07 जून 2013

सत्यनाम मार्ग पर प्रेरित करने का लाभ - तानसेन

Rajeev Ji, Mujh Agyani, ke liye aapne jo aapka amulya samay dekar  aatmgyan ke visyo pr jo prakash dala hai uske liye mai aapka bahut bahut aabhari hu, Haalanki maine prasno ko mazakiya lehje me aapse pucha tha phri bhi aapke dwara mere prasno ka tark sangat rup se uttar prastut kiya jiske liye mai aapka Dil se aabhar dhanyvaad prakat karta hu
Saath hi aapse apne prasno ke madhyam se ki gayi galtiyo ke liye tatha mere uthaye gaye prasno se kisi pathak ko yadi koi thesh pauchi ho to sabhi blog padhne wale dosto se bhi mai chama chahta hu .
He Malik Sahib   chahe mujh se bhakti kara ya na karana pr itni fariyaad jarur karna chahunga ki sache santo ka mere se kabhi apmaan na ho jaye  isliye rajeev Ji Mai aapse apne dwara kiye gaye uljalul prashno se jinse ki kisi bhi prakar se mere dwara aapka apmaan hua ho to mai punh Chama Chaunga.

Chalt chalte ek prsn aur Ki agar kisi jeev ko satyanaam ke marg me kisi jeev dwara laya jata hai to use kaisa aur kis prakar ka punya labh milta hai ?
Aaap Jaise Santo ke Charno me Tujh Manav
GAAYAK TANSEN Ka sadar pranaam swikaar kare dhanya waad
- किसी भी सन्त को मान अपमान अच्छे बुरे से कोई फ़र्क नहीं पङता । सन्त की कोशिश यही रहती है कि उसके द्वारा किसी का अहित न हो । हालांकि सन्तों के कार्य । रहनी । और वाणी आदि अटपटापन लिये होती है । और कभी कभी सन्त बेहद अजीव से कार्य भी करते हैं । जैसे खिज्र द्वारा बादशाह के लङके का हाथ तोङकर उसे झाङी में अकेला छोङ आना । जबकि बादशाह ने उन्हें सवारी के लिये घोङा दिया था । जहाँ तक बात आपके द्वारा पश्चाताप भाव की है । उसमें मुझे विशेष कुछ ऐसा नहीं लगा । जो दोष पूर्ण हो । आपने प्रश्न करके मुझे सहयोग ही किया है । ये बङा आश्चर्यजनक है कि पूर्ण मोक्ष ( को छोङकर ) से पहले किसी भी जीवात्मा का स्वभाव कभी नहीं बदलता । चाहे वह कितना ही बङा देवता भगवान आदि क्यों न हो जाये । उसका मूल स्वभाव कायम रहता है । दिव्यत्व को प्राप्त हुये विभिन्न लोगों देवताओं भगवान आदि के धार्मिक प्रसंग इस बात की पुष्टि करते हैं । फ़िर आप तो अल्पज्ञ और विषय वासना मोहित मानव की श्रेणी में आते हैं । जो काम क्रोध लोभ मोह मद इन 5 विकारों से सदा विकारी रहता है । जबकि कोई भी आत्मज्ञान से जुङा सन्त मन के इन 8 भावों - काम क्रोध लोभ मोह मद मत्सर ज्ञान वैराग से परे 1 भाव प्रेम ( धारा ) में रहता हुआ 1 ( परमात्मा ) से ही जुङा रहता है । इसके बाद सभी 0 ही है । अतः परमात्मा से सृष्टि और फ़िर शून्यता तक यही कृम चलता है ।
उत्तर - पहली बात तो ये है कि जब तक आप स्वयं किसी चीज का महत्व रस आदि नहीं जानते । दूसरे को प्रेरित नहीं कर सकते । हाँ सूचनात्मक टायप की जानकारी  प्रसंगवश अवश्य दे सकते हैं । फ़िर भी यह मान लिया जाय । कोई आत्मज्ञान रहित जीव किसी जीव को प्रेरित कर उस मार्ग पर चला दे । तो यह कुछ कुछ वैसा ही होगा । जैसे कोई स्वयं अनपढ व्यक्ति पढाई का महत्व समझते ( या देखते ) हुये किसी दूसरे को शिक्षित कराने में तन मन धन आदि या तीनों से सहयोग करे । और वह शिक्षा से लाभ उठाये । तो यह अच्छे परोपकार की श्रेणी में आयेगा । अगर एकदम सटीक नियम द्वारा इसका आंकलन किया जाय । तो सृष्टि में सभी अच्छे बुरे कार्यों का प्रतिफ़ल उसका कर्मफ़ल बन जाने के बाद लगभग उसी जैसे रूप में कम से कम 8 गुणा और अन्य परिस्थितियों में 1000 गुणा होकर मिलता है । मान लीजिये । आपने सिर्फ़ 10 फ़लदार वृक्षों का बाग सिर्फ़ परोपकार भावना ( निष्काम भाव ) से लगाया । याने उसके फ़लों आमदनी आदि से आपको कोई लोभ न था । तो कालान्तर ( आगामी जन्मों ) में आप 80 या 8000 फ़लदार वृक्षों के बिना परिश्रम ( विरासत । दान आदि कोई माध्यम से ) के बनेंगे । ये मैंने स्थूल स्तर पर बताया है । सूक्ष्म स्तर पर कर्म और कर्मफ़ल की गति देवता भी आंकलन नहीं कर पाते । इसलिये आपके द्वारा आत्मज्ञान के लिये प्रेरित किया जीव जब सुखी होगा । तो उसी के आधार पर आपका पुण्यफ़ल बनेगा । अब महत्वपूर्ण यही है कि आपने जिस पात्र का चयन किया । वो कितना योग्य है । और उसका क्या लाभ ले पाता है ।
शिवोह्म शिवोह्म - सबमें मैं ही हूँ । सबमें मैं ही हूँ । साहेब साहेब ।
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