14 नवंबर 2012

गलत सलत दोहा लिखा है - डा. श्याम गुप्त


डा. श्याम गुप्त पोस्ट " लाखों लोग इस फ़ोकटिया सतसंग को सुन रहे हैं । " पर  टिप्पणी ।
तात स्वर्ग अपवर्ग धरि धरिय तुला एक अंग । तूल ना ताहि सकलि मिल जो सुख लव सतसंग ।
गलत सलत दोहा लिखा है । मेरे विचार से सही है ।
तात वर्ग,अपवर्ग सुख,धरिय तुला इक अंग । तुले न ताही सकल मिलि,जो सुख लव सतसंग ॥
- वर्ग यहाँ सांसारिक सुख और अपवर्ग = उस दुःखदायी जन्म से विमुक्ति...अर्थात सतसंग सांसारिक एवं पारलौकिक दोनों सुखों से बढकर है ... अब क्यों.. यह तो बहुत बड़ा तात्विक दर्शन है...सतसंग करिए और जानिये ....
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डा. श्याम गुप्त जी ! त्रुटि की तरफ़ ध्यान दिलाने हेतु धन्यवाद । तात वर्ग अपवर्ग सुख में वर्ग के स्थान पर " स्वर्ग " और सुख के स्थान पर " धरि " और तुले ना ताही सकलि मि्लि में खास तुले के स्थान पर - तूल ।

वास्तव में गलत लिख गया है । आपका दोहा सही है । इसमें मेरे द्वारा लिखा गया शब्द " तूल " भृमित कर सकता है । क्योंकि तूल का अर्थ जोर होता है । और मैं इस बात से भी सहमत हूँ कि यथासंभव लिखने और बोलने में शुद्धता होनी ही चाहिये । और मैं यह भी मानता हूँ कि सुख के स्थान पर गलती से धरि लिख गया । लेकिन साधुओं का मामला थोङा अलग हो जाता है । आप गौर करें । तो तुलसीदास ने रामचरित मानस में कहीं क्ष अक्षर का उपयोग नहीं किया । इसकी जगह सभी स्थानों पर छ ही लिखा है । इसी तरह कहीं भी श अक्षर नहीं आया है । इसकी भी जगह स या ष का प्रयोग हुआ  है । ण अक्षर का उपयोग भी नहीं किया । इसकी जगह न लिखा है । चलिये कुछ उदाहरण देखते हैं ।
( लछिमन ? ) समुझाए बहु भाँति । पूछत चले लता तरु पाँती ।
पूरक नाम राम सुख ( रासी ? ) । मनुज चरित कर अज ( अबिनासी ? ) ।
लै ( दच्छिन ? ) दिसि ? गयउ गोसाईं । बिलपति अति कुररी की नाईं ।
जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम ( सीतल ? ) सदा ।
जो अगम और सुगम हैं । निर्मल स्वभाव हैं । विषम और सम हैं । और सदा शीतल ( शांत ) हैं ।
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ । मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ ( छोभ ? ) ।
ते फल ( भच्छक ? ) कठिन कराला । तव भय डरत सदा सोउ काला । 
उन फलों का भक्षण ? करने वाला कठिन और कराल काल है । वह काल भी सदा आपसे भयभीत रहता है ? ( छमब ? ) आजु अति अनुचित मोरा । कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ।
मेरे इस अत्यन्त अनुचित बर्ताव को क्षमा ? कीजिएगा । मैं कोमल ( छोटे ) मुख से कठोर ( धृष्टता पूर्ण ) वचन कह रहा हूँ । अबिनय बिनय जथारुचि बानी । ( छमिहि ? ) देउ अति आरति जानी ।
अविनय या विनय भरी जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढिठाई की है । हे देव ! मेरे आर्तभाव ( आतुरता ) को जानकर आप क्षमा ? करेंगे ।
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मैंने गीता प्रेस गोरखपुर आदि से प्रकाशित रामायण और श्रीमद भगवत गीता का अर्थ व्याख्या देखी है । जो

मुझे पक्का पता है । कई स्थानों पर एकदम गलत है । लेकिन मेरे पास कम से कम अभी तो समय का बेहद अभाव है । और इस तरह के सही गलत अन्तर को बताती हुयी पाण्डुलिपि खुद तैयार करना एक लम्बे समय की मांग करता है । और मैं कोई विद्वान या लेखक नहीं । बल्कि आंतरिक ज्ञान का साधक हूँ । जिसकी जिम्मेदारी अन्य अनेकानेक जीवों को चेताने आगे बढाने की भी है । अतः सार ये कि साधु अपने ही तरीके से बात करते हैं । कैसे ? आपने जो वर्ग का अर्थ - सांसारिक सुख । और अपवर्ग का अर्थ  - उस दुःखदायी जन्म से विमुक्ति । लिखा है । वह सांसारिक भावों में ठीक है । पर गूढ अर्थों में एकदम गलत । क्योंकि स्वर्ग किसी भी मनुष्य के लिये बहुत बङी चीज होता है । और आत्म ज्ञानियों के लिये - पीकदान । शास्त्रों में वर्णित मोक्ष ( 4 प्रकार की मुक्ति ) मनुष्य के लिये  बहुत बङी चीज है । पर सुरति शब्द योग वालों के लिये - काल माया द्वारा फ़ैलाया गया छल । नाटक । आत्म ज्ञानी मुक्ति नहीं मुक्त शब्द का प्रयोग करते हैं । और इन दोनों में जमीन आसमान से भी बङा अन्तर है  । अन्तर तो इससे भी कहीं बहुत बहुत बहुत ज्यादा है । पर अफ़सोस आप इससे बङे अन्तर के स्थान और तुलनात्मक स्थितियों से परिचित नहीं हैं । कर्म धर्म दोऊ बटें जेबरी । जहाँ मुक्ति भरती पानी । सो गति बिरले जानी । अतः मैंने जो वर्ग को ( अर्थ में  । दोहे में नहीं )  स्वर्ग लिखा । वो सही है । और अपवर्ग को स्वर्ग या स्वर्गिक सुखों से भी ऊपर की मुक्ति स्थितियाँ । वह भी सही है । ये दोहा देखिये - अनुज वधू भगिनी सुत नारी । सुन सठ कन्या सम ए  ( चारी ? ) । इस दोहे में चारी शब्द का अर्थ विचार या मान्यता है । बताईये चारी का अर्थ किसी भी तरीके से यह निकलता है ? अब ये दोहा देखिये -  आकर चार लक्ष चौरासी । जोनि भृमित यहि जिव अविनाशी । इसमें - चार लक्ष चौरासी का मतलब क्या है ? 4 लाख 84 ? क्या ये गिनती 4 लाख 84  संख्या को बता रही है ? ये बता रही है । 4 प्रकार की 84 लाख योनियां । अब देखिये । क्यों है स्वर्ग महत्वहीन - एहि तन करि फ़ल विषय न भाई । स्वर्ग हू स्वल्प अन्त दुखदायी । थोङे समय का है स्वर्ग । और अन्त में अधोगति । यानी वही 84 लाख योनियां । और  देखिये - राम बुलाबा भेजिया । दिया कबीरा रोय । जो सुख है सतसंग में । सो बैकुण्ठ न होय । तो मेरे उस लेख का सार - असली सतसंग क्या और कैसे ? बताना था । कहते हैं । घर का बना असली खोआ का लड्डू टेङा मेङा अर्थात तरीके से गोल सजावटी न हो । तो भी बाजारी मिलावटी से ? ज्यादा मजा देता है । ये साधुओं की फ़क्कङता होती है । इसलिये अब इसी मुख्य बात पर बात करते हैं । जैसा कि स्वयं आपने लिखा - अब क्यों ? यह तो बहुत बड़ा ? तात्विक दर्शन है ? सतसंग करिए । और जानिये ।
मेरे लिये सतसंग  ( वो भी असली ) बहुत बङा तात्विक दर्शन नहीं है । बल्कि बहुत बहुत बहुत छोटा सा ( आपके ही अनुसार ) तात्विक दर्शन है । अब इसी बहुत बङे तात्विक दर्शन ? को मैं 13 साल के बच्चों से लेकर 90 साल तक के वृद्धों को बङी आसानी से कराता हूँ । और ये सच्चे सदगुरु की कृपा से ही संभव है । मेरे उस लेख का सार यही था । तुलसीदास ने मानस में ही लिखा है - गो गोचर जहाँ लगि मन जाई । सो सब माया जानो भाई । यानी इंद्रियां ( गो ) और उनके विचरने के स्थान ( गोचर ) और जहाँ तक ये मन जाता है । वह सब सत्य ज्ञान नहीं । बल्कि माया है । काल और मन एक ही बात है । देखिये - काल काल सब कोइ कहे । काल न जाने कोय । जेती मन की कल्पना । काल कहावे सोय । अब देखिये ये काल कहाँ तक जाता है - सार शब्द जब आवे हाथा । तब तब काल नवावे माथा । सार शब्द निज सार है । कहूँ वेद तोय सार । पाईये सो पाईये । बाकी काल पसार । परमात्मा जब आदि सृष्टि से पूर्व की अवस्था में था । और उसमें पहली स्फ़ुरणा ( संकुचन ) हुयी । तब ये प्रथम शब्द प्रकट हुआ । जो वास्तव में 1 अनोखी ध्वनि है । इसी ध्वनि से । अलग अलग सृष्टि स्तरों पर । सृष्टि मंजिलों पर । बहुत तेज वायव्रेशन हो रहा है । जिससे अन्य अनेक धुनात्मक शब्दों - ॐ । सोहं । राम । शिवोहम आदि स्थितियों सृष्टियों का निर्माण हुआ है । तो मेरे कहने का मतलब ये काल उस सार शब्द तक जाता है । जिसे निःअक्षर भी कहा जाता है । यही मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य भी है । और इसी के मिलने को आवागमन से मुक्त होना कहा गया है । क्योंकि सार शब्द के साथ ही परमात्मा से साक्षात्कार हो जाता है ।
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मित्रो ! देश के 1 भी राष्ट्रीय TV चैनल और अखबार ने डा स्वामी के इस प्रेस कांफ्रेंस को नहीं दिखाया था । इस बात से ही आप समझ सकते हैं कि देश की मीडिया देशद्रोही है । कृपया इस वीडियो को देखें । और अपने मित्रो से शेयर करें । देश का मीडिया देशद्रोही है । इसलिए लोगों को जगाने का काम हम लोगों को ही करना पड़ेगा ।

आज डा सुबृमनियम स्वामी ने सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी की फर्जी कंपनियों के बारे में प्रेस वार्ता में खुलासा किया । डा स्वामी ने विभिन्न इंडियन पेनल कोड IPC की धाराओं के बारे में भी बताया । जिनके अंतर्गत सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी दोषी है । डा स्वामी ने राहुल गांधी के स्विट्जरलैंड के ज्यूरिख के पिक्टेट बैंक में खाता होने का सनसनीखेज खुलासा करने के साथ ही आरोप लगाया है कि गांधी खानदान ने विभिन्न देशों में दर्जनों फर्जी कंपनियों बनाई । अरबों का धन बटोरा । फिर कंपनी बंद कर दी । कांग्रेस के धन से दिल्ली का हेराल्ड हाउस कौड़ियों के भाव खरीदा । जिसकी बाजार कीमत 6 000 करोड़ से अधिक है । डा स्वामी ने कहा कि इनकी कंपनियों में विदेशी निवेश भी हुआ है । इसलिए इसकी जांच SIT से की जानी चाहिए । डा स्वामी ने कहा कि उन्होंने अभी 27 में से केवल 2 कंपनियों के बारे में जानकारी दी है । आगे जाकर वो सभी कंपनियों और उसमे हुए अनियमित्ताओं के बारे में जानकारी देगे । डॉ स्वामी कहते हैं कि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को इस्तीफा देना चाहिए ।
डा स्वामी यह भी बताते हैं कि किस प्रकार से सोनिया गाँधी विभिन्न घोटालो में संलिप्त है । और किस प्रकार से सोनिया गाँधी ने अनेको ऐसे काम किये हैं । जिसके लिए उन्हें कानूनी तौर पर सजा मिलनी चाहिए । डा स्वामी कहते हैं कि सोनिया गाँधी का चोरी करने का इतिहास रहा है । सबसे पहले इंश्योरेंस एजेंट बनकर चोरी किया । फिर मारुति का टेक्नीकल डायरेक्टर बनकर चोरी किया । फिर वो झूठे तरीके से वोटर बन गयी । राहुल गाँधी जब पैदा हुआ । तो उसको इटालियन नागरिक बना दिया । तो इस तरह से सब कुछ मिलाकर यह देश का सबसे महा भृष्ट परिवार है । यह और इस परिवार की पोल खोलने की प्रक्रिया आज से उन्होंने शुरु कर दी है । वो कहते हैं कि वो केजरीवाल की तरह केवल आरोप लगाकर भागने वाले नहीं हैं । वो इन आरोपों को न्यायालय में ले जायेंगे । और इन मुद्दों को अंत तक ले जायेंगे ।
अगर पूरा पोस्ट नहीं पढ़ सकते । तो यहाँ पर क्लिक करें । 
http://www.youtube.com/watch?v=RfQohTipfkg
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- Have been crucified with Christ; it is no longer I who live, but Christ who lives in me; and the life I now live in the flesh I live by faith in the Son of God, who loved me and gave himself for me ~ Galatians 2.20
- O my heart! the Supreme Spirit, the great Master, is near you: wake, oh wake ! Run to the feet of your Beloved: for your Lord stands near to your head .You have slept for unnumbered ages; this morning will you not wake ? Kabir
- Nothing can dim the light that shines from within…” Rise and shine my lovely friends . All the love and light 
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