21 मई 2016

सोऽहंग सार - जीवन के पार

अधिकांश ही मेरे देखने में आया है कि इंटरनेट पर आत्मज्ञान प्रचार के मामले में लगभग मौलिक, आधारीय सामग्री का एकदम अभाव सा है । इसके बजाय अधिकाधिक लोग अपना मिर्च मसाला जोङकर या गुरु अथवा संस्था का प्रचार करने पर अधिक जोर देते हैं । जो कि मैंने आरम्भ से ही नही किया । मेरा मानना है कि ज्ञान के लिये अधिकाधिक उपयोगी और गहन जानकारी युक्त सामग्री पर अधिक ध्यान देना चाहिये ।
अपने अनुभव अपने भाव बताना ठीक है लेकिन ‘मूल सत्य’ सदैव इससे अलग ही रहता है ? सर्वाधिक प्रमाणित और शाश्वत सत्य का संदेश देती कबीर की वाणी ही इस हेतु सर्वोपरि है । अतः इसको ज्यादा से ज्यादा शुद्ध 

और विचारणीय सूत्रों, गुह्य सूत्रों के रूप में आत्मज्ञान के जिज्ञासुओं तक पहुँचाना मेरा भाव है । इनका अर्थ और व्याख्या इसलिये नही करता । क्योंकि फ़िर उससे आपको न के बराबर लाभ होगा ।
क्योंकि -
जिन खोजा तिन पाईया, गहरे पानी पैठि । 
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यह 10 सोऽहंग हैं । जिसका गुरु जहाँ की सूचना देगा । वह उसी स्थान को पहुँचेगा । समस्त जीवों में सोऽहंग

प्रवेशित हो रहा है और समस्त शरीर से यही शब्द निकल रहा है और समस्त का सार, सिद्धांत यह है कि इसके ध्यान से ज्ञान है और उससे ही शान्ति है ।
10 सोऽहंग - 1 सत्यपुरुष सोऽहंग 2 सहज सोऽहंग 3 अंकुर सोऽहंग 4 इच्छा सोऽहंग 5 सोऽहंग सोऽहंग 6 अचिन्त्य सोऽहंग 7 अक्षर सोऽहंग 8 निरंजन और माया सोऽहंग 9 ब्रह्मा, विष्णु, शंकर सोऽहंग 10 समस्त जीव सोऽहंग ।
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सोऽहंग शब्द है अगम अपारा । तुमसों धर्मनि कहौ विचारा ।
पेङ सोऽहंग और सब डारा । साखा सोऽहं कीन्ह प्रकारा ।
प्रथम ‘सहज सोऽहंग’ की वानी । दूसरि ‘इच्छा सोइ’ उपतानी ।
तीसरे ‘मूल सोऽहं’ है भाई । चौथे ‘सोऽहं सोऽहं’ निर्माई ।
सोऽहंग ते भये सोइ अतीता । जाको नाम जो कहो ‘अंचिता’ ।
अचिंतहि ते अक्षर सोऽहंगा । अक्षर सोऽहंग ते ‘कैल सोऽहंगा’ ।
कैल सोऽहंग ते ‘त्रिगुण सोऽहंगा’ । सोऽहंग ते सकल सृष्टि को रंगा ।
अमृत वस्तु ते नौ पकारा । सोऽहंग शब्द के सुमिरन सारा ।
सो सोऽहं अचीन्हि जो पावै । सोऽहं डोर गहि लोक सिधावै ।
जा घट होइ सोऽहं मतसारा । सोइ आवहु लोक हमारा ।
सुरति सोऽहं ह्रदय महँ राखो । परचे ज्ञान तुम जग में भाषो ।
एती सिद्धि सोऽहं की भाई । धर्मदास तुम गहौ बनाई ।
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अजावन वीरा आवै हाथा । तब हंसा चले हमरे साथा ।
ताकैं पुनि चहि आवै डोरी । टूटे घाट अठासी करोरी ।
सोऽहं करनी सोऽहं विचारा । सोऽहं शब्द है जिव उजियारा ।
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अक्षर
अक्षर अक्षर अतीत की बानी । निःअक्षर कोई बिरले जानी ।
निःअक्षर की अक्षर स्वांसा । नहि धरनी नहि गगन प्रकासा ।
अक्षर तीन लोक विस्तारा । ता में उरझो सब संसारा ।
तीन सुत तेज अंडमों आई । आप आप इन्हें आप दृढ़ाई ।
चार वेद कहें तिन की साखी । अक्षर अतीत थाप उन्ह राखी ।
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सुरति के स्थान 
अब भिन्न भिन्न कहूँ अर्थाई । सात सुरति के स्थान बताई ।
अक्षर अतीत माया सों कहिये । सोई सुरति निरंजन लहिये ।
अक्षर सुरति दुतिय है स्थाना । जिनके चार वेद परवाना ।
शब्दातीत अनहद रहता । प्रेमधाम अक्षर की चहता ।
चार सुरति का भेद नियारा । तीन सुरति का देउ विचारा ।
पांचे सुरति अंकुर की बानी । पांचे स्थान तेहि ठहरानी ।
छठे स्थान अंकुर की है आपा । जेहि ते सात करी उततापा ।
सातवीं सुरति सहज की रही । उहि समरथ को देखा सही ।
सात सुरति सात हैं स्थाना । मूल सुरति है समर्थ प्रमाना ।
सहज सुरत सब सुर्त उपजाई । मूल सुरति लै हंस समाई ।
मूल सुरति है सबको मूला । सात सुरति को एक स्थूला ।
सात सुरति मूल सिध सब माहीं । धर्मदास लखि राखौ ताहीं ।
शब्द पांजी इतना परमाना । अब कहूँ काया की बंधाना ।
सातों सुरति काया में रहें । औ काया धरि बातें कहें ।
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सुरति स्थान
प्रथमहि दीप अमर मनियारा । तहँ वा मूल सुरति बैठारा ।
दूसरा अजर दीप तहाँ कीन्हा । सहज सुरति को बैठक दीन्हा ।
तीसर दीप हिरण्मय सोई । सुरति अंकुर की बैठक होई ।
चौथे दीप सुरंग निर्मावा । ओऽहं सोऽहं तहाँ बैठावा ।
पाँचवे अधर दीप रहे वासा । तहाँ है अचिंत सुरति को वासा ।
छठये पच्छ दीप जो कीन्हा । तहँ अक्षर सुरति को बैठक दीन्हा ।
सातवीं सुरति कलदीप बिलमाना । काम क्रोध मोह तहाँ समाना ।
सातवीं सुरति सातहूँ स्थाना । तीन सुरति निरंजन काल प्रमाना ।
पुहुप दीप है सब ते नियारा । तहाँ समर्थ से जीव विस्तारा ।
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