05 जून 2013

25 NOV 2013 से 4 JUNE 2013 तक

एक अंतर के साधु का जीवन तुलनात्मक एक दुनियावी व्यक्ति बहुत जुदा होता है । क्योंकि उसकी भूमियाँ बेहद विस्त्रत होती है । कार्यक्षेत्र बहुत अधिक होता है । अलौकिक दिव्य सम्बन्धों का दायरा लगभग असीमित होता है । और ये सृष्टि व्यवहार उसे निभाना ही होता है । तब जबकि ऊपर की लाइनें सिर्फ़ द्वैत के साधु के लिये कही गयी हों । तब भी एक अति व्यस्त व्यक्ति के तुलनात्मक यदि % द्वारा आंकलन किया जाये । तो यह लगभग 1% ( सामान्य दुनियाँ का अति व्यस्त व्यक्ति ) और 150% ( द्वैत का साधु ) के अनुपात में आयेगा । तब यदि साधु अद्वैत का हो । तो फ़िर उसकी भूमियों । कार्यक्षेत्र । कार्य । अद्वैत सम्बन्धों के बारे में मानवीय बुद्धि से आंकलन हरगिज नहीं किया जा सकता । फ़िर जो आनन्द जो रोमांच क्रियाओं में है । वह लिखने में कभी नहीं । अतः 

लिखना मेरे लिये सिर्फ़ अंतःप्रेरणा भर है कि मैं इसको लिख सकता हूँ । और इससे दूसरे बेहद लाभान्वित होंगे । एक और वजह भी है । जो मैं लिख सकता हूँ । वह सिर्फ़ मैं ही लिख सकता हूँ । अतः इसलिये भी लिखने की ( कभी कभी ) प्रबल इच्छा होने लगती है । मैंने कई बार स्पष्ट किया है । मेरे लिये एक व्यक्ति को चेताना सृष्टि के अन्य सभी कार्यों से बढकर है । क्योंकि वास्तव में हम सभी कार्य व्यवसायिक बुद्धि से ही करते हैं । फ़िर वह अद्वैत मोक्ष की परमात्म भक्ति ही क्यों न हो । आप कोई भी क्रिया ऐसी नहीं बता सकते । जिसके प्रतिक्रिया या फ़लस्वरूप आप अधिकाधिक और मनवांछित की इच्छा नहीं करते । अतः मैं कभी इस सिद्धांत को मानने को तैयार नहीं कि ( सिर्फ़ ) परमार्थ के कारने साधुन धरा शरीर । बहुत कम लोग जानते होंगे । 1 जीव को ( आत्मज्ञान हेतु ) चेताने का फ़ल जो होता है । वह सृष्टि के सभी कार्यों से मानदेय में सबसे ऊँचा है । अतः मैं तमाम कार्यों में से इसी को प्राथमिकता देता हूँ ।

मेरे कहने का आशय है । इस तरह अद्वैत के साधु का जीवन उन जगहों उन क्रियाओं से सयुंक्त रहता है । जिनके बारे में सिर्फ़ कल्पना ही की जा सकती है । यदि सिर्फ़ 25 NOV 2013 से आज 4 JUNE 2013 तक की अपनी डायरी ही लिखूँ । तो शायद वह असंभव होगी । क्योंकि इसके लिये अरब खरब शब्दों की आवश्यकता होगी । फ़िर भी स्मृति के आधार पर प्रमुख रोचक और अलौकिक घटनाओं को बताने की कोशिश करूँगा ।
इसी बीच बहुत से लोगों ने जिज्ञासा प्रश्न किये । जिनमें शायद तानसेन कुमार का पेज मेरे कम्प्यूटर में मौजूद है । उनके उत्तर मैंने लिखना भी शुरू कर दिया है । I.T.O  में कार्यरत हमारे एक शिष्य ने मेरे साथ फ़ोन पर बातचीत की रिकार्डिंग की है । जो अलग अलग आध्यात्म विषय पर लगभग 17 घन्टे की है । ये आडियो बातचीत आपको आजकल में ब्लाग पर ही उपलब्ध हो जायेगी ।

श्री महाराज जी का मैं पहला शिष्य हूँ । इसके बाद कुछ हजार शिष्य बने । लेकिन इन सभी में ( बहुत बाद में बने ) शीर्ष पर पहुँचे । दिल्ली के मैंनेजर राकेश शर्मा जी । ये गुरु स्तर पर पहुँच गये । मतलब इनमें दैवीय समस्याओं । आंतरिक यात्रायें ( अन्य को कराने की ) । दिव्य प्रकाश दिखाने । ध्यान जोङने आदि आदि अलौकिक विषयों की पूर्ण क्षमता है । अतः दिल्ली के आसपास के सहज योग सीखने के इच्छुक इनसे फ़ोन पर समय लेकर मिल सकते हैं । इनके फ़ोन नम्बर हैं - 098183 12908 और दूसरा 084478 15644 श्री राकेश जी के योग सफ़र पर एक पूरा लेख भी लिखूँगा । आश्रम आदि के बारे में जानकारी और अध्यात्म से जुङे प्रश्न भी इनसे पूछे जा सकते हैं ।
25 NOV 2013 से 4 JUNE 2013 तक मैंने कई जीवों को चेताया है । इनमें कम्प्यूटर इंजीनियर साहिल तिवारी भी हैं । 24 वर्षीय साहिल वैश्विक और खगोलीय स्तर पर बारीक बिन्दुओं के अच्छे जानकार हैं । मुझसे मिलने से पहले यह सर्व व्यापी बीमारी बिज्ञान मेनिया से प्रभावित उसके प्रबल समर्थक थे । अब यह गहन चिंतन में लगे उस एक एक सूत्र को समझने का प्रयास कर रहे हैं । जो मैंने इन्हें 15 दिन आश्रम में सिखाये थे ।
प्रेत जगत या अलौकिक कहानियों के शौकीन पाठकों के लिये भी कुछ लिखना चाहता हूँ । संभवतया जल्दी ही लिखूँगा । और ये प्रसून का ( अब तक प्रकाशित के अनुसार ) सबसे बङा कारनामा होगा । दूसरे " कामवासना " की तरह मेरी आगामी हर कहानी में मानवीय संवेदनाओं का प्रवल पक्ष भी मौजूद होगा । ओमियो तारा को लेकर भी बहुत पाठकों में बैचैनी है । यदि कुछ स्थिर रहा । तो इसको भी पूरा करूँगा ।
बस एक ही बङा व्यवधान हो सकता है । कोई पात्र या अधिकारी जीव आ जाने पर मैं सभी महत्वपूर्ण कार्य छोङ देता हूँ । बात वही है । इसके प्रतिफ़ल में जो भुगतान मुझे प्राप्त होता है । वह स्वर्ग के राजा इन्द्र के लिये भी ईर्ष्या का विषय हो सकता है ।
इसके अतिरिक्त आध्यात्म के बारीक पहलुओं के लेखन पर भी जोर होगा । मैं अपने कुछ सहयोगी भी तैयार कर रहा हूँ । ऐसा होने पर मुझे अधिक कार्य करने में सुगमता होगी । आज इतना ही ।
सबके अन्दर विराजमान सर्वपूज्य शाश्वत आत्मदेव को मेरा सादर प्रणाम ।
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