25 मई 2010

संत और सिद्ध में बहुत अंतर है..there are major difference saint and siddh

ये महज आज से लगभग डेढ सौ साल पहले की बात है जब टेरी कोहाट (वर्तमान में पाकिस्तानी क्षेत्र ) में कायस्थ कुल में लाला वासुदेव के घर हरिहर बाबा यानी स्वरूपानन्द जी का प्राकटीयकरण हुआ । स्वरूपानन्द जी बाल्यावस्था से ही वैरागी थे और श्रीकृष्ण की भाँति बाल अवस्था से ही इन्होनें अनेकों दिव्य चमत्कार किये । बाद में किशोरावस्था में पहुँचने पर स्वयँ इनके गुरु अद्वैतानन्द जी इनके पास पहुँचे और बिना किसी भूमिका के इन्हें "परमहँस" कहकर पुकारा । आज टी. वी आदि की बदौलत और विभिन्न साधु संतो की प्रचारार्थ पुस्तकों के माध्यम से परमहँस शब्द से आप बखूबी परिचित होंगे परन्तु हँसी की बात ये है कि धङल्ले से इसका उपयोग करने बाले और शान से अपने नाम के आगे परमहँस लगाने वाले जानते तक नहीं होगें कि परमहँस होता क्या है और ये स्थिति कब और किस तरह प्राप्त होती है । मैं थोङा सा संकेत रूप में आपको बताता हूँ ये संत से ऊपर की स्थिति है । और संत होना ही टेङी खीर से कम नहीं है..आजकल जिन लोगों को आप संत सम्बोधन से जानते हैं ।
ये दरअसल ज्यादातर ग्यानमार्ग और भक्तिमार्ग की अनगिनत साधनाओं में से एक के साधक मात्र है और ऐसा भी नहीं हैं कि सब को एक ही तराजू में तौल दिया जाय पर मेरा आशय ये है कि संतो की जिस तरह की भीङ आज देखने को मिल रही है उस भीङ में दो या चार संत भी मुश्किल से निकलेंगे जो वास्तविक संत शब्द की परिभाषा के अन्तर्गत आते हैं । फ़िर परमहँस! wow इस पर तो सिर्फ़ हँसा जा सकता है । इस सम्बन्ध में कबीर की एक बात याद आती है.." सिंहो के लेहङ नहीं , साधु न चले जमात.."
खैर ..साहब बाद में स्वरूपानन्द जी गुरु आग्यानुसार तपोभूमि (आगरा नगला पदी और भगवान टाकीज फ़्लाईओवर के निकट ) आये और बारह वरसों तक घनघोर साधना की । तदपरान्त पुनः गुरु आग्यानुसार आपने अलग अलग स्थानों पर जीवों को सुरति शब्द साधना जो आत्मा की मुक्ति हेतु एकमात्र साधना निर्धारित की गयी है ,से परिचित कराया और जीवन के अंतिम दिनों में गूजरों की नंगली (वर्तमान में गुरुधाम नंगलीधाम के नाम से मशहूर ये स्थान मेरठ शहर के निकट है और लगभग सोलह किमी के दायरे में समस्त सुविधाओं से युक्त आश्रम बना हुआ है ) में रहे ।
उन्ही दिनों की बात है एक दिन स्वरूपानन्द जी प्रवचन कर रहे थे । जब एक सिद्ध उनकी प्रसिद्ध से प्रभावित होकर पहुँचा । उसने स्वरूपानन्द जी के चमत्कारों के बारे में काफ़ी कुछ सुन रखा था । यहाँ ये ध्यान रखे कि सिद्ध और संत में जमीन आसमान का अंतर होता है । संत और परमहँस में भी यही अंतर होता है । बेहद अहंकारी ये सिद्ध लगभग टहलता हुआ स्वरूपानन्द जी के पास पहुँचा और बोला कि कुन्डलिनी ग्यान के द्वारा मैंने आदमी को पशु पक्षी बना देने की कला सीख ली है..और मैंने सुना है कि आपको भी कुछ कलायें आती है..क्यों न हम लोग एक दूसरे को अपनी अपनी कला सिखा दें...स्वरूपानन्द जी ने कहा कि आप बैठें हम बाद में बात करते हैं...बस उसी प्रवचन के दौरान ही स्वरूपानन्द जी ने उसकी हालत खराव कर दी..जबकि वे आराम से पूर्ववतः प्रवचन देते रहे..हुआ यूँ कि प्रवचन के दौरान स्वरूपानन्द जी जिस तरफ़ भी हाथ उठाते उस आदमी का शरीर उधर ही
खिंचता..और बेहद कन्ट्रोल करने की कोशिश के बाद भी वह कुछ न कर सका और प्रवचन खत्म होते होते उसकी हालत अधमरे के समान हो गयी । बरसों से बीमार व्यक्ति की भाँति वह हाँफ़ रहा था । बाद में स्वरूपानन्द जी ने उसे बेहद ताङना दी और कहा कि प्रभु की अनमोल योग विधा का तुम ये उपयोग करते हो अरे जीव तो पहले ही अग्यान के वशीभूत होकर पशुवत जी रहा है उसे पशु पक्षी बनाकर तुम क्या बङी बात कर रहे हो..उस सिद्ध का सारा अहँकार चूर चूर हो गया और वह स्वरूपानन्द जी के पैरों में गिर कर माफ़ी माँगने लगा ।
इसी तरह संत शिरोमणि रैदास जी का एक प्रसंग याद आता है । प्राय संतो का ये स्वभाव होता है कि वे अन्य की अपेक्षा ज्यादातर मौन रहना और सामान्य रूप से बात करना ही पसन्द करते है । बङे बङाई ना करें बङे न बोले बोल । हीरा मुख से ना कहे लाख टका मेरो मोल ।
रैदास जी चर्मकार कुल में हुये थे और जीविकापार्जन हेतु जूते गांठने और नये जूते बनाने का कार्य करते थे । वैसे इस आमदनी से उनका घर आराम से चल सकता था परन्तु रोजाना ही ढेरों साधुओं के आवागमन और उनके स्वागत सत्कार और भोजन आदि के अतिरिक्त खर्च की वजह से उन्हें अक्सर आर्थिक परेशानी का सामना करना पङता था । ऐसे ही दिनों में एक बार एक सिद्ध पुरुष जो रैदास जी के विनम्र व्यवहार से काफ़ी प्रभावित था । उनके घर आया और उसे अहसास हुआ कि रैदास जी इस समय काफ़ी आर्थिक परेशानी महसूस कर रहे हैं । उसने अपने मन में गर्व ( योग और सिद्ध मार्ग से अक्सर इंसान के अन्दर अहंकार सामान्य मनुष्य की अपेक्षा और अधिक हो जाता है क्योंकि उसे बोध होने लगता है कि वो सामान्य से हटकर कुछ विशेष है और अलौकिक शक्ति उसके पास है । जबकि भक्तिमार्ग अहँकार का ही प्रथम समूल नाश करता है । योग में जो प्राप्ति होती है उसकी तुलना राईदाना
से अधिक नहीं है परन्तु भक्ति में जो प्राप्ति है उसका उदाहरण देने के लिये अति विशाल पर्वत भी तुच्छ नजर आता है ) महसूस करते हुये अपने थैले से पारस पत्थर ( सिद्ध द्वारा प्राप्त वह पत्थर जिसको लोहे से स्पर्श करा देने से लोहा सोने में परवर्तित हो जाता है ) निकाला और रैदास जी से कहा कि आप ये पारस रख लो । इसे मैं बीस दिनों के लिये छोङे जा रहा हूँ इस दरम्यान आप जितना भी चाहे सोना बना लेना इससे फ़िर आपको कभी कोई परेशानी नहीं होगी । बेचारा सिद्ध नहीं जानता था कि आत्मग्यानी संत क्या होता है ? गाँठी दाम न बाँधहि नहीं नारी से नेह । कह कबीर उस संत की हम लें चरनन की खेह । दरअसल संतगीरी का पहला अध्याय ही इस बात से शुरू होता है कि सबकी व्यवस्था करने बाला भगवान है । हमारे करने से कुछ नहीं होता है ।
जलचर जीव बसे जल माहीं तिनको जल में भोजन देय । थलचर जीव बसे थल माहीं तिनको थल में भोजन देय । नभचर जीव बसे नभ माहीं तिनको नभ में भोजन देय । नारि गर्भ में बैठा जीवा , उसको भी तो भोजन देय । लोगन राम खिलौना जाना ! अरे पागलो, ये सब व्यवस्था उसके आदेश से ही तो हो रही है और तुम उसको भोग लगाते हो प्रसाद खिलाते हो । उसको नहलाने सुलाने जैसा झूठा नाटक करते हो ।अरे वो एक पल के लिये भी सो गया तो क्या होगा कल्पना करना ही मुश्किल है ?
रैदास जी ने विनम्रता से कहा , अरे भाई ! मैं इसका क्या करूँगा । मेरे पास तो इसका कोई उपयोग ही नही हैं । सिद्ध ने मन में सोचा कि रैदास जी शर्म महसूस कर रहे है इसलिये वो बोला कि आप रख लो मैं कुछ दिनों बाद इसको ले जाँऊगा । उसने मन में सोचा कि मेरे पीछे ये अवश्य ही इससे सोना बना लेंगे ।
रैदास जी उस समय अपने काम में व्यस्त थे । सो उस सिद्ध ने उन्हे बताते हुये वह पारस पत्थर एक जगह दीवाल की सन्धि में रख दिया और चला गया । बीस दिन बाद जब वह लौटा तो उसने बेहद व्यग्रता से प्रथम पारस के बारे में ही पूछा । रैदास जी ने अचकचाते हुये कहा कि कौन सा पारस पत्थर ?
सिद्ध ने सोचा कि रैदास जी के मन में बेईमानी आ गयी है । उसने कहा कि वही रैदास जी जो मैं बीस दिन पूर्व आपको दे गया था । रैदास जी ने कहा कि आप तो मुझे कोई पारस नहीं दे गये थे । सिद्ध व्याकुल होकर उस स्थान पर गया जहाँ उसने पारस दीवार की सन्धि में छुपाया था और बोला कि आपको बताकर इसी स्थान पर रख गया था..कहते कहते उसने देखा कि पारस पत्थर ज्यों का त्यों उसी स्थान पर रखा हुआ था और रैदास जी ने उसको छुआ तक न था । वह बेहद हैरान रह गया क्योंकि वह सोच रहा था कि जब वह लौटकर आयेगा तो रैदास जी का ठाठबाठ ही निराला होगा और पारस की बदौलत वे अपने आपको मालामाल कर लेंगे पर रैदास जी ने तो उसको छुआ तक न था । उसका सारा अहँकार चूर चूर हो गया और वह रैदास जी को नमन करता हुआ बोला कि हे संत शिरोमणि आप संतो के पास वो कौन सा अनमोल और अक्षय धन है जिसके आगे यह पारस भी अत्यन्त तुच्छ है । कृपया मुझे उपदेश करें । पारस और संत में यही अंतरो जान । ये लोहा कंचन करे वो करले आपु समान ।
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