08 जून 2013

ये सभी धार्मिक व्यापारी है -तानसेन

Q 13)  Kya Hum Hans Diksha me dhyan karke apne kisi parichit ya ristedar ya anya kisi ke jiska hum chahe sanskar dekh sakte hai aisa kaise sambhav ho sakta Hai mujhe samjhaiye?
- यहाँ भी वही बात है । साधारण साधक नहीं देख सकते । उच्च स्तरीय ही देख सकते हैं । हाँ यहाँ थोङा अन्तर आ जाता  है । जैसे साधक और उस व्यक्ति के कोई खास संस्कार आपस में जुङ रहे हों । तो साधारण साधक उन्हें देखते हुये काटता या उपचार करता है । इसका अपवाद भी होता है । हमारा एक शिष्य सिर्फ़ 5 दिन से जुङा था । उसके पिता बीमारी से चल बसे थे । उसकी इच्छा देखते हुये मैंने उसे पिता से मिलवाया था । कभी कभी बिना दीक्षा वालों को भी मैंने मिलवाया है । या उपचार कराया है । दरअसल यहाँ परमात्मा का नियम कार्य करता है । इच्छित वस्तु का तय भुगतान । वो धन ( दान ) के रूप में हो । या फ़िर योग ( नाम कमाई आदि ) तब यदि सामने वाले पर कुछ नहीं होता । तो कभी कभी यह भुगतान मैं करता हूँ । आप यकीन करें । यदि धन मुद्रा में इसका आंकलन किया जाये । तो सिर्फ़ इसी काम में मुझे लाखों का घाटा होता है । बस यहाँ शर्त यही है । वह व्यक्ति वास्तव में किसी भी प्रकार से मोल चुकाने में असमर्थ हो । लेकिन इसके बाद वह व्यक्ति मेरा कर्जदार हो जाता है । और आगे उसे ब्याज सहित यह मोल चुकाना होता है । परमात्म सत्ता से कोई छल कपट नहीं कर सकता । और भागकर छुप भी नहीं सकता ।
Q 13 ) Daan Kise kahte hai ? aur kya agar koi vyakti ya sadharan aadmi Bina sadguru se diksha liye kisi vyakti ko koi daan ya punya karm karta hai to kya wo sab nishphal hota hai ? Kabeer ke dohe ki anusar bin guru karta daan, jap sab nishphal jaan ke hisab se ? To phir agar Hum Hans Diksha lete hai to phir Hum dikshit sadhako ko kaise daan dena chahiye jara khulkar bataye kyoki ye publick ki aneko Bhrantiyo ka niwaran karne wala answer hoga ? Ye sare Prashan Mai keval apne hi liye nahi waran sabhi padhne walo ki jigyasao ko dhyan me rakhte hu apse puch raha hu kripya samadhaan kare ?
- अपने द्वारा उपार्जित किये अन्न धन आदि को जो व्यक्ति स्वयं अपने या परिवार के साथ ही खाता है । वास्तव में वह पाप खाता है । यानी पाप से पोषण कर रहा है । उसके शरीर भाग्य और आसपास के माहौल में भी वैसा ही पापमय प्रभाव होने लगेगा । जैसे बीमारियाँ । झगङे । ग्रह कलेश । हानि आदि से नुकसान और तामसिक और नीच मनोवृति का हो जाना । ये प्रभाव तो यहीं होने लगता है । किसी भी व्यक्ति को अपनी कमाई का 10% हमेशा ही दान करना चाहिये । यदि वह विशेष परेशानियों से घिरा है । तो उसे 25% दान करना चाहिये । आप आश्चर्य

करेंगे । आज के समय अनुसार भले ही वह 20 रुपये  प्रतिदिन कमाता हो । भोजन मुश्किल से जुटता हो । फ़िर भी यदि वह निष्काम भाव से 5 रुपये ( 25% ) रोज दान करे । तो न सिर्फ़ तेजी से समस्यायें कटेगी । उसकी स्थिति में भी सुधार होने लगेगा । बिना गुरु के किया हुआ दान भैरव खाते में जाता है । इसका बहुत ही क्षीण लाभ थोङा थोङा करके आगामी जन्म श्रंखलाओं में होता है । जब हम किसी भी सच्चे गुरु या सदगुरु से दीक्षा ले लेते हैं । तो दीक्षा के समय तन मन धन या सर्वस्व अर्पण करते हैं । तो फ़िर हमारे पास बचता ही कुछ नहीं । सिर्फ़ गुरु आदेश का पालन करना होता है । अतः गुरु दीक्षा प्राप्त शिष्य को अलग से दान करने की आवश्यकता नहीं होती । समय समय पर गुरु सेवा में अर्पित किया धन । या गुरु द्वारा संचालित विभिन्न कार्यों से ही ये उद्देश्य पूर्ण हो जाता है । दीक्षा प्राप्त शिष्य को कानून के अनुसार आय का 10% गुरु को अर्पण करना होता है । दान और दान लाभ का भी एक विशाल संविधान है । जिसे थोङे शब्दों में नहीं बताया जा सकता है । किसी स्थिति विशेष के लिये आप प्रश्न कर सकते हैं ।
Q14 ) Karm phal aur karmo ki gati par aapne kisi pathak ke answer me kaha tha ki yaad dila dena uske baad wo baat aayi gayi ho gayi to aaj mai wohi prashn aapse nivedan karta hu karmo ke sidhant aur phal prapti par koi lekh bataye ? 
- यह अनुरोध मुझसे कई लोगों ने किया है । शीघ्र ही मैं इस पर काम करूँगा । ये बङा सूक्ष्म और तरीके से समझाने का विषय है । पर अधिक जल्दी न करें । अभी मैं एक बङी कहानी पर भी काम करूँगा ।
kaafi dino se kisi bhi patahk ke naye jawab aapke blog me padhne ko nahi mil rahe hai ? aap thik to hai na mera matlab aapki tabiyat se hai agar aisa hai to Hum intzaar karenge kyoki liye sabse jaruri ham logo ke liye aap hai phir hamari prashn to kripya kabhi baithe to mujhe mail kar kevl itna to bata dijiyega ki aap jawab kab tak de denge aap ke jawab ke intazar me gaayak tansen urf satyanweshi Byomkesh Bakshi
- जैसी आप लोग सामान्यतया कल्पना भावना कर लेते है । वह मेरा जीवन नहीं है । सोचिये नासा का सिर्फ़ एक आदमी मंगल की भूमि पर उतर जाये । तो विश्व में कम से कम 2 साल तक हंगामा रहेगा । और मेरे लिये पूरे विराट में भृमण करना आम बात है । वास्तव में मैं शब्दों के रूप में और आंतरिक क्रियात्मक ज्ञान के रूप में बहुत ही कम बता पाऊँगा । ना के बराबर । क्योंकि वह अपार है । यदि मैं उसकी रिपोर्टिंग टायप ही करता रहूँ । तो मुश्किल ये है कि आपके सामने असंख्य प्रश्न खङे हो जायेंगे । और उन जिज्ञासाओं का समाधान मैं न कर सका ( क्योंकि इतनी तेजी से समझाना । सबको संतुष्ट करना संभव नहीं होता ) तो बार बार यही न्यूज चैनल आदि में आने लगेगी - सत्यकीखोज पढकर आज दस मरे ।..आज...? अक्सर उत्तर देते समय मैं ऐसी बात गोल कर जाता हूँ । जिससे 100 अन्य प्रश्न पैदा होने की संभावना होती है ।
Q15 )  Apke lekh Kasuti sisya ki me padha tha ki aapke jaisi sthiti Har ek sisya ko prapt nahi hoti aur kabeer ke bahut se sisyo me se sirf 4 ko hi aatmgyan hua tha to phir baaki logo ka kya hua wo log aaj kal  kaha Bhai Giri Kar rahe Hai ? samjhaye ?
- जैसे कार्यकर्ता से प्रधानमन्त्री तक एक सफ़र सा होता है । और आवश्यक नहीं कि सभी अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचे । पर कुल मिलाकर उन्हें न होने से बहुत लाभ और एक नया ज्ञान नयी सोच मिल जाती है । फ़िर ज्ञान बीज कई जन्मों तक आपको उबारने का कार्य करता है । बशर्ते आप उसको ठीक से समझ लो । ज्ञान बीज बिनसे नहीं होवें जन्म अनन्त । ऊँच नीच घर ऊपजे होय सन्त का सन्त । इसलिये 0 से लेकर 100 तक जो जितनी मेहनत से ज्ञान या योग प्राप्त करता है । उसका अन्तिम फ़ल वही हो जाता है । जो नर्क या 84 की तुलना में बहुत अच्छा होता है । यह सत्य है शीर्ष या ऊँचाई पर गिने चुने ही जा पाते हैं । पर जो उनसे नीचे होते हैं । उनके स्तर और प्राप्तियाँ भी कल्पना से परे होती हैं । आप लोगों में ऐसा लालायित भाव दरअसल मेरे लेखों से ही जागा है । और ये कतई दोषपूर्ण न होकर शुभ ही है । क्योंकि आप ऊँचाई के लिये प्रेरित होते हैं ।
Agar hum hans diksha lekar aapke lekho ke anusar hi hamar yaha se agar koi hans diksh leta hai to satyalok tak ki prapti ho jati hai padhai karne par wo to thik hai ? to Last tak ka gyaan jin logo ko nahi hua wo to satyalok me hi niwas karti hai phir wo aage nahi badh paati kya ?
- सबसे पहले आप सत्यलोक का मतलब समझें - सत्य स्थान यानी माया से रहित । बाकी आपका कहना लगभग सही है । साधारण साधक को सबसे कम प्राप्ति 12 सूर्यों का आत्म प्रकाश होकर प्रकाशित हँस जीव बन जाता है । ये प्रथ्वी वाला पीला विनाशी सूर्य नहीं हैं । यह एकदम दूधिया सफ़ेद बेहद चमकीला शीतल प्रकाश होता है । आप इसी से अन्दाजा लगा लें । प्रथ्वी के सूर्य के 12 महीने के 12 देवता नियुक्त हैं । यानी जो देवत्व प्राप्त हुआ । वो भी एक बटा बारह । ये इसलिये कि इन्हें विभिन्न क्रियाओं से भोग प्राप्त होता है । जबकि समय पर इनकी मृत्यु भी होती है । जबकि हँस जीव अमर हो जाता है । और उसके इस सूर्य जैसी कठिन ड्यूटी भी नहीं है ।
Phir wo mukt kaha hua wo bhi to purn gyan ke aabhav me freequently kahi bhi bindaas aa ja nahi sakta na Bhidu ? Un Hanso ka kya hota hai aur is jeev ko Hans Hans karke kyo bulaya jata hai kya satyalok me wo kisi pakshi ki tarah hans ho jata hai spast kare ? 
- आत्मज्ञान या मुक्त ज्ञान में भी अलग अलग स्थितियाँ है । यदि आपके सामने अवसर है । सहयोग है । फ़िर भी आप उसको प्राप्त करना नहीं चाहते । तो दोष उसी का है । वास्तव में हँस जीव मुक्त ही होता है । क्योंकि वह हँस की तरह ही नीर क्षीर यानी सार असार विवेचन जानता है । सोहंग जीव की तुलना में वह बहुत श्रेष्ठ होता है । अमीरस उसका आहार होता है । त्रय ताप आदि शूल उसे नहीं सताते । हँस का प्रकाशयुक्त विलक्षण शरीर होता है । कर्म बन्धन जन्म मरण आदि से मुक्त होता है । इसलिये उसे मुक्त ही कहा जाता है । क्योंकि मुक्त क्षेत्र का ही निवासी  होता है ।
Aurl last lok tak pahuche huye lok hi mukt kahlate hai to phir ye satlok ke hans purna mukt kaha huye ye to wahi atak gyae na ? last wale lok me kya hot hai jar batane ka kast kare waha ke vaibhav ke bare me bhi bataye ?
- शब्दों में कुछ भी कह देना एक तरह से बहुत आसान होता है । अब्राहम लिंकन कोयले की अंगीठी के प्रकाश में शिक्षा प्राप्त कर अमेरिका के राष्ट्रपति बन जाते हैं । आप गौर करें । तो संसार के तमाम जाति धर्म
अधिकतर अन्तिम लक्ष्य तुच्छ स्वर्ग पर ही अटके हुये हैं । खास ईसाई और मुसलमानों में तो ये बहुत लोकप्रिय है । सोचने वाली बात है कि स्वर्ग का सबसे बङा देवता इन्द्र होता है । भारतीय जनमानस में इसकी कामी और ऐश विलास वाली छवि है । सभी जानते हैं । इससे बङे देवता कई हैं । कई ऋषि मुनि और रावण मेघनाथ जैसे लोगों से भी यह भयभीत रहता है । सभी जानते हैं । विष्णु शंकर आदि इससे बहुत बङे पद हैं । इससे सिद्ध  होता है । बात बहुत आगे भी है । मैंने अक्सर लिखा है । सफ़ल हँस साधक काल के सिर पर पैर रखकर जाता है । यानी त्रिलोकी का राष्ट्रपति भी उससे छोटा हुआ । बाकी गूढ धार्मिक जानकारियाँ साधकों के मार्गदर्शन और जीव को प्रेरित करने के लिये अधिक होती हैं । किस्से कहानी और मनोरंजन या जनरल नालेज के लिये नहीं । इसलिये ऐसी जिञासाओं को अति प्रश्न कहा गया है । जबकि आप पर दस रुपये भी न हों । और आप करोंङों की बात करें । तो यह हास्यापद ही है ।
Q16 ) Kisi pathak ke lekh ke answer me apne satlok ke bare me bataya hai uske aage ke loko me kya suvidhaye hoti hai ? vaibhav kis tarah ka hota hai ? kya waha bhi apsara, devi sundari etc milti hai ? 
- जितना ऊँचा जाते है । कृमशः पद शक्ति और अधिकारों में बढोत्तरी होती जाती है । परमात्मा के बाद सबसे बङी शक्ति प्रकृति है । और यह सिर्फ़ परमात्मा के ही अधीन है । इससे नीचे स्थिति अनुसार बदलाव होते जाते हैं । एक भाव में प्रकृति स्त्री रूपा है । इसी से अन्दाजा लगाया जा सकता है । एक बहुत बङी लगभग परमात्मा समतुल्य ही स्थिति के बारे में कहा है - बिनु पग चले सुने बिनु काना । कर बिनु कर्म करे विधि नाना । आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु वानी वक्ता बढ जोगी । इसी से समझ लें ।
Kyoki aapne kaha tha ki aatm gyani santo ki seva me aisi devi sundariya har tarah ki seva karti hai to phir satlok ke jeev kya keval waha Bhajan gate rahte hai khali aanad aand Ya Rasgula Rasgul karte rahte hai ? Jaise swarg me hota hai waisa hi nazara hai kya Sabhi Bangduo ko Bata do kyoki Agar Niche sab forward ho jayega to uper ke bare me soch kar hi sahi kuch  sadhna kar lega ? nahi to bolega ki yaaha se bhi gaya aur waha se bhi gaya ? kuch din aur Jehela Jhali Kabhi to Milega O Taaki O Taaki Karne ka Mauka....Mai sidhe sabdo me Bhog vilas vaibhav satlok aur usse upar ke lok me kya hota janan chata hu Bas ab ..............Bata do ? 
- जैसा आप सोच रहे हैं । बात उससे कूछ अलग है । ये सिर्फ़ वासनात्मक ख्याल है । जो सभी आनन्दों का मूल है । अगर वह मिल जाये । तो फ़िर सभी आनन्द स्वतः प्राप्त हो जाते हैं । जो सभी रसो का रस है । वह मिल जाये । तो सभी रस स्वयं ही प्राप्त हो जाते हैं । जो सभी स्वादों का स्वाद है । वह मिल जाये । तो सभी स्वाद स्वतः प्राप्त हो जाते हैं । अगर ये बात आप समझ सकते हैं । तो फ़िर समझना आसान हो जायेगा । बाकी अनुभव से अधिक जाना जाता है । विचारों जानकारी से सिर्फ़ प्रेरणा होती है । उनमें रस नहीं होता ।
kyoki aisi sadhna ka lalch Sri Srimali & compny Apsra sadhna blog ke madhyam se khub karti hai aur wo bhi  bhai lok 7 dino me hi apsara prapt karne ki vidhi bhi puchte hai taki aam ka  aam ho jaye aur guthliyo ke daam ho jaye ? Esliye jeevo ko jagao aur ye sab cheeze jo attrackt karti hai unke bare me offer ke bare batao ki niche ke loko se bhi mast item song waha hai bhidu ? niwarn kare......Baki Gaayak tansen to diksha lekar hi rahega  aur uttar jaldi dene ki kosis karna ?
- नारायणदत्त श्रीमाली उर्फ़ निखिलेश्वरानन्द ? की लगभग 50 रुपये की आप कोई सरल तन्त्र मन्त्र साधना की कोई पुस्तक खरीद लें । तो उसमें आपको धन । स्त्री भोग । शक्ति । दुश्मन को पराजित करना आदि जैसे सभी उपाय मिल जायेंगे । जो एक मनुष्य को बहुत जरूरी रूप से चाहिये होते हैं । और वो भी 40 दिन या 6 महीने में ही । यहाँ एक सवाल आता है कि श्रीमाली को अप्सरा यक्षणियों आदि से धन । कामभोग । मनचाहे व्यक्ति या स्त्री पर वशीकरण आदि आदि जैसे हुनर आते थे । तो फ़िर उन्हें व्यवसायिक रूप से किताबें बेचने की क्या जरूरत है ( थी ) साधना भक्ति कम व्यवसायिक  तरीके से धन कमाने की क्या जरूरत थी ? जब सब कुछ मन्त्र जपने से ही प्राप्त था । जरा सोचिये । दाल में कुछ काला था न ।
Q 17 ) Rajeev Bhai, Ek question man me ayela hai aap to kahate ho ki aatm  gyan Hans diksha yane apke mandal se prapt diksha ki sadhna karne par ho sakta hai lekin kal mai tv pe shayad koi dharmik channel dekh raha tha to usme bhi Ek aadmi ya sant kah lo vo Vihangam Marg ke guru aur uski sadhna ke bare me bata raha tha kya ye aapke hi mandal ki tarah Dhyan karne wale logo ki ek shelly hai spast karne ki kripa kare ?
- क्योंकि आजकल सभी कुछ पुस्तकों में परिभाषा और अर्थों सहित प्रचुर मात्रा में मौजूद है । और धर्म के व्यवसाय से अधिक सफ़ल और फ़ायदेमन्द आजकल कोई व्यवसाय नहीं हैं । मैंने सुना है । वृन्दावन में तो कथावाचक बनाने की पढाई और ट्रेनिंग आदि का कोर्स शुरू हो गया है । अभी मेरी एक युवा लङकी से मुलाकात हुयी थी । जो इसी क्षेत्र में कैरियर तलाश रही है । वह कहीं भी सतसंग भागवत आदि धार्मिक प्रोग्राम हो । वहाँ प्रवचन कीर्तन आदि में मुफ़्त भागीदारी करती है । फ़िर मंच से घोषणा कराती है । अगर कोई उससे भागवत कराना चाहे । तो वह मुफ़्त में कर देगी । जाहिर  है । लोग धार्मिक कार्य में श्रद्धावश कुछ न कुछ देंगे ही । और उसका प्रचार भी हो जायेगा । फ़िर वह धीरे धीरे मनचाहा भुगतान लेने लगेगी । 20 साल की ये लङकी सिर्फ़ सुरीली रट्टू मैना ( या तोती ) ही है । लेकिन इसी तरह धीरे धीरे वह प्रसिद्ध सन्त देवी या कोई गुरु माँ ( हँसी की बात है न गुरु माँ ?  ) बन जायेगी । वास्तव में गुरु के साथ माँ शब्द कभी नहीं जोङा जाता । वह सिर्फ़ गुरु ही होता है । विहंगम पक्षी को कहते हैं । पर आज कोई इसका सही अर्थ भाव ही बता दे कि - विहंगम मार्ग का योग क्या होता है । तो ही मैं उसे गुरु मान लूँगा । ये सभी धार्मिक व्यापारी है ।
कुछ प्रश्न उत्तर और भी हैं । 

एक टिप्पणी भेजें

LinkWithin

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...

Follow by Email