06 जून 2013

इससे अच्छा सौदा कौन सा है ?

Rajeev Ji, Namskar asha Mai aapke blog ka 2 mahine purana pathak Jigyasu kumar urf gayak tansen apse kuch sawal puchna chahta hu halaki mai aapko mail pehili baar hi kar raha hu aur asha karta hu ki rajeev ji aap mere in sawalo ke jawab jald se jald jarur denge Aur ye  kah ke palla Nahi jhadoge ki sawal karna To Bada asan hai aur Jawab dena bahut muskil, Ya  Baki agle lekh me lekh bada ho jane ke karan, ya phir key board me kharabi aa gai hai etc karke baat talna nahi, aisi mai ummid karta hu bhale hi time lage par sare sawalo ke jawab ek sath dena aur mujhe mail karke ye bhi bata dena ki kab tak de pavoge mere jawab ? kyoki satya ki khoj kar kar ke mere andar bhi khoj ho gai hai aur is khoj khaj ke khel  ki khujai aap hi mita sakte ho ? Bolo thik Hai Na to phir sidhe prasha karta Hu Baki Meri Marji wale lekh ki tarah mat likh dena Meri Marji
Q 1 - Kaal purush Ne Satypurush se door rakhne ke liye 84 banai ye baat thik hai to phir usne Manav Yoni ka nirman kis karan kar diya use kya khujli machi hui thi aur wo chahta to nahi bana sakta tha ? 
- आपने अक्सर पढा सुना होगा - यत पिण्डे तत बृह्माण्डे ।  ये बात दरअसल मनुष्य शरीर ( पिण्ड ) के लिये ही कही गयी हैं । ये ठीक विराट पुरुष या सृष्टि की बनाबट जैसा ही है । दूसरे सिर्फ़ यही वो शरीर या योनि है । जिसमें जीवात्मा कर्म द्वारा अपना उत्थान या पतन कर सकता है । इसमें मनुष्य घृणित नारकीय जीव से लेकर स्वयं परमात्मा तक हो सकता है । सत्य पुरुष या शाश्वत आत्मा से ही सभी चेतन पुरुषों की स्थिति उपाधि का सृजन हुआ । तो इस तरह सत्य पुरुष से ही काल पुरुष का भी सृजन हुआ । सिर्फ़ इस बिन्दु पर गौर से सोचिये । यदि मानव योनि जैसी कर्म योनि का सृजन न हुआ होता । जीवात्मा का उत्थान पतन का खेल न होता । तो फ़िर जो जैसा एक बार बन गया । वैसा ही रहता । यदि आपसे कह दिया जाये कि आप भी भगवान बन सकते हैं । तो आपको कितनी खुशी होती है । इसको एक सरल उदाहरण से समझिये । इसी प्रथ्वी पर मनुष्य के लिये नारकीय जीवन और स्वर्गिक सुख जैसी दोनों स्थितियाँ हैं । जिसने अपना उत्थान कर लिया । वह स्वर्ग के मजे लूटता है । और जिसने पतन किया । वो दुखी रहता है । तो उसने बिना भेदभाव के सबको समान अवसर दिया । उत्थान पतन के इस खेल का चक्र सदा जारी रहता है । गहराई से सोचें । तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है ।
Aurag sagar me maine padha tha wo jeevo ko khata hai param purush ne use shrap diya par aisi taisi to jeevo ki ho gai phir kaal pursh ka isme kya dosh hai wo to parm pita ke haath me hai use mitata kyo nahi taki ye lafda hi khatm ho jaye ,
- काल पुरुष कोई हौव्वा नहीं है । यदि किसी व्यक्ति पर कोई मुकद्दमा चल रहा हो । तो न्यायाधीश उस अपराध का पूरा काल । गतिविधियाँ । उचित अनुचित आदि पर संविधान अनुसार विचार विमर्ष कर उस व्यक्ति को सजा देता है । गौर करें । तो ये भी तो न्यायाधीश ने उस व्यक्ति को कर्म अनुसार खा लिया । दूसरे शब्दों में यह जीव का शोधन ही तो हुआ । ठीक यही काल पुरुष का कार्य है । यदि वह जीव को खाये न । तो सृष्टि का कृम कैसे चलेगा ? जैसे 84 के किसी जीव की मृत्यु हुयी । तो उसका भोग काल पूरा हो गया । फ़िर अगला भोग शुरू हुआ । लेकिन यदि मनुष्य की मृत्यु ( काल आहार ) हुयी । तो उसके पूरे जीवन का निचोङ निकाल कर सार पदार्थ ( कर्म । संस्कार आदि को ) को आगे की गति हेतु भेज दिया । फ़िर तुम मरने वाले काम करते ही क्यों हो । वह सभी को खाता ही है । ऐसा भी नहीं । पुण्यात्मा उच्च देव पदों पर सुशोभित होते हैं । अतः यह अपने कर्म फ़ल ही हैं । यदि बारीकी में जाया जाये । तो काल का भी काल ( महाकाल ) होता है । वह काल को खा जाता है । इसलिये यदि आप ज्ञान युक्त हैं । तो काल महाकाल आपका कुछ भी नहीं बिगाङ सकते । वरना अज्ञानी तो हर स्थिति में दुख ही भोगता है । फ़िर वह बस पकङने जैसा मामूली काम ही क्यों न हो । आपने बिलकुल ठीक लिखा - सत्यपुरुष काल पुरुष को मिटाता क्यों नहीं । मिटाता है । आत्म ज्ञान युक्त हँस जीव काल और फ़िर कृमशः महाकाल को भी खा जाता है । जब सभी सुविधायें मौजूद हैं । तो उसका लाभ उठाना न उठाना तुम्हारे हाथ में है ।
kyoki kaal purh ki tarah use bhi koi hisab magne wala nahi to mita de aur sabhi jeevo ko chuda le ye ul jalul ke khel me kya phayda mila sidhe jeevo ke hitaisi param purush use satyalok me posting kyo nahi de deta kyoki jeev to usi ke ansh hai aur wo bhi vivesh ?
- वास्तव में यह हँस जीव यहाँ त्रिलोकी में सृष्टि रूपी मेला देखने आया था । पर्याप्त धनी था । मुक्त था । अमृत इसका आहार था । पर ये त्रिलोकी की वासनाओं से इस कदर मोहित हुआ कि बेहद गरीब होकर काल का कर्जदार हो गया । हँस से काग ( कौआ ) वृति हो गयी । और विषय रूपी विष्ठा ( काम । क्रोध । लोभ । मोह । मद ) इसका आहार हो गये । तब यह काल माया का कैदी हो गया । तो गलती किसकी थी ? वास्तव में यह वायदा करके आया था कि अपना परिचय ( हँस ) और आपको ( सत्यपुरुष ) याद रखूँगा । और जल्द ही लौट आऊँगा । मगर यहाँ माया ( माता पिता पत्नी बच्चे भाई बहन धन सम्पत्ति मान प्रतिष्ठा ) जैसे कुचक्रों में फ़ँस गया । जबकि ये सिर्फ़ मेले के साथी थे । जीवन में दो दिन का मेला जुङा । हँस जब भी उङा तब अकेला उङा ।
Q2 ) Kaal purush urf krishna kumar, maya bhabhi urf astangi ke hatho se is Satyanaam ke prabhav se jeev aajad ho jayenge to phir ek na ek din to uska khel khatm hoga hi, aur ye srishti khali ho hi jayegi kyoki parmpursh apne jeeevo ko stlok bulana chata hai To phir Last me Kaal purush ka Kya hoga Kyokig aurag sagar ke hisab se to wo stlok se bhaga diya gaya hai yani shapit hai To phir kya ye dono hi "jangal me Mangal"( Kaal purush aur astangi ) karte rahenge ya phir Satyapurush phir se inhe jeevo ki aisi taisi karne ke liye Prime Minister Bana ke Kisi aur lok Me posting de dega Kaal purush ka kya hoga Bhai ? ye Jarur Batana kyoki Sabhi Phasad ki Jad ye dono Baap Beta hi hai Jeev ki to jaise......Maa......bhen ek kar rakhi hai Ganga gaye to ganga daas Aur Jamuna gaye to Jamuna daas jaisi wali sthiti Kabeer ke dohe me Chalti Chakki dekh kar diya kabeera roy Baap ( Satyapursh ) Beta ( Kaal purush ) ke khel Me Sabut Bacha Na Koy ?
- ऐसा लगता है । आपने अनुराग सागर या अन्य धर्म ग्रन्थों या मेरे ब्लाग्स को ठीक से नहीं पढा । या आप बात की गहराई ठीक से नहीं समझना चाहते । आदि सृष्टि के बाद से ही ये सृष्टि चल रही है । और अनन्त काल तक चलती रहेगी । क्योंकि ये आत्मा से स्वपनवत है । क्या आप विराट सृष्टि में जीव आत्माओं की संख्या का अनुमान लगा सकते हैं ? दूसरे लाखों जन्मों के पुण्य संचय के बाद आत्म ज्ञान की तरफ़ झुकाव होता है । और फ़िर मोक्ष मार्ग की यात्रा शुरू होती है । कभी कभी ये कई जन्मों का सिलसिला होता है । और हरेक कोई इसमें पूर्णतया  सफ़ल भी नहीं होता । मैं इसका सही सूत्र विस्तार से किसी बङे लेख में बताऊँगा । पर संक्षेप में इतना समझ लो । आत्मा ( अनादि ) में जब कोई वैचारिक हलचल ( स्फ़ुरणा ) पैदा होती है । तब मन ( काल पुरुष ) पैदा  होता है । क्योंकि ये इच्छाशक्ति ( अष्टांगी ) के द्वारा भोग करता है । तब तीन पुत्र ( या गुण - सत रज तम ) उत्पन्न कर स्वपनवत ( माया के परदे पर ) सृष्टि करता है । ये ( वैचारिक ) वासना द्वारा उत्पन्न ( मगर आत्म स्तर पर आभासित । जैसे मनुष्य को स्वपन सच लगना ) सृष्टि को - मन + इच्छाशक्ति + तीन गुण + 33 करोङ मनोवृतियों को मिलाकर जो संयुक्त इच्छा शरी्र निर्मित होता है । उसी की संज्ञा जीव है । कैसा अदभुत खेल बनाया । ईश्वर बृह्म जीव और माया । अर्थात ये चारों ज्ञान के धरातल पर एक ही है ।
Q3 ) Ye yam Lok kaha hai iski duri prithvi se kitni hai ?
- इसकी ठीक दूरी अभी मुझे ज्ञात नहीं । फ़िर भी स्मृति आधार पर यह लगभग 24 000 योजन है । 1 योजन 4 कोस यानी 10 किमी के बराबर होता है । इस तरह यह लगभग 1 00 000 किमी के करीब है ।
aur Mrityu ke baad kya sabhi jeevo ko waha le jaya jata hai agar kuch jeev apne samanya karmo ke hisab se 84 me jate hai to ? aise kaun se log hai jo yam lok ki hawa khane ka special paap karte Hai ?
- प्रायः माँसाहारी भोजन करने वाले । जीवहत्या करने वाले निश्चय ही बने पाप अनुसार नर्क में जाते हैं । फ़िर वह किसी भी देश काल जाति धर्म समुदाय आदि आदि के हों । कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं कह सकता कि हमारे धर्म में माँसाहार जायज है । स्वांस स्वांस का करो विचारा । बिना स्वांस का करो आहारा । इसके अतिरिक्त पर स्त्री या पर पुरुष से से काम भोग करने वाले । हत्या करने वाले । पराया धन हङपने वाले आदि बहुत प्रकार हैं । जो निश्चय ही फ़लानुसार विभिन्न नर्कों में गिरते हैं । लेकिन आप इसको रामचरित मानस के एक दोहे से बखूबी समझ सकते हैं - परहित सरस धर्म नहीं भाई । पर पीङा  सम नहीं अधिकाई । यानी दूसरे को दुख पहुँचें । ऐसा कार्य ही सबसे बङा पाप है । इम्हें उपहार स्वरूप निश्चय ही घोर नर्क प्राप्त होता है ।
Mr. Chitragupta & Company Yamlok me is prithvi par hi le lijiye 7 Kharab ke as pass ki aabadi Hogi ye mai anuman se kah raha hu itne logo ka lekha Zokha rakhne me to super computer ki bhi halat kharab ho jayegi phir ye inki company ka management kis tarah se karte hai kripya batane ka kast jarur kare ? 
- जिस प्रकार एक कम्प्यूटर में बहुत सा बहुत प्रकार का डाटा रिकार्ड होता है । लेकिन नेट में आप जो शब्द खोज करते हैं । वही परिणाम आता है । इसी प्रकार प्रत्येक जीवात्मा में अंतकरण । चेतना ( पावर यूनिट ) जीव पाप पुण्य परिणाम जैसी प्रोग्रामिंग होती है । जो पलक झपकते ही सब बता देता है । ध्यान रहे । कुरआन में भी इसी किताब का जिक्र है । पर जानकारी के अभाव में वह उसका गलत मतलब समझ बैठे हैं । कुरआन में कयामत या प्रलय शब्द दरअसल जीवात्मा की मृत्यु का ही संकेत देता है । जीवन सृष्टि और मृत्यु प्रलय का ही घोतक है ।
Yamduto ke dwara jeev ko yampuri le jane me kitna Time lagta hai ?
- प्रथ्वी से यमपुरी की सीमा तक बहुत हद चार मिनट लगते हैं । लेकिन यमपुरी की सीमा में पहुँचने के बाद मृतक जीवात्मा की यात्रा के कई तरह के नियम है । एक निश्चित दूरी बाद यमदूत बदल जाता ( जाते हैं ) है । यम दरबार में पेशी होने से पूर्व इसे कई अजीवोगरीब अनुभवों से गुजरना होता है । यमपुरी की खासियत यह है कि इसके वातावरण में कुछ कुछ कालापन सा है । जैसे काली आंधी आने पर लगता है । भवन आदि का रंग भी कालेपन की अधिकता लिये मटमैला सफ़ेद जैसा है । आपको भूत प्रेतों का वर्णन रोचक लगता होगा । पर यहाँ के मृत्यु कन्या आदि परिवार के लोग ( निवासी ) उन्हें बहुत फ़ीका कर देते हैं ।
ajamil ki katha to apne suni hogi wo hi ek numbari sari jindagi aish ki aur ladke ka naam rakha narayan aur yamduto ke dwara uski raksha Vishu ke duto dwara ki gayi Ye kaise hua kyoki usne to Advait se koi diksha Nahi li thi phir  iska matlab wo Narayan kehne se Hi bach gaya lekin apke lekho ke hisab se sache sant dwara diksha (advait) mil jane ke baad ye Tanta wahi tut jata  hai is theyori ko khul kar clear kare kyoki ? 
- यदि राम का उल्टा मरा मरा जप कर वाल्मीकि बृह्म समान हो गये । उल्टा नाम जपा जग जाना । वाल्मीकि भये बृह्म समाना । तो कितने ही दिन रात सीधा राम राम जपते रहते हैं । फ़िर तबसे आज तक
1 भी । ध्यान दें 1 भी ? वाल्मीकि क्यों नहीं हो पाया । इसका मतलब आज राम राम कहने वाले सभी मूर्ख हैं । अजामिल जैसी कथायें सिर्फ़ काल पुरुष और उसके एजेंटों द्वारा फ़ैलाया मायाजाल है । आपने कई ऐसे लोगों को मृत्यु के समय देखा होगा । जिनके परिजन उनसे मृत्यु के समय अपने अपने धर्म अनुसार राम राम । गीता पाठ । गंगाजल पिलाना । बछिया पुजवाना ( गाय का बच्चा ) तुलसी पत्र खिलाना । भगवान आदि की फ़ोटो से मस्तक नवाना आदि क्रियायें कराते हैं । इतने प्रपंचों के बाद भी किसी एक के भी यहाँ विष्णु का दूत आया । जब आपको पता है । जीवन भर पाप करो । और मृत्यु के समय राम बोल दो । तो इससे अच्छा सौदा कौन सा है ? बहुत से बोलते हैं । कभी देवदूत बचाने आये । आपने भगवान के लिये यह सुना होगा । जिसको मारा । उसको तारा । फ़िर राम के हाथों मरा रावण अगले जन्म में शिशुपाल कैसे बना ? जब तर गया था । ध्यान रहे यह कृम - जय विजय । हिरणाकश्यप हिरण्याक्ष । रावण कुम्भकरण । कंस शिशुपाल तक तो बङे स्तर पर ही गया । झूठी कथाओं के सिलसिले में आपने एक और चीज देखी होगी । फ़लानी लङकी विश्वास के आधार पर नदी चलकर पार कर गयी । कोई भगवान को भोग लगाने का मतलब सचमुच खिलाना समझ बैठा । तो भगवान को प्रकट होकर रोटी खानी पङी । मैं कह रहा हूँ । इस तरह की घटनायें आपकी या आपके पूर्वजों की जानकारी में कहीं घटी ? एक राजा था ( कब था ? ) एक ब्राह्मण था ( मगर कब और कौन था ? ) यदि अता पता था भी । तो इतना पुराना कि आपके पूर्वजों के भी पूर्वज उस समय डायपर ही पहनते होंगे । जाहिर है । यह सब झूठों द्वारा फ़ैलाये गये झूठ ही हैं ।
Aaj kal Bahut se log yamlok ko Bakwas samjhte hai aur diksha lene wale ko bewkuf ? Aur waise bhi Lato ke bhut Bato se Nahi Mante Lekin apke utar se Mere Jaise Log Bhale hi der se sahi Manenge to ? To isliye Jawab Jalebi ki Tarah nahi Samosa ki tarah Hona Jaruri Hai
- जानिये जीव तबही जग जागा । जम का डण्ड जो सर पे लागा । आछे दिन पाछे गये किया न हरि से हेत । अब पछताये होत का जब चिङिया चुग गयी खेत । बचपन खेल में खोया । जवानी मेल में खोयी । बुढापा देख के रोया । आयी मौत तो रोकर बोला - अब का होया । अब का होया ? ऐसे ही लोगों के लिये कहा है ।
Q4 ) Ek din me lakho-croro log mar jate hai yadi usme se 50,000 ki Bhieshi yamlok me hoti ho to waha uske sare janam ka record khangale me Ya Chalan pesh karne me Mr. Chtiragupta ko kitna samay lagta hoga aur peshi kitne dino chalti hogi ? 
- निगुरा ( हँसदीक्षा रहित ) ज्ञानरहित जीवन बिताने वाले सामान्यतया 84 लाख योनियों में ही जाते हैं । हँसदीक्षा वाले या तो अगला मनुष्य जन्म या फ़िर मुक्त हो जाते हैं । सच्चे गुरु से जुङे धार्मिक प्रवृति के साधारण लोग जिन्होंने पुण्य धर्म दान आदि बहुलता से किये हों । स्वर्ग आदि के पुण्यफ़ल अनुसार अधिकारी होते हैं । द्वैत के कुण्डलिनी आदि के अच्छे साधक साधना के अनुसार छोटा या बङा देव पद प्राप्त करते हैं । सिर्फ़ योग साधना करने वाले सिद्ध आदि हो जाते हैं । तीन प्रमुख देवताओं की उनके गुण के आधार पर साधना लरने वाले कृमशः बृह्मा के - यमदूत टायप कार्यकर्ता या सृष्टि विषयक अन्य छोटे मोटे कार्यों में सहायक गण बनते हैं । विष्णु के अच्छे किस्म के देवदूत आदि कार्यकर्ता । शंकर के भूत प्रेत बेताल योगिनी डाकिनी शाकिनी आदि गण बनते हैं । आपके प्रश्न भाव के अनुसार यमलोक सिर्फ़ पापी ही जाते हैं । जिन्हें नर्क प्राप्त होता है । स्वर्ग प्राप्त हुये लोग यमलोक नहीं जाते । पाप पुण्य का रिकार्ड हमारे अंतकरण में ही रिकार्ड होता है । यह मृत्यु के समय स्वचालित तरीके से फ़िल्मी रील के समान घूमता है । मृतक को स्पष्ट अपने कर्म और उसका फ़ल दिखाई देता है । मुश्किल से 15 मिनट में यह रील घूमकर ठहर जाती है । और इसी के फ़लानुसार जीवात्मा की अगली गति तय हो जाती है । यह सब मृत्यु के बाद थोङी ही देर में हो जाता है । सिर्फ़ नर्क प्राप्त व्यक्ति को स्थिति अनुसार अधिक समय इधर उधर कष्ट सहना होता है । जैसे एक गम्भीर कैदी को हवालात जेल सजा आदि प्रक्रियाओं से गुजरना होता है ।
Kya Prithvi lok ke judgeo ki tarah Hi waha Bhi Yamraj ki post hoti Hai jo ek se adhik ho agar yamraj ek hi Hai to phir itne logo ki ek din me peshi kaise hogi ? Khul kar bataye lekh bada hone ki chinta mat karna kyoki ye sab sawalo ki jawab sab panter log Jalebi Bai ki hi tarah dete hai Bhale hi Der ho lekin ek hi lekh me dijiye.........varna aap keh sakte hai mujhe eska jawab nahi malum mai samajh jaunga ..ki satya ki  khoj karne me time lag sakta Hai ?
- लोगों में फ़िल्मी यमराज की कल्पना अधिक है । वास्तव में मुख्य यमराज 1 प्रथ्वी का 1 ही होता है । पर उसके सहायक अधीनस्थ कुछ अधिक होते हैं । यह यमलोक पूरा एक बहुत बङे नगर के समान छोटा लोक है । मेरे अनुभव के अनुसार यह उत्तर दक्षिण दिशा के मध्य में प्रथ्वी से कुछ ही हजार योजन की दूरी पर है । ऊँचाई भी अधिक नहीं है । नर्क आदि या कठिन सजाओं को प्राप्त जीवात्मा को कुछ लम्बे समय तक विभिन्न मुकद्दमे के समान परिस्थितियों से गुजारा जाता है ।
Q5 ).Ek (  Hans Diksha ) prapt sadhak ke parivar ke log yadi hans diksha sadhak ke ma baap ne na li ho to uski mrityu ho jane par uske maa baap ki kya Gati hogi ?
- साधारण स्तर के साधक के माँ बाप की काल पुरुष के संविधान अनुसार उनके ( जीव ) कर्मों के आधार पर ही गति होगी । क्योंकि आत्मा के स्तर पर जीव के माँ बाप जैसे सम्बन्ध नहीं होते - मात पिता भगिनी सुत दारा । यह सब माया का परिवारा । यह ठीक उसी तरह है । जैसे एक लङका पढे । और आप कहें कि उसके घर के सभी को सरकारी नौकरी और तनखाह मिले । लेकिन साधक यदि उच्च स्तर का राम भक्त है । तो घर वालों को भी लाभ मिलता है । ये ठीक उसी तरह है । घर में कोई D.M या मिनिस्टर हो जाये । तो सभी को कु्छ अंशों में लाभ होता है ।
Ya Hans diksha wale Sadhak ko apne maa baap ki sadgati ke liye kya kriya karni hogi vaidik riti wali taaki unki atma ko shanti mile ? aur kya Dhyan me ja kar wo sadhak apne maa baap se mil sakta hai ya dekh sakta hi jaise nark lok, swarg lok, etc me sukshm sarir ke dwara ja sakta hai kya ?
- सबसे पहले तो जहाँ ( जिस घर में ) आत्मज्ञान का प्रवेश हो जाता है । वहाँ के दूसरे अन्य जीव माता पिता आदि भी इन तरंगों से अछूता नहीं रह पाते । लेकिन फ़िर भी वे यदि जङ बुद्धि टायप या हठी हैं । और साधक उनका कल्याण करना ही चाहता है । तब वह गुरु से निवेदन कर दान ( धन आदि ) भक्ति ( अपनी नाम कमाई से ) आदि क्रियाओं से उन्हें सदगति दिला सकता है । जो उन पर उस भक्त पुत्र की कर्ज रूप होगी । और अधिकतम एक मनुष्य जीवन का ही मौका मिलेगा । सिर्फ़ नगण्य % लोग ही हठता के शिकार होकर अधोगति को प्राप्त होते हैं । वरना अक्सर सुधर जाते हैं । कोई भी अच्छा साधक इसी जीवन में उनकी प्राप्त स्थिति को बखूबी देख सकता है ।
Nark me yadi ho to kyoki bina diksha ke Nigura chahe koi bhi ho Nark hi jayega na isliye maa baap se milne ke liye ja sakte Hai hans diksha ke madhyam se.........Jarur bataye ?
- दरअसल ज्ञान होते ही माता पिता पत्नी आदि यह माया का भृम टूट जाता है । फ़िर कोई भी जीव सबमें परमात्मा ही है । ऐसा ही देखता है । फ़िर भी आपके प्रश्न के अनुसार साधक उनकी स्थिति को तो देख सकता है । पर मिलना आदि बङे साधक के लिये ही सम्भव होता है । सबके लिये नहीं ।
Q6 ) Hans Diksha prapt karne par kitna abhyas karne par ya kitni naam kami ya sadhan karne par vakti param Hans diksha prapt karne ka adhikari ho jata Hai ?
- 1 दिन से लेकर 10 जन्म तक । क्योंकि यह सब स्वयं व्यक्ति की पात्रता लगन मेहनत पूर्व जन्म के संस्कार भक्ति संचय आदि बहुत सी चीजों पर निर्भर करता है । बृह्माण्ड की चोटी तक पहुँच जाने के बाद परमहँस दीक्षा होती है । यहीं से परमात्म क्षेत्र की सीमा शुरू हो जाती है ।
Q.7) Yadi koi hans dikshit sadhak Niyamnusar sumiran dhyan bhajan etc karta hai to dhyan me wo kis prakar ki chadhai karta hai mera matlab use praranbhik awastha me kya kya dikhta hai step by step bataye ?
- प्रत्येक व्यक्ति की पूर्व पात्रता अनुसार यह अलग अलग होता है । फ़िर भी अक्सर घूमता हुआ बङा सा
प्रकाश चक्र अधिकतर दिखाई देता है । इसके बाद हमारे यहाँ सूक्ष्म शरीर से यात्राओं के बजाय साधक को इससे अगले चरण कारण शरीर से जोङ देते हैं । इससे वह तेजी से मुक्त होता है । व्यर्थ के उलझाव और फ़ँसने से बच जाता है । कारण शरीर में वह अपने विभिन्न मनुष्य जन्म और संस्कार नष्ट होते हुये देखता है । इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ घटता है । जो थोङे शब्दों में नहीं बताया जा सकता ।
Q8). Hans diksha me As a Turist aadmi kitni sadhna karne par Man Chahe loko me Ghumne Phirne ka visa Prapt karta hai Jara Khul ke bataye ?
- साधना में जो ऊँचाई और स्थिति प्राप्त होगी । उतनी ही ऊँचाई तक और उससे नीचे के सभी स्थान ( लोक ) अपनी ( प्राप्त ) क्षमता अनुसार घूम सकता है । पूर्णत मुक्त हुआ पुरुष ही सर्वत्र गति करता आ जा सकता है । सन्तों योगियों के असंख्य स्तर बनते हैं । अतः आपके भाव अनुसार बता पाना सम्भव नहीं है । इसको मनुष्य जीवन से ही समझ सकते हैं । यहाँ भी समर्थ धनी पुरुषों का ( वो भी व्यक्तिगत जम्बो जेट से ) एक पैर यहाँ तो दूसरा धरती के दूसरे कोने पर होता है । वही योग में भी है । क्योंकि योग का मतलब ही धन से है ।
Kyoki dhyan karna waise hi bada boring hai ?
- यह  सिर्फ़ आप कह रहे हैं । ध्यान के अनुभवी ही जानते हैं । इससे ज्यादा आनन्ददायक कुछ भी नहीं है ।
Aur log to dhyan karna hi nahi chahte 
- सभी धर्मों में तमाम पूजा पँथ के ढकोसलों के बजाय आज जनसंख्या का बहुत बङा % किसी न किसी तरह के ध्यान से जुङा है । आप शायद कुँये में रहते हैं । इसलिये उससे अधिक नहीं सोच पाते । 
lekin agar koi turist type ka aadmi agar is yog ko karta hai to uske labh ya Tour Package ke bare me bata diya jaye to phir swabhavik hi us Tour package ko paane ke liye lalayit hoga hi na ?
- आपके ही शब्दों में टूर टूरिस्ट टूर पैकेज ये सब किसके काम हैं ? धनी लोगों के । वे अपनी क्षमता अनुसार टूर । टूर पैकेज आदि तय करते हैं । आपके पास जितना माल है । उतनी ही मौज होगी । ठीक यही बात योग में हुयी प्राप्ति के आधार पर तय हो सकती है । अब कोई गाँव का रामलाल हलवाई सिंगापुर टूर के सपने देखे । तो यह मूर्खता से अधिक नहीं है । सिर्फ़ लालायित होने से कुछ नहीं होता । जी तोङ मेहनत करनी होती है ।
Q9) As a tourist ( Hans diksh visa prapt ) Mai dhyan avastha me yaksh lok aur swarg lok ki apsaro ke darshan aur other benifit bhi lena chaunga kya wo milegi kyoki kundlini me to yahi sab hota hai to hans wale ko kya bhog karne ke liye koi mauka nahi milega wo kya sirf Mithai dekh kar lalchata hi rahega ki ye kesar barfi, wo gulab jamun etc.
- ज्ञान चाहे द्वैत ( कुण्डलिनी ) का हो । या अद्वैत का । ये सभी कुछ दोनों में जीवात्मा के संस्कार अनुसार आता है । हँस जब तक बृह्माण्ड की चोटी पार नहीं हो जाता । ऐसे बहुत से खेल तमाशे हैं । इतना ही नहीं । अद्वैत के योगियों के लिये देवी स्तर की दिव्यात्मायें भोग को प्राप्त होती है । लेकिन अद्वैत का विमान तेजी से उङता है । इसलिये जल्दी पार हो जाता है । द्वैत में भोग विलास ही अधिक है । अतः प्राप्त होने तक और उसके बाद भी ऐसे अवसर सदा बने रहते हैं । परन्तु ध्यान रहें । अवधि  पूरी होने पर द्वैत की कोई भी उपाधि सिर्फ़ और सिर्फ़ 84 में ही गिरेगी । इसलिये ज्ञानी इस तरफ़ आकर्षित नहीं होते । जहाँ तक भोग की बात है । अद्वैत के नौकर चाकर द्वैत के मन्त्रियों से अधिक ही वैभव वाले होते हैं । पर ये सब कठोर तप धैर्य  और कङी मेहनत से मिलता है । 
are bhai sabko forward kar doge to picture kab dikhaoge thoda enjoy ka bhi mauka is diksha wale ko milta hai ki sukha hi uper udta rahta hai ki tum yahi atak jaoge Uper bahut kuch hai lekin niche bhi to kuch kam Nahi to uska bhi sukh lene ki ktni chut is sadhna me hoti hai warna wahi bat hogi  aadhi chod sari ko dhave Na adhi khave Na sari Khav ?
- इसको एक लाइन में समझा जा सकता है । सभी कुछ संस्कार ( जीव के अन्दर पदार्थ ) पर निर्भर करता है । जो आपको अप्रिय लग रहा है । उसी में जीव का भारी हित होता  है ।
apke lekho me padha tha ki intersting lok me dhyan jane par guru waha andher kar deta hai yani adult philm suru hone ke baad editing kar dete ho to phir theatr me hi kyo ghusate ho sidhe satlok hi kyo nahi dikha dete agar rasta wahi hai to thoda enjoy bhi karne do bhai ? waise hi waha koi ja nahi pata aur jata hai to bhukhe hi phir kya maza ? Humko to koi phi mele yakshini, apsra, ya phir devi sundari ? aisa julm kyo karte ho aap log..........kamaal karte ho aap Rajeev Ji uttar jarur Jalebh Nahi banana Bura mat Manana lekin mujhe to aisi hi sadhna karna hi phir dhire dhire uper ke lok dekhenge Ha...ha.. Ha.....
- ऐसे अनुभव छोटे स्तर पर होते हैं । अधिक होने पर जीव भृमित हो सकता है । या और अधिक माया में फ़ँस सकता है । गुरु नियम अनुसार अपनी ड्यूटी निभाता है । ये ठीक वैसा ही है । आपरेशन थियेटर में आप डाक्टर से कहो - बार बार ऐसा ही नशे का इंजेक्शन लगाकर मुझे बेहोश रहने दो । यहाँ ठंडक में बङी अच्छी नींद आती है ।
Q10). Agar koi panter type ya Mere type ka aadmi ( Hans Diksha ) lekar khalas ho jata hai yani mar jata hai to uski bangdu wali adat to abhi chuti hi nahi uska dhyan to masala pane ke liye hi lalayit tha to phir us Bangdu ki kya gati hoti hai use koi divya lok me thoda stya karne ka mauka dete ho ya phir khali kanglaa aa gaya karke waha se sidhe manav bana dete hai ?
- वास्तव में ऐसी स्थिति होने पर इसके ठीक विपरीत होता है । उसकी पशु मानसिकता अनुसार हँस दीक्षा होने के बाद भी उसे दण्ड स्वरूप थोङे समय विभिन्न पशु योनियों में जाना होता है । जो आप चाह रहे हैं । वह मिलना तो बहुत दूर रहा । वैसे मैं इसको अपवाद ही मानता हूँ । क्योंकि प्रायः ऐसा होता नहीं है ।
सच्ची हँस दीक्षा उसी को प्राप्त होती है । जो पहले द्वैत में चलकर आया हो । या सन्त सेवा या पुण्य़ संचय किया पुण्य़ात्मा हो । आपके कहने का भाव ऐसा है । जैसे जाहिल मूर्ख गंवार को आक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में एडमिशन मिल जाये । और ऐसा कभी नहीं होता । बल्कि पृष्ठभूमि के आधार पर होता है । और ऐसा व्यक्ति इस तरह का पागलपन नहीं करता ।
Agar thodi sadhana ki ho to wo kya waha icha anusar ek hi din sahi kuch time to gujare gujraat me kar sakta Hai kya ? ye jarur batana ?
- हँस दीक्षा की थोङी भी साधना होने पर प्रायः तुरन्त अगला मनुष्य जन्म ही प्राप्त होता है । 
Q11)  Rajeev Baba Ji aapke hi lekho me padh chuka tha ki Hans diksha wale Bhagwan Ya us se bhi Bade Post par Ja sakte hai Ye kaise ? Kya Bramha, Vishnu, Mahesh Ki post Bhi UPSC ( hans diksh ) Ke exam ki tarah hai  aur Jo isme achi Rank Lata Hai uski Posting IAS, IPS, IFS ya Bhagwan Jaise pado ko prapt kar lete hai ye kuch samj nahi paya tha thoda khul kar batye ki for the post of Bhagwan How to prepare in hans Diksha & when we will get the post of bhagwan ? kya phir Hame bhi unhi ke equal me vaise hi lok kisi aur sristhi me milnge usi power ke sath kripya bataye ?
- कुण्डलिनी के द्वैत योग में भी सायुज्य ( क्लोन ) सारूप्य ( इष्ट के समान रूप अधिकार ) सालोक्य ( उसी के समान लोक ऐश्वर्य की प्राप्ति ) सामीप्य ( इष्ट की निकटता ) ये चार प्रकार की मुक्ति या पद का विधान है । जाहिर है । द्वैत में भी भगवान पद प्राप्त करने का प्रावधान है । अन्यथा ये असंख्य विष्णु शंकर काल पुरुष आदि आते कहाँ से हैं ? फ़िर अद्वैत के पदों की तो बात ही अलग है ।
Taaki Bhai log Choti Moti IAS IPS IFS ki tayari ko chod kar aur President aur Pepsodent jaise Pad chod kar is or ki badi Padhai ki aur lalah se hi sahi Aa sake ?  Kyoki Hira ye Na kahe Lakh taka mero Mol ?
- IAS IPS आदि ही लोहे के चने चबाना है । तब फ़िर ये कितना कठिन होगा । अन्दाजा लगाया जा सकता है । बातें करना और बात है । जब करने की बात आती है । तब नानी याद आती है ।
Q12 ) Aapke lekh Mujhe Nind Na aaye Me padha tha ki Nind aapko nasib Nahi ye kya lafda hai rajeev ji aap chah kar bhi nahi so sakte kyo ki aapka dhyan nind me Jate hi kisi lok me pahuch jata hai Jaha aap logo ke Nange Sanskar dekh leto ho, Jaise koi vasnatmak aur bhi Mast raam wale sanskar phir aap un sanskaro ki bhi aisi taisi karke raat 3 baje prithvi par aate ho? Ye kya mazra hai jara publik ko khul kar samjaho ki unka software kaise delete karte ho
- किसी भी विशेष प्रशिक्षु साधक का यह सत्ता द्वारा आदेशित कर्तव्य होता है । जैसे सूर्य रोज निकलता है । और उसकी किरणें प्रकाश के साथ साथ गन्दगी पर भी पङती है । तब गन्दगी सूर्य ताप के साथ अवशोषित होकर नष्ट होने लगती है । यही नंगे संस्कार देखना और उनका नष्ट करना है ।
aur ye sab karke apko kya fayda milta hai aap hi ke blog sisya ki kasuti me bhi aapne ye hi kaha tha ? Ye Sanskar lok bhi Hota hai kya ?
- संस्कार लोक नहीं होता । वरन यह शिष्य की ( यथा ) व्यापक चेतना ( सूर्य प्रकाश ) के  साथ आदेशित जीवों के संस्कार जुङ कर नष्ट होते हैं । जैसे जूसर फ़ल का रस निकाल कर उसका अवशेष हटा देता है । उसी प्रकार संस्कारित  शिष्य के प्रति यह कसौटी साधक और प्रकृति ( साधक का आंतरिक शरीर । चेतना । विधुत आदि अन्य अंग ) के सौजन्य से शोधन प्रक्रिया होती है । साधक के स्तर अनुसार ही उसको फ़ायदा होता है । जैसे अब सृष्टि की कोई भी प्राप्ति । कोई भी पद मेरे लिये सिर्फ़ हँसी मजाक का विषय है । यह सव करना मेरे लिये कर्तव्य बोध है । और अन्तिम वासना शरीर के औपचारिक दायित्व भी । 
आगे और भी प्रश्न उत्तर हैं । कुछ इंतजार करें । साहेब साहेब ।
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