04 मार्च 2017

पवित्र नगर

मैं अपने यौवनकाल में सुना करता था कि एक ऐसा शहर है जिसके निवासी ईश्वरीय पुस्तकों के अनुसार धार्मिक जीवन व्यतीत करते हैं । 
मैंने कहा - मैं इस शहर की जरूर खोज करूँगा और उससे कल्याण साधन करूँगा ।
यह शहर बहुत दूर था । मैंने अपने सफ़र के लिये बहुत सा सामान जमा किया । चालीस दिन के बाद उस शहर को देख लिया और इकतालीसवें दिन उस शहर में दाखिल हुआ ।
मुझे यह देखकर बङा आश्चर्य हुआ कि नगर के सभी निवासियों के केवल एक हाथ और एक आँख थी । 
मैंने यह भी अनुभव किया कि वे स्वयं भी आश्चर्य में डूबे हुये हैं । मेरे दो हाथों और दो आँखों ने उन्हें आश्चर्य में डाल दिया था ।
इसलिये जब वे मेरे सम्बन्ध में आपस में बातचीत कर रहे थे ।
तो मैंने एक से पूछा - क्या यह वही पवित्र नगर है जिसका प्रत्येक निवासी धार्मिक जीवन व्यतीत करता है ।
उन्होंने उत्तर दिया - हाँ यह वही नगर है ।
मैंने पूछा - तुम्हारी यह दशा क्यों कर हुयी । तुम्हारी दाहिनी आँख और दाहिने हाथ क्या हुये ?
वह मेरी बात से बहुत प्रभावित हुआ और बोला - आओ और देखो ।
वे मुझे एक देवालय में ले गये जो शहर के बीच में स्थित था ।
मैंने उस देवालय के चौक में हाथों और आँखों का एक बङा ढेर लगा देखा । वे सब सङ गल रहे थे ।
यह देखकर मैंने कहा - अफ़सोस ! किसी निर्दयी विजेता ने तुम्हारे साथ यह अत्याचार किया है ।
इतना सुनकर उन्होंने आपस में धीरे धीरे बातचीत करनी शुरू की और एक वृद्ध आदमी ने आगे बढ़कर मुझसे कहा - यह हमारा ही काम है, किसी विजेता ने हमारे आँख और हाथ नहीं काटे । ईश्वर ने हमें अपनी बुराईयों पर विजय प्रदान की है ।
यह कहकर वह मुझे एक ऊँचे स्थान पर ले गया । बाकी सब लोग हमारे पीछे थे । 
वहाँ पहुँचकर मन्दिर के ऊपर एक लेख दिखाया ।
जिसके शब्द थे -
‘यदि तुम्हारी दाहिनी आँख तुम्हें ठोकर खिलाये तो उसे बाहर निकाल फ़ेंको, क्योंकि सारे शरीर के नरक में पङे रहने की अपेक्षा एक अंग का नष्ट होना अच्छा है । और यदि तुम्हारा दाहिना हाथ तुम्हें बुराई करने के लिये विवश करे तो उसे भी काटकर फ़ेंक दो । ताकि तुम्हारा केवल एक अंग नष्ट हो जाये और सारा शरीर नर्क में न पङने पाये ।’
यह लेख पढ़कर मुझे सारा रहस्य मालूम हो गया । 
मैंने मुँह फ़ेर कर सब लोगों को सम्बोधित किया - क्या तुम में कोई स्त्री पुरुष ऐसा नहीं, जिसके दो हाथ और दो आँखें हों ?
सबने उत्तर दिया - नहीं कोई नहीं, यहाँ बालकों के, जो कम उम्र होने के कारण इस लेख को पढ़ने और इसकी आज्ञाओं के अनुसार कार्य करने में असमर्थ हैं, वही बचे हैं । कोई मनुष्य नहीं ।
जब हम देवालय से बाहर आये तो मैं तुरन्त इस ‘पवित्र नगर’ से भाग निकला, क्योंकि मैं बच्चा नहीं था और उस शिलालेख को अच्छी तरह पढ़ सकता था ।
~ खलील जिब्रान  
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