15 अगस्त 2016

परमात्मा - आखिर कहाँ है ?

साधो एक आपु जग माहीं ।
दूजा करम भरम है किर्तम । ज्यों दर्पन में छाई ।
जल तरंग जिमि जल में उपजै ? फिर जल माहिं रहाई ?
काया झाईं पाँच तत्व की । बिनसे कहाँ समाई ।
या बिधि सदा देह गति सबकी ? या विधि मनहिं विचारो ।
आपा होय न्याव करि न्यारो ? परम तत्व निरवारो ।
सहजै रहै समाय सहज में । ना कुछ आय न जावै ।
धरै न ध्यान करै नहिं जप तप ? राम रहीम न भावै ।
तीरथ बर्त सकल परित्यागै । सुन्न डोरि नहिं लावै ?
यह धोखा जब समुझि परै ? तब पूजै काहि पुजावै ।

जोग जुगत ते भरम न छूटै ? जब लग आप न सूझै ?
कहैं कबीर सोइ सतगुरु पूरो ? जो कोई समझै बूझै ?

सब का साखी मेरा साईं । साखी = साक्षी
ब्रह्मा बिस्नु रुद्र ईसुर लौं । और अब्याकृत नाहीं ।
पांच पचीस से सुमती करि ले ? ये सब जग भरमाया ।
अकार उकार मकार मात्रा । इनके परे बताया । ॐ = शरीर
जागृत सुपन सुषोपति तुरिया ? इनतें न्यारा होई ।
राजस तामस सातिक निर्गुन ? इनतें आगे सोई । 3 गुण, निर्गुण
स्थूल सूक्ष्म कारन महाकारन । इन मिलि भोग बखाना । 4 शरीर
बिस्व तेजस पराग आत्मा । इनमें सार न जाना ।
परा पसंती मधमा बैखरि । चौ बानी नहिं मानी । 4 वाणी
पांच कोष नीचे करि देखो । इनमें सार न जानी ।
पांच ज्ञान और पांच कर्म हैं । ये दस इन्द्री जानो ।
चित सोइ अंतःकरन बखानी । इनमें सार न मानो ।
कुरम सेस किरकिला धनंजय । देवदत्त कंह देखो । 5 वायु
चौदह इन्द्री चौदह इन्द्रा ? इनमें अलख न पेखो ?
तत पद त्वं पद और असी पद । बाच लच्छ पहिचाने ।
जहद लच्छना अजहद कहते । अजहद जहद बखाने ।
सतगुरु मिलै सत सबद लखावै । सार सबद बिलगावै ।
कहै कबीर सोई जन पूरा । जो न्यारा करि गावै ।
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