07 मार्च 2017

मैं शैतान हूँ ! (2)

और ला-विस इसी प्रकार की बातें करता रहा और अपने भाषण में उसने स्वयं अपने द्वारा ही रचित अनेक ऐसे गुप्त शब्दों का प्रयोग किया, जो उन लोगों ने कभी न सुने थे ।
इस धूर्तता के बाद, जब चन्द्रमा अपनी पूर्ण उज्जवलता में परिणित हो गया तो ला-विस ने पहले से भी अधिक अपनी आवाज को ऊँचा किया और प्रभावशाली स्वर में बोला - अब ऊपर उठो और देखो कि रात्रिदेव ने अपने दुष्ट शत्रु पर विजय पा ली है । सितारों के बीच वह फ़िर अपनी यात्रा पर अग्रसर हुआ है । तुम्हें यह जानना चाहिये कि अपनी प्रार्थनाओं द्वारा तुमने उसे अंधकार के दैत्य को जीतने में सहायता दी है । वह अब बहुत प्रसन्न है और सदैव से अधिक प्रसन्न है ।
सभी लोग उठ खङे हुये और चन्द्रमा को देखने लगे, जो फ़िर पूर्ण रूप से प्रकाशित था । उनका भय समाप्त हो गया और उनकी व्याकुलता आनन्द में परिवर्तित हो गयी । वे नाचने गाने लगे और अपनी भारी छङी से लोहे की चादरों पर आघात करने लगे । इस प्रकार उपत्यकायें शोर से भर उठीं ।
उस रात को गिरोह के सरदार ने ला-विस को निमन्त्रित किया और कहा - तुमने ऐसा कार्य किया है, जिसे आज तक कोई नही कर पाया । तुमने एक गुप्त भेद की जानकारी का दर्शन किया है, जिसे हममें से कोई भी समझ पाने में असमर्थ है ।
जैसी कि मेरी प्रजा चाहती है, आज से तुम सारे गिरोह में, मेरे बाद, सबसे उच्च पदाधिकारी होगे । मैं सबसे अधिक बलबान हूँ और तुम सबमें बुद्धिमान तथा बहुत ही शिक्षित पुरुष हो । तुम हमारे और देवताओं के बीच मध्यस्थ हो । उन देवों की इच्छाओं और उनके कार्यों की व्याख्या तुम्हें करनी होगी और तुम हम लोगों को ऐसी बातें सिखाओगे, जो उनकी शुभकामनाओं तथा स्नेह पाने के लिये आवश्यक हैं ।
और ला-विस ने चतुराई से विश्वास दिलाया - मनुष्य का ईश्वर, जो कुछ भी मेरे दिव्य सपनों के माध्यम से मुझसे कहेगा । वह सभी जाग्रत अवस्था में तुम्हें बता दिया जायेगा और तुम विश्वास करो कि मैं तुम्हारे और ईश्वर के बीच में प्रत्यक्ष रूप से कार्य करूँगा ।
सरदार को विश्वास हुआ और ला-विस को दो घोङे, सात गायें, सत्तर भेङें और सत्तर मेमने भेंट किये गये । फ़िर वह ला-विस से इस प्रकार बोला - गिरोह के आदमी तुम्हारे लिये एक मजबूत मकान बना देंगे और हर फ़सल के समय अन्न का एक भाग तुम्हें भेंट किया करेंगे, जिससे कि तुम सम्मानित और माननीय गुरु की भांति रह सको ।
ला-विस खङा हो गया और जाने को तैयार ही था कि सरदार ने रोक लिया और कहा - वह कौन है और कहाँ है, जिसे तुम मनुष्य का ईश्वर कहते हो । और यह साहसी देव कौन है जो कि उज्जवल रात्रि के देवता से युद्ध करता है ? पहले तो कभी हमने उसके बारे में नहीं सुना था ।
ला-विस ने अपने माथे को खुजाया और उत्तर दिया - मेरे माननीय सरदार ! प्राचीन समय में, मनुष्य के जन्म से पहले सभी देवता एक साथ शान्तिपूर्वक सितारों की विस्तीर्णता के पीछे ऊपर के संसार में वास करते थे । देवताओं के देवता प्रभु उनके पिता थे । प्रभु उन बातों को जानते थे । जिसे देवता नही जानते थे । प्रभु ऐसे कार्य करते थे, जो देवता लोग करने में असमर्थ थे । उन्होंने ऐसे दिव्य रहस्य, जो नित्य विधान के बाहर के थे, केवल अपने पास तक सीमित रखे थे ।
बारहवें युग के सातवें वर्ष में (अरब का वह देवता, जो बाद में शैतान बना) ‘बाहतार’ की आत्मा ने जो महान ईश्वर से घृणा करता था, विद्रोह कर दिया । 
और अपने पिता के सम्मुख खङे होकर बोला - सभी जीवधारियों पर आप स्वयं अपनी ही महान सत्ता का अधिकार क्यों जमाये रखते हैं और हमसे सृष्टि के विधान को क्यों छिपाये हुये हैं ? क्या हम आपके वे बच्चे नहीं, जो केवल आपमें ही विश्वास रखते हैं और आपके अनन्त ज्ञान और महान सत्ता के भागीदार हैं ?
देवताओं के देवता इस पर क्रुद्ध हो गये और बोले - प्रारम्भिक अधिकार और महान सत्ता तथा आवश्यक रहस्य तो मैं अपने पास सुरक्षित रखूँगा ही, क्योंकि मैं ही आदि और मैं ही अन्त हूँ ।
तब बाहतार बोला - जब तक आप मुझे अपनी सत्ता और अधिकार में भागीदार नहीं बनायेंगे, मैं मेरे बच्चे और मेरे बच्चों के बच्चे आपके विरुद्ध विद्रोह करेंगे ।
तब देवताओं के देवता अनन्त आकाश में अपने सिंहासन पर खङे हो गये और उन्होंने म्यान में से अपनी तलवार निकाल ली तथा सूर्य को ढाल के रूप में हाथ में थाम लिया ।
एक ऐसी आवाज जिसने सृष्टि के समस्त कोनों को हिला दिया, वह बोले - नीच गिर, दुष्ट, विद्रोही, उस नीचे के शोकयुक्त संसार में, जहाँ अन्धकार और दुर्भाग्य का राज्य है । वहाँ तू अकेला रहेगा और निरुद्देश्य घूमता रहेगा, जब तक सूर्य राख के ढेर में, और सितारे छितरी हुयी किरणों में परिवर्तित न हो जायेंगे ।
उसी क्षण बाहतार ऊपरी संसार से गिरकर नीचे की दुनियां में जा पङा, जहाँ कि समस्त अधर्मी आत्मायें लङती-झगङती रहती हैं ।
तब बाहतार ने जीवन के रहस्यों की शपथ ली कि वह अपने पिता और भाईयों से युद्ध करेगा और प्रत्येक आत्मा को, जो उससे प्रेम करेगी, अपने फ़न्दे में फ़ँसायेगा ।
जैसे ही सरदार ने यह सुना उसके माथे पर सिलवट पङ गयी और उसका चेहरा भय से पीला पङ गया ।  
उसने कठिनाई से पूछा - तो पापी देवता का नाम बाहतार है ।
ला-विस ने उत्तर दिया - हाँ उसका नाम बाहतार था । पहले वह ऊपर के संसार में था । किन्तु जब वह नीचे की दुनियां में आ गया तो उसने बङी सफ़लता से अपने भिन्न-भिन्न नाम रखे..बालजाबूल, शैतानेल, बलिआल, जमील, आहरीमान, मारा, अबदौन, डेविल और अन्त में शैतान, जो कि विख्यात है ।
सरदार ने ‘शैतान’ शब्द को कंपित स्वर में कई बार दोहराया । उसके मुख से एक ऐसी आवाज निकल रही थी, जो तेज हवा के चलने पर सूखी पत्तियों की खङखङाहट से उत्पन्न होती है ।
तब उसने कहा - शैतान आदमी से भी उतनी ही घृणा क्यों करता है जितनी कि ईश्वर से ?
ला-विस ने शीघ्रता से उत्तर दिया - वह मनुष्य से इसलिये घृणा करता है क्योंकि वे भी शैतान के भाई बहनों की सन्तान ही हैं ।
सरदार ने प्रश्न किया - तब शैतान मनुष्य का चाचा है ?
ला-विस बोला - हाँ माननीय सरदार ! किन्तु वह उनका सबसे बङा शत्रु है, जो उनके दिनों में दुःख एवं रात्रियों को भयानक स्वपनों से भर देता है । यह वह शक्ति है, जो कि तूफ़ान को उन मनुष्यों के घरों की ओर भेजती है और उनके खेतों पर दुर्भिक्ष लाती है तथा उनको और उनके जानवरों को रोग-ग्रस्त बनाती है । वह एक अधर्मी किन्तु शक्तिशाली देव है । वह बङा ही दुष्ट है । जब हम दुःखी होते हैं वह हँसता है और जब हम प्रसन्न होते हैं वह दुःख मनाता है । तुम सबको मेरी योग्यता की सहायता से उसकी ठीक से जाँच पङताल करनी चाहिये ताकि तुम लोग उसके जाल में न फ़ँस पाओ और उसके दुष्ट कर्मों से दूर रह सको ।
सरदार ने अपना सिर मोटी छङी पर झुका दिया और फ़ुसफ़ुसाया - उस अदभुत शक्ति का रहस्य आज मुझे ज्ञात हुआ है, जो तूफ़ान को हमारे घरों की ओर भेजती है तथा हम पर और हमारे जानवरों पर महामारी फ़ैलाती है । सब लोगों को यह समझ लेना चाहिये, जो मैं अब समझा हूँ, और हमें ला-विस को धन्यवाद देना चाहिये तथा उसका आदर सत्कार करना चाहिये । क्योंकि उसने हमारे सबसे बङे शत्रु के गुप्त रहस्यों को हम पर प्रकट किया है और इस प्रकार हमें अधर्म की राह पर चलने से बचाया है ।
और ला-विस गिरोह के सरदार को वही छोङकर अपने झोपङे में चला गया । उसे अपनी समझ-बूझ पर गर्व था और खुशी की तरंग में वह झूम रहा था ।
प्रथम बार उस दिन ला-विस के सिवा सरदार और उस गिरोह ने वह रात विकराल देवों से घिरे अपनी शय्याओं पर, भयानक दृश्यों और व्याकुल कर देने वाले सपनों को देख-देखकर ऊँघते हुये काटी ।
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थोङी देर के लिये शैतान चुप हो गया तब फ़ादर इस्मान ने व्यग्र भाव से उसकी ओर देखा । फ़ादर के होठों पर मौत जैसी रूखी मुस्कान फ़ैल गयी थी ।
शैतान फ़िर बोला - इस तरह प्रथ्वी पर भविष्यवाणी का जन्म हुआ । अतएव मेरा अस्तित्व ही उसके जन्म का कारण बना ।
ला-विस प्रथम मनुष्य था, जिसने मेरी पैशाचिकता को अपना व्यवसाय बनाया । ला-विस की मृत्यु के उपरान्त यह वृत्ति उसके बच्चों ने अपनाई और इस व्यवसाय की वृद्धि निरन्तर होती गयी । यहाँ तक कि ये एक पूर्ण और पवित्र धन्धा बन गया और उन लोगों ने इसे अपनाया, जिनके मस्तिष्क ज्ञान के भंडार हैं तथा जिनकी आत्मायें श्रेष्ठ, ह्रदय स्वच्छ और कल्पनाशक्ति अनन्त है ।
बेबीलोन (बाबुल) में एक पुजारी की पूजा लोग सात बार झुककर करते हैं, जो मेरे साथ अपने भजनों द्वारा युद्ध ठाने हुये है ।
नाइनेवेह (नेनवा) में वे एक मनुष्य को, जिसका कहना है कि उसने मेरे आन्तरिक रहस्यों को जान लिया है, ईश्वर और मेरे बीच की एक सुनहरी कङी मानते हैं ।
तिब्बत में वे एक मनुष्य को, जो मेरे साथ एक बार अपनी शक्ति आजमा चुका है, सूर्य और चन्द्रमा के पुत्र के नाम से पुकारते हैं ।
बाइबल्स में इफ़ेसस और ऐटियोक ने अपने बच्चों का जीवन मेरे विरोधी पर बलिदान कर दिया ।
और यरुशलम तथा रोम में लोगों ने अपने जीवन को उनके हाथों सौंप दिया, जो मुझसे घृणा करते हैं और अपनी सम्पूर्ण शक्ति द्वारा मुझसे युद्ध में लगे हुये हैं ।
सूर्य के साये के नीचे प्रत्येक नगर में मेरा नाम धार्मिक शिक्षा, कला और दर्शन का केन्द्र है । यदि मैं न होता तो मन्दिर न बनाये जाते । मीनारों और विशाल धार्मिक भवनों का निर्माण न हुआ होता । 
मैं वह साहस हूँ, जो मनुष्य में दृढ़ निष्ठा पैदा करता है ।
मैं वह स्रोत हूँ, जो भावनाओं की अपूर्वता को उकसाता है ।
मैं एक ऐसा हाथ हूँ, जो आदमी के हाथों में गति लाता है ।
मैं शैतान हूँ । अजर-अमर शैतान हूँ । जिसके साथ लोग इसलिये युद्ध करते हैं कि जीवित रह सकें । 
यदि वे युद्ध करना बन्द कर दें तो आलस्य उनके मस्तिष्क, ह्रदय और आत्मा के स्पन्दन को बन्द कर देगा और इस प्रकार उनकी अत्यधिक शक्ति के बीच अदभुत असुविधायें आ खङी होंगी ।  
मैं एक मूक और क्रुद्ध तूफ़ान हूँ, जो पुरुष के मस्तिष्क और नारी के ह्रदय को झकझोर डालता है । मुझसे भयभीत होकर वे मुझे दण्ड दिलाने हेतु मन्दिरों एवं धर्म-मठों को भागे जाते हैं अथवा मेरी प्रसन्नता के लिये बुरे स्थान में जाकर मेरी इच्छा के सम्मुख आत्म-समर्पण कर देते हैं ।
सन्यासी, जो रात की नीरवता में, मुझे अपनी शय्या से दूर रखने के लिये ईश्वर से प्रार्थना करता है, एक ऐसी वैश्या के समान है, जो मुझे अपने शयन-कक्ष में निमन्त्रित करती है ।
मैं शैतान हूँ अजर अमर !
भय की नीव पर खङे धर्म-मठों का मैं ही निर्माता हूँ । विषय-भोग तथा आनन्द की लालसा की नीव पर मैं ही मदिरालय और वैश्यालय का निर्माण करता हूँ ।
यदि मैं न रहूँ तो विश्व में भय और आनन्द का अन्त हो जायेगा और इनके लोप हो जाने से मनुष्य के ह्रदय में आशायें एवं आकांक्षायें भी न रहेंगी । तब जीवन नीरस, ठंडा और खोखला हो जायेगा । मानों टूटे हुये तारों का सितार हो ।
मैं अमर शैतान हूँ !
झूठ, अपयश, विश्वासघात, विडम्बना और वंचना के लिये मैं प्रोत्साहन हूँ । और इन तत्वों का यदि विश्व से बहिष्कार कर दिया जाये तो मानव समाज एक निर्जन क्षेत्र मात्र रह जायेगा । जिसमें धर्म के कांटों के अतिरिक्त कुछ न पनप सकेगा । 
मैं अमर शैतान हूँ !
मैं पाप का जन्मदाता हूँ और यदि पाप ही न रहेगा तो उसके साथ ही पाप से युद्ध करने वाले योद्धा अपने सम्पूर्ण गृह और परिवार सहित समाप्त हो जायेंगे ।
मैं पाप का ह्रदय हूँ, क्या तुम यह इच्छा कर सकोगे कि मेरे ह्रदय के स्पन्दन को थामकर तुम मनुष्य-मात्र की गति रोक दो ?
क्या तुम मूल को नष्ट कर उस परिणाम को स्वीकार कर पाओगे ? मैं ही तो मूल हूँ ।
क्या तुम अब भी मुझे इस निर्जन वन में मुझे इसी प्रकार मर जाने दोगे ? क्या तुम आज ही उस बन्धन को तोङ फ़ेंकना चाहते हो, जो मेरे और तुम्हारे बीच दृढ़ है, जबाब दो ऐ पुजारी !
यह कहकर शैतान ने बाँहें फ़ैला दी और सिर झुका लिया ।
तब वह जोर जोर से हाँफ़ने लगा । उसका चेहरा पीला पङ गया और वह मिस्र की उन मूर्तियों जैसा दीखने लगा, जो नील नदी के किनारे समय द्वारा ठुकराई पङी हैं ।
तब उसने अपनी बुझती आँखों को फ़ादर इस्मान के चेहरे पर गङा दिया ।
और लङखङाती आवाज में बोला - मैं थक गया हूँ और बहुत दुर्बल हो गया हूँ । अपनी मिटती आवाज में वे ही बातें बताकर, जिन्हें तुम स्वयं जानते हो, मैंने गलती की है । अब जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा कर सकते हो । तुम मुझे अपने घर ले जाकर मेरे घावों की चिकित्सा कर सकते हो अथवा मुझे मेरे हाल पर यहीं मरने को छोङ सकते हो ।  
फ़ादर इस्मान व्याकुल हो उठे और कांपते हुये अपने हाथों को मलने लगे ।
तब अपने स्वर में क्षमा-याचना भरकर वे बोले - एक घन्टा पूर्व, जो मैं नहीं जानता था, वह अब मुझे मालूम हुआ है । मेरी भूल को क्षमा करो । मैं अब जान गया हूँ कि तुम्हारा अस्तित्व संसार से प्रलोभन का जन्मदाता है और प्रलोभन ही एक ऐसी वस्तु है, जिसके द्वारा ईश्वर मनुष्यता का मोल आंकता है । यह एक माप-दण्ड है, जिससे सर्व-शक्तिमान ईश्वर आत्माओं को तौलता है ।
मुझे विश्वास हो गया है कि यदि तुम्हारी मृत्यु हो गयी तो प्रलोभन का भी अन्त हो जायेगा और इसके अन्त से मृत्यु उस आदर्श शक्ति को नष्ट कर देगी, जो मनुष्य को उन्नत एवं चौकस बनाती है ।
तुम्हें जीवित रहना होगा । यदि तुम मर गये और यह बात लोगों को ज्ञात हो गयी तो नरक के लिये उनके भय का अन्त हो जायेगा और वे पूजा अर्चना करना छोङ देंगे । क्योंकि पाप का तो अस्तित्व ही न रहेगा ।
तुम्हें अवश्य जीवित रहना होगा, क्योंकि तुम्हारे जीवन के ही अपराध और पाप में मनुष्य की मुक्ति का द्वार है ।
जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं, मनुष्यों के प्रति अपने प्रेम की स्मृति में, तुमसे जो घृणा करता हूँ, उसका त्याग करूँगा ।
इस पर शैतान ने एक विकट अट्टहास किया, जिसने प्रथ्वी को हिला दिया ।
और बोला - तुम कितने बुद्धिमान हो फ़ादर ! अध्यात्म-विद्या का कितना आश्चर्यमय ज्ञान तुम्हारे पास संचित है । अपने ज्ञान के द्वारा तुमने मेरे अस्तित्व का कारण ढ़ूँढ़ निकाला है, जिसे मैं स्वयं कभी न समझ पाया और अब हमें एक-दूसरे की आवश्यकता का ज्ञान हुआ है । 
मेरे भाई ! आओ मेरे निकट आओ । प्रथ्वी पर अंधकार फ़ैलता जा रहा है और मेरा आधा रक्त इस घाटी के उदर में समा चुका है, मानों अब मुझमें कुछ रहा ही नहीं । एक टूटे हुये शरीर के टुकङे भर हैं, जिन्हें यदि तुम्हारी सहायता प्राप्त न हुयी तो मृत्यु शीघ्र ही अपना कर ले जायेगी ।
फ़ादर इस्मान ने अपने कुरते की आस्तीनें ऊपर चढ़ा लीं और अपने घर की ओर चल पङे ।
उन घाटियों के बीच सन्नाटे में घिरे और घोर अन्धकार के आवरण से सुशोभित फ़ादर इस्मान अपने गांव की ओर चले जा रहे थे ।
उनकी कमर उनके ऊपर के बोझ से झुकी जा रही थी और उनकी काली पोशाक और लम्बी दाढ़ी पर से रक्त की धारा बह रही थी, किन्तु उनके कदम सतत आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके होठ मृतप्रायः शैतान के जीवन के लिये ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे । 
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