11 नवंबर 2012

तुम्हें तो 1400 साल से किसी अल्लाह का पता चला

चर्चामंच से सोमवारीय चर्चा में इस लेख का लिंक मिला ।
- हमें विस्तार से पता होना चाहिए कि AA इस्लाम के अनुसार मुसलमानों को गैर मुसलमानों के साथ कैसे संबंध रखने चाहिए और कैसे उनके साथ इस्लामी शरी'अत के अनुसार जीवन व्यतीत करना चाहिये ?
A सब तारीफें अल्लाह के ही लिए हैं ?
B पहली बात तो यह कि इस्लाम दया और न्याय का धर्म है ? इस्लाम के लिए इस्लाम के अलावा अगर कोई और शब्द इसकी पूरी व्याख्या कर सकता है । तो वह है - न्याय ?
मुसलमानों को आदेश है कि - C ग़ैर मुसलमानों को ज्ञान । सुंदर उपदेश । तथा बेहतर ढंग से वार्तालाप से बुलाओ ।  ईश्वर ? कुरआन में कहता है (अर्थ की व्याख्या)
29-46 D और किताब वालों से बस उत्तम रीति से वाद विवाद करो । रहे वे लोग जो उनमें ज़ालिम हैं । उनकी बात दूसरी है ? और कहो - E हम ईमान लाये उस चीज़ पर ? जो हमारी ओर  अवतरित हुई और तुम्हारी ओर भी अवतरित ? हुई ।
F और हमारा पूज्य और तुम्हारा पूज्य अकेला ही है और हम उसी के आज्ञाकारी हैं ?
9-6 और यदि मुशरिकों (G जो ईश्वर के साथ किसी और को भी ईश्वर अथवा शक्ति मानते हैं) में से कोई तुमसे शरण मांगे तो तुम उसे शरण दे दो । यहाँ तक कि वह अल्लाह की वाणी सुन ले । फिर उसे उसके सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दो ।
H क्यों वे ऐसे लोग हैं । जिन्हें ज्ञान नहीं है ?
इस्लाम यह अनुमति नहीं देता है कि 1 मुसलमान किसी भी परिस्थिति में किसी गैर मुस्लिम (जो इस्लाम के प्रति शत्रुता पूर्ण व्यवहार नहीं करता ?) के साथ बुरा व्यवहार करे ।
J इसलिए मुसलमानों को किसी ग़ैर मुस्लिम के खिलाफ आक्रमण की या डराने की या आतंकित करने या उसकी संपत्ति गबन करने की या उसे उसके सामान के अधिकार से वंचित करने की या उसके ऊपर अविश्वास करने की या उसे उसकी मजदूरी देने से इंकार करने की या उनके माल की कीमत अपने पास रोकने की (जबकि उनका माल खरीदा जाए) या अगर साझेदारी में व्यापार है । तो उसके मुनाफे को रोकने की अनुमति नहीं है ।
इस्लाम के अनुसार यह मुसलमानों पर अनिवार्य है । गैर मुस्लिम पार्टी के साथ किया करार या संधियों का सम्मान करें । 1 मुसलमान अगर किसी देश में जाने की अनुमति चाहने के लिए नियमों का पालन करने पर सहमत है (जैसा कि वीसा इत्यादि के समय) और उसने पालन करने का वादा कर लिया है । तब उसके लिए यह अनुमति नहीं है कि K उक्त देश में शरारत करे । किसी को धोखा दे । चोरी करे । किसी को जान से मार दे अथवा किसी भी तरह की विनाशकारी कार्रवाई करे । इस तरह के किसी भी कृत्य की अनुमति इस्लाम में बिलकुल नहीं है ।
अल शूरा 42-15 अर्थ की व्याख्या  - और मुझे तुम्हारे साथ न्याय का हुक्म है । L हमारे और आपके प्रभु ? 1 ही है । हमारे साथ हमारे कर्म हैं और आपके साथ आपके कर्म ।
इस्लाम यह अनुमति अवश्य देता है कि M अगर ग़ैर मुस्लिम मुसलमानों के खिलाफ युद्ध का एलान करें । उनको उनके घर से बेदखल कर दें अथवा इस तरह का कार्य करने वालों की मदद करें । तो ऐसी हालत में मुसलमानों को अनुमति है । ऐसा करने वालों के साथ युद्ध करे और उनकी संपत्ति जब्त करें ।
60-8 N अल्लाह तुम्हें इससे नहीं रोकता है कि तुम उन लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनके साथ न्याय करो । जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया और ना तुम्हें तुम्हारे अपने घर से निकाला । निस्संदेह अल्लाह न्याय करने वालों को पसंद करता है ?
60-9 अल्लाह तो तुम्हें केवल उन लोगों से मित्रता करने से रोकता है । O जिन्होंने धर्म के मामले में  तुमसे युद्ध किया और तुम्हें तुम्हारे अपने घरों से निकाला और तुम्हारे निकाले जाने के सम्बन्ध में सहायता की । जो लोग उनसे मित्रता करें । वही ज़ालिम हैं ।
क्या इस्लाम काफिरों का क़त्ल करने का हुक्म देता है ? कुछ लोग इस्लाम के बारे में भ्रांतिया फ़ैलाने के लिए कहते हैं कि इस्लाम में गैर मुसलमानों को क़त्ल करने का हुक्म है । P इस बारे में ईश्वर के अंतिम संदेष्ठा महापुरुष मुहम्मद (स.) की कुछ बातें लिख रहा हूँ । इन्हें पढ़कर फैसला आप स्वयं कर सकते हैं ।
Q - जो ईश्वर और आखिरी दिन (क़यामत के दिन) पर विश्वास रखता है । उसे हर हाल में अपने मेहमानों का सम्मान करना चाहिए । अपने पड़ोसियों को परेशानी नहीं पहुँचानी चाहिए और हमेशा अच्छी बातें बोलनी चाहिए अथवा चुप रहना चाहिए । Bukhari, Muslim
R - जिसने मुस्लिम राष्ट्र में किसी ग़ैर मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई । उसने मुझे ठेस पहुंचाई । Bukhari
- जिसने 1 मुस्लिम राज्य के गैर मुस्लिम नागरिक के दिल को ठेस पहुंचाई । मैं उसका विरोधी हूँ । S और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होऊँगा । Bukhari
T - न्याय के दिन से डरो ? मैं स्वयं उसके खिलाफ शिकायत कर्ता रहूँगा ? जो 1 मुस्लिम राज्य के  गैर मुस्लिम नागरिक के साथ गलत करेगा या उस पर उसकी जिम्मेदारी उठाने की ताकत से अधिक जिम्मेदारी डालेगा अथवा उसकी किसी भी चीज़ से उसे वंचित करेगा । Al-Mawardi
- अगर कोई किसी गैर मुस्लिम की हत्या करता है । जो कि मुसलमानों का सहयोगी था । तो उसे स्वर्ग तो क्या स्वर्ग की खुशबू को सूंघना तक नसीब नहीं होगा । Bukhari
एवं पवित्र कुरआन में ईश्वर कहता है कि - इसी कारण U हमने इजरायल की संतान के लिए लिख दिया था कि - जिसने किसी व्यक्ति को किसी के ख़ून का बदला लेने या धरती में फ़साद फैलाने के जुर्म के अतिरिक्त किसी और कारण से मार डाला । तो मानो, उसने सारे ही इंसानों की हत्या कर डाली और जिसने उसे जीवन प्रदान किया । उसने मानों सारे इंसानों को जीवन प्रदान किया । V उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्‍ट प्रमाण ला चुके हैं ? फिर भी उनमें बहुत से लोग धरती में ज़्यादतियाँ करने वाले ही हैं । 5-32 - शाहनवाज़ सिद्दीकी
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इस लेख पर कुछ टिप्पणियां ।
Shah Nawaz  - अब तो आपको पता चल ही गया होगा कि इस्लाम किसके साथ युद्ध करने का हुक्म देता है ? W अगर कोई मेरे घर अथवा मेरे देश पर आक्रमण करेगा । तो मैं अवश्य ही कुरआन ए करीम का अनुसरण करते हुए उनकी गर्दने उतारूंगा और उनके पोर पोर पर चोट पहुंचाऊंगा ।
safat alam taimi - बड़ा अच्छा लेख प्रस्तुत किया शाहनवाज़ भाई आपने । X लोगों को बस आपत्ति करना आता है । समझने के इच्छुक हों तब ना ? और विरोध भी कर रहे हैं किसका ? अपनी ही धरोहर का ?
safat alam taimi  - 1 Y कुरआन शान्ति का संदेश देता है ? इस्लाम का उद्देश्य पूरे संसार में शान्ति स्थापित करना है ? Z इस्लाम हर धर्म का सम्मान करता है ? क़ुरआन में इंसानी जानों का सम्मान इतना किया गया है कि उसने किसी 1 व्यक्ति (चाहे उसका धर्म कुछ भी हो) की हत्या को सारे संसार की हत्या सिद्ध करता है । जो कोई किसी इंसान को जबकि उसने किसी की जान न ली हो । अथवा धरती में फसाद न फैलाया हो की हत्या करे । तो मानो उसने प्रत्येक इंसानों की हत्या कर डाला और जो कोई 1 जान को (अकारण कत्ल होने से) बचाए । तो मानो उसने प्रत्येक इंसानों की जान बचाई । सूर । माईदा । आयत 32
और मुसलमान जिस नबी को अपनी जान से अधिक प्रिय समझते हैं । A1 वह प्रत्येक संसार के लिए ? दयालुता बनकर आये थे B1  (हे मुहम्मद) हमने आपको सम्पूर्ण संसार के लिए दयालुता बनाकर भेजा है । सूर । अंबिया 107 मुहम्मद सल्ल के प्रवचनों में आता है - जो कोई इस्लामी शासन में रहने वाले गैर मुस्लिम की हत्या कर दे । वह स्वर्ग की बू तक न पाएगा । सही । बुख़ारी ।
देखा ! यह है इस्लाम की शिक्षा ? और हम सब इसी पर 100 % विश्वास रखते हैं । 1 मुस्लिम कभी किसी गैर मुस्लिम को गैर मुस्लिम होने के नाते किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचा सकता । इसलिए कि वह जानता है ? कि हम सब 1 ही माता पिता का संतान हैं ?
2 ज़रा आप C1 मुहम्मद सल्ल की आदर्श जीवनी ? का अध्ययन करके देख लीजिए । उनके शत्रुओं ने उनको और उनके अनुयाइयों को निरंतर 21 वर्ष तक हर प्रकार से सताया । कितनों को जान से मार दिया । घर से निकाला । लेकिन सबको सहन करते रहे । D1 यहाँ तक कि 21 वर्ष तक अत्याचार सहते सहते जब अन्त में मक्का पर विजय पा चुके ? तो सार्वजनिक क्षमा की घोषणा कर दी । जिसका परिणाण यह हुआ कि मक्का विजय के वर्ष उनके अनुयाइयों की संख्या 10 000 थी । तो 2 वर्ष में ही 1 अन्तिम हज के अवसर पर 1 लाख 40 हज़ार हो गई । क्यों ? वह सोचने पर विवश हुए कि जिस इंसान को हमने 21 वर्ष तक चैन से रहने नहीं दिया । हम पर क़ाबू पाने के बाद हमारी क्षमा की घोषणा कर रहा है । मानो यह स्वार्थी नहीं । बल्कि हमारी भलाई चाहता है ।
सुलभ § सतरंगी said - उपरोक्त सन्दर्भ से 1 बात तो स्पष्ट है कि बांग्ला देश, पाकिस्तान या ऐसे देश के सरकार (लोग) दोज़ख के भागी है । इस्लामी शासन के अंतर्गत उन्होंने थोडा भी अन्याय किया तो वे स्वर्ग की खुशबू से वंचित रहेंगे ।
2 शाहनवाज जी ! त्वरित जवाब लिखने के लिए आपका शुक्रिया । कुछ ऐसी ही बातें हमारे उस्ताद ने भी बताई थी । जैसे सफ़र में हों । तो रोज़ा रखना जरुरी नहीं है इत्यादि । E1 मेरे अधिकाँश दोस्त मुस्लिम ही हैं । मगर वे इस्लाम के बारे में 0 या थोड़ी जानकारी रखते हैं ? ठीक उसी प्रकार अधिकांश हिन्दू विभिन्न रिवाज, नियम और ग्रंथों के बारे में सही जानकारी नहीं रखते ।
बहरहाल आप तो हम जैसे नास्तिकों को ‘काफिर’ समझते हैं ? जबकि मैं मानवता का सेवक हूँ । मेरी समस्या 1 ही है । किसी भी धर्म ग्रन्थ में आस्था नहीं । हाँ ! कुछ अच्छी बातें जरुर उठा लेता हूँ  सभी किताबों से । जैसे मैंने कुरआन/हदीस से 1 पंक्ति लिया - अमानत में खयानत नहीं करनी चाहिए । पुराने वेद से लिया - सर्व धर्म समभाव । वसुधैव कुटुम्बकम ।
गीता से लिया - परिवर्तन संसार का नियम है । इत्यादि और इसे गाँठ बाँध लिया । मुझे विश्वास है । कुरआन या अन्य अच्छे धर्म ग्रन्थ का पालन किये बगैर भी मैं अच्छी जिंदगी बसर कर सकता हूँ । सबको साथ लेकर चल सकता हूँ । इसके लिए मुसलमान कहलाना जरुरी नहीं है ? मैं अपने देश से इतर किसी धर्म को नहीं मानता हूँ । यही मेरी सुन्दरता का राज है । लेकिन जिद्दी लोगों को समझाना अपना फ़र्ज़ (नागरिक धर्म) समझता हूँ ।
2 why most of the terrorists all over the world are muslim ?
ऐसा कहना पूर्णत: सत्य नहीं है । आज भी विभिन्न देशों में विभिन्न पंथों के लोग आतंकवाद में लिप्त हैं ।
F1 परन्तु फिर भी जो आतंकवाद आज मुस्लिम समाज में पनप रहा है । वह चिंता का विषय है । दरअसल इसके पीछे लम्बी कहानी है । अमेरिका और इजरायल जैसे देश एवं कुछ सांप्रदायिक संगठन काफी सालों से कुछ मुस्लिम देशों/समाज को समाप्त अथवा पराजित करने जैसी कोशिश में लगे हुए हैं । इससे 1 कशमकश की स्थिति बन गई है और इस कारण मुस्लिम युवाओं में 1 असंतोष की भावना घर कर रही है और इसी का फायदा आतंकवादी संगठन उठा रहे हैं । वहीं अशिक्षा और बेरोज़गारी भी इसका 1 महत्त्वपूर्ण कारण है । G1 अशिक्षा के कारणवश बहुत ज्यादा मुसलमानों को मालूम ही नहीं है कि इस्लाम की क्या शिक्षाएं हैं ? और इसी का फायदा उठाकर आतंकवादी संगठन लोगों को बेवक़ूफ़ बनाकर अपनी योजनाओं में शामिल कर लेते हैं ।
http://sandesh.premras.com/2010/04/blog-post_14.html
गैर मुसलमानों के साथ संबंधों के लिए इस्लाम के अनुसार दिशा निर्देश ।
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AA इसी लेख पर मुस्लिम टिप्पणी में लिखा है कि - हम सब 1 ही माता पिता की संतान हैं ? फ़िर 1 ही माता पिता के मुस्लिम और गैर मुस्लिम 2 प्रकार की संतानें कैसे हो सकती हैं ?
A सब तारीफें अल्लाह के ही लिए हैं ? क्या ओलम्पिक में कोई गोल्ड मैडल जीता है अल्लाह ने या सचिन का रिकार्ड तोङ दिया या फ़िर 1400 साल के अल्लाह ने ऐसा कोई काम किया । जिसके लिये उसे नोबल प्राइज मिले ? दरअसल ये लिखना ही संकीर्णता का परिचायक है और धार्मिक वैमनस्यता का कारण और मूर्खतापूर्ण इस्लामी कट्टरता की जङ भी ?
B पहली बात तो यह कि इस्लाम दया और न्याय का धर्म है ?
- और बाकी धर्म क्या क्रूरता और अन्याय के धर्म हैं ? क्या 1400 साल पहले इंसान दया और न्याय से परिचित नहीं था । बहुत पीछे मत जाओ, ईसामसीह महावीर और बुद्ध को ही ले लो । क्या 1400 साल पहले धरती पर आदिमानव काल चल रहा था । जो नंगे पुंगे इंसान हू हा ऊ ऊ  बू बू  चिल्लाते फ़िरते थे ।
C ग़ैर मुसलमानों को ज्ञान, सुंदर उपदेश, ग़ैर मुसलमानों को (धार्मिक ज्ञान) ज्ञान, सुंदर उपदेश बाद में करना । पहले मुसलमानों को ही सुधार लो । उन्हें ठीक से नहाना धोना ही सिखा दो । पढना लिखना ही सिखा दो । ये मैं नहीं कह रहा । आपने (लेख लेखक) ही लिखा है । क्या लिखा । देखें G1 क्योंकि आप देख सकते हैं । वैश्विक % में गैर मुस्लिम कितने अधिक शिक्षित सफ़ाई पसन्द सलीके वाले और प्रेमपूर्ण व्यवहार करने वाले हैं । जबकि तमाम मुस्लिम आबादी आज भी आदिवासी कबीलाई जंगलियों के समान आचरण वाली है ।
D और किताब वालों से बस उत्तम रीति से वाद विवाद करो । पर और (धार्मिक किताब वालों) से वाद विवाद कर ही कहाँ पाओगे । तुम्हारी किताब तो हिन्दुओं की योग धर्म विज्ञान छोङो नैतिक शिक्षा, सद उपदेश जैसी मामूली किताबों के आगे ही नहीं ठहर पायेगी । क्या तुम्हारी अक्ल पर  ताला लगा है । जिनको तुम अल्लाह का उपदेश कहते हो । किसी भी चौराहे नुक्कङ पर बैठे निठल्ले नाकारा लोग भी इससे सुन्दर उपदेश करते हैं न कि उलझाऊ - फ़िर हमने चांद को आसमान में उल्टा लटका दिया । उसमें एक बुढिया को नीचे जमीन घूरने के लिये बैठा दिया । फ़िर हमने सोचा और 1 सूरज भी बना दिया ।
E क्या चीज थी ये ? बङा  संस्पेंस क्रियेट हो गया ।
F अच्छा बता रहे हो कि तुम्हें अब (1400 साल से) पता चला । वैसे 1 ही है फ़िर हमारा तुम्हारा क्यों कहते हो ? शायद तुम्हें नया नया पता चला । इसीलिये बताने को परेशान हो पर हम तो बहुत पहले बहुत पहले से ही जानते हैं । वह 1 ही है और उसको कहते हैं - परमात्मा ।
G ये क्या और किनके बारे में बात हो रही है । कोई बता सकता है ?
H निश्चय ही इस आयत में मूर्ख पाकिस्तानियों के बारे में अल्लाह ने बताया है ।
I &J  और वैसे ऐसी अनुमति और कौन सा धर्म देता है ? मैं कहता हूँ । सब कुरआन रामायण बाइबल गीता आदि इंसान लङाऊ पोथन्ने उठाकर रख दो ।
आपको मालूम होगा अम्बेडकर ने ब्रिटिश संविधान की नकल कर ही भारतीय संविधान लिखा है । उसमें भी ऐसी ऐसी धारायें हैं । जिनको पढ़कर अच्छे अच्छे बिगङैल भूत भी शांति दूत बन जायेंगे । वो किसी अल्लाह की वाणी या उपदेश से प्रभावित होकर नहीं बल्कि डर की वजह से ।
इसकी धाराओं में 4 प्रकार की सजा का विधान है । वो भी किसी कयामत वाले दिन नहीं ? अभी का अभी, तुरन्त । किसी की जेब काट कर देख लो ।
1 इतने दिन या साल की सजा । 2 इतने रुपये का जुर्माना ।
3 सजा और जुर्माना दोनों । 4 न्यायाधीश के विवेकानुसार ।
K 1 हालीवुड फ़िल्म में अमेरिका आदि किसी देश में किसी जेल का अजीब नियम है । वहाँ अपराधी को लगभग 3 फ़ुट ऊँचाई और 3 वर्ग फ़ुट के जालीदार पिंजरें में रखते हैं । सुबह सुबह इनको पिंजरे से निकालकर पैंट हटवाकर प्रष्ठ भाग में जोर से डंडा मारते हैं । इस्लाम ने अनुमति दे भी दी । तुम्हारी हिम्मत है किसी पराये देश में या स्वदेश में ऐसा कर सको ? अल्लाह तो जो करेगा, कयामत के दिन करेगा । ये तुरन्त हाथ धोकर पीछे पङ जायेंगे ।
L ये बात मुसलमान जोर देकर क्यों बताते हो । क्या हिन्दू कहते हैं कि - भगवान अलग अलग हैं । तुम्हें तो 1400 साल से किसी अल्लाह का पता चला । आदि सृष्टि से ही ग्रन्थों में परमात्मा और सृष्टि ज्ञान की पुस्तकों की भरमार है ।
M मेरे गांव का चौधरी जिसने कोई कुरआन बाइबल रामायण कभी नहीं पढी सुनी । अगर कोई उससे गलत बात की चूँ भी कर दे । तो लठ्ठ उठा कर बेहिसाब मारता है ।

N ये व्यवहार तो कोई मन्द बुद्धि इंसान भी जानता समझता है । अल्लाह क्या मन्द बुद्धि है या फ़िर शायद मुसलमानों को समझता होगा । और इसका मतलब क्या है - जिन्होंने तुमसे धर्म के मामले में युद्ध नहीं किया ? ये अल्लाह प्रेम का धर्म सिखाता है या युद्ध का धर्म ?
O जिन्होंने धर्म के मामले में तुमसे युद्ध किया - अब जबरदस्ती अपना जैसा धर्म लोगों को बताओगे तो युद्ध नहीं तो और क्या होगा । 1400 साल से तुम यही तो कर रहे हो । कोई निर्णय निकला ?
P ईश्वर के अंतिम संदेष्ठा महापुरुष मुहम्मद (स.) - यह बात मुसलमान किस आधार पर कहते हैं । मेरी समझ में नहीं आता । जबकि तुम उन्हें किसी ईश्वर का संदेष्टा कहते हो ।
इंसान ने जन्नत और 72 हूरों का इंतजाम यहीं कर लिया । बस थोङे हाथ पैर हिलाओ । थोङी (शिक्षा की) इबादत तो करो ।
Q इससे अधिक फ़ालतू बात (यदि किसी धार्मिक ईश्वरीय ग्रन्थ को ये मामूली बात भी बतानी पङे) मैंने आज तक नहीं सुनी । क्योंकि इतना तो गली में घूमने वाली पागल औरत भी समझती है । इससे तो ऐसा लगता है कि - अल्लाह मुसलमानों को एकदम जाहिल गंवार समझता है ।
R अल्लाह से पूछो कि 1400 साल से बहुत पहले भी ये दुनियां मजे से चल रही थी और कुरआन मुसलमान के न होने से और बढ़िया ही चल रही थी । फ़िर इसने मुसलमान और कुरआन का एकदम बेकार बखेङा फ़ैलाया ही क्यों ? किसी मुसलमान या मुस्लिम राष्ट्र की जरूरत ही क्या थी ? आज जो मुसलमान नहीं या कुरआन नहीं पढते । वो क्या अच्छे इंसान नहीं हैं ?
S और मैं न्याय के दिन उसका विरोधी होऊँगा - अल्लाह ! तुमने यही बात करके अशांति फ़ैलायी । साइंस के अनुसार सृष्टि 4 अरब साल से है और तुम जो करोगे । न्याय के दिन ही करोगे ? अभी क्या बात है ? तुरन्त करते चलो । इतना काम इकठ्ठा क्यों कर रहे हो । इंसान (न्यायाधीश) 4-6 साल में ही फ़ैसला कर देते हैं ।
T न्याय के दिन से डरो ?
अल्लाह ! तुम दूसरों को क्या डराते हो । इंसान भी अपने बच्चों को प्यार मुहब्बत अच्छा जीवन सिखाता है । अगर वह गलती पर है । तो उसे सही रास्ता दिखाता है और तुमने ये कयामत के दिन जन्नत और 72 हूरों की बात क्या चलाई । दुनियां में अन्याय अधर्म का हाहाकार मचा दिया । हिन्दू सन्तों ने इंसान के लिये यहीं स्वर्ग बना दिया और जीते जी ही बहुतों को परमात्मा से मिला दिया । विश्वास नहीं होता । तुम्हारे इसी स्वर्ग (और उससे बहुत ऊपर भी) सहज योग वाले जाते हैं ।
V उनके पास हमारे रसूल (संदेशवाहक) स्पष्‍ट प्रमाण ला चुके हैं ? क्या प्रमाण है इस बात का कि मुहम्मद अल्लाह का संदेशवाहक थे ?
W जो तुम करोगे, वही दूसरों को भी करना आता है । सभी घी की चुपङी  रोटी खाते हैं ।
X लोगों को बस आपत्ति - यही ईसाई, मुसलमानों को समझाना चाहता हूँ । यदि तुम समझो । सनातन धर्म में वो समृद्ध सिद्ध ज्ञान विज्ञान मौजूद है कि आँखें खुल जायें । तुम्हें अल्लाह और जन्नत की हकीकत (कयामत के दिन नहीं) जीते जी ही आसानी से पता चल जाये ।
Y फ़िर भी लोग समझ नहीं पाते । अल्लाह ! वैसे एकाध जगह शांति हुयी कि नहीं ? मुझे तो स्वयं मुसलमानों में ही घोर अशांति के सिवाय कुछ दिखायी नहीं देता ।
Z इस्लाम हर धर्म का सम्मान करता है ? पर मुझे लगता है । सिर्फ़ फ़टे में टांग अङाता है । क्योंकि  कोई पूछता नहीं । इसलिये अपना महत्व साबित करने के लिये चिल्लाता है ।
A1 चलो झूठा ही सही मान लिया । फ़िर मुहम्मद को मानने वाले क्या कर रहे हैं ? द्वेष और  नफ़रत हिंसा खून खराबा । ये बात कभी सोची तुमने ?
B1 हे मुहम्मद ) हमने आपको ?.. बस सारे संसार में झगङे की जङ ऐसे ही सम्बोधन युक्त लाइनें हैं । जिनमें किसी 1 व्यक्ति को ठेका सा दे दिया । इतिहास गवाह है । हरेक समय में बिना किसी धार्मिकता के ऐसी ऐसी महान हस्तियां हुयी हैं । जिन्होंने जातिवाद की मूर्खतायुक्त संकीर्णता से एकदम दूर विश्व में सदभावना मानवता और भाईचारे का दिव्य अनमोल संदेश फ़ैलाया ।
C1 मुहम्मद सल्ल की आदर्श जीवनी ? इससे ज्यादा आदर्श वाली कम से कम 1 लाख जीवनी बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के मानवीय इतिहास में उपलब्ध है ।
D1 ये बात वाकई महत्वपूर्ण है । अगर मुसलमानों को जरा भी समझ आ जाये । अगर वे मुहम्मद के इसी आचरण पर चलकर इस्लाम का प्रचार करें । तो बिना (धर्म परिवर्तन के) मुसलमान बने ही कमाल का भाईचारा फ़ैलेगा और जन्नत मरने के बाद कयामत के दिन नहीं ? यहीं जीते जी जिन्दगी भर को तो होगी ही पर क्या खुद मुसलमान ही ऐसा आचरण करते हैं ?
E1 मगर वे इस्लाम के बारे में 0 या थोड़ी जानकारी रखते हैं ? खुद मुसलमानों को ही इस्लाम की जानकारी नहीं तो ये सिखाने वाले पहले इन्हें ही क्यों नहीं सिखाते ।
F1 आप देख सकते हैं । ये उत्तर जान बूझ कर सत्य को नकारने जैसा है । जैसे आँखों देखी मक्खी निगलना, सरासर और सफ़ेद झूठ बोलना ।
G1 अशिक्षा के कारणवश बहुत ज्यादा मुसलमानों को मालूम ही नहीं है कि इस्लाम की क्या शिक्षाएं हैं ? ..क्या बात है । फ़िर पहले अपना ही घर सुधार लो औरों की फ़िक्र बाद में करना । 
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