09 जून 2013

धन आप किससे कमाते हैं - तानसेन

Q18 ) Dvait, Advait, Aur Vihangam Marg, Kundalini jagaran, surti sabad yog, ya aap jisko raj yog ya sahaj yog kahte ho ye ek hi ceez hai kripya bataye ? 
- द्वैत शास्त्रों का बहु प्रचलित शब्द है । जिसका शाब्दिक अर्थ 2 होता है । वास्तव में इसके सबसे उच्च और गूढ अर्थ में जाया जाये । तो द्वैत का अर्थ पुरुष ( चेतन ) और प्रकृति ( भावना या जङ सृष्टि ) ही होता है । और जब चेतन और प्रकृति का परस्पर संयोग होता है । तो तमाम पदार्थ ( पद + अर्थ ) उपाधि । स्थिति आदि का निर्माण होता है । क्योंकि इसके बाद भी चेतन निर्लेप ही रहता है । इसीलिये वह परमात्मा ( कहा गया ) है । अब इस मूल ( सृष्टि ) ज्ञान के बाद इसमें कोई भी भगवान । देवी । देवता । स्त्री । पुरुष । तत्व । महाभूत । महाशक्तियाँ आदि आदि कुछ भी जिसको आप जान सको । वह द्वैत ही कहलायेगा । सार ये कि - जहाँ 2 हैं । वही द्वैत है ।
अद्वैत - सिर्फ़ परमात्मा को ही कहते हैं । ध्यान रहे । यहाँ प्रकृति भी नहीं रहती । वह परमात्मा में ही लय हो जाती है । इसीलिये एक महत्वपूर्ण आध्यात्म सूत्र है - एकोह्म द्वितीयोनास्ति । अर्थात वही एक सभी में है । उसके अतिरिक्त कुछ भी दूसरा नहीं है ।
विहंगम मार्ग - पक्षी के समान सर्वत्र इच्छानुसार मुक्त गति को कहते हैं । इसका गुरु खास और दुर्लभ होता है । मजे की बात ये है । इससे ऊपर भी कुछ श्रेष्ठ गतियाँ होती है । पर मैं उनका खुलासा नहीं करूँगा । क्योंकि पाखण्डी बनाबटी साधुओं ने वैसे ही चोरी के ज्ञान से जनता को भृमित कर रखा है ।
कुण्डलिनी जागरण - कुण्डलिनी शक्ति रीढ के निचले पिछले हिस्से में कुण्डली मारे सोयी नागिन के समान है । यह मूलाधार से उठकर सहस्ररार चक्र तक जाती  है । यदि कोई साधक सिर्फ़ मूलाधार चक्र को ही जगा लेता है । तो उसका भी कुण्डलिनी जागरण ही माना जायेगा । यह अलग बात है । वह इसको कहाँ तक कर पाता है ।
सुरति शब्द योग - या  राज योग या सहज योग एक ही बात है । इसमें सटीक शब्द सुरति शब्द योग है । मन । बुद्धि । चित्त । अहम । इन चार भागों से बना अंतकरण जब एक होकर कार्य करता है । उसको सुरति कहते हैं । इसका काम ( अंतर के शब्द व ध्वनि आदि ) सुनना है । इसके अतिरिक्त एक निरति होती है । वह अंतर के दृश्य देखती है । शब्द अंतर वाणी या अंतर में होने वाले ध्वनि रूपी अनहद शब्द को कहते हैं । ये सुरति ऊर्ध्व ( ऊपर की ओर ) गमन करती हुये इसी शब्द ( को सुनती हुयी इसमें ) में लय हो जाती है । इसी को सुरति शब्द योग कहा गया है । शब्द की कई मंजिले हैं । सबसे ऊपर जो शब्द है । उसमें सुरति के लय होने पर परमात्मा का साक्षात्कार होता है ।
Aaj kal TV ke famous maharaj Kumar Swami, koi beej Mantar ki diksha dete hai ? ye kya locha hai beej mantar ka ? isse kya jo lakho log khade hokar apna phayda hota hai kai log us samagam me jate Hai Bhai Janta ke liye sahi apko is visay par kuch to lekh ke madhyam se hi Batana Hoga ? 
- मुझे भारतीय जनता को लेकर अफ़सोस है । या तो वह वैधानिक रूप से किसी जानकार के सानिंध्य में यह सब बीज मन्त्र आदि का जाप करते । या साधारण भाव भक्ति ही करते । पर एक बात अच्छी भी है । भारतीय जनता भेङचाल में आकर उस चीज को ( वास्तव में लालच भावना से ) यकायक ले तो लेती है ।  पर ध्यान नहीं देती । अभी लगभग 2 माह पूर्व हमारे नये शिष्य योगेश को पूर्व में किसी मूर्ख साधु ने पढाई के आधार पर बीज मन्त्र का जाप कराया । योगेश लालच भावना से इसको बङी गम्भीरता और गहराई से करते थे । बीज मन्त्र की अनियन्त्रित विध्वंसक ऊर्जा पैदा होने लगी । लेकिन उसको लगाने के लिये कोई यन्त्र तन्त्र प्रयोग उपयोग आदि उस साधु के पास कुछ भी नहीं था । लिहाजा योगेश के मुँह से खून आने लगा । और उनकी मानसिक स्थिति बिगङने लगी । कुण्डा प्रतापगढ के इस साधु ( योगेश का पूर्व गुरु जो अभी के कुम्भ मेले में बना था ) से जब योगेश ने परेशानी बतायी । तो वह बोला - करते रहो । तुम्हें विश्वास नहीं है । इसलिये ऐसी परेशानी आती है । संयोगवश नेट के द्वारा योगेश ने मुझसे फ़ोन पर सम्पर्क किया । और अपनी स्थिति के बारे में जानना चाहा । मैंने सपाट शब्दों में कहा - तुम्हारी मृत्यु की गिनती शुरू हो गयी । और मरना कौन चाहता है । योगेश तुरन्त भागकर मेरे पास आये । और आज सहजता से बिना किसी अतिरिक्त श्रम के उससे बहुत ऊँचाई वाला दुर्लभ राज योग कर रहे हैं । पहले ( के ) ध्यान से घवराहट गर्मी बैचेनी आदि होती थी । अब आनन्द शीतलता और गहन शान्ति का अनुभव होता है ।
Aur ye Bhi jo maine upar sadhnaye puchi hai usme kis kis sadhna ko karne se kya-kya prapt hota hai aur un sadhnao ko karne walo ki kya-kya gati hoti hai Ye Bataye ?
- प्रश्न करते समय ये ध्यान रखना चाहिये - हम क्या पूछ रहे हैं ? कभी कभी प्रश्नों में भारी अज्ञानता का समावेश रहता है । आपको हैरत होगी कि भारी भरकम धर्म ग्रन्थों में भी ज्ञान के बारे में जानकारी महज स्थूल रूप में है । सिर्फ़ संकेत मात्र । बारीक और सूक्ष्म स्तरीय जानकारी कहीं नहीं है । यदि संसार में प्रचलित वैज्ञानिक नजरिये से देखा जाये । तो कहीं भी नहीं । तब यदि मैं आपके 2 लाइन के प्रश्नों का स्थूल रूप से भी उत्तर दूँ । तो सिर्फ़ कुण्डलिनी पर ही ग्रन्थ लिख जायेगा । क्योंकि इसमें ही असंख्य साधनायें प्राप्तियाँ और गतियाँ होती है । पूर्व निर्धारित तरीके में थोङा फ़ेरबदल बदलाव एक नई स्थिति प्राप्ति का निर्माण कर देता है । फ़िर भी यदि कोई इच्छुक है । तो इस हेतु ढेरों धार्मिक साहित्य उपलब्ध है । उसका अध्ययन करके फ़िर जहाँ समझ में न आये । वहाँ पूछना तर्कसंगत और उचित है । यदि कुछ पाना चाहते है । तो तन मन धन का उपयोग कर कठोर श्रम करना होता है ।
Q 19 ) Akhil sristi me ghumne ka adhikari aadmi kab tak aur kaun si sadhna karne ke baad ban jata hai jara spast karkne ki kripa kare ?
- जिस तरह किसी वाहन में जितना ईंधन होगा । और वाहन की जितनी क्षमता होगी । और जैसी यान्त्रिकी होगी । वह वाहन उससे आगे ( यहाँ ऊपर ) नहीं जा सकता । अखिल सृष्टि में सिर्फ़ पूर्ण मुक्त पुरुष ही विचरण कर सकता है । जो शब्द के पार जा चुका हो । अगर सरल शब्दों में कहा जाये । तो परमात्मा से साक्षात्कार किया हुआ साधु । जिसकी मौज फ़क्कङ हो जाती है । यह सिर्फ़ आत्मज्ञान की सुरति शब्द साधना से ही सम्भव है । क्योंकि आदि सृष्टि से यही मूल और सनातन ज्ञान है । दूसरा कोई नहीं । जपु आदि सचु जुगादि सचु है भी सचु नानक होसी भी सचु । कब तक पूरा कर पायेगा ? इसके लिये साधक की पात्रता । लगन । मेहनत । समर्पण । यात्रा ।  ग्रहणता । अमलता आदि आदि गुणों के ऊपर निर्भर करता है । इसकी एक बङी शर्त यही है कि - गुरु पूरा होना चाहिये । जहाँ तक का गुरु होगा । वहीं तक जा पायेगा । फ़िर आगे का गुरु चाहिये । शब्द ध्वनि के रूप में वास्तव में ऊपर गुरु ही होता है । जो शिष्य की सुरति को अपनी चुम्बकीय ( गुरुत्व ) शक्ति से ऊपर खींच लेता है । यदि कोई एक ही पूर्ण गुरु परमात्मा की कृपा से मिल जाये । तो फ़िर बार बार गुरु बदलने की आवश्यकता नहीं होती । कोई भी साधक जिस ऊँचाई तक पहुँच जाता है । वह उसकी प्राप्ति ही होती है । और वह नीचे से वहाँ तक कहीं भी विचरण कर सकता है ।
aur usko kya kya adhikaar prapt hote hai yani purn Mukt Sant ya Aatma Gyani Sant ki bat kar raha hu ?
- ऐसी कोई प्राप्ति कोई अधिकार नहीं होता । जो उसे प्राप्त न हो । वास्तव में वह इनसे भी ऊपर होता है ।
aaj asharam bapu ke bare me bhi log kehte hai ki unko bhi aatm gyan prapt hua hai to kya ye satya hai kyoki aapki aur unki bate bilkul alag hai ?
- आत्मज्ञान किस चिङिया का नाम है ? आशाराम को दूर दूर तक नहीं पता । वास्तव में कुण्डलिनी के ही अंतर्गत आने वाले 5 तत्वों में से 1 तत्व का भी आशाराम को ज्ञान नहीं है । हाँ बहुत छोटे स्तर की सिद्धियां अवश्य हैं । यदि कोई निम्न स्तर का अच्छा तामसी तांत्रिक भी आशाराम के ऊपर प्रयोग कर दे । तो लेने के देने पङ जायेंगे । दूसरे आत्मज्ञानी कभी बेहूदा टायप बातें नहीं करते । शाब्दिक तन्त्र मन्त्र की बातें कर गुमराह नहीं करते । अनेकों मन्त्र । रास्ते नहीं बताते । आत्मज्ञान में सिर्फ़ निर्वाणी ध्वनि रूप मन्त्र होता है । जिसको अंतर में प्रकट किया जाता है । इससे हटकर जो भी बोलता है । वह गुरु बिना शक काल का दूत ही है । जो तुम्हें उबारने नहीं डुबोने का कार्य करता है ।
Ye ekadashi vrat karne par pandit Bhai Bahut jor dete hai Kya in vrato, tirtho Ko karne ka Bhi koi Phal Hai Ya aisi hi hai.. bataye?
- 5 ज्ञानेन्द्रियों 5 कर्मेन्द्रियों और 1 मन को एकाग्र कर प्रभु भक्ति (  अनहद ध्वनि ) में लगाना ही एकादशी ( 11 ) वृत ( वरतना ) है । 5 + 5 + 1 = 11 बाकी तोताराम पण्डितों द्वारा सुझायी गयी भक्ति भाव पूजा है । यह  ठीक इसी तरह है । जैसे हम किसी से कहते हैं - खाना खा लीजिये । तो हमारा उसके प्रति भाव ही हुआ । लेकिन वास्तविक व्यवहार तभी होगा । जब हम खाना खिला देंगे । और उसका पेट भर जायेगा । तब यह क्रियात्मक हो जायेगा । एकादशी को देवता विष्णु से खास इसलिये जोङा जाता है । क्योंकि सत्व गुण की वृद्धि और शुद्धता ही हमें ऊपर की और ले जाती है । क्योंकि सत्व गुण ही योग में ईंधन का कार्य करता है । दूसरे कार्यों में यह हमें बल भी देता है । हम नीचे से ही ऊपर की ओर जा सकते हैं । मूल शास्त्रों में वर्णित एकादशी वृत विधान सटीक है । पर लालची ( सिर्फ़ जाति के विद्वान नहीं ) पण्डितों ने मनमाने ढंग से इसे विकृत किया है । यहाँ याद रखें । शास्त्र आधार पर ही चलें । तो किसी भी यज्ञ वृत आदि का परिणाम तुरन्त या निश्चित समय में इसी जीवन में मिल जाता है । न कि मरने के बाद । जैसा कि पण्डित किसी भी धर्म कर्म की फ़ल प्राप्ति मरने के बाद बताते हैं । क्योंकि अनजान जीव को इसी आधार पर ठगा जा सकता है ।
Q20 ) Kaun se Daan  aur  Punya karm insaan ko karne chahiye jsse usko agle janam me Kafi Paisa Mile ya wo reach person bane, use sunder Biwi mile etc ?
-  जो बोओगे । वो काटोगे के सिद्धांत अनुसार यदि अगले जन्म में बेहद पैसा चाहिये । तो पैसा ( का दान ) बोओ । सच्चे साधु सन्त । निर्धन और जरूरतमन्द की धन से वस्तुयें आदि खरीदकर सेवा परमार्थ करें । यदि इतना समय नहीं । तो सीधा धन भी दे सकते हैं । सुन्दर पत्नी के लिये स्त्रियों के प्रति कोमल भाव । काम आसक्ति । और उनको उपहार देना । उनसे प्रिय बातें करना आदि जरूरी होता है । लेकिन इससे भी जरूरी किसी महत्वपूर्ण देवी की लगभग दिव्यता गुण लिये पत्नी और दिव्य सुन्दरता और दिव्य अंग वाली पत्नी हेतु आराधना की जाती है । ये  दोनों बातें मनुष्य स्तर पर हैं । लेकिन किसी भी अच्छे योग से जुङ जाने पर ये दोनों चीजें और पद शक्ति आदि अलग से प्राप्त होते हैं । याद रखें । बिना मेहनत और निवेश के कुछ भी प्राप्त नहीं होता ।
kya aaj ka kiya hua punya byaj ke saath kal yani agle janam me milta hai ? aapke lekho ke Hisab se mai kah raha hu ki aapne kaha tha ki hum apne Punyo ya Kamai ka Balance Bhi khud dekh sakte Hai ,wo kaise hota hai kripya lekh ko vistar se bhale hi thoda time lage Bhidu kyoki Ye jo public Hai ye kuch nahi janti Hai ye to public Hai...? 
- निश्चय ही मिलता है । और ब्याज के साथ ही मिलता है । पर मूल और ब्याज का % इस बात पर निर्भर करता है कि पुण्य का निवेश आपने कौन से तरीके और किस योजना के तहत किया है । वास्तव में आज आपको जो भी घर परिवार स्त्री बच्चे माँ बाप धन सुख दुख आदि आदि प्राप्त है । वह आज का नहीं । कभी के पूर्व जन्मों का ही कर्मफ़ल है ।
Ya keval Hans diksha ki Naam kamai se hi sab Mil jayega, Jaisa aapne apne blog ke kisi lekh Mai Divya Stri se Vivah Karna Chahta Hu Me kaha tha ?
- सच्ची हँस दीक्षा किसी उच्च महंगे और प्रतिष्ठित महाविधालय में प्रवेश मिलने जैसा है । जाहिर है । यहाँ  तक पहुँचने वाला गुणी और पुण्य का पूर्व धनी ही होगा । ये दीक्षा हरेक को नहीं मिलती । अब बिल गेटस लक्ष्मी मित्तल और वारेन वफ़ेट जैसे ही ऐसे विधालय में अपने बच्चे को पढा सकते हैं । और उनको यह सब सहज उपलब्ध होता है । बाद में भी होता रहता है । कहने का मतलब यहाँ तक पहुँचने के लिये बहुत कुछ करना होता है । अतः बाद में निसंदेह बहुत कुछ या सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है ।
Q 21 ) Aapke lekho me padha tha ki kisi sisya ko aapne kaha tha ki aap sisya hi nahi ho kyoki wo guru ashram nahi aaya tha ? diksha ke baad to phir aap ye bataye ki Hans diksha prapt aadmi ko diksha ke baad Apni padhai puri karne ke liye Aur usme PHD lene ke liye Guru ki kis prakar Tan, Man, Dhan, aur samarpan se seva karni padti Hai ?
- जिस तरह सिर्फ़ स्कूल में एडमिशन ( दीक्षा ) से पढाई और डिग्री पूरी नहीं हो जाती । तन मन धन तीनों के सहयोग से कठिन मेहनत करनी होती है । जिन्दगी में आप जो भी प्राप्त करना चाहते हैं । उसके लिये आवश्यक सभी चीजों को जुटाना फ़िर कार्य कराना भी आवश्यक होता है । उदाहरण के लिये आप मकान बनाना चाहते हैं । तो सिर्फ़ मकान का नक्शा या जमीन के लिये बयाना ( जमीन खरीद पक्की करने के लिये दी गयी कुछ अग्रिम धम राशि ) दे देने से मकान नहीं बन जाता । सीमेंट बालू ईंटे आदि दूसरी बहुत सी अन्य चीजों और क्रिया हेतु धन तथा आवश्यक समय और पूर्ण देख रेख की भी आवश्यकता होती है । तब मकान निर्माण होता है । गौर करें । तो यही सिद्धांत हर प्राप्ति में काम करता है । चाहे वह नौकरी । शादी । या बच्चे पैदा करना क्यों न हो । तब साधना के भी जरूरी अंग और जरूरतें होती हैं ।
Maan lo koi Sadhak India me nahi rehta lekin wo Satnaam ki sadhna Diksha lekar ( aapke Mandal ) se karna chata hai to wo Dhan se to sewa kar sakta hai, ye bhi maan lete hai kabhi 1-2 baar darshan ke liye aa jata hai ? lekin apna kaam dham chodkar guru ki hi keval Seva kaise kareg ?
- धन आप किससे कमाते हैं ? तन मन के सहयोग से ही न । तो फ़िर धन से सेवा भी तन मन से सेवा हो जाती है । यदि आप तन से कोई सेवा करते हैं । तो व्यवहारिक रूप से वह भी धन ही है । क्योंकि मेहनत को धन में परिवर्तित किया जा सकता है । कुछ लोग बुद्धि ( मन ) से कमाते हैं । यदि गौर से सोचें । तो वह भी धन ही है । क्योंकि बहुत से लोग मन से श्रम और क्रिया करके धन कमाते  हैं । अगर गौर करें । तो तन मन धन आपस में घुले मिले हुये हैं । बिना तन मन के धन कैसे कमाया जा सकता है ? कभी सोचा है ? बाकी परिस्थितियोंवश आ नहीं सकता । तो भाव और मन से उसे गुरु में ध्यान लगाना चाहिये ।
kyoki use to apne pariwar ko palna bhi Hai, Biwi ko Chat bhi khilani padegi, alu pyaj bhi lana hai, bill bhi jama karna hai, Aur raat me Biwi ke saat chahe aadmi ki icha ho na ho Taak Dhina Dhin Match bhi khelna Hai ? aur agle din gadha Majduri karne office bhi jana hai ? To Kul mila ke Mere jaise Nakare log diksha lekar kis prakar Apna jeevan Sarthak Kar Sakte hai ? Ache se Samose me chatni Daal kar ? Bataye ? In Public interest also,  this question in very important ......Satyanveshi Byomkesh Bakshi
- वास्तव में जीवन एक युद्ध ( विभिन्न मोर्चों पर संघर्ष ) की भांति है । यदि कोई व्यक्ति ऊपर आपके बताये अनुसार सामान्य जीवन जी रहा है । और उसे कोई आपदा लग जाती है । तो उसे इसी जीवन चर्या में से समय धन आदि निकालकर उसे हल करना होता है । और यदि कोई व्यक्ति अपनी मौजूदा स्थिति से अधिक उन्नति करना चाहता है । तो भी उसे तन मन धन से ( इसी जीवन से ) उस तरफ़ जुङना होता है । जिस तरह किसी युवा को किसी महत्वपूर्ण क्षेत्र विशेष में सफ़लता के लिये तमाम तैयारी करनी होती है । और उसके परिजन भी इसमें पूरा सहयोग करते हैं । क्योंकि पूर्व जन्म के कर्मों अनुसार ऐसा शानदार जीवन या उपलब्धि उसकी किस्मत में पूर्व ही लिखी होती है । तब सभी हालात वैसे ही बन जाते हैं । जा पर कृपा राम की होई । ता पर कृपा करे सब कोई । तब कोई भी मनुष्य अपने पूर्व जन्म के सात्विक कर्मों के अनुसार भक्ति पदार्थ इस जन्म हेतु संचय कर लाया होता है । तब उसके सभी हालात भी उसी अनुसार बन जाते हैं । सहज योग में साधारण पूजा जितना पाखण्ड भी नहीं है । गीता में श्रीकृष्ण के माध्यम से आत्मदेव ने कहा था - हे अर्जुन युद्ध कर । और निरन्तर भजन कर । तब अर्जुन बोला - मैं लाखों बाणों का मुँह मोङ सकता हूँ । पर युद्ध करते समय भजन कैसे संभव है ? तब श्रीक्रुष्ण ने समझाया - यह ऐसा ही भजन सुमरन है । जो युद्ध करते समय भी किया जा सकता है । जैसे पनिहारिन मटकी सर पर रखे साथ ही साथ अन्य कार्य भी कर लेती है । जैसे कछुआ ध्यान से अण्डों को सेता है । कर से कर्म करो विधि नाना । रखो ध्यान जहाँ कृपा निधाना । आपको आश्चर्य होगा । यह सुमरन शौच और काम रति के मध्य भी होता है । ऐसा हमारे कई साधकों के अनुभव में आया है । और यह कोई पाप भी नहीं है ।
Q22 ) Shirdi ke Sai Baba ke bare me apne to suna hi hog ? kripya ye bataye ki Sai Baba ko kya aatm gyan hua tha ? Aapke lekh ke anusar Sai ek padvi hoti hai ?  To sai baba kya koi avtari purush the ya kya the ? unki yog yatra kaha tak thi kripya batane ka kast kare ?
- ज्ञान ( और समाधि अवस्था ) 2 प्रकार का होता है । 1 चेतन ज्ञान और 2 जङ ज्ञान । द्वैत के अधिकतर ज्ञान जङ ज्ञान के अंतर्गत आते हैं । क्योंकि उसमें लक्ष्य ( जङ ) प्रकृति की क्रियायों से किसी निर्माण का होता है । चेतन ज्ञान सिर्फ़ चेतन पुरुष या परमात्मा से जुङने हेतु किया जाता है । यह सर्वोच्च ज्ञान है । क्योंकि इसी से सबमें चेतना है । और चेतना ( तथा ऊर्जा ) के बिना कोई क्रिया सम्भव नहीं । सिर्फ़ शिरडी के साई को जङ ज्ञान ( समाधि ) में कुछ उपलब्धि थी । ये एक प्रकार के बहुत छोटे सिद्ध होते हैं । जिनकी भक्ति से भक्ति स्थान को " आन " लग जाती है । यह आन एक निश्चित समय तक के लिये ही होती है । फ़िर प्रभावहीन हो जाती है । उससे लोगों के छोटे मोटे कार्य होने लगते हैं । जैसे - किसी छोटी मोटी दैवीय आपदा से किसी बहाने से छुटकारा । किसी कार्य में कोई छोटी मोटी दैवीय शक्तियाँ विघ्न डाल रही हैं । तो उनसे समझौता सौदा करके छुटकारा । सरल शब्दों में यह निम्न स्तरीय देवताओं के ऐजेंट का कार्य करते हैं । मामूली जङ ज्ञान से जुङे साई बाबा का आत्म ज्ञान से दूर तक का वास्ता नहीं था । न ही वह कोई अवतारी पुरुष थे । दिवंगत गुलशन कुमार की बदौलत वैष्णो देवी । फ़िल्म अभिनेता मनोज कुमार की बदौलत साई बाबा और किसी अन्य फ़िल्मकार की बदौलत सन्तोषी माँ और किसी छोटे मोटे प्रकाशक की वजह से वैभव लक्ष्मी वृत और TV चैनलों की वजह से खाऊ कमाऊ बाबा आदि जैसी गुमनाम चीजें भी अस्तित्व में आ जाती हैं । वास्तव में किसी अच्छी उपयोगी चीज का प्रकाशित होना बुरी बात नहीं । पर वह वाकई में जन समाज के लिये हितकारी हो । मैंने सुना है । फ़िल्म अभिनेत्री रानी मुखर्जी ने शिरडी के साई से प्रभावित होकर 50 लाख का भवन निर्माण शिरडी में कराया । और खास तभी से उसकी किस्मत डूब गयी । अमिताभ बच्चन पहला बच्चा नाती हो । इसके लिये मुम्बई के सिद्ध विनायक में 51 लाख रिश्वत देकर आये । और नातिन हो गयी । उनकी योग यात्रा ऐसी ( और इतनी ही ) थी कि - जैसे चींटी को खोजने के लिये हिमालय पर्वत पर चढा जाये ।
iske alawa Nizamudin Auliya, Sufi Sant salim sekh chisti, aur Baaba Pharid aadi ke bare me bhi bataye ki in santo peero phakiro, auliya aadi ki gati kya hoti hai ? aur ye aatmgyan me inki pahuch kaha tak hai ?
- आत्मज्ञान इतना सरल सुलभ और सस्ता होता । और ऐसे ही भीङ के भीङ सत्य ज्ञान के ज्ञानी होते रहते । तो किसी स्वर्ग और सचखण्ड के लिये किसी प्रयास की जरूरत ही नहीं होती । प्रथ्वी पर ही ये सब होता । और हमेशा सतयुग ही रहता । ऊपर लिखे नामों या ऐसे ही अन्य लोगों के जीवनकाल का अध्ययन आप करें । तो ये साधारण व्यक्ति ही थे । बस किसी अलौकिक ज्ञान से इनका जुङाव अवश्य रहा था । अपने जीवनकाल में इन्हें कोई खास पूछता तक न था । ये सब खुराफ़ातें बाद के धन्धेबाजों द्वारा फ़ैलायी जाती हैं । जैसे एक अजीव सा सत्य उदाहरण देखिये । वास्तविक आत्मज्ञान के सन्त शिरोमणि कबीर के सिर्फ़ चार शिष्यों को ( वो भी ध्यान रहे स्वयं कबीर के द्वारा ) पूर्ण ज्ञान हुआ था । पर आज कितने ही कबीर पंथी जाने किन किनका ढिंढोंरा पीटते हैं कि वह पूर्ण सन्त हुआ या हैं । खुद बहुत  से कबीर पंथी लाइन से सदगुरु बने बैठे हैं । जबकि समय का सदगुरु सिर्फ़ 1 ही होता है । स्वयं कबीर ने अनुराग सागर आदि में पूर्ण विस्तार से इनकी कलई खोली है । पर लोग ध्यान से इन बातों का चिंतन नहीं करते ।
Q 23 ) Maine Tantra sadhna ki web site me padha tha ki lal pari aur saha hazrat ki bhi pariya hoti hai kya apsarao ke alawa bhi ye lok hai yani Muslim Lok aadi ?
- बात कहने योग्य नहीं है । पर प्रश्न और विषय के अनुसार कहना पङ रहा है । एक मजेदार घटिया सा शेर है - कुदरत में प्रीत  की रीत भी अजीव है । दिल आया गधी पर तो परी क्या चीज है । नेट की किसी घटिया वेबसाइट या 50 रुपये की किसी किताब से 4 मन्त्र और कुछ फ़ूल पत्ती प्रसाद आदि से लाल नीली परियाँ अप्सरायें मिलने लगें ( तो यह चीज कभी की सिद्ध हो जाती । और अति उपयोगी होने के कारण परम्परा से सदा सिद्ध रहती ) तो शायद बहुत से लोग स्त्रियों से विवाह ही न करें । बलात्कार की घटनायें क्यों हों । रण्डुये क्यों तरसे । देह बाजार का इतना बङा विश्व बाजार क्यों हो । और ये इंटरनेट पर करोङों साइटस भी क्यों हों । हाँ ये सब कुछ होता है । सत्य है । पर इतनी आसानी से नहीं । जितना बताया जाता है । और इस तरह भी नहीं । जैसे ये लोग बताते हैं ।
aur Muslim log kya marne ke baad unke liye alag se janaat aur dojakh Hota hai ? Muslim jo namaaz ada karte hai uska kya phal hota hai ? aur jo kurbaani wo dete hai eed ke festival me wo kya hai ?
- अगर भगवान को ऐसा ही कोई विभाजन करना होता । तो वह मनुष्य की बनावट में भी फ़र्क कर देता । आज जितने भी ( मगर विकृत रूप ) धर्म हैं । वह सब लगभग 2000 वर्ष के अन्दर वास्तव में किसी संघर्ष को लेकर उपजे हैं । थोङा चौंकिये । ईसाई धर्म ( विरोध में बना ) मुस्लिम धर्म । सिख धर्म । बौद्ध धर्म  ( कुछ अपवाद ) और यहाँ तक कि हिन्दू धर्म भी यदि सूक्ष्म आंकलन किया जाये । तो अधर्म ( दुष्टतापूर्ण व्यवहार ) से पीङित लोगों का संघर्ष मात्र हैं । अतः मूल सनातन धर्म ही है । आगामी 8 साल के अन्दर ये सभी धर्म जङ से नष्ट हो जायेंगें । और फ़िर से शुद्ध सनातन धर्म की स्थापना होगी । तब 10-20 000 साल के इन फ़सली धर्मों के लिये क्या भगवान अलग से जन्नत दोजख बनायेंगे ? यह सिर्फ़ भाषान्तर है । मुस्लिमों को नमाज से वही फ़ायदा होता है । जो हिन्दुओं को घण्टा बजाऊ अगरबत्ती जलाऊ फ़ूल चढाऊ पूजा से होता है । यानी भगवान में सिर्फ़ आस्था भाव का पैदा होना । कुरवानी हो या अन्य कोई हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई धार्मिक अनुष्ठान ये बीच के ( पण्डित मौलवी आदि ) लोगों के बनाये धार्मिक बाजार विकसित करने के प्रपंच है । जिसमें मूर्ख जनता पूरा सहयोग करती है । यदि धार्मिक बाजार में बेतहाशा आमदनी और मौज न हो । तो ये पण्डित मुल्ले खोजे से नहीं मिलेंगे । और जो हैं । वो सब्जी बेचने लगेंगे । हाँ तब गिने चुने सही लोग ही धर्म शिक्षक के रूप में होंगे । कुरबानी हमेशा अपने अहम की दी जाती है । मुर्गों बकरों भैंसों की नहीं । वह कुरबानी नहीं दावत उङानी का बहाना मात्र है । जो खास इन्हीं भगवान के ठेकेदारों का पेट भरता है ।
Q24 ) Karn Pisachini, Panchaguli ke bare me bataye kya  ye bhi manusyo ko pane ke liye icha
- ये सब नीच वृतियाँ हैं । जो अभिष्प्त दुराचारी और कुत्सित भाव की स्त्री जीवात्माओं से बनती हैं । वैसे ये मनुष्यों को पाने जैसी कोई इच्छा नहीं रखती । मगर मूर्ख और लालची मनुष्य विभिन्न प्रलोभनों का शिकार होकर खुद इनके शिकंजों में फ़ँस जाते हैं । और भीषण दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।
Q25 ) Rajeev ji, Agar koi aadmi Satnam Hans Diksha sache Sadguru se Ya aapke Mandal se  lekar uska abhyas karta Hai to uske Pap karm kis prakar se khatm hote hai ya pap karm nast ho jate hai ?
- रामचरित मानस में एक चौपाई है । सनमुख होय जीव मोहे जबहीं । कोटि जन्म अघ ( पाप ) नासों तबहीं । पूर्ण पापों का भस्म हो जाना परमात्म साक्षात्कार के समय हो जाता है ।
kyoki aapne apne pichle lekho me ye kaha hai ki kaya se jo patak hoi bin bhugte chute Na Koi  to phir Satya Naam Hamari Bhakti, sumiran, dhyan, guru seva , use pap ke phal se hame kaise bachati hai ya kis Prakar se uska prabhav kam kar deti hai kripya samjhaye.
- बाकी अलग अलग भक्ति अंगों से पाप कर्म क्षीण हो जाते हैं । नष्ट भी हो जाते हैं । ध्यान सुमरन आदि सात्विक कमाई में वृद्धि होना ही है । मान लीजिये । आप लाखों के कर्जदार है । और आपका कोई बिजनेस या नौकरी ( यहाँ सच्ची भक्ति ) आदि का प्रबन्ध हो जाता है । तो वह भारी कर्ज ( यहाँ पाप ) आपको राहत पूर्ण लगने लगेगा कि धीरे धीरे आप उससे मुक्त हो जायेंगे । अब आपकी वो नौकरी या बिजनेस ( यहाँ योग का स्तर और प्राप्ति ) किस स्तर का है । उससे क्या प्राप्ति है ? उसी आधार पर पापों का शमन होगा । कुछ ध्यान से । कुछ समाधि से । कुछ गुरु सेवा से । और कुछ दान से । कुछ क्षीण % से भोगने पर आदि । ये सब संयुक्त ( या जितने आप कर पायें ) या कुछ कम के आधार पर उसी अनुपात में पाप नष्ट होने लगते हैं ।
Q26 ) Kya purn Aatma Gyan Ho jane ke baad swayam aatma ka astitva hi khatm ho jata hai ? Kya wo parmatma me leen ho jati hai ? kya hota hai aatmgyan prapt hone par ?
- आत्मज्ञान होने पर आत्मा का अस्तित्व खत्म नहीं हो जाता । बल्कि वह पूर्ण प्रकाशित हो उठता है । जीव भाव । जीव आवरण । और मिथ्या मायावी संसार आवरण किसी दुस्वपन की भांति खत्म हो जात्ता है । और जीवात्मा मुक्तात्मा होकर आनन्दमय हो उठता है । परमात्मा में लीन होने का मतलब है । उसी जैसा हो जाना । अर्थात एक हो जाना ।
aaj jo Jain dharm hai, Budh dharm hai kya wo jo sadhna jis bhi Marg se wo kar rahe hai kya unhe koi prapti hogi ya unki bhakti Bhi keval kaal ki hi Bhakti Hai ? Gol Mol Jawab Nahi Mangata Apun, Sir Sidhe Sidhe is baat ko Clear kijiye ? 
- जैसाकि मैंने ऊपर बताया । इन धार्मिक शाखाओं का भी मूल ( जो इनके भी प्रतिनिधियों ने तय किया था ) विकृत हो चुका है । ये वास्तविक ज्ञान को भूलकर मनमानी व्याख्यायें करने लगे हैं । और - रहिमन बिगरे दूध को मथे न माखन होय । तो चाहे वो हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई जैन बौद्ध कोई भी क्यों न हो । खराब दूध से मक्खन नहीं निकाल सकते ।
Mahaveer Aur Gautam Budha ko Kya Aatma gyan ki prapti Nahi hui thi Bataye ? Aur aaj jo Jain samaj ke digambar Muni itna kast jhelte hai aur jo tap kar rahe hai kya unka koi parinaam unhe prapt hoga ki Nahi ?
- महावीर और गौतम छोटे अवतारों की श्रेणी में आते हैं । द्वैत के ऋषि मुनि और ये लगभग समान पहुँच वाले कहे जा सकते हैं । इन्होंने शून्य अवस्था और शून्य समाधि को जाना था । इन्हें सत्य बोध ( कि वास्तविक सत्य अन्दर है । ) हुआ था । न कि आत्मबोध । बुद्ध नाम ही बुद्धत्व की ओर इशारा करता है न कि आत्मबोध की तरफ़ । बाकी आजकल के लोग धार्मिक परम्पराओं का ढोल अधिक बजा रहे हैं । वास्तविक ज्ञान से इनका कोई लेना देना नहीं । जिस प्रकार बबूल के पेङ पर कभी आम नहीं लगते । उसी प्रकार वास्तविक ज्ञान और सच्चे सदगुरु बिना कभी कोई प्राप्ति नहीं होती । हाँ ! आज जो ये कर रहे हैं । उसी प्रकार धीरे धीरे करके सत्यता शाश्वतता की ओर कृमशः इनकी जन्म जन्म की यात्रा शुरू हो जाती है । और  थोङा थोङा करके ये उस तरफ़ जाने लगते हैं । भले ही साधारण लोग इन्हें कुछ भी समझें । ये स्वयं बखूबी जानते हैं कि वास्तव में वे 0/0 ही हैं । कुछ अच्छे शिक्षित लोग दिमागी लोग इनसे थोङी ही बातचीत में ढोल की पोल समझ जाते हैं ।
Q27 ) Srimad Bhagwat katha ya Raam katha Aaj har Bade Sehro me aayojit ki ja rahi hai Lakho log inme jakar Anand ka anubhav karte hai to kya is se keval unka Bhakti bhav aage ke liye banega ? 
- बस सत्य इतना ही है कि आगे के लिये भाव बनता है । और कोई प्राप्ति नहीं होती । जैसे किसी बिज्ञान प्रदर्शनी किसी पुस्तक प्रदर्शनी में हमें तमाम आविष्कारों तमाम नये विषयों पर जानकारी तो मिल जाती है । पर वास्तविक लाभ तभी है । जब हम उस अविष्कृत वस्तु को खरीद कर लाभ उठायें । और बात वही है । इसके लिये सच्चे क्रियात्मक गुरु चाहिये । व्यवसायिक कथावाचक नहीं ।
kya Parikshit ki tarah ye log moksh ke adhikari Nahi Honge ? Spst rupe se Bataye? unki Gati kya hogi ?
- अगर परीक्षित को सुनाई गई शुकदेव कथा से वहाँ बैठे 88 000 सभी ऋषि मुनि और अन्य भी श्रोता मोक्ष पा जाते । तो बङे जोर शोर से यह जिक्र स्वयं भागवत कथा में ही होता । पर ऐसा कुछ नहीं है । जाहिर है । मोक्ष सिर्फ़ परीक्षित का हुआ । वो भी शुकदेव जैसे सन्त के द्वारा । मोक्ष सिर्फ़ योग क्रियाओं से होता है । कथायें गीत संगीत या भगवत चापलूसी से कदापि नहीं । तमाम लोग सिर्फ़ अपना धन और समय नष्ट कर रहें हैं । इससे सिर्फ़ विचारों में क्षणिक शुद्धता आती है ।
Kya Aatm gyan ki prapti ka marg keval surti sabad sadhana hi hai aur kisi anya yog kundline, dvait, Vihangam Marg, Jain, Muslim, isai Dharm ke dwara is gyan ki prapti Nahi Ho Sakti Taaki Bhai Logo Ka Sansay Bole To Sara Lafda Hamesha ke liye Khatam ho jaye aur Wo in Tanto ko chod kar keval aur keval Ek hi Sadhe Sab Sadhe Kar Sake ?
- एकहि साधे सब सधे सब साधे सब जाये । रहिमन सींचों मूल को फ़ूलहि फ़लहि अघाय । सिर्फ़ सुरति शब्द साधना का क्रियात्मक ज्ञान ही मोक्ष दिला सकता है । कुण्डलिनी महा देवत्व तक दिला सकता है । किसी भी रूप में जीव हत्या और माँसाहार करने वालों के लिये प्रभु का एक ही नियम है - GO TO HELL फ़िर किसी प्राप्ति की तो बात ही जाने दें । हाँ नर्क 100% प्राप्त होगा । बाकी धर्म शाखाओं के लोग यदि मूल उपदेशों को गम्भीरता से गहनता से आचरण में लाते हैं । तो निश्चय ही उनके लिये सनातन धर्म के रास्ते बनने लगते हैं । इतना अवश्य होता है ।

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