29 मार्च 2011

इस अमृतबेला की वास्तव में क्या महिमा है ?

नमस्ते राजीव जी । मैं सुशील कुमार हरियाणा से । मेरी आपसे पहले भी 2 बार बात हो चुकी है । आज मेरे दफ़्तर में छुट्टी थी । इसलिये मैंने सोचा । आपसे कुछ काम की बात पूँछ लूँ । राजीव जी सुना है । अमृतबेला का बहुत महत्व है । कहते हैं कि ये समय देवताओं का समय होता है । मुझे आप इस अमृतबेला की महिमा के बारे में कुछ बतायें । क्योंकि आपके विचार और सुझाव केवल मेरा ही नही बल्कि और लोगों का भी मार्गदर्शन करेंगे । इसलिये आप हो सके तो इस अमृतबेला की वास्तव में क्या महिमा है ? इस बात पर कुछ काम की बात बतायें । ( श्री सुशील कुमार जी । हरियाणा । ई मेल से )

MY ANS - सीतापुर के श्री खुशीराम जी मेरे ब्लाग के नियमित पाठक हैं । और कभी कभी मुझे फ़ोन करते रहते हैं । एक बार उन्होंने शाम 6 बजे के लगभग मुझे खेत पर कार्य करते हुये फ़ोन किया । कुछ देर की बातचीत में बात ध्यान पर आ गयी । मैंने पूछा - क्या आपके कोई गुरु हैं ? आप किसी प्रकार का ध्यान या नाम जप करते हो..आदि ?? फ़िर तय हुआ कि अभी तो खेत पर व्यस्त हैं । समय मिलने पर बात करेंगे । इसके तीन चार दिन बाद सुबह चार बजे खुशीराम जी का फ़ोन आया । जो मैंने ( हमारा स्पेशल समय होने के कारण ) रिसीव नहीं किया । बाद में खुशीराम जी ने बताया कि सुबह ध्यान के बारे में पूछने के लिये फ़ोन किया था । साथ ही साथ एक उलाहना सा भी दिया । साधु होकर चार बजे सो रहे थे ??
मुझे बहुत खुशी हुयी कि आज के समय में भी खुशीराम जैसे हजारों नहीं बल्कि लाखों लोग है । जो चार बजे से आरम्भ होने वाली " अमृतबेला " तक शौचादि से फ़ारिग होकर जीवन का वास्तविक आनन्द प्राप्त करते हैं । हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्त्री पुरुषों के उठने का समय यही है । जो बहुत पहले से परम्परागत चला आ रहा है ।..वैसे सुबह आठ से लेकर दोपहर दो बजे तक उठने वालों की संख्या तो करोङों में है ।
अमृतबेला -  सुबह चार बजे से लेकर छह बजे तक के समय को अमृतबेला कहते हैं । 24 घंटे के दिन रात में 2 घंटे की इस अमृतबेला की वास्तव में बहुत महिमा है । जप तप नाम सुमरन ध्यान अन्य पूजा पाठ के लिये तो इसका महत्व है ही । सामान्य मानव जीवन के लिये भी ये बेहद महत्वपूर्ण है । इस समय तक उठकर शौचादि से फ़ारिग होकर स्नान करके कुछ हरिनाम का सुमरन करने वाले का जीवन मानों हर तरह से सफ़ल और सम्पन्न हो जाता है । केवल इतना करने मात्र से ही वह इंसान जीवन में कभी रोगों से पीङित नहीं होगा । दैहिक ( शारीरिक ) दैविक ( अलौकिक ) भौतिक ( जीवन या संसार से जुङी ) ताप ( कष्ट ) उसके पास फ़टकेंगे भी नहीं । सच्चरित्रता स्वयँ उसके स्वभाव में आ जायेगी । समस्त सदगुण बिना किसी प्रयास के उसे अपना लेंगे । बचपन से ही सदा इस नियम का पालन करने वाले के दांत जीवन भर ( 100 वर्ष ) नहीं टूटेंगे । मजबूत रहेंगे । केश सफ़ेद नहीं होंगे । हड्डियाँ कमजोर नहीं होंगी । त्वचा ढीली होकर नहीं लटकेगी । यानी वृद्धावस्था उसके पास भी नहीं फ़टकेगी ।
अमृतबेला अलौकिक दृष्टि से - इस समय क्योंकि दैवीय शक्तियाँ प्रबल होती हैं । अतः आपका थोङा भी पूजा पाठ दिन की अपेक्षा कई गुना प्रभावशाली हो जाता है । जो लोग योग साधना में ऊँचे उठे हुये होते हैं । वे इस समय ऊँचे आकाश में स्वयँ उच्चरित हो रही वेद ऋचायें आदि साक्षात जमीन से ही सुन सकते हैं । ठीक उसी तरह जिस तरह आप सुबह सुबह किसी मन्दिर में बजता कीर्तन भजन आदि सुनते हो । ये कार्य किसी पहुँचे हुये गुरु द्वारा आपकी तीसरी आँख ( दिव्य नेत्र ) या Third Eye खोल देने पर होता है । आपके सिर्फ़ तीसरी आँख ही नहीं होती । तीसरा कान ( दिव्य कर्ण ) भी होता है । पर इसको खोलना ( एक्टिव ) नहीं  होता । तीसरी आँख खुलते ही यह स्वयँ ही खुल जाता है । बाकी तो इस अमृतबेला का आनन्द और महत्व इसमें उठने वाले ही जानते हैं ।
अब एक सच्चा किस्सा - लगभग कोई पचास साल पहले एक अच्छे सन्त हुये हैं । जब उनके पास कोई भी इंसान अपनी किसी भी समस्या को लेकर जाता था । तो वो हमेशा एक ही बात कहते थे कि - सुबह जल्दी चार बजे उठा करो । और हैरानी की बात । उनकी बात मानकर जल्दी उठने से लोगों की हर समस्या हल हो जाती थी ।
क्या था इसका रहस्य - एकाध अपवाद को छोङकर आपने देखा होगा कि बुरे से बुरे इंसान के भी जैसे किसी मन्दिर आदि में घुसकर पवित्र विचार हो जाते हैं । किसी तीर्थस्थल पर पहुँचकर भावनाएँ स्वतः धार्मिक हो जाती हैं । सुबह के समय हमारा किसी फ़िल्म गाने आदि देखने के बजाय । धार्मिक भजन आदि सुनने का स्वतः ही मन करता है । सुबह के समय बेहद लङाकू आदमी भी लङाई नहीं करता । यानी हमारी भावनाओं में सात्विक रसायन खुद व खुद उस समय घुल रहा होता है । बस जरूरत है । उसे आत्मसात ( आबजर्ब ) करने की । यही रसायन हमारी जिन्दगी में हर तरह के अच्छे उच्च और सकारात्मक परिणाम लाता है ।
गोधूलि बेला - यानी पुराने समय के अनुसार कहें । तो जिस समय गायें दिन भर चरने के बाद शाम को जिस समय घर लौटती हैं । और उनके चलने से जो धूल उङती है । उसे गोधूलि बेला कहते हैं । यह समय दिन और शाम जिस बिंदु पर मिलते हैं । यानी आपस में मिक्स हो रहे होते हैं । उसे कहा जाता है । जो लगभग शाम पाँच से छह बजे का समय होता है । यह भी अमृतबेला से कम पर महत्वपूर्ण समय होता है । शास्त्र के अनुसार इस समय भी कोई जीवन से जुङा हुआ कार्य नहीं करना चाहिये । हाँ कर सकते हैं । तो हरि नाम सुमरन । पूजा । आरती आदि करें । किसी सम्मानीय अथवा अतिथि या साधु आदि की सेवा करें ।
राक्षसी बेला - 24  घंटे के समय में बीच बीच में आसुरी प्रवृति यानी राक्षसी बेला का भी समय आता है । सुबह आठ से दस के बीच कुछ समय । दोपहर बारह से तीन के बीच में । शाम चार से पाँच के बीच में । और रात में बीच बीच में कुछ कुछ समय को छोङकर चार बजे तक पूरी रात ही राक्षसों की होती है । इसीलिये इस समय में चोरी हत्या कामवासना और सोते हुये व्यर्थ जिन्दगी गँवा देना आदि दुर्गुणों का बोलबाला हो जाता है ।
विशेष - सच्चे साधु रात में मुश्किल से तीन घंटे ही सोते हैं । और बाकी समय जागते ( भले ही लेटे लेटे ही ) हुये प्रभु चिंतन ही करते हैं । इसी के लिये कबीर साहब ने कहा है ।
सुखिया सब संसार है । खाबे और सोबे ।
दुखिया दास कबीर है । जागे और रोबे ।
और अन्त में - धन्यवाद सुशील जी ! जो आपने मुझे ये सतसंग याद दिलाया । आप जैसे सज्जन पुरुष हम साधुओं को सचेत करते रहते हैं । जय राम जी की साहेब.. साहेब !
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