16 मार्च 2017

प्राप्तव्यमर्थं

किसी नगर में सागरदत्त नामक वणिक रहता था । उसके पुत्र ने सौ रुपये में एक पुस्तक खरीदी । जिसमें सिर्फ़ इतना ही लिखा था ।
प्राप्तव्यमर्थं लभते मनुष्यो, देवोऽपि तं लंघयुतिं न शक्तः ।
तस्मान्न शोचामि न विस्मयो मे, यदस्मदीयं न हि तत्परेषाम ।
प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही मनुष्य लेता है । उसको देव भी उलंघन करने में समर्थ नहीं है । इस कारण न मैं शोच करता हूँ न मुझको विस्मय है । जो हमारा है वह दूसरों का नही ।
यह देख सागरदत्त ने पूछा - पुत्र, कितने मूल्य में यह पुस्तक खरीदी ?
वह बोला - सौ रुपये में ।
सागरदत्त बोला - धिक, मूर्ख ! जो तूने लिखे हुये एक श्लोक को सौ रुपये में खरीदा । इस बुद्धि से किस प्रकार धन उपार्जन करेगा । सो आज से तुम हमारे घर में प्रवेश न करना ।
इस प्रकार घर से घुङक कर निकाल दिया । वह उससे दुःखी हो दूर देशान्तर स्थित हुआ ।
तब कुछ दिनों बाद वहाँ के निवासियों ने पूछा - आप कहाँ से आये हो, क्या नाम है ?
वह बोला - मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को प्राप्त होता है इत्यादि ।
फ़िर किसी अन्य के भी परिचय आदि पूछने पर उसने यही कहा ।
तब नगर में उसका नाम ‘प्राप्तव्यमर्थं’ हुआ । 

उस नगर की रूप यौवन सम्पन्न चन्द्रवती नाम की राज्यकन्या एक बार अपनी सखी के साथ एक महोत्सव देखने आयी और वहाँ किसी रूप सम्पन्न मनोहर राजपुत्र को देखकर कुसुम बाण से हत मोहित हो गयी ।
और उसने अपनी सखी से कहा - सखि ! जिस प्रकार इससे समागम हो, तुम अवश्य ही वह यत्न करो ।
यह सुन सखी उस राजपुत्र के पास जाकर बोली - मुझे चन्द्रवती ने तुम्हारे पास भेजा है और उसने तुमसे कहा है कि तुम्हारे दर्शन से ही कामदेव ने मेरी मृत्युदशा कर दी । सो यदि शीघ्र हमारे निकट न आओगे तो मैं मरण की शरण लूँगी ।
यह सुनकर उसने कहा - यदि अवश्य में वहाँ आऊँ तो किस उपाय से आऊँ ?
सखी बोली - रात्रि में महल पर से लम्बायमान कठिन रस्सी के सहारे चढ़ आना ।
वह बोला - जो तुम्हारा यह निश्चय है तो मैं यही करूँगा ।
रात होने पर वह राजपुत्र विचारने लगा - अहो ! यह बङा कुकर्म है ।
- गुरुकन्या, मित्र की भार्या, स्वामी सेवक की स्त्री इनसे जो पुरुष गमन करता है । वह ब्रह्मघाती होता है ।
- जिससे अयश हो, जिस कर्म से दुर्गति हो, जिस कर्म से स्वर्ग से भ्रष्ट हो । वह कर्म न करे ।
ऐसा विचार कर उसके पास न गया ।
उसी समय घूमता हुआ प्राप्तव्यमर्थं वहाँ श्वेत घर के निकट लम्बायमान रस्सी को देख कर कौतुक ह्रदय से उसको पकङकर (ऊपर) गया ।
उस राजपुत्री ने ‘ये वही है’ ऐसा जानकर सन्तुष्ट चित्त से स्नान, भोजन, पानाच्छादनादि से सन्मान किया ।
फ़िर उसके संग शय्या में सोती हुयी उसके अंग स्पर्श से प्राप्त हुये हर्ष से रोमांचित शरीर हो उसने कहा - तुम्हारे दर्शन मात्र से अनुरक्त हुयी मैंने अपना आत्मा तुमको दिया । तुमको छोङकर मेरा स्वामी स्वपन में भी और न होगा । सो मेरे साथ आलाप क्यों नही करते ।
वह बोला - मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही प्राप्त होता है ।
उसके ऐसा कहने पर ‘यह (कोई) और है’ ऐसा विचार कर उसने अपने धवल गृह से उतार कर छोङ दिया । तब वह किसी टूटे हुये देवमन्दिर में जाकर सो गया ।
वहाँ किसी कुलटा का संकेत किया हुआ नगर रक्षक आया । प्राप्तव्यमर्थं को सोया हुआ देखकर उसने अपना भेद छिपाने हेतु पूछा - आप कौन हैं ?
वह बोला -  मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही प्राप्त होता है ।
यह सुनकर वह दण्डपाशक बोला - यह देवगृह शून्य है सो मेरे स्थान में जाकर सो रह ।
‘बहुत अच्छा’ ऐसा कह बुद्धि की विपरीतता से अन्य स्थान में सो गया ।
उस रक्षक की नियमवती नाम वाली कन्या किसी पुरुष में अनुरक्त हुयी उसे संकेत कर उसी स्थान में सोयी हुयी थी ।
तब प्राप्तव्यमर्थं को आया देखकर ‘यही मेरा प्रिय है’ ऐसा रात्रि के घने अन्धकार से मोहित हुयी उठकर भोजन आदि क्रिया करा कर गान्धर्व रीति से अपना विवाह कर उसके संग शयन में स्थित हुयी खिले मुखकमल से बोली - अब भी क्यों निडर होकर मुझसे नही बोलते हो ?
वह बोला - मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही प्राप्त होता है ।
यह सुनकर उस (नियमवती) ने विचार किया - बिना विचारे जो कार्य किया जाता है, उसका ऐसा ही फ़ल होता है ।
फ़िर इस विचार से दुःखी हो उसने प्राप्तव्यमर्थं को निकाल दिया ।
तब प्राप्तव्यमर्थं को मार्ग में जाते हुये वरकीर्ति नाम का वर (किसी) और देश का रहने वाला गाजे-बाजे के साथ बारात ले जा रहा था, मिला । प्राप्तव्यमर्थं बारात के साथ चलने लगा ।
लेकिन जब तक लग्न समय आता, उससे पहले ही राजमार्ग में स्थिति (उस) श्रेष्ठी के गृह द्वार में, जहाँ कि मंगल वेश किये रत्न मण्डप की वेदी में विवाह के निमित्त वह वणिक पुत्री स्थित थी ।
एक मदमत्त बिगङा हाथी अपने आरोहक को मार कर जनसमूह के कोलाहल के साथ लोगों को रौंदता हुआ वहाँ आया । सारे बाराती और दूल्हा डरकर भाग गये । 
उसी समय भय से चंचल नेत्र वाली उस अकेली रह गयी दुल्हन कन्या को देखकर ‘डरो मत, मैं रक्षक हूँ’ ऐसा कहकर उसका दक्षिण (सीधा) हाथ पकङ कर प्राप्तव्यमर्थं ने साहस के साथ हाथी को कठोर वाक्यों से घुङक कर उसे बचाया ।
तब दैवयोग से हाथी के हट जाने पर, सुह्रद बान्धव के साथ लग्न समय बीत जाने पर, वरकीर्ति ने वहाँ आने पर उस कन्या को अन्य के साथ देख कर कन्या के पिता से कहा - श्वसुर ! यह आपने विरुद्ध किया । जो (पहले) मुझको देकर के कन्या और को दी ।
वह बोला - मैं भी हाथी के डर से भागा हुआ आपके साथ ही आया हूँ । यह न जाने क्या हुआ ।
फ़िर वह अपनी पुत्री से बोला - वत्से ! तूने यह अच्छा न किया । सो कह, यह क्या वृतान्त है ।
वह बोली - इसने मेरी प्राण संकट से रक्षा की, सो इसको छोङकर मुझ जीती हुयी का हाथ कोई ग्रहण नही करेगा ।
इसी बात में रात बीत गयी ।
तब प्रातःकाल होने पर महाजनों के समूह में इस वार्ता का व्यतिकर सुनकर वह राजदुहिता (चन्द्रवती) उस स्थान पर आयी ।
कर्ण परंपरा से सुनकर दण्डपाश की कन्या भी उस स्थान पर आ गयी ।
तब उस महाजन के समूह को सुनकर राजा भी वहाँ आ गया ।
और प्राप्तव्यमर्थं से बोला - निडर होकर कहो, ये सब क्या वृतान्त है ।
वह बोला - मनुष्य प्राप्त होने योग्य अर्थ को ही प्राप्त होता है ।
राजकन्या बोली - देव भी उसको लंघन करने में समर्थ नही ।
दण्डपाशक की सुता बोली - इस कारण न मैं कुछ शोचती हूँ न मुझे कुछ विस्मय है ।
इस अखिल लोक के वृतान्त को सुन कर (फ़िर) वणिकसुता भी बोली - जो हमारा है सो दूसरे का नही ।
तब राजा ने उनको अभयदान देकर सबसे प्रथक प्रथक वृतान्त पूछा और सब वृतान्त जानकर प्राप्तव्यमर्थं को बहुत मान के साथ सम्पूर्ण अलंकार, परिवार सहित अपनी कन्या देते हुये ‘तू मेरा पुत्र है’ ऐसी घोषणा के साथ उसको युवराज अभिषिक्त कर दिया ।
दण्डपाशक ने भी निजशक्ति अनुसार वस्त्रपानादि आदि से सत्कृत कर अपनी कन्या प्राप्तव्यमर्थं को अर्पित कर दी ।
तब प्राप्तव्यमर्थं ने अपने माता पिता को कुटुम्ब सहित उस नगर में सम्मानपूर्वक बुलाया और अपने गोत्रों के साथ अनेक भोग भोगता हुआ सुख से रहा ।  
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