28 मई 2016

शुकराना

रूप सिंह बाबा ने अपने गुरु अंगद देव जी की बहुत सेवा की । 20 साल सेवा करते हुए बीत गए । गुरु रूप सिंह पर प्रसन्न हुए और कहा - मांगो जो माँगना है । 
रूप सिंह बोले - गुरुदेव मुझे तो मांगना ही नहीं आता ।
गुरु के बहुत कहने पर रूप सिंह बोले - मुझे एक दिन का वक़्त दो । घर वालों से पूछ के कल बताता हूँ ।
घर जाकर माँ से पूछा तो माँ बोली - जमीन माँग ले ।
मन नहीं माना ।
बीवी से पूछा तो बोली - इतनी गरीबी है पैसे मांग लो । 
फिर भी मन नहीं माना ।
छोटी बिटिया थी उनको, उसने बोला - पिताजी गुरु ने जब कहा है कि मांगो तो कोई छोटी मोटी चीज़ न मांग लेना । 
इतनी छोटी बेटी की बात सुन के रूप सिंह जी बोले - कल तू ही साथ चल । गुरु से तू ही मांग लेना ।
अगले दिन दोनों गुरु के पास गए ।
रूप सिंह बोले - गुरुदेव मेरी बेटी आपसे मांगेगी मेरी जगह ।
वो नन्ही बेटी बहुत समझदार थी । रूप सिंह इतने गरीब थे कि घर के सारे लोग दिन में एक वक़्त का खाना ही खाते ।
इतनी तकलीफ होने के बावजूद भी उस नन्ही बेटी ने गुरु से कहा - गुरुदेव मुझे कुछ नहीं चाहिए । आपके हम लोगों पर बहुत एहसान है । आपकी बड़ी रहमत है । बस मुझे एक ही बात चाहिए कि आज हम दिन में एक बार ही खाना खाते हैं । अगर कभी आगे ऐसा वक़्त आये कि हमे चार पांच दिन में भी एक बार खाए । तब भी हमारे मुख से शुक्राना ही निकले । कभी शिकायत न करें ।
शुकर करने की दात दो ।
इस बात से गुरु प्रसन्न होकर बोले - जा बेटा, अब तेरे घर के भंडार सदा भरे रहेंगे । तू क्या तेरे घर पर जो आएगा । वो भी खाली हाथ नहीं जाएगा ।
यह है शुकर करने का फल । सदा शुकर करते रहें ।
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सुख में सिमरन, दुख में अरदास ।
हर वेले शुकराना,
सुख में शुकराना, दुःख में शुकराना ।
हर वेले हर वक्त सिर्फ, शुकराना शुकराना शुकराना ।
सेवा, सिमरन, सतसंग करके, तेरा शुक्र मनाना आ जाये ।
जिंदगी ऐसी कर दो मेरी, औकात में रहना आ जाये ।
अगर पूछे कोई राज खुशी का, तो तेरी तरफ इशारा करूँ ।
खुशियों से भर दो झोली सबकी, हर दुख सहना आ जाये ।
यही प्रार्थना तुझसे सतगुरु, तेरी रजा में रहना आ जाये ।
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