16 मई 2010

मुंहफ़ट पूनम

वो एक मुँहफट लङकी थी । जिसका नाम पूनम था । पूनम सुन्दर और युवा थी । फ़िर भी हर जगह से उसकी शादी के लिये " ना " हो जाती । और इसकी मात्र एक ही वजह थी कि वो मुँहफट नाम से मशहूर लङकी थी । उसका बाप बङा परेशान था । लङकी पहाङ की तरह फ़ैलती जा रही थी । मां बाप के सीने पर बोझ के समान थी । और उसके हाथ पीले करना मुश्किल हो रहा था । बात ज्यादा ही गम्भीर थी । कन्या ज्यादा ही मुँहफट थी । कौन है । कब है । क्या है । क्या स्थिति है । क्या माहौल है ? इससे कोई मतलब नहीं । बस जो उचित बात लगी । फ़ौरन मुँह पर मार दी । हालांकि बात एकदम सच कहती थी । आरपार की बात कहती थी । पर जमाना उसको सहन नहीं कर पाता था ।
पङोस में गुप्ता जी मर गये । तो ये माँ के साथ शोकसभा में गयी । और जब औरतें सम्वेदना ( अक्सर झूठी ) प्रकट कर रही थी । इसने कहा - तो भी बहुत दिन जी लिये । वरना इतना शराबी और कुकर्मी आदमी तो अपने कर्मों से बीस साल पहले ही मर जाता ।
इसी तरह ये पङोस की कन्या राधा, जो इसकी सहेली ही थी । की शादी में शामिल होने गयी । और महिलाओं के बीच में बोली - ठीक हुआ । राधा की शादी समय पर हो गयी । वरना ये देवेश के साथ भाग जाती ।
लोगों ने पूनम के पिता सलाह दी कि तुम बताते ही क्यों हो कि लङकी मुँहफट है । अरे शादी कर दो ।  पर पूनम का बाप इसके लिये तैयार नहीं था कि किसी को जानबूझ कर धोखा दो । और कन्या चार दिन बाद वापस घर आकर बैठ जाय ।
लेकिन किसी ने सच कहा है । हम लोग तो सिर्फ़ कोशिश करते हैं । वास्तविक सृष्टा जोङी तो ऊपर वाला पहले ही कर देता है । इस तरह पूनम का पिता जब एक सौ इकतीसवें द्वार पर रिश्ता लेकर गया । और फ़ोटो देखते ही वर पक्ष ने हाँ कर दी । तब उसने हाथ जोङकर कहा कि वैसे तो मेरी पूनम लाखों में एक है । लेकिन...? 
- भाईसाहब ! हम ऐसी कन्या से हरगिज शादी नहीं कर सकते । तुरन्त जबाब मिला ।
तब उदय प्रताप जो इस बात को सुन रहा था । उदय प्रताप ने इस बात को चैलेंज के रूप में लिया कि एक कन्या से लङके इसीलिये शादी नहीं कर रहे कि वो मुंहफ़ट है । शर्म की बात है । पूरे पुरुष समाज के लिये । उसने बिना किसी से ( घर वालों से ) कोई बात किये तत्काल फ़ैसला सुनाया कि - मैं शादी करूँगा । तो सिर्फ़ पूनम से ही ।
खैर उदय के घर वालों का रोना धोना हटा दें । तो पूनम का पिता बेहद खुश हुआ । और शादी की तैयारी में जुट गया । इधर उदय प्रताप अपनी शादी में जाने की विशेष तैयारी करने लगा । उसने दूल्हे की कटार थोङी बङी और खतरनाक स्टायल की चुनी । सेहरा भी अलग । सेहरे की कलंगी भी ऐसी । मानों कोई राजा भयंकर रण के लिये प्रस्थान कर रहा हो । कहने का आशय उसने दुल्हाई मेकअप इस तरह का किया कि दूल्हा कम लङाका ज्यादा लगे । इस सबसे अलग उसने एक काले रंग की तेल चुपङी हुयी लाठी । जिसके ऊपर के हिस्से में पीतल का दहाङते हुये शेर का मुख था । विशेष रूप से ली । घरवाले पहले ही नाखुश थे । उन्होने इस स्पेशिलिटी का कोई विरोध नहीं किया । जो मरजी आये कर । नहीं मानता तो मर ।
पूनम का ये दूल्हा बेहद चर्चा का विषय बना । बारात जब दरबाजे पर पहुँची । तो औरतें मुँह में पल्लू दबाकर हँसी । और पूनम की सखियों ने इसे हैरत से देखा ।
दौङकर दुल्हिन बनी पूनम को बताया कि जीजा बहुत बङा लठ्ठ लेकर आया है । पूनम अंदर तक काँप गयी । कुछ ने कहा - लुक्का मालूम होता है । बङी बूढियों ने कहा - भगवान ठीक ही न्याय करता है । जा मोंहफटिया के लैं चहिएऊँ । ऐसो ई ठस बुद्धी को । जेई ठीक करि पैये । जा मुंहफट कों..?
इस तरह अनजानी आशंकाओं से सहमी पूनम अपने इस वर को घूंघट की ओट से देखती रही । एक नारी स्वभाव के आंकलन से पूनम हर तरह से श्रेष्ठ थी । बस कमी एक ही थी ।
विवाह की रस्म के दौरान उस समय हल्ला मच गया । जब कन्या पक्ष की औरतें सूप में अनाज रखकर कुछ रीति रिवाज का पालन कर रही थीं । और सूप में अनाज के हिलने से छन..छन..छन की आवाज हुयी ।
तब उदय प्रताप ने कहा - सूप नीचे रख दो ।
औरतें घबरा गयीं । पर कुछ न समझते हुये वर की बात मानकर सूप नीचे रख दिया गया ।
उदय की सास ने प्यार से पूछा - बेटा क्या बात है ?
उदय ने कहा - आप लोगों से कोई बात नहीं । इस सूप से बात है । छन.छन मुझे कतई पसन्द नहीं I और लठ्ठ मारकर सूप तोङ दिया । पूनम का कलेजा धाङ धाङ करके बजने लगा ।
इसी तरह द्वाराचार ( दरबज्जे ) के समय बर्तन किसी तरह खटक गये । उदय ने लठ्ठ उठा लिया । और बर्तन तोङ डाले । खटर..पटर..मुझे बिलकुल बर्दाश्त नहीं..I
इसी तरह विवाह में कोई कुत्ता किसी कारणवश कांय कांय करने लगा । उदय ने उसके भी दो लठ्ठ ( मगर झूठमूठ ) के लगा दिये - कांय कांय मुझे कतई पसन्द नहीं I
पूनम जैसे बोलना ही भूल गयी । मन में सोच रही थी कि सांस लेने की आवाज पसन्द करता है या नहीं ? जैसे तैसे शादी हो गयी ।
पूनम ने बेहद धङकते । बेहद सहमते हुये ससुराल में कदम रखा । कदम कदम पर ख्याल रखा कि लठ्ठाधारी पति किसी ध्वनि से डिस्टर्ब न हो । एक महीने बाद पूनम की चौथी यानी पहली विदा निकली ।
बेहद डरता डरता पूनम का पिता ये सोचकर बेटी को बुलाने गया कि पता नहीं क्या क्या..सुनने को मिलेगा ? एक तरह से वह चांद पर तबा बांधकर खुद ही पिटने को तैयार होकर गया । आखिर एक मुँहफ़ट लङकी का बाप था बेचारा ।
पर आशा के विपरीत समधी और समधिन ने बङे लाङ से उसे झिङकते हुये कहा - आप भी गजब करते हो समधी जी । जो हमारी गऊ जैसी सुशील बहू के लिये जाने क्या क्या कह रहे थे । जबसे आयी है । हमने उसकी आवाज तक नहीं सुनी । और आप कह रहे थे कि मुंहफट है । 
पूनम के बाप ने सोचा कि - या तो ये व्यंग्य कर रहे है । या अवश्य कोई चमत्कार हुआ है ?
उसका ध्यान उदय की ओर गया । उसने सोचा निश्चय ही ये चमत्कार जमाई राजा का है । सो मौका मिलते ही उत्सुक पूनम का बाप उदय को एक तरफ़ ले गया । और बोला - सही सही बताना..बेटा ! ये चमत्कार कैसे हुआ ?
उदय ने बताया । ससुर जी ने पगङी उतारकर उसके पैरों में रख दी । और बोले - एक कृपा और कर दो बेटा । मेरी डुकरिया ( पूनम की माँ ) को भी सही कर दो । तो जीवन के बचे दिन । मैं भी कुछ चैन से जी लूँ । वो भी बिलकुल ऐसी ही है मुंहफट ।
उदय उसे एक कुम्हार के घर ले गया । उसने एक कच्ची मलईया । और एक पकी हुयी मलईया ( छोटे साइज के घङे ) ली । और दोनों को फ़ोङ दिया । फ़िर बोला - यदि आप दोनों को फ़िर से ज्यों का त्यों बना दें । तो में सासूजी को सुधार दूँगा ।
उसका ससुर बोला - कच्ची तो दोबारा बन जायेगी । मगर पकी कैसे बनेगी ?
तब उदय ने कहा - इसी तरह ससुरजी ! पूनम कच्ची थी । उसमें सुधार हो सकता था । मगर सासूजी पक चुकी हैं । इसलिये उनमें सुधार संभव नहीं । इसलिये उन्हें सहने के अलावा और कोई चारा नहीं ।
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