05 अगस्त 2016

सदगुरुओं का मदारीपन

बहुत से ग्रामीण टायप और लगभग अशिक्षित से ( स्वयंभू सदगुरु ) साधुओं के लिये धूप का यह छाया रूप या छाया पुरुष या छाया साधना ( जिसे वे वही विराट रूप कहते हैं । जो श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के समय अर्जुन को दिखाया था ) वरदान स्वरूप ही है । जिसके झांसे में अनपढ़ तो अनपढ़ शिक्षित लोग भी आ जाते हैं । क्योंकि उन्हें तन्त्र मन्त्र आदि के बारे में A B C D भी पता नहीं होती । ये सब मैंने खुद देखा है ।
अभी कुछ दिनों पूर्व लिखे लेख अगङम बगङम सगङम ( क्लिक ) में मैंने जिन भदौरिया जी और स्थानीय सदगुरु राजानन्द जी का जिक्र किया । उन्होंने भी इसका भरपूर लाभ उठाया । जबकि वास्तव में इसका आत्मज्ञान या तत्वज्ञान या परमात्मा से दूर दूर तक लेना नहीं है ।
कुछ ऐसे और लोग भी मेरी जानकारी में आये ।

वास्तव में इस छायोपासना में साधक योगी तत्व का पता लगाकर अपने भविष्य, शरीरगत तत्व आदि का पता लगा सकते हैं । और इससे वे अपनी मनोदशा और जिन्दगी के अन्य क्रियाकलापों को नियंत्रित कर जीवन को लाभान्वित कर सकते हैं । वैसे इसकी कई विधियाँ योगी बताते हैं । जो इस प्रकार हैं -
छायोपासना में तेज धूप में खङे होकर बनती परछाईं के कंठ प्रदेश ( गर्दन भाग ) पर मन को पूर्ण एकाग्र किया जाता है ।
फिर साधक अपनी स्थिति अनुसार 15-20 मिनट उसका एकटक अपलक देखता है । यह तरीका ठीक त्राटक करने जैसा ही होता है ।
इसके बाद शरीर को ज़रा भी न हिलाते हुए आकाश में देखता है । 
तब जमीन से लेकर आसमान तक जहाँ तक उसकी दृष्टि जाती है । उसे अपनी ही छाया की अनुकृति दिखती है ।
इसकी कुछ आवृत्तियों के पूर्ण हो जाने के बाद षण्मुखी मुद्रा के अभ्यास करने से चिदाकाश ( चित्त का आकाश ) में उत्पन्न होने वाले रंग को देखते हैं । तब जो भी रंग दिखाई देता है ।
उस पर रंग आदि के हिसाब से सम्बन्धित तत्व का पता चलता है । अतः रंग अगर पीला हो तो पृथ्वी तत्व और भूरा हो तो आकाश तत्व की प्रधानता मानी जाती है । ऐसा ही अन्य तत्वों के बारे में समझें ।
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अब सही छाया पुरुष को जानें ।
सार शब्द जब आवै हाथा । तबही काल नवावै माथा ।

1 आत्मा - जिसके पहचान के लिये इच्छा, द्वेष, सुख, दुख, ज्ञान और प्रयत्न लिंग हैं । यही भोगता है । यही निर्लेप भी है । इसी का सारा खेल है । ज्ञान दृष्टि होने पर बंध मोक्ष मन का धर्म है ।
2 शरीर - जो चेष्टा, इंद्रियों और अर्थों का आश्रय है । और भोग का स्थान है । बाह्य रूप में यह स्थूल है ।

3 इंद्रिय - आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा जिसके उपादान कारण प्रथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश हैं । ये भोग के साधन हैं । या ज्ञानेन्द्रियां हैं ।
4 अर्थ या विषय - रस, रूप, गंध, स्पर्श, और शब्द हैं । जो पाँचों इंद्रियों के भोगने के विषय और पाँच भूतों के यथायोग्य गुण भी हैं । मनुष्य में ये पाँचों होते हैं । अन्य जीवों में एक ही अधिक होता है ।
5 बुद्धि, ज्ञान,उपलब्धि - ये तीनों पर्याय शब्द हैं । विषयों को भोगना या अनुभव करना बुद्धि है ।
6 मन - जिसका लिंग एक से अधिक ज्ञानेन्द्रियों से एक समय में ज्ञान न होना है । जो सारी इन्द्रियों
का सहायक है । और सुख दुख आदि का अनुभव कराता है । पच्चीस प्रकृतियां, पाँच ज्ञानेन्द्रियां, पाँच कर्मेंन्द्रियां, पाँच तत्वों के शरीर का राजा ये मन है ।
7 प्रवृति - मन वाणी और शरीर से कार्य का आरम्भ होना प्रवृति है ।
8 दोष - प्रवृत करना । जिनका लक्षण होता है । ये मोह, राग, द्वेष तीन दोष हैं ।
9 प्रेतभाव - पुनर्जन्म अर्थात सूक्ष्म शरीर का एक शरीर को छोङकर दूसरे को धारण करना प्रेतभाव है । गीता में कृष्ण ने कहा था - हे अर्जुन सब भूतों में मैं ही स्थित हूँ ।
10 फ़ल - प्रवृत और दोष से जो अर्थ उत्पन्न हो । उसे फ़ल कहते हैं ।
फ़ल दो प्रकार का होता है ।
एक - मुख्य । दूसरा - गौण । मुख्य फ़ल में सुख दुख के अनुभव आते हैं । और गौण फ़ल में सुख दुख के साधन शरीर इन्द्रियां विषय आदि का समावेश होता है ।
11 दुख - जिसका लक्षण पीङा होता है । सुख भी दुख के अंतर्गत है । क्योंकि सुख बिना दुख के रह नहीं सकता । एक के बाद दूसरे का आना तय है । जैसे दिन के बाद रात और जीवन के मृत्यु निश्चित है ।
12 अपवर्ग - दुख की निवृति हो जाना । ब्रह्म की प्राप्ति हो जाना । ज्ञान की प्राप्ति या सृष्टि से अलग ज्ञान में प्रविष्ट को अपवर्ग कहते हैं ।
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