09 अगस्त 2016

वाह रे कबीरा

आजकल आजकल कबीरपंथी, रामपाल, मधु परमहंस, तोतापुरी परम्परा और राधास्वामी पंथ आदि आदि के प्रचार प्रसार के चलते ‘सारशब्द’ का बोलबाला और लोकप्रियता बुलन्दी पर है । इसके चलते ओऽहं, सोऽहं, ररंकार, निरंकार, निरंजन, शक्ति जैसी ‘झींगुरी आवाजों’ की मार्केट वैल्यू बहुत कम रह गयी । देवी देवता तो बस BPL गरीबों के लिये ही रह गये । शेयर मार्केट में सिर्फ़ सारशब्द के शेयर छलांग पर हैं । इससे नीचे बात करने को भी कोई राजी नहीं
लेकिन संभवतः इन सबके बीच मेरा अस्तित्व ही एक ऐसा है । जिसे न तो ( झूठे ) परमात्मा और न उसकी फ़ूंक और फ़ुंकनी सारशब्द में और न ही इस सबके ठेकेदार ‘सदगुरु’ में कोई दिलचस्पी है । मेरी दिलचस्पी महज ‘स्वयं’ में रहती है ।
साधुई जीवन में और नेट पर बहुत से लोगों से बातचीत में यह आभास सा लगता है कि सारशब्द उन्हें मिल गया है । जिसे उन्होंने बहुत हिफ़ाजत से बैंक लाकर में रखवा दिया है ।
सात हाथ यानी करीब दस फ़ुट का गढ्ढा खुदवा कर कबीर ने धर्मदास को यही फ़ूंक फ़ूंकते समय विद्या रानी, भगवान जी, मम्मी पापा आदि आदि की कई कसमें खिलाकर कहा था -
धर्मदास तोहे लाख दुहाई । सार शब्द न काहू बताई ।
और फ़ूंक मार दी ।
पहले जब मैं नया नया साधु हुआ था । बाबाओं के आश्रम के पास दस दस फ़ुट के गढ्ढे पर गढ्ढे देखकर काफ़ी हैरान होता था कि - ये इतने क्यों हैं । क्या बोरिंगे बहुत ज्यादा फ़ेल हुयी हैं ?
अब समझ आया कि वे सारशब्दी गढ्ढे थे ।
वैसे कई पंथ ये दावा करते हैं कि सारशब्द उनके ही पास है ? या कबीर ने ‘सिर्फ़ फ़लाने खानदान’ को ही इसके लिये अधिकृत किया है ?
लेकिन मेरी मोटी समझ में यह नही आता कि जब आप ‘इसी चीज’ के आधार पर ही अपना ‘पूरा व्यापार’ चला रहे हो । तो वह गोपनीय और व्यक्तिगत कैसे रह सकती है ? जबकि कहते हो कि ज्ञान ध्यान आदि देने के बदले कुछ लेते भी नहीं । हाँ दान दक्षिणा में बीसो गुना अधिक ले लेते हैं ।
मान लीजिये । कोई मेरे जैसा व्यवसायिक बुद्धि वाला उस समय तो उन बाबाओं की सब बात मान कर यह ‘सारशब्द’ ले आया । पर अब ये एग्जाम के ‘पेपर आउट’ या पेपर लीक होने जैसा हो गया । तो फ़िर गोपनीय या दुहाई वाला कैसे रहा ? देश विदेश में वालमार्ट पोलिसी पर सेल चेन खोली जा सकती है ।
खैर..आज सुबह ही नेट पर सारशब्द सम्बन्धी यह लेख देखा । अच्छा चिन्तन है । सो आपके लिये यहाँ प्रतिलिप चेपन कर दिया ।
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सारशब्द - सारशब्द का विवरण कबीरवाणी में कितनी ही जगह आया है । लेकिन मुख्य रूप से इसका विस्तृत रूप से विवरण बीजक शब्द 114 में आया है । सारशब्द के बारे में अलग अलग लोगों की अलग अलग राय है । कबीर पंथ की एक शाखा मानती है कि सारशब्द ही एक मूलमंत्र है । जिससे जीव का कल्याण हो सकता है । और वह केवल उनकी शाखा के गुरू के पास है । कबीर ने उसे गुप्त रख कर केवल उनकी गद्दी के अधिकारियों को दिया है ।
अन्य लोग सारशब्द को ही सत्यज्ञान मानते हैं । और वह सच्चे गुरू की शरण में जाने पर ही मिल सकता है । आइये आज हम थोङा इस सारशब्द को जानने का प्रयास करते हैं कि वास्तव में यह क्या है ?
किसी भी एक वस्तु के ज्ञान के संबध में संभावित दो उत्तर हो सकते हैं ।
1 उस वस्तु के बारे में अज्ञान अथवा अनभिज्ञता ।
2 सत्यज्ञान ।
इसी प्रकार एक साथ दो वस्तुओं के ज्ञान के संबंध में संभावित चार उत्तर हो सकते हैं ।
1 दोनों वस्तुओं के बारे में अनभिज्ञता ।
2 दोनों वस्तुओं में से एक का ज्ञान एवं दूसरी के बारे में अनभिज्ञता ।
3 दोनों वस्तुओं को एक समान मानना अर्थात दोनों में कोई भेद न मानना ।

4 दोनों वस्तुओं का भिन्न भिन्न सत्यज्ञान ।
संसार में प्रत्यक्ष रूप से दो ही वस्तुओं का अस्तित्व नजर आता है - जङ, चेतन ।
इन दोनों के ज्ञान के बारे में मुख्यतया संसार में चार मत प्रचलित हैं ।
1 कर्म मार्ग - साधारण मानवों का ज्ञान जिन्हें अपने जीवनयापन से संबंधित षटकर्मों के अतिरिक्त कोई ज्ञान नहीं होता है । ऐसे मानव सिर्फ अपने जीवनयापन में ही विश्वास रखते हैं । उन्हें अन्य किसी प्रकार के भक्ति भाव या अन्य धार्मिक कृत्यों में कोई रुचि नहीं रहती है ।
इस मार्ग का अधिष्ठाता ब्रह्मा को माना जाता है । वेदों में ब्रह्मा ने विभिन्न कर्मकाण्डों का विवरण दिया है ।
2 उपासना मार्ग - इस मार्ग के अनुयायियों को जङ पदार्थों का ज्ञान रहता है । परन्तु चेतन सत्ता के संबंध में अनभिज्ञ रहते हैं । इस मार्ग के लोगों की दृष्टि में संसार की समस्त गतिविधियों का संचालक कोई परमपिता, ईश्वर या सतपुरुष है । जो किसी अन्य लोक में बैठ कर संसार की समस्त गतिविधियों का संचालन कर रहा है । और मानते हैं कि उसकी भक्ति करने पर ही जीव का कल्याण संभव है । इस मार्ग का अधिष्ठाता विष्णु है ।
3 योग मार्ग - इस मत के लोगों का मानना है कि जङ चेतन में कोई भेद नहीं है । दोनों एक ही परम तत्व से निर्मित हैं  । जिस प्रकार सोना और उससे निर्मित आभूषण दो नहीं । उसी प्रकार जङ और चेतन एक ही है । इसके अधिष्ठाता शिव माने जाते है ।
4 पारख मत या अन्विक्षकी मत - इस मत के अन्तर्गत जङ एवं चेतन दोनों भिन्न भिन्न सत्ताऐं हैं । एवं दोनों का अस्तित्व भी भिन्न भिन्न है । चेतन की जङ में आसक्ति ही जीव देह धारण करता है । एवं अपने कर्मानुसार ही जीव दुख सुख भोगता है । संसार का निर्माता कोई ईश्वर या परमात्मा नहीं है । संसार की समस्त क्रियायें प्रकृति की स्वाभाविक गुण धर्म के अनुरूप होती हैं । इस मत से संबंधित वाणी ही सारवाणी या सारशब्द कहलाती है ।
सार शब्द से बांचिहो । मानहु इतबारा हो ।1।
आदि पुरूष एक वृक्ष है । निरंजन डारा हो ।2।
तिरदेवा शाखा भये । पत्र संसारा हो ।3।
ब्रह्मा वेद सही कियो । शिव योग पसारा हो ।4।
विष्णु माया उत्पत्ति कियो । ई उरले व्यवहारा हो ।5।
तीन लोक दशहु दिशा । यम रोकिन द्वारा हो ।6।
कीर भये सब जीयरा । लिये विष कि चारा हो ।7।
ज्योति स्वरूपी हाकिमा । जिन्ह अमल पसारा हो ।8।
कर्म की बंशी लाय के । पकरो जग सारा हो ।9।
अमल मिटाओ तासु का । पठवो भव पाया हो ।10।
कहहिं कबीर तोहि निर्भय करो । परखो टकसारा हो ।11।
कबीर बीजक शब्द संख्या 114 
कबीर कहते हैं कि - हे मानवो, तुम्हारा कल्याण केवल सारशब्द से ही संभव है । अन्य भर्मित शब्दों से नहीं ।1।
इस संसाररुपी वृक्ष का मूल यह चेतन सत्ता जीव ही है । और इस जीव का मनरूपी निरंजन ही इसकी डाली है । इस मन की सत्ता से ही तीन गुणों की उत्पति होती है । और इन तीन गुणों से ही पत्रों रूपी संसार की उत्पत्ति होती है । अर्थात मानव मन में इच्छा उत्पन्न होती है कि मैं अपना विस्तार करूं । तो वह संसार में लिप्त होता है । और अपने नये संसार रुपी संतान उत्पत्ति करके परिवार बनाता है । और उसे ही अपना संसार मानता है । अगर मानव संसार में लिप्त न हो । तो न उसका कोई संसार नहीं बनेगा । त्यागी बैरागी भी शिष्यों एवं आश्रमों रूपी संसार बनाता है ।2 &3।
तीन गुणों में रजोगुण के अधिष्ठाता ब्रह्मा ने संसार में वेदों के द्वारा कर्म मार्ग प्रशस्त किया । और शिव ने योग मार्ग । विष्णु ने उपासना मार्ग चलाया । लेकिन ये तीनों ही मार्ग मनकल्पित एवं अनिर्णय युक्त होने के कारण जीवों के लिय बंधनप्रद ही रहे ।4&5।
इन तीनों मार्गों में जीवों के लिप्त रहने के कारण सारे जीव विषय वासनाओं फंस कर ज्योति स्वरूप निरंजन ( काल ) के शिकार बने । तीनों मार्ग में लिप्त जीव विभिन्न कर्मकाण्डों में फंसे रह कर काल का शिकार बने ।6से9।
कबीर कहते हैं कि - हे मानवो, इन तीनों मार्गों के अमल को मिटाकर मेरी चतुर्थ पारख वाणी सारशब्द को परखो । और ग्रहण करो । तो तुम इस संसार सागर से पार हो सकते हो ।10&11।
साभार - ताराचन्द जी ।
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गोविन्द दास - वास्तव में सारशब्द अति गम्भीर विषय है । अनेक विद्वानों ने इसके विषय में अपनी अपनी अनेक धारणाएं बना ली हैं । कई महानुभावों ने सतगुरु के चिन्तन अथवा सत्यपुरुष के ध्यान में तल्लीन होने अथवा अपने तन मन की सुधि को भूल जाने को सारशब्द कहा है । कईयों ने ज्ञान के रूप को सारशब्द माना है । क्योंकि सारशब्द के बिना जीव का मुक्त होना असम्भव है । इसलिए बिना ज्ञान के जीव का आवागमन बना रहेगा । ज्ञान को सारशब्द का होना बहुत से महानुभाव मानते हैं ।
लेकिन वो है नही । क्योंकि बीजक में तो कबीर ने खोलकर बता दिया है ।
एक नाम है अगम गंभीरा । तहवाँ अस्थिर दास कबीरा ।
बीजक 34 वीं रमैनी 
नाम निःअक्षर अर्थात अक्षरों से रहित, अजपा, अबोल और किसी प्रकार से अंकित करके न दर्शाया जाने वाला एक शब्द है ।
शब्द शब्द सब कोई कहै । वो शब्द विदेह ।
जिभ्या पर आबे नही । निरखि परखि करि लेह ।
( बीजक साखी - 35 )
इसमें संदेह नहीं कि सारशब्द एक अति सूक्ष्म तथा अनुभवों से परे गूढ़ रहस्य होते हुए भी बिना कबीर के मिलना अति दुर्लभ है । या कोई पूर्ण संत, महात्मा, या खुद सदगुरु उसका मेल करा सकते हैं ।
पाँच तत्व के भीतरे । गुप्त वस्तु अस्थान ।
बिरले मर्म कोई पाई है । गुरु के शब्द प्रमाण ।
( बीजक साखी - 27 )
एक शब्द गुरुदेव का ताका अनन्त विचार ।
थाके मुनिजन पंडिता वेद न पावै पार ।
ताराचन्द - सारशब्द को एक नाम की संज्ञा देकर दो उदाहरण दिये हैं । एक रमैणी संख्या 34 से और दूसरा साखी द्वारा । कबीर ने रमैणी संख्या 30 में 
औ भूले षटदर्शन भाई । पाखंड भेष रहा लपटाई
कहकर षटदर्शनों का ।
रमैणी संख्या 31 में
समृति आहि गुणन को चिन्हा
कहकर सुमृतियों का । रमैणी संख्या 32में
अन्ध सो दर्पण वेद पुराणा
कहकर वेद पुराणों का
और रमैणी संख्या 33 में
वेद की पुत्री सुमृति भाई 
कहकर सुमृतियों के सिद्धान्तों का खंडन किया । और फिर रमैणी संख्या 34 में पंडितों को फटकारते है कि -
पढी पढि पंडित करु चतुराई । निज मुक्ति मोहि कहो समुझाई ।
कहां बसे पुरुष कौन सा गांऊ । सो पंडित मोहि सुनावहु भाई ।
चारि वेद ब्रह्मा निज ठाना । मुक्ति का मर्म उनहु नहीं जाना ।
दान पुन्य उन बहुत बखाना । अपने मरण की खबरि न जाना ।
एक नाम है अगम गंभीरा । तहंवा अस्थिर दास कबीरा ।
चिउंटी जहां न चढि सके । राई ना ठहराय ।
आवागमन की गम नहीं । यहां सकलो जग जाय ।34।
उपरोक्त रमैणी में कबीर ने पंडितो को बुरी तरह फटकारा है । या यूं कहे कि पंडितों के कपङे उतार दिये हैं । ऐसे में आप क्या समझते है कि कपङे उतारते उतारते बीच में ही एक नामरूपी अनमोल मोती चुपके से पंडितों को दे दिया । कबीर इतने भोले तो थे नहीं । जो अपने विरोधियों को ही अनमोल हीरा दे देते ।
यह पंक्ति तो उन लोगों को व्यंग की भाषा में है । जो किसी कल्पित ब्रह्म के नाम का आधार लेकर बैठे है । और देखिये इस साखी में कितना बडा व्यंग है कि आम लोग उस जगह जाना चाहते हैं । जहाँ न तो चीटीं चढ़ सकती है । और न ही वहाँ राई का दाना ठहर सकता है ।
साखी - शब्द शब्द सब कोई कहे, में स्पष्ट संकेत नहीं है कि यहाँ कौन सी वस्तु के लिय कह रहे है । लेकिन वे एक संकेत देते है कि - निरख परख कर लेव, इसका मतलब है कि कबीर जिस वस्तु के बारे में कह रहे हैं । वह कहीं अपने ही आसपास है । तभी तो उसे निरखने एवं परखने की बात कह रहे हैं । दूर की वस्तु को कैसे निरखा और परखा जायेगा ? अब अपने आसपास तो यह संसार है । जो नामधारी है । अत: यह तो हो नहीं सकता । अब बचा है अपना निज चेतन । जो आँखों से भले अदृश्य हो । लेकिन जानने और परखने में आ रहा है । अत: यहाँ संकेत निज आत्मतत्व का है न कि किसी नाम अथवा सारशब्द का ।
बात चली थी सारशब्द पर जो कि आपने आत्मा कहा, उस सारशब्द को । लेकिन सदगुरु तो उसको नाम कहते हैं । 
राम नाम जिन चिन्हिया । झीना पिंजर तासु ।
नैन न आवै निंदरी । अंग न जामै मासु ।
बीजक साखी - 54
सुमिरन करहु राम का । काल गहे है केस ।
ना जानों कब मारि है । क्या घर क्या परदेश ।
( बीजक रमैनी साखी - 19 )
जस कथनी तस करनी । जस चुम्बक तस नाम ?
कहहि कबीर चुंम्बक बिना ? क्यों जीतें संग्राम ।
( बीजक साखी-314 )
चुम्बक लोहे प्रीत है ? लोहे लेत उठाय ?
ऐसा शब्द कबीर का ? काल सों लेत छुड़ाय ।
( बीजक साखी-318 )
शब्द हमारा आदि का ? पल पल करहु याद ?
अंत फलेगी माहली । ऊपर की सब बाद ।
( बीजक साखी - 7 )
शब्द हमारा आदि का ? शब्दे पैठा जीव ?
फूल रहनि की टोकरी । घोरे खाया घीव ।
( बीजक साखी - 3 )
साँचा शब्द कबीर का । ह्रदय देखु विचार ।
चित दै समुझे नही ? मोहि कहत भैल युग चार ।
( बीजक साखी - 64 )
आपने जो साखियां यहां प्रस्तुत की हैं । उनका संबंध सिर्फ शब्द से है । सारशब्द से नहीं । नाम संज्ञा है । जो किसी व्यक्ति, वस्तु या जगह का होता है । जबकि सारशब्द शब्दों का वह समूह है । जो किसी विशेष स्थिति को परिभाषित करता है ।
जाके मुनिवर तप करें । वेद थके गुण गाय ।
सोई देऊँ सिखापना । कोई नहि पतियाय ।
( बीजक साखी -123 )
संसार में जितने धर्मग्रंथ हैं । और जितने महापुरुष हुए । उन्होंने शब्द की महिमा गाई है । क्या वेद, क्या शास्त्र, क्या पुराण, क्या कुरआन । सबने ‘शब्द’ की महिमा गाई । ईश्वर ही ‘शब्द’ है । ऐसा सबने कहा । पिण्ड, ब्रह्माण्ड और अण्ड स्थित हैं । इस नाम की धारायें कुल ब्रह्माण्डों में व्याप्त है । इसलिए यह सर्वव्यापक है । सब सन्तों ने इससे सम्पर्क प्राप्त करके उस अनामी को जाना । जो सबमें होते हुए भी सबसे अलग थलग है ।
इस ‘नाम’ को शब्द, नाद, आकाशवाणी, कलमा, इसमे आजम या Word आादि से पुकारा है । मालिक ए कुल ने अनेक सृष्टियों का निर्माण किया ।
एक ते अनंत । अनंत एक होय आया । 
परिचय भई जब एक सों । अनंतो एकै माँहि समाया । 
( बीजक साखी - 124 )
तिल समान तो गाय है । बछडा नौ नौ हाथ ।
भरि भरि मटकी दूध ले । पूंछ अठारह हाथ ।
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और ये रहे, मेरे कुछ संकेत -
क्षर मकार को कहत हैं । अक्षर है आकार ।
रं निःअक्षर ब्रह्म है ? राम निःअक्षर पार ?
डोरी एक अनूप है । अधरे दर्शन होय ?
काया से बाहर लखै ? हंस कहावै सोय ।
स्वत: सहज वह शब्द है ? सार शब्द कह सोय ।
सब शब्दों में शब्द है । सबका कारण सोय ?
प्रकृति पार वह शब्द है ? आगम अचिंत अपार ।
अनुभव सहज समाधि में ? आज गुरु चरण अधार ।
झंडा रोपा गैब का ? दो पर्वत के संध ।
साधु छिपाने शब्द को । दृष्टि कमल के अंत ?

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