10 मई 2010

क्रोध को कैसे जीतें काम को कैसे जीतें ?


1 बार बाबा फरीद कहीं जा रहे थे । एक व्यक्ति उनके साथ चलने लगा । उसकी जिज्ञासा ने उसे बाबा के साथ कर दिया था । व्यक्ति ने बाबा से पूछा - क्रोध को कैसे जीतें । काम को कैसे जीतें ?
ऐसे प्रश्न लोग बाबा से पूछते रहते थे । बाबा ने बड़े स्नेह से उस व्यक्ति का हाथ पकड़ा । और बोले - तुम थक गए होगे । चलो किसी पेड़ की छाया में विश्राम करते है ।  बाबा बोले - बेटा ! समस्या क्रोध और काम को जीतने की नहीं । उन्हें जानने की है । वास्तव में न हम क्रोध को जानते हैं । और न काम को । हमारा यह अज्ञान है कि हमें बारबार हराता है । इन्हें जान लो । तो समझो जीत पक्की है । जब हमारे अंदर क्रोध प्रबल होता है । काम प्रबल होता है । तब हम नहीं होते हैं । हमें होश ही नहीं होता है । इस बेहोशी में जो कुछ होता है । वह मशीनी यंत्र की भांति हम किया करते हैं । बाद में केवल पछतावा बचता है । बात तो तब बने । जब हम फिर से सोयें नहीं । अंधेरे में पड़ी रस्सी सांप जैसी नजर आती है । इसे देखकर कुछ तो भागते हैं । कुछ उससे लड़ने की ठान लेते हैं । लेकिन गलती दोनों ही करते है । ठीक तरह से देखने पर पता चलता है कि वहां सांप तो है ही नहीं । बस जानने की बात है । इस तरह इंसान को अपने को जानना होता है । अपने में जो भी है । उससे ठीक से परिचित भर होना है । बस । फिर तो बिना लड़े ही जीत हासिल हो जाती है । उस व्यक्ति को अपने सवाल का जवाब मिल गया ।
************
हमेशा याद रखो । जो कुछ भी मैं तुम्हें कहता हूं । तुम उसे 2 तरह से ले सकते हो । तुम उसे मेरे अधिकार से ले सकते हो । यह निश्चित ही सत्य होगा । तब तुम कष्ट देखोगे । तब तुम विकसित नहीं होओगे । जो कुछ भी मैं कहता हूं । उसे सुनो । उसे समझने की कोशिश करो । अपने जीवन में उसको उतारो । देखो वह कैसे कार्य करता है ? और तब  तुम्हारी अपनी चेतना में यह आता है । हो सकता है । वह वही हो । वह ना भी हो । वे ठीक वैसे ही नहीं हो सकते । क्योंकि तुम्हारा अलग व्यक्तित्व है - अद्वितीय चेतना । जो कुछ भी मैं कह रहा हूं । वह मेरा अपना है । वह निश्चित ही मेरे भीतर गहरे जमा होगा । हो सकता है
कि तुम ठीक वैसे ही निष्कर्ष पर आओ । लेकिन वे ठीक वैसे ही नहीं हो सकते । इसलिए मेरा निष्कर्ष तुम्हारा निष्कर्ष नहीं होना चाहिए । तुम्हें मुझे समझने का प्रयास करना चाहिए । तुम्हें सीखने का प्रयास  करना चाहिए । लेकिन तुम्हें मेरे से जानकारी इकठ्ठी नहीं करनी चाहिए । तुम्हें मेरे से निष्कर्ष इकठ्ठे नहीं करने चाहिए । तब तुम्हारा मन  शरीर विकसित होगा । एक बार तुम मन शरीर से पार हो जाते हो । तब पहली बार तुम जानते हो कि तुम मन नहीं हो । बल्कि साक्षी हो । मन से नीचे तुम्हारा उससे तादात्म्य बना रह जाता है । एक बार तुम जानते हो कि विचार, मानसिक कल्पनाएं और भाव बस वस्तुए हैं । तुम्हारी चेतना में तैरते बादल हैं । तुम उनसे तत्काल विभक्त हो जाते हो । तुम शरीर के पार हो जाते हो । तुम अब और अधिक शरीर में सीमित नहीं रहे । तुम जानते हो कि तुम शरीर नहीं हो ।
************
जीवन कमाना होता है । मिलता नहीं । जीवन साधना है । जन्म के साथ जीवन नहीं मिलता । जन्म के साथ अवसर मिलता है । साधो । तो जीवन मिल जाएगा । न साधो । कभी न मिलेगा । तुमने जन्म को ही जीवन समझ लिया है । और इसीलिए तो तुम इतने परेशान हो कि भुलाने के लिए शराबों की जरूरत है । सदियों से मंदिर और मस्जिद ने शराब का विरोध किया है । चर्च और गुरुद्वारे ने शराब का विरोध किया है । लेकिन शराब जाती नहीं । मंदिर मस्जिद उखड़ गए हैं । मधुशाला जमी है । मंदिर मस्जिदों में कौन जाता है अब ? जो जाते हैं । वे भी कहां जाते हैं ? वे भी कोई औपचारिकता पूरी कर आते हैं । जाना पड़ता है । इसलिए जाते हैं । वहां बैठकर भी वहां कहां होते हैं ? मन तो उनका कहीं और ही होता है । यह जरूरत अपने को भुलाने की इसीलिए है कि तुम्हें अपना पता ही नहीं । और जो तुमने अपने को समझा है । वह कांटे जैसा चुभ रहा है । तुम्हें मैं वही दे देना चाहता हूं । जो तुम्हारे पास है । और जिससे तुम्हारे सम्बन्ध छूट गए हैं । उसको पा लेना ही सिद्ध हो जाना है । सिद्ध को भुलाने की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती । ओशो ।
************
संत के पास दूर दूर से लोग आते हैं । पर संत का पडोसी और उसके गांव के लोग कभी नहीं आते । ओशो ।
************
आकार ( जैसे गणित में let x  मानते हैं ( है ) नहीं । लेकिन न हो । ऐसा भी नहीं । दर्शन का महत्व है । दर्शन शब्द का अर्थ - दर्शन शब्द पाणिनीय व्याकरण के अनुसार " दृशिर प्रेक्षणे " धातु से ल्युट प्रत्यय करने से निष्पन्न होता है । अतएव दर्शन शब्द का अर्थ दृष्टि या देखना, जिसके द्वारा देखा जाय या जिसमें देखा जाय, होगा । दर्शन शब्द का शब्दार्थ केवल देखना या सामान्य देखना ही नहीं है । इसीलिए पाणिनी ने धात्वर्थ में " प्रेक्षण " शब्द का प्रयोग किया है । प्रकृष्ट ईक्षण, जिसमें अन्तर्चक्षुओं द्वारा देखना या मनन करके सोपपत्तिक निष्कर्ष निकालना ही दर्शन का अभिधेय है । इस प्रकार के प्रकृष्ट ईक्षण के साधन और फल दोनों का नाम दर्शन है । जहाँ पर इन सिद्धांतों का संकलन हो । उन ग्रन्थों का भी नाम दर्शन ही होगा । जैसे - न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन मीमांसा दर्शन आदि आदि । दर्शन ग्रन्थों को दर्शन शास्त्र भी कहते हैं । यह शास्त्र शब्द " शासु अनुशिष्टौ " से निष्पन्न होने के कारण दर्शन का अनुशासन या उपदेश करने के कारण ही दर्शन शास्त्र कहलाने का अधिकारी है । दर्शन अर्थात साक्षात्कृत धर्मा ऋषियों के उपदेशक ग्रन्थों का नाम ही दर्शन शास्त्र है । Ram Joshi 
एक टिप्पणी भेजें

Follow by Email