‘चिज्जड ग्रन्थि’ का भेदन कर सके ?

उत्तर - मैं कौन हूँ ? की तलाश करके । योगी कुन्डलिनी का उत्थान करके अवश्य उसे सुष्मणा मार्ग में ले जाना चाहेगा । ज्ञानी का यह लक्ष्य नही है । लेकिन दोनों एक परिणाम प्राप्त करते हैं अर्थात प्राणशक्ति को सुष्मणा में ले जाकर ‘चिज्जड ग्रन्थि’ का भेदन करते हैं ।
कुन्डलिनी आत्मा अथवा शक्ति का दूसरा नाम है । चूंकि हम स्वयं को शरीर से मर्यादित मानते हैं । हम उसके शरीर में रहने की बात कहते हैं । वस्तुतः वह बाहर भीतर दोनों जगह है । क्योंकि वह आत्मा या आत्मशक्ति से भिन्न नही है ।
---------------
प्रश्न - आत्मानुसंधान से ध्यान अच्छा नही है ?
उत्तर - ध्यान मानसिक कल्पना पर आधार रखता है । जबकि आत्मानुसंधान सत्य का अन्वेषण है । ध्यान का आधार वस्तुसत्ता है । अन्वेषण का आधार आत्मसत्ता है ।
प्रश्न - सत्य के अन्वेषण की कोई वैज्ञानिक पद्धति होनी ही चाहिये ।
उत्तर - असत्य का त्याग और सत्य का अन्वेषण वैज्ञानिक है ।
प्रश्न - मेरा मतलब है कृमशः त्याग की वैज्ञानिक प्रक्रिया अवश्य होनी चाहिये । पहले मन का, तब बुद्धि का उसके बाद अहंकार का त्याग ।
उत्तर - आत्मा ही एकमात्र सत्य है और सब असत्य है । मन तथा बुद्धि आत्मा से अलग नही रह सकते । बाइबल कहता है - निश्चल बनो और जानो कि ‘मैं ईश्वर हूँ’ । आत्मा को ईश्वर रूप जानने के लिये सिर्फ़ निश्चलता जरूरी है ।
----------------
प्रश्न - कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि हमें किसी ठोस पदार्थ पर ही एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिये । क्योंकि मन के नाश का प्रयत्न खतरनाक हो सकता है ?
उत्तर - खतरनाक किसके लिये ? आत्मा से भिन्न कोई खतरा हो सकता है । मैं-मैं अनन्त सागर है । अहंकार उस पर एक तरंग मात्र है । जिसे जीव या वैयक्तिक आत्मा कहा जाता है । तरंग भी पानी ही है । क्योंकि मिटने पर वह सागर में मिल जाता है । जब वह तरंग होता है । तब भी वह सागर का भाग है । इस सादे सत्य के अज्ञान के कारण अनेक नामवाली असंख्य पद्धतियां ‘योग’ ‘भक्ति’ ‘कर्म’ बताई जाती हैं । इनमें से प्रत्येक के कई भेद हैं । जिनका उपदेश बङी चतुरता से, बङे विस्तार से लोगों के मन को लुभाने और भ्रम में डालने के लिये किया जाता है । विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय तथा वाद भी ऐसे ही हैं । उन सबका प्रयोजन क्या है ? केवल आत्मा को जानना । वे आत्मा को जानने के लिये आवश्यक साधन या अभ्यास हैं ।
इन्द्रियों से जाने गये पदार्थ प्रत्यक्ष कहे जाते हैं । क्या आत्मा जैसी कोई प्रत्यक्ष वस्तु है । जो हमेशा और इन्द्रियों की सहायता के बिना अनुभव की जा सकती हो ? इन्द्रिय प्रत्यक्ष परोक्ष ज्ञान है, प्रत्यक्ष नही । केवल अपनी सभानता ही सीधा या प्रत्यक्ष ज्ञान है और वह सबके लिये समान है । अपनी आत्मा को जानने के लिये कोई सहायता जरूरी नही है ।
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email