18 मई 2010

जो हम होने का दिखावा करते हैं


22 मई 1980 गौतम बुद्ध सभागार । ओशो आश्रम । पुणे । भारत ।
भगवान श्री नित्य प्रति की प्रकार प्रवचन दे रहे थे । तभी श्रोताओं की ओर से एक छुरा उनकी हत्या करने के उद्देश्य से उनको लक्ष्य कर फेंका गया । पूरा बुद्धा सभागार जैसे एक क्षण को जड़ हो गया । पर सौभाग्यवश वह छुरा भगवान को लगा नहीं । और उनके पास से गुजरता हुआ चैतन्य और वादन दोनों के पैरों के बीच गिरा ।
भगवान श्री ने तुरंत कहा - फिक्र न करें । ऐसे ही बैठे रहें ।
भगवान श्री अपने स्थान पर अविचल, मुस्कराते हुये उसी मुद्रा में शांत बैठे थे । और जैसे ही उस युवक को पकड़कर लोग बाहर ले गये । भगवान श्री ने जहां से प्रश्नोत्तर प्रवचन का अंश अधूरा छोड़ा था । ठीक वहीँ से पुनः प्रारम्भ कर दिया । उनके लिये जैसे कुछ हुआ ही नहीं ।
अगले दिन स्वामी आनंद मैत्रय ने प्रश्न किया - भगवान ! कल प्रातःकाल ठीक प्रवचन के बीच आप पर जिस धर्मांध हिन्दू युवक ने छुरा फेंककर आपकी हत्या करने का धर्म के नाम पर जो लज्जाजनक प्रयास किया । कृपया इस संबंध में हमें दिशा बोध देने की कृपा करें ।
भगवान श्री ने उत्तर दिया - आनंद मैत्रय ! धर्म के नाम पर इस संसार में जितने जघन्य अपराध और मूढ़तापूर्ण कृत्य हुए । उनसे इतिहास के प्रष्ठ रंगे पड़े हैं । और मज़ा यह है कि अधर्म के नाम पर कोई भी बुरा कृत्य आज तक नहीं हुआ । सरमद, मंसूर के सर कलम किये गए । मज़हब के नाम पर लाखों निर्दोष काफिरों की हत्या की गई । अनेक कलात्मक सुंदर मंदिर तोड़े गये । ज्ञान के भंडार अमूल्य पुस्तकें और दुर्लभ पांडुलिपियों के साथ सिकंदरिया का विशाल पुस्तकालय जलाया गया । इसी मज़हब के नाम पर । लाखों बौद्धों को खदेड़कर भारत से पूर्वी देशों में धकेल दिया गया । हजारों की हत्या की गई । लाखों को नीच कर्म करने को विवश किया गया । इसी धर्म के नाम पर । धर्म के नाम पर ही यूरोप में हजारों स्त्रियों को जिंदा जलाया गया । और भारत में इसी धर्म के नाम पर लाखों स्त्रियों को जबरन पति के शव के साथ चिता की लपटों के हवाले कर दिया गया । धर्म के नाम पर ही जीसस को क्रूस पर चढ़ाया गया । सुकरात को ज़हर पिलाया गया । इसी धर्म के नाम पर हिन्दुस्तान पाकिस्तान के बंटबारे के समय हजारों हत्याएं हुईं । स्त्रियों पर बलात्कार हुए । करोड़ों की सम्पति आग की भेंट कर दी गई । और तुम पूछ रहे आनंद मैत्रय, यह जघन्य कृत्य धर्म के नाम पर किया गया । धर्म के नाम पर ही ऐसे कृत्य किये जा सकते हैं । क्योंकि धर्म बड़ा प्यारा मीठा और माधुर्य पूर्ण नाम है । धर्म के ठेकेदार मुल्ला, पादरी, पुरोहित हमेशा से यही समझाते रहे लोगों को कि धर्म के नाम पर धर्म युद्ध में जो मरेगा । वह सीधा स्वर्ग जायेगा ।
धर्म जो जीने की कला है । अपने आपको जानने की कला है । जो प्रेम और करुणा की कला है । उसे इन कथित धार्मिक लोगों ने मरने मारने की कला बना दिया है । और तुम कहते हो - वह युवक धर्मांध था । वस्तुतः धर्म किसी को अंधा नहीं बनाता । धर्म तो अंतर्द्रष्टि देता है । अंधे को आंख देता है । धर्मांध कोई हो कैसे सकता है ? उसे तो अधर्मांध कहना चाहिये । लेकिन हम धर्मांध का रूढ़ प्रयोग करते हैं । ऐसे लोगों को तो अंधा कहना चाहिये । यह सभी मूर्छित और पागल लोग हैं । और इन्हें पागल बनाने में सभी संगठित धर्मो का काम है । जिन्होंने विश्वास के नाम पर उन्हें अंधविश्वास और मूढ़ता दी है । उनकी प्रज्ञा और प्रेम को कभी विकसित होने ही नहीं दिया । धर्माचार्यों का धंधा ही तभी चल सकता था । जब लोग अंधे और मूढ़ बनें रहें ।
और मैं अपने सन्यासियों से इसलिये बहुत खुश हूं कि उन्होंने उस युवक को मारा नहीं । कोई चोट नहीं पहुंचाई । वे उसे प्रेम से उठाकर बाहर ले गये । जो कुछ तुमने किया । वह अमूल्य है । तुमने अपना होश बनाये रखा । मूर्छित नहीं हुए । उद्दिग्न नहीं हुए । यह मेरे लिए बहुत अमूल्य है । तुम मेरी घोषणा को भूले नहीं कि प्रत्येक के अंदर परमात्मा विराजमान है । उस युवक के अंदर भी वही परमात्मा है । थोड़ा सा अँधेरे में पड़ा है । पर है तो परमात्मा ही । तुमने उसके साथ जो सम्मान पूर्ण व्यवहार किया । वह प्रशंसनीय है । यदि तुम लोगों में प्रति हिंसा जागृत होती । तो मुझे कष्ट होता । मैं इसीलिए तुम सभी का आभारी हूं । तुमने उसे ऐसे उठाया । जैसे कोई गिरे हुये व्यक्ति को सड़क से उठाता हो । सन्यासी का यही लक्षण है । यही लक्षण धार्मिक होने का है ।
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बुद्धत्व और कुछ नहीं । बस इतना ही है कि हर चीज वैसी ही है । जैसी होनी चाहिए । यह बुद्धत्व की परिभाषा है । हर चीज वैसी ही है । जैसी कि होनी चाहिए । हर चीज पूरी तरह से पूर्ण है । जैसी है । यह अहसास । और अचानक तुम घर पर होते हो । कुछ भी बाकी नहीं बचता । तुम हिस्से हो । एक जैविक हिस्से हो । इस महानतम, सुंदर पूर्ण के । तुम इसमें विश्रांत हो । इसमें समर्पित । तुम अलग से नहीं बचते । सभी विभाजन विदा हो जाते हैं । एक महान आनंद घटता है । क्योंकि अहंकार के विदा होते ही कोई चिंता नहीं बचती । अहंकार के विदा होने के साथ ही किसी तरह का विषाद नहीं बचता । अहंकार के विदा हो जाने के साथ ही किसी तरह की मृत्यु की संभावना नहीं बचती । यह बुद्धत्व है । यह समझ है कि सब कुछ शुभ है कि सब सुंदर है । और यह जैसा है । वैसा ही सुंदर है । सब कुछ गहनतम लयबद्धता में है । संगत में है ।
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कोई टाटा । कोई बिड़ला । कोई अंबानी । कोई मनमोहन, होकर रह गया । क्या होना था ? क्या से क्या होकर रह गया ?
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मानव ने पत्थर पूजे । पर मानव को कब पहचान सका ?
यद्यपि इसकी छाया से ही । पा रंग रूप, भगवान सका ।
मानव फुटपाथों पर सोते । भगवान भवन में झूले पर ।
मानव सुत पत्तल चाट रहे । नैवेद्य यहाँ थाली भर भर ?
जा रही हजारों लाशें । बे कफन यहाँ शमशानो में ।
श्रंगार नहीं पूरा होता । इनका रेशम के थानो में ?
आर्य समाजी, कोई भी, बहन सुषमा आर्य की इन पंक्तियो से नाइत्तफाकी रखता है ? RSS को सवसे पहले कौन गृहमंत्री ने प्रतिवंधित किया ? तत्कालीन सर संघ चालक को इसके औचित्य का खुला जवाव पटेल ने दिया । क्या मूर्ति से एकता हो जायेगी ? वह भी जन्मजात विरोधी की से ?  मोदी जी 2500 करोड़ की लागत से ये पुण्य कर रहे हैं । क्या किसी आर्य मोदी समर्थक ने अपना विरोध दर्ज कराया ? क्या सवका जमीर मर गया । सत्य के लिए दयानद श्रीकृष्ण की मर्यादा व साहस मर गया ? पटेल के मरने के दशकों वाद राजनैतिक लाभ के लिए उसे भुनाना । क्या यही राजनैतिक अवसरवाद जीने का सहारा रह गया है ? चलो गांधी ने नेहरू को टिकाया । तव पटेल को प्रधान मंत्री वनाने का कोई अभियान छेड़ा था क्या ? मोदी पी एम की घोषणा से पहले गुजरात में शराव बंदी ख़त्म होने की चर्चा के समय मैंने भास्कर के साथ यादवों का इतिहास याद दिलाया कि कैसे विदेशी मुद्रा व पर्यटन के नाम द्वारिका में शराव शुरू होते ही यदुवंश आपस में लड़ लङ के मर गया था ? ऐसे ही 2500 करोड़ को कथित " स्टेच्यू आफ यूनिटी " की जगह गरीवों की उन्नति में लगाया जाये । तो क्या गलत होगा ?  मैं मोदी के सांप्रदायिक संतुलन के कारण वढा समर्थक हूँ । मगर मोदी भी तुष्टीकरण करने लगे हैं । गोपालगढ़ भरतपुर घटना व सलमान खान के साथ [   जो कल तक खलनायक वनाया हुआ था । साथ पतंग उड़ाते ही भला हो गया ? जो आर्य समाजी अभी सत्य कहने का साहस नहीं रखते । वे मोदी के पी एम बनने के बाद तो अपना अस्तित्व ही खो बैठेंगे । कापी पेस्ट ।
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इस दुनिया में सम्मान से जीने का सबसे महान तरीका है कि हम वो बनें । जो हम होने का दिखावा करते हैं - सुकरात ।

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