31 मार्च 2011

तभी वास्तविक चीजें तुम्हें घट सकती हैं

यदि तुम श्रद्धा से चलते हो । समग्रता से चलते हो । छाया की तरह बुद्ध के पीछे हो लेते हो । चीजें तुममें घटित होने लग सकती हैं । क्योंकि वे इस व्यक्ति में घटित हो चुकी हैं । इन्हीं गौतम बुद्ध में । जीसस में । महावीर में वे घटित हो चुकी हैं । और अब वे मार्ग जानते हैं । वे उस पर यात्रा कर चुके हैं । यदि तुम उनसे तर्क करो । तो तुम्हीं गंवाने वाले बनोंगे । वे गंवाने वाले नहीं हो सकते । वे तुम्हें बिलकुल 1 ओर छोड़ देंगे । इस सदी में ऐसा गुरजिएफ के साथ हुआ है । बहुत से लोग उसके प्रति आकर्षित होते । लेकिन वह ऐसी परिस्थितियां बना देता नये शिष्यों के लिए कि जब वे समग्रता से श्रद्धा नहीं करते । उन्हें तुरंत चले जाना पड़ता । जब तक कि वे बेतुकेपन में भी श्रद्धा नहीं रखते । और वे बेतुकी बातें आयोजित की हुई होती थीं । गुरजिएफ झूठ बोलता जाता । सुबह वह 1 बात कहता । दोपहर को कुछ और । और फिर तुम कुछ पूछ तो सकते नहीं थे । वह तुम्हारे तर्क पूर्ण मन को पूरी तरह तहस नहस कर डालता । सुबह वह कहता - इस गड्डे को खोदो । ऐसा करना अनिवार्य ही है । शाम तक यह पूरा हो जाना चाहिए । सारा दिन तुम इसे खोदते रहते । तुम बहुत ज्यादा परिश्रम करते । तुम थक जाते । तुम पसीना पसीना हो जाते । तुमने कुछ भी खाया न होता । और शाम होने पर वह आता । और कह देता - मिट्टी को वापस गड्डे में फेंक दो । और तुम्हारे सोने से पहले वह काम पूरा हो जाना चाहिए । इस समय तक तो 1 साधारण बुद्धि वाला भी कह देगा - आपका मतलब क्या है ? मैंने सारा दिन बरबाद कर दिया । मैंने सोचा था कि यह कुछ बहुत
जरूरी है । जिसे शाम तक पूरा करना ही पड़ता था । और अब आप कहते हैं । मिट्टी को वापस फेंको । यदि तुम ऐसी बात उससे कहते । गुरजिएफ कहता - सीधे भाग जाओ । जाओ । मैं तुम्हारे लिए नहीं । तुम मेरे लिए नहीं । यह गड्डे की या उसे खोदने की बात नहीं है ।
असल में वह देखना चाह रहा है । तुम तब भी उसमें श्रद्धा रख सकते हो । या नहीं ? जब वह बेतुका हो । 1 बार वह जान लेता कि तुम उसमें श्रद्धा रख सके हो । और वह जहां भी ले गया । उसके साथ चल सके हो । केवल तभी वास्तविक चीजें चली आती । तब परीक्षा समाप्त हो गयी । तुम परख लिये गये । और प्रामाणिक पाये गये हो । 1 सच्चा खोजी । जो प्रयोग कर सकता है । और श्रद्धा रख सकता है । तभी वास्तविक चीजें तुम्हें घट सकती हैं । इससे पहले हरगिज नहीं ।
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च्वाग्त्सू ने सपना देखा । च्वाग्त्सू ने सपना देखा । अपना सपना देखो न । कब तक च्वाग्त्सू के सपने से काम चलोओगे ? याद है न । किसने कहा था ? जो भी मिले सहारा । लटकने की तो आदत है । नईया मंझधार में डूब रही है पार लगा दो प्रभु । यही प्रार्थनायें हैं न हमारी । आपकी । अधिकतर की । बनाये हुए मन्त्र भी क्या हैं ? उद्धार करो । सम्पदा भर जाये । और आप तोता बना के बोले चले जा रहे हैं । 
मंदिर में गए झुके से दीखते हैं । हाथ जुड़े हुए से दीखते हैं । पर अंदर से उतने ही तने एकदम अकड़ के साथ । पैसे दिए । काम हो गया । पुजारी को दिए । कुछ तथाकथित भगवान की मूर्ति को भी दिए । पुजारी ने संकल्प करा दिया रुपये का । ले दे हो गया काम ख़त्म । अब आगे का धंधा पानी देखते हैं । मंदिर से बाहर निकले । अकड़ी हुई गर्दन के साथ । चलो काम हो गया । 1 कृत्य हुआ । मस्जिद में घुटने पर बैठ नमाज़ अदा की । 1 कृत्य हुआ । आत्मा तो झुकी नहीं । समर्पण इतना आसान नहीं । श्रद्धा इतनी हलकी नहीं । चर्च में प्रार्थनाओं में शामिल हुए । कृत्य हुआ । अब आगे की रोजी रोटी की सोचते हैं । यही साधारण दिनचर्या । और यही तथाकथित धर्म की परिभाषा । किसी आम व्यक्ति के लिए । सम्मोहित से जीवन काट रहे हैं । इसी में दुखी भी हैं । हताश भी हैं । सुखी भी हैं । उत्साहित भी । और सातों रंगो का लुत्फ़ उठा रहे हैं । खुश हुए तो भगवन ( मानसिक ) को वाहवाही मिल गयी । दुखी हुए । तो 2-4  सुना डाली । क्या हैं सपने आपके ? आपकी वास्तविक स्थिति का आपको आभास भी तभी होता है । जब आपका सम्मोहन टूटता है । आपको मन्त्र पकड़ा दिए गए । आप रटे जा रहे हैं । मन में संतुष्ट कि साधना हो रही है । मंत्रों की वास्तविक स्थिति क्या है । क्या आपको आभास है ? यदि आपके ही भाव अनुसार समझने की चेष्टा करें । तो मन्त्र को 1 वाहन के रूप में समझा जा सकता है । जिनका कार्य आपको वहाँ तक ले जाना है । जहाँ से आपकी अगली यात्रा शुरू होती है । जिनका कार्य आपको आपकी शक्ति से परिचित कराना है । यानि कि व्याख्याएं तो संकेत थी ही उन मूल ग्रन्थ को समझने का । मूल ग्रन्थ में वर्णित क्लिष्ट यानि कि दुष्कर यानि कि कठिन भाषा को समझने का कार्य व्याख्याओं ने किये । परन्तु यहाँ ध्यान देने वाली ये बात है कि आप जिन मूल को व्याख्या द्वारा समझने की चेष्टा कर रहे हैं । वो मूल भी अंततः संकेत ही हैं । मंत्रो ने आपको वहाँ ले जाकर खड़ा कर दिया । जहाँ आपको भवन का दरवाजा दीख रहा है । अब इस भवन मे प्रवेश करना है । तो वहाँ मंत्रो को छोड़ना ही पड़ेगा । ध्यान दीजियेगा । अपनी साधना के पथ पर आपने जिन जिनका भी ( जन्म से मिले संस्कार धर्म या के कर्म से मिले गुरु, पुस्तकें, कल्पनायें, दिवास्वप्न ) उपयोग किया है । वो सब माध्यम मात्र हैं । और आपको छोड़ना ही है । उनको पकड़ के आप आगे नहीं बढ़ सकते । अंत में सब मात्र संकेत ही हैं । कभी 1 जन्म लिए बालक के बढ़ते शरीर को देखिये । आज का पहना वस्त्र हो सकता है कल काम न आये । शरीर बढ़ गया । अब उसको दूसरे वस्त्रो की आवश्यकता है । पर वस्त्र वस्त्र ही है । आत्मा का स्थान नहीं ले सकते । इसी प्रकार साधना में भी आत्मिक विकास के साथ वस्त्र बदलते हैं । पर वो वस्त्र ही हैं ।
दरअसल जो भी इतना विकसित हो गया कि स्वप्न और जागरण में भेद करने लग गया । आभास होने लगता है कि स्वप्न के प्रभाव कहाँ   कहाँ जीवन में हैं । और कितने गहरे हैं । फिर चाहे बुद्ध हों । रामकृष्ण हों । कृष्णमूर्ति हों । या ओशो । कोई भी उस स्तर पर पहुँच कर उस सत्य को सहज ही महसूस कर सकता है । आप में भी वो ही सम्भावनाये हैं । ये कोई जादू नहीं । सिर्फ जागरण है । कृष्ण का भी इशारा ही था । जिसने भागवत गीता को जन्म दिया । ऋषि मुनियो का जागरण था । जिनके माध्यम से वेदों ने जाना गया । राम ने स्वयं कोई ऐसी उदघोषणा की ही नहीं । मज़े की बात मुहम्मद सारी उम्र यही कहते रहे । वो अति साधारण उन लोंगों जैसे ही हैं । उनके अंदर कोई चमत्कार जैसा नहीं । पर लोंगों ने वो ही सुना । जो वो चाहते थे । जीसस यही कहते रहे । बुद्ध यही कहते रहे । पर इनकी भी धारायें बन गयीं । धर्म बनकर खड़े हो गए । जैसे आज ओशो की धाराएं बन गयी हैं । फिर नया क्या हुआ ? इनके कहने और समझने का समाज पर असर क्या हुआ ? क्या ये सब वो ही समझा पाये । जो ये चाहते थे ? आज का सबसे ज्वलंत उदाहरण तो शिर्डी साई बाबा का है । जिनको सब जानते मानते और पहचानते भी हैं । उनकी ही शिक्षाओं के विपरीत आज सोने से लदे भवन में विराजमान हैं । और सुबह शाम सेवा उनकी चल रही है । और लोंगों को मुक्ति का आभास भी हो रहा है । कैसा सम्मोहन है ये ? यही जागरण आपको उन सभी तन्दराओं से मुक्त करेगा । जिन जिनको आपने अपनी निंद्रा में अभूतपूर्व पूज्यनीय स्थान दिया है । यही जागरण आपको बतायेगा कि वो सिर्फ संकेत है । मृगतृष्णा है । आपके लिए 1 ऐसी धर्म की व्यवस्था है । जिसके रेगिस्तान में आप प्यासे भटकते भटकते दम तोड़ देते हैं । और देखिये मजे की बात । दम तोड़ते वक्त भी आप उसी तन्द्रा में ही दम तोड़ते हैं ।
नानक दुःखिया सब संसार । ते सुखिया जिन नाम अधार ।
उस स्तर पर पहुँच के अगर कोई कुछ कह रहा है । तो पहली बात इतना हल्का नहीं हो सकता कि पडोसी का नाम ले ले कि तू पार हो जायेगा । नानक कौन से नाम की बात कह रहे हैं ? नानक ने 1 बार भी नहीं कहा कि - मेरा नाम ले । सिर्फ इशारा - ते सुखियां जिन नाम आधार । कृष्ण ने भी इशारा किया । बुद्ध ने इशारा किया । रामकृष्ण ने । रमन महर्षि ने । ओशो ने । पर बुद्धि हमारी । हमने समझा वही । जो हम समझना चाह रहे हैं । वो बेचारे क्या कहना चाह रहे हैं ? इससे तो हमें कोई वास्ता ही नहीं । कह   कहकर उनके जीवन कम पड़ गए । सुन   सुनकर भी हमने वही सुना । जो हमारे कान सुनना चाह रहे थे । आज भी हम उतना ही सुनते और पढ़ते हैं । जितना हम चाहते हैं ।
और यही वजह है कि - धर्म का जो रूप हम चाह रहे हैं । वो हमारे सामने है । एकदम तैयार भोजन । इसके लिए ये मन्त्र । उसके लिए वो मन्त्र । ये चाहिए तो ये पूजा । वो चाहिए तो ये हवन । इस सफलता के लिए इस दिन इस पत्थर को इस तरह से पूजो । उस सफलता के लिए उस पत्थर को उस विधि से पूजो । और हो गया - सनातन धर्म । सब ताली बजा रहे हैं । सम्मोहित से । इससे ज्यादा का विचार ही नहीं किया । विचार आता ही तभी है । जब ये चेतना आती है कि ये भी काम नहीं आ रहे ? क्यों ? जिस दिन जागरण फलित होता है । 1 भारी सम्मोहन से छुटकारा मिलता है । 1 गहरी तन्द्रा से पीछा छूटता है । क्या सत्य कुछ और है ? कापी पेस्ट ।
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