02 दिसंबर 2011

हंसी सदा ही युवा ताजी होती है

जीवन को विधायक आरोहण दो - जीवन से अंधकार हटाना व्यर्थ है । क्योंकि अंधकार हटाया नहीं जा सकता । जो यह जानते हैं । वे अंधकार को नहीं हटाते । वरन प्रकाश को जलाते हैं । 1 प्राचीन लोककथा है । उस समय की । जब मनुष्य के पास प्रकाश नहीं था । अग्नि नहीं थी । रात्रि तब बहुत कठोर थी । लोगों ने अंधकार को दूर करने के बहुत उपाय सोचे । पर कोई भी कारगर नहीं हुआ । किसी ने कहा - मंत्र पढ़ो । तो मंत्र पढ़े गये । और किसी ने सुझाया कि - प्रार्थना करो । तो कोरे आकाश की ओर हाथ उठाकर प्रार्थनाएं की गई । पर अंधकार न गया । सो न गया । किसी युवा चिंतक और आविष्कारक ने अंतत: कहा - हम अंधकार को टोकरियों में भर भरकर गड्ढों में डाल दें । ऐसा करने से धीरे धीरे अंधकार क्षीण होगा । और फिर उसका अंत भी आ सकता है ।
यह बात बहुत युक्ति पूर्ण मालूम हुई । और लोग रात रात भर अंधेरे को टोकरियों में भर भरकर गड्ढों में डालते । पर जब देखते तो पाते कि वहां तो कुछ भी नहीं है । ऐसा करते करते लोग बहुत ऊब गये । लेकिन अंधकार को फेंकने ने 1 प्रथा का रूप ले लिया था । और हर व्यक्ति प्रति रात्रि कम से कम 1 टोकरी अंधेरा तो जरूर ही फेंक आता था । फिर, कभी ऐसा हुआ कि 1 युवक किसी अप्सरा के प्रेम में पड़ गया । और उसका विवाह उस अप्सरा से हुआ । पहली ही रात बहू से घर के बढ़े सयानों ने अंधेरे की 1 टोकरी घाटी में फेंक आने को कहा । वह अप्सरा यह सुन बहुत हंसने लगी । उसने किसी सफेद पदार्थ की बत्ती बनाई । 1 मिट्टी के कटोरे में घी रखा । और फिर किन्हीं 2 पत्थरों को टकराया । लोग चकित देखते रहे । आग पैदा हो गई थी । दीया जल रहा था । और अंधेरा दूर हो गया था । उस दिन से फिर लोगों ने अंधेरा फेंकना छोड़ दिया । क्योंकि वे दिया जलाना सीख गये थे । लेकिन जीवन के संबंध में हममें से अधिक अभी भी दीया जलाना नहीं जानते हैं । और अंधकार से लड़ने में ही उस अवसर को गंवा देते हैं । जो कि अलौकिक प्रकाश में परिणित हो सकता है । प्रभु को पाने की आकांक्षा से भरो । तो पाप अपने से छूट जाते हैं । और पापों से ही लड़ते रहते हैं । वे उनमें ही और गहरे धंसते जाते हैं । जीवन को विधायक आरोहण दो । निषेधात्मक पलायन नहीं । सफलता का स्वर्ण सूत्र यही है ।
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डाइनेमिक मेडिटेशन के दूसरे चरण में रेचन करना 1 पागलपन प्रतीत होता है । इस संबंध में 1 ध्यानी का प्रश्न - यदि घर पर इसे हम जारी रखेंगे । चिल्लाएं । या नाचें । या हंसें । तो आसपास के लोग पागल समझने लगेंगे । 
- आसपास के लोग अभी भी पागल ही समझते हैं एक दूसरे को । कहते न होंगे । यह दूसरी बात है । यह पूरी जमीन करीब करीब मैड हाउस है । पागलखाना है । अपने को छोड़कर बाकी सभी लोगों को लोग पागल समझते 

ही हैं । लेकिन अगर आपने हिम्मत दिखाई । और इस प्रयोग को किया । तो आपके पागल होने की संभावना रोज रोज कम होती चली जाएगी । जो पागलपन को भीतर इकट्ठा करता है । वह कभी पागल हो सकता है । जो पागलपन को उलीच देता है । वह कभी पागल नहीं हो सकता । फिर 1-2 दिन । 4 दिन । उत्सुकता लेंगे । 4 दिन बाद उत्सुकता कोई लेने को तैयार नहीं है । कोई आदमी दूसरे में इतना उत्सुक नहीं है कि बहुत ज्यादा देर उत्सुकता ले । और आपके 24 घंटे के व्यवहार में जो परिवर्तन पड़ेगा । वह भी दिखाई पड़ेगा । आपका रोना  चीखना ही दिखाई नहीं पड़ेगा । आप जब क्रोध में होते हैं । तब कभी आपने सोचा कि लोग पागल नहीं समझेंगे ? तब आप नहीं सोचते कभी कि लोग पागल समझेंगे कि नहीं समझेंगे । क्योंकि आप पागल होते ही हैं । लेकिन अगर यह ध्यान का प्रयोग चला । तो आपके 24 घंटे के जीवन में रूपांतरण हो जाएगा । आपका व्यवहार बदलेगा । ज्यादा शांत होंगे । ज्यादा मौन होंगे । ज्यादा प्रेम पूर्ण । ज्यादा करुणा पूर्ण होंगे । वह भी लोगों को दिखाई पड़ेगा । इसलिए घबड़ाएं न । 4 दिन उन्हें पागल समझने दें । 4 दिन के बाद । 8 दिन के बाद । 15 दिन के बाद । आपसे पूछने वाले हैं वही लोग कि - यह आपको जो फर्क हो रहा है । क्या हमें भी हो सकता है ? घबड़ा गए पब्लिक ओपिनियन से । लोग क्या कहते हैं ? तब तो बहुत गहरे नहीं जाया जा सकता । हिम्मत करें । और लोग पागल समझते हैं । या बुद्धिमान समझते हैं । इससे कितना अंतर पड़ता है ? असली सवाल यह है कि - आप पागल हैं । या नहीं ? असली सवाल यह नहीं है कि - लोग क्या समझते हैं । अपनी तरफ ध्यान दें कि आपकी क्या हालत है । वह हालत पागल की है । या नहीं है ? उस हालत को छिपाने से कुछ न होगा । उस हालत को मिटाने की जरूरत है । फिर यह जो रोना चीखना, हंसना, नाचना है । यह धीरे धीरे शांत होता जाएगा । जैसे जैसे पागलपन बाहर फिंक जाएगा । वैसे वैसे शांत हो जाएगा । 3 सप्ताह से लेकर 3 महीना - कम से कम । 3 सप्ताह, ज्यादा से ज्यादा 3 महीना चल सकता है । जितनी तीव्रता से निकालिएगा । उतनी जल्दी चुक जाएगा । प्रत्येक व्यक्ति को थोड़ा अलग अलग समय लगेगा । क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति के संगृहीत पागलपन की मात्रा अलग अलग है । लेकिन जितनी जोर से उलीच देंगे । उतनी जल्दी फिंक जाएगा बाहर । और आप शांत हो जाएंगे । जैसे जैसे शांत होने लगेंगे । आप चाहेंगे भी । तो चीख न सकेंगे । नाच न सकेंगे । रो न सकेंगे । हंस न सकेंगे । मात्र चाहने से कुछ हो नहीं सकता । भीतर चीज चाहिए निकलने को । और जैसे जैसे गहराई बढ़ेगी । वैसे वैसे पहला स्टेप रह जाएगा । और चौथा स्टेप रह जाएगा । दूसरा पहले गिर जाएगा । फिर धीरे धीरे पूछने का भी मन नहीं होगा । पूछना भी बाधा मालूम पड़ेगी कि - मैं कौन हूं । तीसरा स्टेप भी गिर जाएगा । बाद में पहला स्टेप भी मिनट 2 मिनट का रह जाएगा । श्वास ली नहीं कि आप सीधे चौथे स्टेप में चले जाएंगे । अंततः जितनी गहराई पूरी हो जाएगी । उतना 2 मिनट के लिए पहला स्टेप रह जाएगा । और सीधा चौथा स्टेप आ जाएगा । पूरे 40-50 मिनट आप चौथी अवस्था में ही रह पाएंगे । लेकिन आप अपनी तरफ से अगर चौथी अवस्था लाने की कोशिश किए । तो वह कभी नहीं आएगी । इन 2 और तीसरे स्टेप से गुजरना ही पड़ेगा । इनके गिर जाने पर वह अपने से आ जाती है ।
ஜ۩۞۩ஜ ॐॐॐ आत्मा ॐॐॐ ஜ۩۞۩ஜ 
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ऐसे हंसो कि तुम्हारा पूरा जीवन 1 हंसी बन जाये । इस भांति जियो कि पूरा जीवन 1 मुस्कुराहट बन जाये । इस भांति जियो कि आसपास के लोगों की जिंदगी में मुस्कुराहट फैल जाये । इस भांति जियो कि सारी जिंदगी 1 हंसी के खिलते हुए फूलों की कतार हो जाये । ओशो
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मैंने 3 फकीरों के बारे में सुना है । उनके नाम का कोई उल्लेख नहीं । क्योंकि उन्होंने कभी किसी को अपना नाम नहीं बताया । उन्होंने कभी किसी बात का जवाब नहीं दिया । इसलिए चीन में उन्हें बस " 3 हंसते फकीरों " के नाम से ही जाना जाता है । वे 1 ही काम करते थे । वे किसी गांव में प्रवेश करते । बाजार में खड़े हो जाते । और हंसना शुरु कर देते । अचानक लोग सजग हो जाते । और वे अपने पूरे प्राणों से हंसते । फिर दूसरे लोग प्रभावित हो जाते । और 1 भीड़ जमा हो जाती । और उनको देखने भर से ही पूरी भीड़ भी हंसने लगती । यह क्या हो रहा है ? फिर पूरा शहर सम्मिलित हो जाता । और वे फकीर किसी दूसरे शहर को चल देते । उन्हें बहुत प्रेम किया जाता था । उनका यही एकमात्र उपदेश था । यही 1 संदेश था कि - हंसों । और वे कुछ सिखाते नहीं थे । बस परिस्थिति पैदा कर देते थे । फिर ऐसा हुआ कि वे देश भर में प्रसिद्ध हो गए - 3 हंसते फकीर । पूरा चीन उनको प्रेम करता था । उनका सम्मान करता था । किसी ने भी इस तरह से शिक्षा नहीं दी कि - जीवन 1 हंसी होना चाहिए । और अन्यथा कुछ भी नहीं । और वे किसी व्यक्ति विशेष पर नहीं हंस रहे थे । लेकिन बस हंस रहे थे । जैसे कि वे ब्रह्मंडीय मजाक को समझा गये हों । 1 शब्द भी बिना बोले । उन्होंने पूरे चीन भर में बहुत आनंद फैलाया । लोग उनके नाम पूछते । लेकिन वे बस हंस देते । तो यही उनका नाम हो गया - 3 हंसते फकीर । फिर वे वृद्ध हुए । और किसी गांव में, उनमें से 1 फकीर मर गया । पूरा गांव अपेक्षा करता था । बहुत अपेक्षा से भर गया था । क्योंकि अब तो कम से कम उन्हें रोना ही चाहिए । जबकि उनमें से 1 फकीर मर गया है । यह देखने जैसा होगा । क्योंकि इन लोगों के रोने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था । पूरा गांव जमा हो गया । 2 फकीर तीसरे फकीर की लाश के पास खड़े थे । और दिल खोलकर हंस रहे थे । तो गांव वालों ने पूछा - कम से कम यह तो समझाएं । तो पहली बार वे बोले । और उन्होंने कहा - हम इसलिए हंस रहे हैं कि - यह आदमी जीत गया । हम हमेशा ही सोचते थे कि कौन पहले मरेगा । और इस आदमी ने हमें हरा दिया । हम अपनी पराजय पर और उसकी जीत पर हंस रहे हैं । और फिर वह इतने वर्ष हमारे साथ रहा । और हम 1 साथ हंसे । और हमने एक दूसरे के साथ का । मौजूदगी का । आनंद लिया । उसे अंतिम विदा देने का कोई और उपाय नहीं हो सकता । हम हंस भर सकते है । पूरा गांव दुखी था । लेकिन जब मृत फकीर की देह को चिता पर रखा गया । तो पूरे गांव को पता चला कि यही दोनों नहीं हंस रहे थे । तीसरा । जो मर गया था । वह हंस रहा था । क्योंकि वह तीसरा व्यक्ति जो मर गया था । उसने अपने साथियों को कहा था - मेरे कपड़े मत बदलना । ऐसा रिवाज था कि जब कोई व्यक्ति मर जाता । तो वे उसके कपड़े बदलते । और उसके शरीर को नहलाते । तो उसने कह रखा था - मुझे नहलाना मत । क्योंकि मैं कभी भी गंदा नहीं रहा । मेरे जीवन में इतनी हंसी थी कि कोई भी अशुद्धता मेरे पास जमा नहीं हो सकती । मेरे पास भी नहीं फटक सकती । मैंने कोई धूल इकट्ठी नहीं की । हंसी सदा ही युवा ताजी होती है । तो मुझे नहलाना मत । और न ही मेरे कपड़े बदलना । तो बस उसे सम्मान प्रकट करने के लिए । उन्होंने उसके कपड़े नहीं बदले । और जब शरीर को चिता पर रखा गया । तो अचानक उन्हें पता चला कि - उसने अपने कपड़ो के नीचे बहुत सी चीजें छिपा ली थीं । और वे सभी चीजें शुरू हो गई - चीनी आतिशबाजी । तो पूरा गांव हंसा । और वे 2 फकीर बोले - बदमाश । तू मर गया । लेकिन तूने दोबारा हमें हरा दिया । तेरी हंसी ही अंतिम रही । जब इस ब्रह्यांड का पूरा मजाक समझ लिया जाता है । तो 1 ब्रह्यांडीय हंसी उठती है । वह उच्चतम है । केवल कोई बुद्ध ही उस भांति हंस सकता है । वे 3 फकीर निश्चित ही बुद्ध रहे होंगे । ओशो
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