28 मई 2010

इसका कोई उत्तर नहीं है


मैं कौन हूँ ? इसका कोई उत्तर नहीं है । यह उत्तर के पार है । तुम्हारा मन बहुत सारे उत्तर देगा । तुम्हारा मन कहेगा - तुम जीवन का सार हो । तुम अनंत आत्मा हो । तुम दिव्य हो । और इसी तरह के बहुत सारे उत्तर । इन सभी उत्तरों को अस्वीकृत कर देना है - नेति नेति । तुम्हें कहे जाना है - न तो यह । न ही वह । जब तुम उन सभी संभव उत्तरों को नकार देते हो । जो मन देता है । सोचता है । जब प्रश्न पूरी तरह से अनुत्तरीय बच जाता है । चमत्कार घटता है । अचानक प्रश्न भी गिर जाता है । जब सभी उत्तर अस्वीकृत हो जाते हैं । प्रश्न को कोई सहारा नहीं बचता । खड़े होने के लिए । भीतर कोई सहारा नहीं बचता । यह एकाएक गिर पड़ता है । यह समाप्त हो जाता है । यह विदा हो जाता है । जब प्रश्न भी गिर जाता है । तब तुम जानते हो । लेकिन वह जानना उत्तर नहीं है । यह अस्तित्वगत अनुभव है । 
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सवाल - मुझे भोजन से तृप्ति क्यों नहीं होती ? ओशो - हर रोज भोजन लेने से पहले चुपचाप ध्यान में बैठ जाओ । आंखें बंद कर लो । और महसूस करो कि तुम्हारे शरीर को क्या चाहिए ? जो भी जरूरत हो । तुमने अभी भोजन देखा नहीं । भोजन सामने भी नहीं है । तुम बस अपने प्राणों में महसूस करो कि तुम्हारे शरीर को क्या जरूरत है ? तुम्हें क्या खाने जैसा लग रहा है ?
डाक्टर लियोनार्ड पिअरसन इसे " हमिंग फूड " कहते हैं । वह भोजन जो तुम्हारे भीतर से आवाज देता है । ऐसा भोजन तुम चाहे जितना खाओ । लेकिन वही खाओ । दूसरी तरह के भोजन को वह " बैकनिंग फूड " कहते हैं । वह भोजन, जो तुम्हारे सामने हो । तो तुम उसमें उत्सुक हो जाओ । फिर वह दिमागी बात हो गई । तुम्हारी जरूरत न रही । अगर तुम अपने हमिंग फूड की आवाज को सुनते हो । तो वह तुम चाहे । जितना खाओ । लेकिन तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी । क्योंकि वह तुम्हें तृप्त कर देगा । शरीर उसी चीज की मांग करता है । जिस चीज की उसे जरूरत होती है । और किसी चीज की मांग शरीर नहीं करता । वह भोजन तृप्त करता है । और तृप्ति हो जाए । तो व्यक्ति जरूरत से ज्यादा कभी भी नहीं खाता । मुश्किल तभी होती है । जब तुम वे चीजें खाते हो । जो तुम्हें बाहर से आकर्षित करती हैं । तुम्हें दिखाई दी । और तुमने खा ली । ऐसा भोजन तुम्हें तृप्त नहीं करेगा । क्योंकि शरीर को उसकी जरूरत नहीं है । तुम अतृप्त रह जाते हो । अतृप्त रह जाने के कारण । तुम ज्यादा खा लेते हो । लेकिन ऐसा भोजन तुम भले ही कितना भी खाते चले जाओ । तुम्हें तृप्त नहीं करेगा । क्योंकि उसकी जरूरत ही नहीं है । यह 1 बड़ी समस्या बन गई है । क्योंकि तुम यह भूल ही गए हो कि तुम्हें अपनी भीतरी इच्छा को सुनना है । बल्कि लोगों को सिखाया जाता है कि वे भीतर की आवाज को न सुनें । लोग कहते हैं - यह खाओ । वह मत खाओ । जैसे बंधे हुए नियम हों । शरीर कोई बंधे हुए नियम नहीं जानता । मनस्विद कहते हैं - अगर बच्चों को भोजन के साथ अकेला छोड़ दिया जाए । तो वे वही खाएंगे । जिस चीज की उनके शरीर को जरूरत है । कई अध्ययन किए गए । और बड़े हैरानी के परिणाम आए हैं । अगर कोई बच्चा किसी बीमारी से पीडि़त है । और उस बीमारी के लिए सेब अच्छा है । तो बच्चा सेब को चुन लेगा । खाने की चाहे और कितनी चीजें पड़ी हों । लेकिन बच्चा सेब को ही चुनेगा । जानवर भी ऐसा करते हैं । सिर्फ आदमी यह भाषा भूल गया है । तुम 1 भैंस को लाकर बगीचे में छोड़ दो । पूरा बगीचा पड़ा है । पूरी हरियाली मौजूद है । लेकिन वह कोई परवाह नहीं करेगी । फूल और पेड़ कितना ही लुभाएं । लेकिन वह उनकी ओर देखेगी भी नहीं । वह खाने को वही घास चुनेगी । जिसकी उसे जरूरत है । तुम भैंस को धोखा नहीं दे सकते । सिर्फ आदमी को ही धोखा दिया जा सकता है । तो तुम्हारा शरीर जो कहता है । उसे सुनने की कला सीखनी शुरू करो । जब तुम नाश्ता करने लगो । तो आंखें बंद कर लो । और देखो कि - तुम क्या चाहते हो ? तुम्हारी वास्तविक इच्छा क्या है ? क्या उपलब्ध है ? यह मत सोचो । सिर्फ यह सोचो कि इच्छा किस चीज की उठ रही है । फिर जाकर वह चीज खोजो । और खाओ । कुछ दिन ऐसा करो । धीरे धीरे तुम पाओगे कि अब तुम बेकार के खाने में उत्सुक नहीं होते ।
दूसरी बात - जब तुम खाओ । तो अच्छी तरह से चबाकर खाओ । भोजन को जल्दी जल्दी निगलो मत । मुंह में उसका पूरा स्वाद लो । अच्छी तरह से चबाओ । क्योंकि स्वाद तो सारा गले से ऊपर ही है । गले से नीचे कोई स्वाद नहीं है । इसलिए जल्दी मत करो । भोजन को ज्यादा चबाओ । ताकि ज्यादा स्वाद आए । और इस स्वाद को सघन करने के लिए जो कर सकते हो । करो । जब तुम कुछ खाने लगो । तो पहले उसे सूंघो । उसकी गंध का मजा लो । क्योंकि आधा स्वाद तो गंध में ही है । कई प्रयोग किए गए हैं । अगर तुम्हारी नाक पूरी तरह बंद हो । और तुम्हें कुछ खाने को दिया जाए । तो तुम उसका स्वाद नहीं ले सकते । तब तुम्हें समझ आएगा कि स्वाद से ज्यादा गंध के कारण तुम स्वाद ले सकते हो । अगर तुम्हारी आंखें बंद हों । तो तुम उतना भी स्वाद नहीं ले पाओगे । क्योंकि अब तुम आंखों को आकर्षित करने वाले रंग को महसूस नहीं कर सकते । कई प्रयोग किए गए हैं । जिनमें नाक और आंख पूरी तरह बंद करके कुछ खाने को दिया जाता है । तो तुम यह भी नहीं बता सकते कि तुम क्या खा रहे हो । यही कारण है कि जुकाम में तुम खाने का मजा नहीं ले सकते । क्योंकि तुम उसे सूंघ नहीं पाते । जब लोगों को जुकाम होता है । तो वे तीखे मसालेदार भोजन खाना शुरू कर देते हैं । क्योंकि उससे उन्हें थोड़े से स्वाद का पता चलता है । तो भोजन करते हुए भोजन को अच्छे से देखो । सूंघो । कोई जल्दी नहीं है । पूरा समय लो । इसे 1 ध्यान बना लो । अगर लोगों को लगे कि तुम पागल हो गए हो । तो भी कोई चिंता न लो । भोजन को सब ओर से उलट पुलटकर देखो । आंखें बंद करके उसे छुओ । गालों से छुआओ । हर तरह से महसूस करो । बारबार सूंघो । फिर थोड़ा सा भोजन भी पर्याप्त होगा । और तुम्हें बहुत तृप्ति देगा । ओशो

25 मई 2010

संत और सिद्ध में बहुत अंतर है..there are major difference saint and siddh

ये महज आज से लगभग डेढ सौ साल पहले की बात है जब टेरी कोहाट (वर्तमान में पाकिस्तानी क्षेत्र ) में कायस्थ कुल में लाला वासुदेव के घर हरिहर बाबा यानी स्वरूपानन्द जी का प्राकटीयकरण हुआ । स्वरूपानन्द जी बाल्यावस्था से ही वैरागी थे और श्रीकृष्ण की भाँति बाल अवस्था से ही इन्होनें अनेकों दिव्य चमत्कार किये । बाद में किशोरावस्था में पहुँचने पर स्वयँ इनके गुरु अद्वैतानन्द जी इनके पास पहुँचे और बिना किसी भूमिका के इन्हें "परमहँस" कहकर पुकारा । आज टी. वी आदि की बदौलत और विभिन्न साधु संतो की प्रचारार्थ पुस्तकों के माध्यम से परमहँस शब्द से आप बखूबी परिचित होंगे परन्तु हँसी की बात ये है कि धङल्ले से इसका उपयोग करने बाले और शान से अपने नाम के आगे परमहँस लगाने वाले जानते तक नहीं होगें कि परमहँस होता क्या है और ये स्थिति कब और किस तरह प्राप्त होती है । मैं थोङा सा संकेत रूप में आपको बताता हूँ ये संत से ऊपर की स्थिति है । और संत होना ही टेङी खीर से कम नहीं है..आजकल जिन लोगों को आप संत सम्बोधन से जानते हैं ।
ये दरअसल ज्यादातर ग्यानमार्ग और भक्तिमार्ग की अनगिनत साधनाओं में से एक के साधक मात्र है और ऐसा भी नहीं हैं कि सब को एक ही तराजू में तौल दिया जाय पर मेरा आशय ये है कि संतो की जिस तरह की भीङ आज देखने को मिल रही है उस भीङ में दो या चार संत भी मुश्किल से निकलेंगे जो वास्तविक संत शब्द की परिभाषा के अन्तर्गत आते हैं । फ़िर परमहँस! wow इस पर तो सिर्फ़ हँसा जा सकता है । इस सम्बन्ध में कबीर की एक बात याद आती है.." सिंहो के लेहङ नहीं , साधु न चले जमात.."
खैर ..साहब बाद में स्वरूपानन्द जी गुरु आग्यानुसार तपोभूमि (आगरा नगला पदी और भगवान टाकीज फ़्लाईओवर के निकट ) आये और बारह वरसों तक घनघोर साधना की । तदपरान्त पुनः गुरु आग्यानुसार आपने अलग अलग स्थानों पर जीवों को सुरति शब्द साधना जो आत्मा की मुक्ति हेतु एकमात्र साधना निर्धारित की गयी है ,से परिचित कराया और जीवन के अंतिम दिनों में गूजरों की नंगली (वर्तमान में गुरुधाम नंगलीधाम के नाम से मशहूर ये स्थान मेरठ शहर के निकट है और लगभग सोलह किमी के दायरे में समस्त सुविधाओं से युक्त आश्रम बना हुआ है ) में रहे ।
उन्ही दिनों की बात है एक दिन स्वरूपानन्द जी प्रवचन कर रहे थे । जब एक सिद्ध उनकी प्रसिद्ध से प्रभावित होकर पहुँचा । उसने स्वरूपानन्द जी के चमत्कारों के बारे में काफ़ी कुछ सुन रखा था । यहाँ ये ध्यान रखे कि सिद्ध और संत में जमीन आसमान का अंतर होता है । संत और परमहँस में भी यही अंतर होता है । बेहद अहंकारी ये सिद्ध लगभग टहलता हुआ स्वरूपानन्द जी के पास पहुँचा और बोला कि कुन्डलिनी ग्यान के द्वारा मैंने आदमी को पशु पक्षी बना देने की कला सीख ली है..और मैंने सुना है कि आपको भी कुछ कलायें आती है..क्यों न हम लोग एक दूसरे को अपनी अपनी कला सिखा दें...स्वरूपानन्द जी ने कहा कि आप बैठें हम बाद में बात करते हैं...बस उसी प्रवचन के दौरान ही स्वरूपानन्द जी ने उसकी हालत खराव कर दी..जबकि वे आराम से पूर्ववतः प्रवचन देते रहे..हुआ यूँ कि प्रवचन के दौरान स्वरूपानन्द जी जिस तरफ़ भी हाथ उठाते उस आदमी का शरीर उधर ही
खिंचता..और बेहद कन्ट्रोल करने की कोशिश के बाद भी वह कुछ न कर सका और प्रवचन खत्म होते होते उसकी हालत अधमरे के समान हो गयी । बरसों से बीमार व्यक्ति की भाँति वह हाँफ़ रहा था । बाद में स्वरूपानन्द जी ने उसे बेहद ताङना दी और कहा कि प्रभु की अनमोल योग विधा का तुम ये उपयोग करते हो अरे जीव तो पहले ही अग्यान के वशीभूत होकर पशुवत जी रहा है उसे पशु पक्षी बनाकर तुम क्या बङी बात कर रहे हो..उस सिद्ध का सारा अहँकार चूर चूर हो गया और वह स्वरूपानन्द जी के पैरों में गिर कर माफ़ी माँगने लगा ।
इसी तरह संत शिरोमणि रैदास जी का एक प्रसंग याद आता है । प्राय संतो का ये स्वभाव होता है कि वे अन्य की अपेक्षा ज्यादातर मौन रहना और सामान्य रूप से बात करना ही पसन्द करते है । बङे बङाई ना करें बङे न बोले बोल । हीरा मुख से ना कहे लाख टका मेरो मोल ।
रैदास जी चर्मकार कुल में हुये थे और जीविकापार्जन हेतु जूते गांठने और नये जूते बनाने का कार्य करते थे । वैसे इस आमदनी से उनका घर आराम से चल सकता था परन्तु रोजाना ही ढेरों साधुओं के आवागमन और उनके स्वागत सत्कार और भोजन आदि के अतिरिक्त खर्च की वजह से उन्हें अक्सर आर्थिक परेशानी का सामना करना पङता था । ऐसे ही दिनों में एक बार एक सिद्ध पुरुष जो रैदास जी के विनम्र व्यवहार से काफ़ी प्रभावित था । उनके घर आया और उसे अहसास हुआ कि रैदास जी इस समय काफ़ी आर्थिक परेशानी महसूस कर रहे हैं । उसने अपने मन में गर्व ( योग और सिद्ध मार्ग से अक्सर इंसान के अन्दर अहंकार सामान्य मनुष्य की अपेक्षा और अधिक हो जाता है क्योंकि उसे बोध होने लगता है कि वो सामान्य से हटकर कुछ विशेष है और अलौकिक शक्ति उसके पास है । जबकि भक्तिमार्ग अहँकार का ही प्रथम समूल नाश करता है । योग में जो प्राप्ति होती है उसकी तुलना राईदाना
से अधिक नहीं है परन्तु भक्ति में जो प्राप्ति है उसका उदाहरण देने के लिये अति विशाल पर्वत भी तुच्छ नजर आता है ) महसूस करते हुये अपने थैले से पारस पत्थर ( सिद्ध द्वारा प्राप्त वह पत्थर जिसको लोहे से स्पर्श करा देने से लोहा सोने में परवर्तित हो जाता है ) निकाला और रैदास जी से कहा कि आप ये पारस रख लो । इसे मैं बीस दिनों के लिये छोङे जा रहा हूँ इस दरम्यान आप जितना भी चाहे सोना बना लेना इससे फ़िर आपको कभी कोई परेशानी नहीं होगी । बेचारा सिद्ध नहीं जानता था कि आत्मग्यानी संत क्या होता है ? गाँठी दाम न बाँधहि नहीं नारी से नेह । कह कबीर उस संत की हम लें चरनन की खेह । दरअसल संतगीरी का पहला अध्याय ही इस बात से शुरू होता है कि सबकी व्यवस्था करने बाला भगवान है । हमारे करने से कुछ नहीं होता है ।
जलचर जीव बसे जल माहीं तिनको जल में भोजन देय । थलचर जीव बसे थल माहीं तिनको थल में भोजन देय । नभचर जीव बसे नभ माहीं तिनको नभ में भोजन देय । नारि गर्भ में बैठा जीवा , उसको भी तो भोजन देय । लोगन राम खिलौना जाना ! अरे पागलो, ये सब व्यवस्था उसके आदेश से ही तो हो रही है और तुम उसको भोग लगाते हो प्रसाद खिलाते हो । उसको नहलाने सुलाने जैसा झूठा नाटक करते हो ।अरे वो एक पल के लिये भी सो गया तो क्या होगा कल्पना करना ही मुश्किल है ?
रैदास जी ने विनम्रता से कहा , अरे भाई ! मैं इसका क्या करूँगा । मेरे पास तो इसका कोई उपयोग ही नही हैं । सिद्ध ने मन में सोचा कि रैदास जी शर्म महसूस कर रहे है इसलिये वो बोला कि आप रख लो मैं कुछ दिनों बाद इसको ले जाँऊगा । उसने मन में सोचा कि मेरे पीछे ये अवश्य ही इससे सोना बना लेंगे ।
रैदास जी उस समय अपने काम में व्यस्त थे । सो उस सिद्ध ने उन्हे बताते हुये वह पारस पत्थर एक जगह दीवाल की सन्धि में रख दिया और चला गया । बीस दिन बाद जब वह लौटा तो उसने बेहद व्यग्रता से प्रथम पारस के बारे में ही पूछा । रैदास जी ने अचकचाते हुये कहा कि कौन सा पारस पत्थर ?
सिद्ध ने सोचा कि रैदास जी के मन में बेईमानी आ गयी है । उसने कहा कि वही रैदास जी जो मैं बीस दिन पूर्व आपको दे गया था । रैदास जी ने कहा कि आप तो मुझे कोई पारस नहीं दे गये थे । सिद्ध व्याकुल होकर उस स्थान पर गया जहाँ उसने पारस दीवार की सन्धि में छुपाया था और बोला कि आपको बताकर इसी स्थान पर रख गया था..कहते कहते उसने देखा कि पारस पत्थर ज्यों का त्यों उसी स्थान पर रखा हुआ था और रैदास जी ने उसको छुआ तक न था । वह बेहद हैरान रह गया क्योंकि वह सोच रहा था कि जब वह लौटकर आयेगा तो रैदास जी का ठाठबाठ ही निराला होगा और पारस की बदौलत वे अपने आपको मालामाल कर लेंगे पर रैदास जी ने तो उसको छुआ तक न था । उसका सारा अहँकार चूर चूर हो गया और वह रैदास जी को नमन करता हुआ बोला कि हे संत शिरोमणि आप संतो के पास वो कौन सा अनमोल और अक्षय धन है जिसके आगे यह पारस भी अत्यन्त तुच्छ है । कृपया मुझे उपदेश करें । पारस और संत में यही अंतरो जान । ये लोहा कंचन करे वो करले आपु समान ।

बौद्धिकता पूरी तरह से दीवालिया है


तुम्हारा मन बुद्धिमत्ता नहीं है ।  हो सकता है कि यह अजीब लगे । लेकिन यह सच है । तुम्हारा मन बुद्धिमत्ता नहीं है । मन बौद्धिक हो सकता है । जो कि बुद्धिमत्ता का बहुत ही गरीब परिपूरक है । बौद्धिकता यांत्रिक है । तुम बहुत बड़े विद्वान बन सकते हो । बहुत महान प्रोफेसर । बस शब्दों के साथ खेलते हो । जो कि सभी उधार के हैं । विचारों को व्यवस्थित और पुनः व्यवस्थित करते हैं । उनमें से कोई भी तुम्हारे नहीं हैं । बौद्धिकता पूरी तरह से दीवालिया है । उसके पास अपना कुछ भी नहीं है । सब कुछ उधार लिया हुआ है । और बुद्धिमत्ता और बौद्धिकता में यही फर्क है । बुद्धिमत्ता तुम्हारी जन्मजात गुणवत्ता है ।
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1 राजा ने 1 चित्रकार को नियुक्त किया । वह ऐसा चित्र चाहता था । जैसा अभी तक संसार में बना ही न ही - अदभुत । चित्रकार जेन गुरु था । चित्रकार ने चित्र बनाना प्रारम्भ किया । महीनों व्यतीत हो गए । फिर वर्षों बीत गए । राजा अधीर होकर पूछता । और चित्रकार और मोहलत मांग लेता । सुबह से शाम तक चित्रकार स्वयं को 1 कक्ष में बंद कर लेता । और चित्र का सृजन चलता रहता । कक्ष में किसी को प्रवेश की अनुमति नहीं थी । स्वयं राजा को भी नहीं । कभी रात्रि में उस कक्ष से निनाद की आवाजे आतीं । कभी वीणा के स्वर आते । कभी झरने जैसी आवाजे । तो कभी 1 दिव्य सुवास उठती । राजा का महल कक्ष से लगा ही था । राजा की अधीरता बढती ही जाती । लेकिन क्या करता ? वचन से आबद्ध जो था । वह बस महीनों बाद चित्रकार से निवेदन कर देता । और चित्रकार कहता - कुछ दिन और ।
राजा ने यह भी गौर किया कि चित्रकार की आभा परिवर्तित हो गयी है । उसके पदचाप संगीतमय हो गये हैं । वह चलता है - जैसे कोई नर्तन करे । उसकी निगाहें ओज पूर्ण हो उठी हैं । वह कुछ गुनगुनाती तल्लीनता में रहता है । जैसे उसके भीतर महारास चल रहा हो । उसकी भंगिमाए राजा को निर्भार कर जातीं ।
1 दिन राजा अनेक रातों न सो पाने के बाद अधीर हो उठा - आपका चित्र कब पूर्ण होगा ? महानुभाव ? मैं आतुर हो रहा हूँ । अब असह्य होता जा रहा है । अब तो रात्रि को नींद भी नहीं आती । 24 घंटे बस आपका और आपके चित्र का चिंतन ही मन में चलता है । ऐसा क्या है कि आप मुझे इतना तृषित कर रहे हैं ? कृपया मुझे अति शीघ्र उस अदभुत चित्र के दर्शन कराईए । मैं कहीं विक्षिप्त न हो जाऊँ ।
चित्रकार मुस्कुराते हुए राजा की बाहें थामकर उसे चित्रशाला में ले गया ।
राजा ने वह चित्र देखा । चित्र में 1 मार्ग था । कहीं दूर जंगलों में गुम सा होता हुआ - यह मार्ग कहाँ जाता है ?
चित्रकार ने कहा - यह तो मुझे भी नहीं पता । क्या आप चलना चाहोगे ? राजा ने आतुरता से हामी भर दी - हाँ हाँ अवश्य । तुरन्त ।
चित्रकार ने राजा को साथ लिया । और दोनों उस मार्ग पर चल पड़े ।
कुछ दूर जाकर दोनों खो गए । चित्रकार भी । चित्र भी । और राजा भी । और यह लिखते हुए मैं भी । और पढ़ते हुए आप भी । जेन । अनन्या स्वास्तिका ।
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1 बीज सारी पृथ्वी को वृक्षों से भर सकता है - ओशो ।
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अनंत काल खंड में यहाँ आपस में कोई एक दूसरे से अपरिचित नहीं है । अस्तित्व के विकास क्रम में हम सब कभी न कभी, किसी न किसी जीवन में एक दूसरे की निकटता से गुजरें हैं - जाने अनजाने । यही स्मृति हमें सहज आकर्षित करती हैं । और बुद्धों के प्रति प्रेम को यही,
हमारी स्वयं से स्वयं के मिलन की अतृप्त प्यास हमें उनका दीवाना बना देती हैं ।
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प्रिय मित्रो ! आपकी दृष्टि में कौन है वैदिक ( हिन्दू )  धर्म का असली आदर्श आचार्य -  A आद्य शंकराचार्य B स्वामी दयानंद ।
A आद्य शंकराचार्य - मूर्ति पूजा के महान संस्थापक । 8 वर्ष की आयु में चारो वेद कंठस्थ कर डाले । 12 वर्ष के होते होते सकल शास्त्र निष्णात हो गए । और 16 वर्ष के होते होते तो ऐसा अद्वितीय शारीरक भाष्य लिख डाला कि हजारो वर्ष बाद आज भी उसका दर्शन करके बड़े बड़े विद्वान दांतों तले अंगुली दबाते हैं । मातृभक्त ऐसे कि संन्यास की अति उत्कट अभिलाषा होने के बावजूद भी आज्ञा लेकर तब संन्यास लिया । और अंतकाल में माता को हरिदर्शन करवा कर मोक्ष पद प्रदान कराना न भूले । इस नन्हे बालक ने अल्पायु में ही विधर्मियो से जकड़े हुए तत्कालीन सनातन धर्म को शस्त्र और शास्त्र दोनों की अदभुत नीति से विधर्मियो के चंगुल से स्वतन्त्र कर भारत की चारो दिशाओं में 4 मठो के माध्यम से वैदिक धर्म की ध्वजा फहरा दी । अंत में स्वेच्छा से समाधिस्थ होकर परधाम गमन किया । इनके द्वारा निर्मित इस धर्म दुर्ग के आश्रय तले कालान्तर में श्री हर्ष, वाचस्पति मिश्र, श्री चित्सुखाचार्य, मधुसूदन सरस्वती, धर्म सम्राट करपात्री जी जैसे 1 से बढ़कर 1 विद्वान और वैदिक धर्म के प्रचारक महापुरुष पुष्पित होते रहे हैं ।
B स्वामी दयानंद - मूर्ति पूजा का घनघोर विरोधी, मातृ पितृ भक्त ऐसे कि माता पिता को धोखा देकर बारबार घर से भागते रहे । अंत में माता पिता को रोता बिलखता छोड़ ऐसे भागे कि दोबारा घर ना लौटे । ज्ञान ऐसा कि शिवलिंग का प्रसाद चूहे को पाते देख ये समझ बैठे कि शिव लिंग में भगवान का वास नहीं । नदी में बहती 1 लाश को चीर फाड़ कर उसमें योग शास्त्रों में वर्णित अष्टचक्र खोजने लगे । भांग पीकर शैव दर्शन का मूल खोजते रहे । नेत्रहीन स्वामी विरजानंद से व्याकरण सीखने की एवज में जेब से पैदल इनसे जब उन्होंने बोला कि आप वैदिक धर्म का प्रचार करो । तो वैदिक धर्म का ऐसा कबाडा कर गए कि क्या कहने ? काशी शास्त्रार्थ करने गए । तो इनका ज्ञान देखकर तत्कालीन शास्त्रार्थ के मध्यस्थ काशी नरेश ने इनके बारे में ये निर्णय दिया - दयानंद महा धूर्त है । गुरु भक्ति ऐसी कि जिस गुरु से सर मुंडवाकर संन्यास दीक्षा ली । उनके ही सम्प्रदाय और सिद्धांत को पाखण्ड बता बैठे । अंत में इनको बहुत दुर्गति पूर्वक देह त्याग करना पडा । आज तक मुसलमानों और जाति विहीन आदिवासियों को आर्य नाम देकर के बनाया गया । इनका निर्मित आर्य समाज हिन्दू पुराणों और स्मृतियों, ब्राह्मणों को गालियाँ देते तथा उनका दुष्प्रचार करते नहीं थकता है । कौन है । हिन्दुओं का असली आदर्श ?
प्रिय महानुभावों ! कृपया इसे तुलना न समझ कर 1 सामान्य सा जनमत संग्रह ( सर्वे ) मात्र समझें । क्योकि वस्तुतः दयानंद जैसे जुगनू की श्रीमदाद्यशंकराचार्य जी जैसे सूर्य के साथ क्या तुलना ? पंडितजी अभिषेक जोशी 

23 मई 2010

पारस पत्थर का रहस्य

mistry of paras stone - इस अदभुत सृष्टि में एक ही चीज चार रूपों में मौजूद है मिसाल के तौर पर प्रथ्वी को लें । एक प्रथ्वी जिस पर हम रहते हैं । एक प्रथ्वी देवी रूप में नारी आकृति है । एक जिसका हम इस्तेमाल करते हैं और न देवी मानते हैं न अन्य कुछ । एक प्रथ्वी हमारे अन्दर है । 
इसी तरह हम एक तिनका से लेकर बङी से बङी चीज को ले लें । वह इसी तरह चार अस्तित्व (पर वास्तव में है एक ही) के साथ मौजूद है । जो लोग अलौकिक साधनाओं के रहस्य से परिचित नहीं हैं । उन्हें ये बात समझने में कठिनाई हो सकती है ।
इसको समझने के लिये उदाहरण के तौर पर हम दूसरे तत्व अग्नि fire को लेते है । यदि कोई अग्नि तत्व को सिद्ध कर ले तो उसके देवता को जान जायेगा । उस समय वो देवता भी होगा । अदृश्य में व्याप्त अग्नि भी होगी । सांसारिक अग्नि तो प्रत्यक्ष होती ही है और हमारे अन्दर भी अग्नि होगी । इसी तरह पवन, आकाश आदि जितना और जो कुछ भी है । वह कुछ इसी तरह से है ।
हैरत की बात ये है कि जिस घर में हम रहते है वो घर, हम स्वयं हमारे माँ बाप और अन्य सभी भी हमारे अन्दर मौजूद है और इनको बङे आराम से उसी तरह देखा जा सकता है । जैसे हम टीवी पर कोई दृश्य देखते हैं ।
लेकिन अभी पारस पत्थर की बात है । ये वो पत्थर है जिसको किसी भी अन्य धातु से स्पर्श करा दिया जाय तो वो धातु सोने में परिवर्तित हो जाती है पर क्या ये पत्थर सिर्फ़ एक मिथक ही है । हरगिज नहीं । आप हमेशा के लिये ये बात गाँठ बांध लें कि इस संसार में कोई भी चीज मिथक नहीं है और जितनी भी चीजें हम देखते या व्यवहार करते हैं । उससे करोङों अरबों गुना अन्य दूसरी चीजें हैं जो हमारी पहुँच से बाहर है ।
उदाहरण के तौर पर भूत प्रेत को अन्धविश्वास कह दिया जाता है पर वास्तव में भूत प्रेत होते हैं और उनके हजारों प्रकार होते हैं । इसलिये जिस चीज का कभी कोई अस्तित्व नहीं होता । उस चीज की कहानी भी अधिक दिनों तक जिन्दा नहीं रहती है ।
यदि आप सच को ठीक से समझना चाहें तो सबसे पहले तो यही मानना होगा कि हम जिस जगह रहते हैं । वह सर्वत्र रहस्यमय आवरण से आच्छादित है ?
रैदास और गोरखनाथ महज आज से पाँच सौ साल पहले ही तो हुये है । जब एक महात्मा (सिद्ध पुरुष) उनके पास (रैदास) कुछ दिनों के लिये पारस पत्थर रख गया था ।
गोरखनाथ के गुरु मछन्दरनाथ जब महा जादूगरनियों के जाल में फ़ँसकर आसक्त होकर वहीं रहने लगे थे और गोरखनाथ उन्हें छुङाकर लाये थे तो वो अपने थैले में एक सोने की ईंट छुपा लाये थे । ये देखकर गोरखनाथ को गुरु के इस लोभ पर बेहद गुस्सा आया और उन्होने अपनी सिद्धि का चमत्कार दिखाते हुये एक बेहद भारी पत्थर की शिला (पर) को स्वयं मूत्र त्याग द्वारा (वास्तव में सिद्धि के द्वारा) सोने की बना दिया । ये बात अलग है कि गुरु मछन्दर ने उससे भी बङा चमत्कार दिखाकर गोरख का गरूर तोङ दिया ।
ये दोनों घटनायें विस्तार से आपको जल्दी ही मेरे ब्लाग पर पङने को मिलेगी ।
ये दोनों घटनायें सिर्फ़ पाँच सौ साल पहले पारस पत्थर या अन्य विधियों से सोना बनाने का प्रमाण देती हैं । मूलतः पारस पत्थर का हासिल होना एक प्रकार की अलौकिक सिद्धि ही है । क्योंकि आप इसको अध्ययन करके और अन्य शोध करके हासिल करने की चेष्टा करें तो ये प्राप्त नहीं होगा । परन्तु दूसरी कुछ अन्य चीजें हैं जो आपको पारस पत्थर का भ्रम दे सकती हैं । इनमें सबसे ऊपर नाम आता है सर्वभेदी पारद या सर्वग्राही पारद का । पारद पारा को कहते हैं और धर्मशास्त्र कहते हैं कि ये एक समय प्रथ्वी पर गिरा भगवान शंकर का वीर्य है ।
इसमें पारद के चार कुँए जम्बू दीप में बने । जिनमें सर्वश्रेष्ठ कुंआ देवताओं ने छुपा दिया और जो आज भी हिमालयी पर्वत श्रंखलाओं में मौजूद है । पर अज्ञात है । दूसरा कुंआ भी मानव से इतर जातियों ने छुपा दिया या कहे कि अपने कब्जे में ले लिया ।
एक सबसे निम्न स्तर के कुंए का पारद ही मनुष्य को प्राप्त हो पाता है और अन्य दूसरे कुंये का पारद भी अलौकिक ज्ञान के शोधकर्ता प्राप्त कर लेते है । इसी पारद को विभिन्न क्रियाओं से गुजार कर लगभग छह माह तक खल्ल में कूटा जाता है तब ये कुपित होकर मुँह फ़ाङ देता है और सर्वभेदी या सर्वग्राही बन जाता है । ऐसा हो जाने पर ये धातुओं को परवर्तित करने की क्षमता वाला हो जाता है और कुछ अन्य तरीको का इस्तेमाल करने पर ये किसी भी धातु को सोना भी बना देता है ।
यद्यपि ये कार्य कठिन है पर असंभव नहीं ।
प्राचीन समय में अनेक लोग इन विद्याओं का उपयोग करते थे । इस सम्बन्ध में मैंने एक प्रयोग किया था जो बीस प्रतिशत सफ़ल रहा था । इसमें मैंने एक पेङ का गोंद लेकर नौसादर के साथ काफ़ी तेज ताप पर गर्म किया और गर्म करने के बाद जो शोधित पदार्थ ऊपर उठकर आया उसको कनेर आदि वांछित पीले पुष्पों के रस के साथ पुनः तपाया और फ़िर से प्राप्त नये पदार्थ को रांगा शीशा और चाँदी (तीनों का महीन चूर्ण) के साथ घोंटा । 
अब मेरा अगला कदम इसको लुहार की भट्टी के समान दहकती आग में पिघलाना भर था । मैं इसके ही प्रयास में लगा ही था कि कुछ महात्मा आदि द्वारा मेरी सोच की दिशा बदल गयी ।
उनका मानना था कि यह व्यर्थ की मेहनत है । इससे अच्छा पारस ज्ञान ही है और इस तरह वो प्रयोग बीच में ही छूट गया और मैं अन्य बेहतर उपलब्धियों की तलाश में जुट गया । ये क्रम कुछ सालों चला ।
तब मेरा प्रभुकृपा से आत्मज्ञानी संतों से मिलना हुआ । उन्होंने कहा कि कितना भी कुछ भी हासिल कर लो अंत में तुम्हारे काम आने वाला कुछ भी नहीं है । इसलिये वो धन क्यों नहीं कमाते जो हमेशा काम आता है और अक्षय धन है ।
पारस और सन्त में, यही अन्तरो जान ।
ये लोहा कंचन करें, वो करि लैं आपु समान । 
यहाँ मैं एक बात कहना चाहूँगा कि आत्मज्ञानी संत मिलना दुर्लभ है । एक बार पारस पत्थर आपको सहज ही प्राप्त हो सकता है पर सच्चे संत मिलना बेहद मुश्किल है । लेकिन किसी कपावश मुझे ऐसे संत मिले और उनके शीतल वचनों के स्पर्श मात्र से ही मेरा सारा अज्ञान धुल गया और इस तरह पारस पत्थर और मेरे अन्य शोध एक बार फ़िर बीच में ही रह गये । यहाँ एक बात ये स्पष्ट कर देना चाहूँगा कि मेरा वो समय यूँ ही निरर्थक नहीं गया बल्कि मैंने बहुत कुछ प्राप्त किया । पर वो आत्मज्ञान और परमात्म रस को जान लेने से फ़ीका ही लगता है ।
इसी तरह लांगलिका (कलियारी) नामक पेङ की जङ से भी सोना बनाया जा सकता है । कृतिम सोना जो असली सोने की तरह काला नहीं पङता को तो संभवतः अभी भी लोग बनाते हैं । 
इसी तरह एक प्रकार का बङा कमल पुष्प होता है जिसकी पहचान ये होती है कि उसमें गाङे रंग का तेल जैसा तरल पदार्थ निकलकर पानी पर फ़ैलता रहता है । ये तेल भी सोना बनाने के काम आता है ।
प्रकृति के अनेकों रहस्यों में से एक सोना भी, जब प्रथ्वी के गर्भ में सभी वांछित पदार्थ संयोगवश मिल जाते हैं तो अन्दर मौजूद प्राकृतिक ताप उसको सोने में बदलने की प्रक्रिया आरम्भ कर देता है । लेकिन क्योंकि ऐसा परिवर्तन हजारों सालों का सफ़र तय करके, तब प्राकृतिक रूप से बनी नयी चीज का निर्माण करता है । अतः मानवीय स्तर का कोई भी प्रयास न तो इसका मुकाबला कर सकता और न ही उस स्तर का निर्माण करने में सक्षम है ।
परन्तु ध्यान रखें कि ये बात में मानवीय स्तर पर कह रहा हूँ । साधु महात्मा और अलौकिक ज्ञान के ज्ञाताओं के लिये ये ज्ञान और ये बातें बङे तुच्छ स्तर की होती हैं । यानी वे चाहे तो ये चीजें चुटकियों में हासिल कर लेते हैं और प्रायः श्रेणी के अनुसार ये चीजें अक्सर महात्माओं पर देखने को मिल ही जाती हैं । 

18 मई 2010

ये मेरे साथ स्वर्ग जाने के हकदार नहीं

प्रश्न - आपकी बातों में कभी कभी राजनीति की गंध क्यों मालूम होती है ? 
ओशो - होगी गंध तुम्हारे भीतर । तुम्हारी व्याख्याओं में होगी । तुम्हारे मन की धारणाओं में होगी । तो तुम वही सुन लोगे जो तुम्हारे भीतर छिपा है और ऐसा तो बहुत कठिन है आदमी पाना, जिसके भीतर किसी न किसी तरह की राजनीति न पड़ी हो । तो अगर मैं कभी राजनीति शब्द का भी उपयोग कर दूँ तो तुम्हारे भीतर जल्दी से तहलका मच जाता है ।
धर्म शब्द सुनकर तुम्हारे भीतर कुछ नहीं होता । परमात्मा शब्द सुनकर तुम्हारे भीतर कोई लहर 
पैदा नहीं होती । राजनीति शब्द सुनकर ही तुम्हारे भीतर तरंगें आ जाती हैं, 
उसमें तुम्हारा रस है । राजनीति शब्द सुनकर ही तुम तालियां पीटने लगते हो । उसमें तुम्हारा रस है तुम उसे समझ पाते हो । वह तुम्हारी बुद्धि के भीतर है वह तुम्हारी समझ के भीतर है । फिर उसकी तुम व्याख्या भी कर लेते हो ।
क्योंकि यह तो तुम मानोगे कि शायद धार्मिक तुम नहीं होओ लेकिन राजनीति तो तुम भी काफी बघारते हो । काफी जानते हो काफी बात करते हो । अखबार तो तुम भी पढ़ते ही हो न, 24 घंटे बात तो करते ही हो न । उसमें तो तुम बड़े कुशल हो तो 1 शब्द भी सुना कि तुम्हारे भीतर जल्दी से 1 यात्रा शुरू हो जाती है । वह यात्रा तुम्हारी ही है तुम उसे मुझ पर मत आरोपित करना । कभी कभी मैं जानकर राजनीति शब्द का और कभी कभी जानकर राजनीति के संबंध में कुछ वक्तव्य भी दे देता हूं ।
1 पागल आदमी 1 पागलखाने के बाहर खिड़की के ऊपर बैठा हाथ में मछली पकड़ने की बंसी लिए है । आटा लगाकर काटे में खिड़की से लटकाए हुए बैठा था । 
मुल्ला नसरुद्दीन वहाँ से निकला तो उसने मजाक में पूछा कि - कितनी मछलियाँ पकड़ी ? 
उसने कहा - तुम्हें मिलाकर 11 । 
मुल्ला ने पूछा - मतलब ?
उसने कहा - 10 और पूछ चुके हैं ।
उस पागल ने कहा कि - तुम भी भीतर क्यों नहीं आ जाते ? यहाँ कहाँ मछली ?
तो मुल्ला ने कहा - फिर बैठे क्यों हो यह बंसी लिए हुए ?
- तुमको पकड़ने के लिए । देख रहा हूँ कितने नासमझ यहाँ से निकलते हैं ?
कभी कभी मैं चोट कर देता हूं । तत्क्षण मेरे हाथ में पकड़ में आ जाती हैं मछलियाँ कि किन किनको चोट लगी ? कौन कौन बौखला गए ? पत्र आने लगते हैं प्रश्न आने लगते हैं कि आपने बहुत ऐसा कर दिया । ठीक नहीं किया ।

मुल्ला नसरुद्दीन के घर कव्वालियों का प्रोग्राम था । बड़े बड़े नामी कव्वाल आए हुए थे । मेहमान कव्वालियों से झूम रहे थे । 
ऐसे में जब 1 कव्वाल ने यह पंक्ति पढ़ी - खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है । 
हर तरफ से वाह वाह का शोर उठा और बारबार कव्वाल ने इस पंक्ति को दोहराया - खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है..खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है । 
मुल्ला नसरुद्दीन जिसके घर यह आयोजन हो रहा था, बड़े गुस्से में भर गया - खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है ? यह बदतमीज कव्वाल, इसको इतनी भी समझ नहीं है कि मैंने ही बुलाया और मेरी ही फजीहत करवा रहा है कि खुदा जाने पर्दे में क्या हो रहा है ?
आखिर 1 सीमा थी और जब लोग फिर कहने लगे कि - वाह वाह ! फिर से हो जाए ।
तो वह उठकर खड़ा हो गया, उसने कहा - ठहर ! 1 सीमा होती है बर्दाश्त की और शिष्टाचार की भी । एक जरूरत है एक आवश्यकता है ।
और जल्दी से मुल्ला उठा और उसने पर्दा उठाकर कहा कि - देखिए ! कव्वाल साहब ! कोई हसरत न रह जाए कि पर्दे में क्या हो रहा है ? पर्दे में कुछ नहीं हो रहा है । देख लीजिए मेरी पत्नी छालियां कुतर रही है ।
अपनी अपनी समझ है ।
मुल्ला समझा कि शायद मेरी पत्नी के संबंध में कुछ कह रहा है कि - पर्दे के भीतर पता नहीं क्या हो रहा है ।
तुम्हारी समझ तुम्हारे जीवन में व्याख्याएं बनाती है । तुम मेरे पास भी हो लेकिन मेरे पास हो थोडे ही । तुम मुझे भी नहीं समझ पाते । मेरे पास वर्षों रहकर भी तुम यह नहीं समझ पाते कि मुझे राजनीति से क्या लेना देना हो सकता है ? 
लेकिन तुमने हाथ मेरे हाथ में तो छोड़ा नहीं है । तुम तो बैठे हो वहाँ सजग होकर कि कोई मौका मिल जाए । कोई बात जो तुम्हारी पकड़ में आ जाती हो । आ जाए तो तुम जल्दी से उस पर छलांग ले लेते हो ।
लाख तुमसे कहूं - ध्यान करो तब तुम नहीं पूछते कि - आप ध्यान की इतनी बातें क्यों करते हैं कि आपकी बातों से ध्यान की गंध आती है । एक दफा भी आदमी ने नहीं पूछा अब तक कि आपकी बातों से ध्यान की गंध आती है ।
आएगी कहाँ ? तुम्हारे भीतर हो तो ही आएगी न । लेकिन कभी इस 2-4 साल में कभी एकाध दफा राजनीति पर मैं कुछ कह देता हूं कि तत्क्षण आज न मालूम कितने प्रश्न आ गए हैं ।
स्वामी विष्णु चैतन्य भी पूछ लिए हैं कि आपका मन राजनीति के प्रति पक्षपात से भरा हुआ है । पूर्वाग्रह से भरा हुआ है न तो पूर्वाग्रह का मतलब तुम्हें पता है न तुम्हें अपने पूर्वाग्रहों का बोध है । एक बात तुमसे कहना चाहूंगा कि अगर तुम्हें मुझमें राजनीति की गंध आती हो तो जितनी जल्दी यहां से भाग सको, भाग जाओ । क्योंकि राजनीति की जहां भी गंध आए वहाँ रुकना मत । खतरनाक है यह बात, भाग ही जाओ । 
स्वामी विष्णु चैतन्य ! जितनी जल्दी भाग सको यहां से भाग जाओ । क्योंकि जहां राजनीति की गंध है । वहां खतरा है । कहीं लग न जाए तुम्हें राजनीति की गंध । कहीं यह रोग तुम्हें पकड़ न जाए । अपने को खोजने की थोड़ी कोशिश करो । कहां से यह गंध आ रही है ?
इतनी बार तुम्हें कहा हूं कि अपने को बीच में लाकर मुझे मत सुनो । मगर जब मैं धर्म की बात करता हूँ तो तुम कभी ऐसे सवाल नहीं पूछते क्योंकि वे तुम्हारी समझ में नहीं आते । वे तुम्हारे सिर के ऊपर से निकल जाते हैं । तुम्हारी समझ में वही बात आती है जो आ सकती है । तब तुम जल्दी से पकड़ लेते हो और तुम्हारे भीतर बड़ा ऊहापोह मच जाता है कि - अरे !
तुम्हें यह तो कभी खयाल में ही नहीं आता कि तुम किस तरह के शिष्य हो । तुम्हें यह तो कभी खयाल ही नहीं आता कि तुम्हारा शिष्यत्व अभी है ही नहीं लेकिन तुम्हें यह खयाल जरूर आ जाता है कि यह गुरु तो राजनीति में पड़ा है ।
गुरु कैसा होना चाहिए ? इसका तो तुम्हें पूरा पूरा हिसाब है । 
शिष्य कैसा होना चाहिए ? इसका तुम्हें कोई हिसाब नहीं है । 
और तुम ध्यान रखना मैं इस तरह की बातें कहता रहता हूँ और कहता रहूँगा । यह मेरी महत्वपूर्ण विधियों में से 1 विधि रही है जब मैं कुछ लोगों से छुटकारा पाना चाहता हूँ तो मैं कुछ उपाय करता हूँ । जब मेरे पास गांधीवादियों की 1 जमात इकठ्ठी हो गयी और मुझे लगा कि वह तो किसी मतलब की नहीं है तो मैं गांधी की आलोचना किया ।
गाँधी से मुझे कुछ लेना देना नहीं था मगर गांधी की आलोचना करते ही से 90% गांधीवादी हट गए । जो 10% बचे वे सच में ही काम के आदमी थे उनका लगाव मुझसे था ।
मेरी सदा तलाश चल रही है कि जिसका लगाव मुझसे है । मैं उसी पर मेहनत करना चाहता हूँ । बाकी पर मैं मेहनत नहीं करना चाहता ।
जब गांधीवादी हट गए तो मैंने उनकी फिकर छोड दी । जब मैं गांधीवादी के विपरीत बोल रहा था  और गांधी की आलोचना कर रहा था । स्वभावत: समाजवादी और कम्युनिस्ट, सब मेरे पास आ गए । उनको लगा - यह आदमी ठीक है ।
तब मैं समाजवाद के खिलाफ बोला । जब मैंने देखा कि बहुत समाजवादी इकट्ठे हो गए और उनकी मुझे कोई जरूरत नहीं है । समाजवाद के खिलाफ बोला, समाजवादी भाग गए । उनमें से कोई 10% बच रहे । जो बच रहे वे मेरे थे । जो भाग गए वे मेरे थे ही नहीं । उनकी भीड़ मैं इकट्ठी भी क्यों रखूं ? वे आज नहीं कल भाग ही जाने वाले थे । वे किसी और ही कारण से आए थे । उनका कारण था कि मैं गांधी के खिलाफ बोला । उन्हें मुझमें कोई रस न था ।
मेरी निरंतर चेष्टा है कि मैं उन पर ही मेहनत करूँ जिनको मुझमें रस है । मैं उन थोड़े से लोगों को दे देना चाहता हूँ जो दिया जा सकता है । लेकिन यह उन्हीं को दिया जा सकता है । यह वसीयत उन्हीं की हो सकती है जो पूरे पूरे मेरे साथ हैं । जो 100% मेरे साथ हैं । 
जो नरक भी मेरे साथ जाने को तैयार हैं वही मेरे साथ स्वर्ग जाने के हकदार होंगे । जो बीच में खड़े हो गए और कहने लगें कि - आप तो नर्क चले हम नहीं जाते तो इनको मैं स्वर्ग भी ले जाने वाला साथ नहीं हूँ । ये मेरे साथ स्वर्ग भी जाने के हकदार नहीं हैं ।
तो कभी मैं ऐसी बातें भी कहूंगा । कहता ही रहूंगा । कभी कभी छांटने के लिए उपयोगी हैं । उन बातों में मुझे कुछ रस नहीं है । यह तो तुम बहुत बाद में समझ पाओगे । अगर कभी समझ पाए सौभाग्य से कि - मैं कभी कौन सी बात कहता हूँ । क्यों कहता हूँ?

तुम अगर अपनी व्याख्याएं बीच में न लाओ तो बहुत आसानी होगी । तुम ज्यादा ढंग से समझ पाओगे । पूर्वाग्रह तुम्हारे हैं । पक्षपात तुम्हारे हैं । राजनीति तुम्हारे भीतर पड़ी है । ओशो 

जो हम होने का दिखावा करते हैं


22 मई 1980 गौतम बुद्ध सभागार । ओशो आश्रम । पुणे । भारत ।
भगवान श्री नित्य प्रति की प्रकार प्रवचन दे रहे थे । तभी श्रोताओं की ओर से एक छुरा उनकी हत्या करने के उद्देश्य से उनको लक्ष्य कर फेंका गया । पूरा बुद्धा सभागार जैसे एक क्षण को जड़ हो गया । पर सौभाग्यवश वह छुरा भगवान को लगा नहीं । और उनके पास से गुजरता हुआ चैतन्य और वादन दोनों के पैरों के बीच गिरा ।
भगवान श्री ने तुरंत कहा - फिक्र न करें । ऐसे ही बैठे रहें ।
भगवान श्री अपने स्थान पर अविचल, मुस्कराते हुये उसी मुद्रा में शांत बैठे थे । और जैसे ही उस युवक को पकड़कर लोग बाहर ले गये । भगवान श्री ने जहां से प्रश्नोत्तर प्रवचन का अंश अधूरा छोड़ा था । ठीक वहीँ से पुनः प्रारम्भ कर दिया । उनके लिये जैसे कुछ हुआ ही नहीं ।
अगले दिन स्वामी आनंद मैत्रय ने प्रश्न किया - भगवान ! कल प्रातःकाल ठीक प्रवचन के बीच आप पर जिस धर्मांध हिन्दू युवक ने छुरा फेंककर आपकी हत्या करने का धर्म के नाम पर जो लज्जाजनक प्रयास किया । कृपया इस संबंध में हमें दिशा बोध देने की कृपा करें ।
भगवान श्री ने उत्तर दिया - आनंद मैत्रय ! धर्म के नाम पर इस संसार में जितने जघन्य अपराध और मूढ़तापूर्ण कृत्य हुए । उनसे इतिहास के प्रष्ठ रंगे पड़े हैं । और मज़ा यह है कि अधर्म के नाम पर कोई भी बुरा कृत्य आज तक नहीं हुआ । सरमद, मंसूर के सर कलम किये गए । मज़हब के नाम पर लाखों निर्दोष काफिरों की हत्या की गई । अनेक कलात्मक सुंदर मंदिर तोड़े गये । ज्ञान के भंडार अमूल्य पुस्तकें और दुर्लभ पांडुलिपियों के साथ सिकंदरिया का विशाल पुस्तकालय जलाया गया । इसी मज़हब के नाम पर । लाखों बौद्धों को खदेड़कर भारत से पूर्वी देशों में धकेल दिया गया । हजारों की हत्या की गई । लाखों को नीच कर्म करने को विवश किया गया । इसी धर्म के नाम पर । धर्म के नाम पर ही यूरोप में हजारों स्त्रियों को जिंदा जलाया गया । और भारत में इसी धर्म के नाम पर लाखों स्त्रियों को जबरन पति के शव के साथ चिता की लपटों के हवाले कर दिया गया । धर्म के नाम पर ही जीसस को क्रूस पर चढ़ाया गया । सुकरात को ज़हर पिलाया गया । इसी धर्म के नाम पर हिन्दुस्तान पाकिस्तान के बंटबारे के समय हजारों हत्याएं हुईं । स्त्रियों पर बलात्कार हुए । करोड़ों की सम्पति आग की भेंट कर दी गई । और तुम पूछ रहे आनंद मैत्रय, यह जघन्य कृत्य धर्म के नाम पर किया गया । धर्म के नाम पर ही ऐसे कृत्य किये जा सकते हैं । क्योंकि धर्म बड़ा प्यारा मीठा और माधुर्य पूर्ण नाम है । धर्म के ठेकेदार मुल्ला, पादरी, पुरोहित हमेशा से यही समझाते रहे लोगों को कि धर्म के नाम पर धर्म युद्ध में जो मरेगा । वह सीधा स्वर्ग जायेगा ।
धर्म जो जीने की कला है । अपने आपको जानने की कला है । जो प्रेम और करुणा की कला है । उसे इन कथित धार्मिक लोगों ने मरने मारने की कला बना दिया है । और तुम कहते हो - वह युवक धर्मांध था । वस्तुतः धर्म किसी को अंधा नहीं बनाता । धर्म तो अंतर्द्रष्टि देता है । अंधे को आंख देता है । धर्मांध कोई हो कैसे सकता है ? उसे तो अधर्मांध कहना चाहिये । लेकिन हम धर्मांध का रूढ़ प्रयोग करते हैं । ऐसे लोगों को तो अंधा कहना चाहिये । यह सभी मूर्छित और पागल लोग हैं । और इन्हें पागल बनाने में सभी संगठित धर्मो का काम है । जिन्होंने विश्वास के नाम पर उन्हें अंधविश्वास और मूढ़ता दी है । उनकी प्रज्ञा और प्रेम को कभी विकसित होने ही नहीं दिया । धर्माचार्यों का धंधा ही तभी चल सकता था । जब लोग अंधे और मूढ़ बनें रहें ।
और मैं अपने सन्यासियों से इसलिये बहुत खुश हूं कि उन्होंने उस युवक को मारा नहीं । कोई चोट नहीं पहुंचाई । वे उसे प्रेम से उठाकर बाहर ले गये । जो कुछ तुमने किया । वह अमूल्य है । तुमने अपना होश बनाये रखा । मूर्छित नहीं हुए । उद्दिग्न नहीं हुए । यह मेरे लिए बहुत अमूल्य है । तुम मेरी घोषणा को भूले नहीं कि प्रत्येक के अंदर परमात्मा विराजमान है । उस युवक के अंदर भी वही परमात्मा है । थोड़ा सा अँधेरे में पड़ा है । पर है तो परमात्मा ही । तुमने उसके साथ जो सम्मान पूर्ण व्यवहार किया । वह प्रशंसनीय है । यदि तुम लोगों में प्रति हिंसा जागृत होती । तो मुझे कष्ट होता । मैं इसीलिए तुम सभी का आभारी हूं । तुमने उसे ऐसे उठाया । जैसे कोई गिरे हुये व्यक्ति को सड़क से उठाता हो । सन्यासी का यही लक्षण है । यही लक्षण धार्मिक होने का है ।
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बुद्धत्व और कुछ नहीं । बस इतना ही है कि हर चीज वैसी ही है । जैसी होनी चाहिए । यह बुद्धत्व की परिभाषा है । हर चीज वैसी ही है । जैसी कि होनी चाहिए । हर चीज पूरी तरह से पूर्ण है । जैसी है । यह अहसास । और अचानक तुम घर पर होते हो । कुछ भी बाकी नहीं बचता । तुम हिस्से हो । एक जैविक हिस्से हो । इस महानतम, सुंदर पूर्ण के । तुम इसमें विश्रांत हो । इसमें समर्पित । तुम अलग से नहीं बचते । सभी विभाजन विदा हो जाते हैं । एक महान आनंद घटता है । क्योंकि अहंकार के विदा होते ही कोई चिंता नहीं बचती । अहंकार के विदा होने के साथ ही किसी तरह का विषाद नहीं बचता । अहंकार के विदा हो जाने के साथ ही किसी तरह की मृत्यु की संभावना नहीं बचती । यह बुद्धत्व है । यह समझ है कि सब कुछ शुभ है कि सब सुंदर है । और यह जैसा है । वैसा ही सुंदर है । सब कुछ गहनतम लयबद्धता में है । संगत में है ।
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कोई टाटा । कोई बिड़ला । कोई अंबानी । कोई मनमोहन, होकर रह गया । क्या होना था ? क्या से क्या होकर रह गया ?
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मानव ने पत्थर पूजे । पर मानव को कब पहचान सका ?
यद्यपि इसकी छाया से ही । पा रंग रूप, भगवान सका ।
मानव फुटपाथों पर सोते । भगवान भवन में झूले पर ।
मानव सुत पत्तल चाट रहे । नैवेद्य यहाँ थाली भर भर ?
जा रही हजारों लाशें । बे कफन यहाँ शमशानो में ।
श्रंगार नहीं पूरा होता । इनका रेशम के थानो में ?
आर्य समाजी, कोई भी, बहन सुषमा आर्य की इन पंक्तियो से नाइत्तफाकी रखता है ? RSS को सवसे पहले कौन गृहमंत्री ने प्रतिवंधित किया ? तत्कालीन सर संघ चालक को इसके औचित्य का खुला जवाव पटेल ने दिया । क्या मूर्ति से एकता हो जायेगी ? वह भी जन्मजात विरोधी की से ?  मोदी जी 2500 करोड़ की लागत से ये पुण्य कर रहे हैं । क्या किसी आर्य मोदी समर्थक ने अपना विरोध दर्ज कराया ? क्या सवका जमीर मर गया । सत्य के लिए दयानद श्रीकृष्ण की मर्यादा व साहस मर गया ? पटेल के मरने के दशकों वाद राजनैतिक लाभ के लिए उसे भुनाना । क्या यही राजनैतिक अवसरवाद जीने का सहारा रह गया है ? चलो गांधी ने नेहरू को टिकाया । तव पटेल को प्रधान मंत्री वनाने का कोई अभियान छेड़ा था क्या ? मोदी पी एम की घोषणा से पहले गुजरात में शराव बंदी ख़त्म होने की चर्चा के समय मैंने भास्कर के साथ यादवों का इतिहास याद दिलाया कि कैसे विदेशी मुद्रा व पर्यटन के नाम द्वारिका में शराव शुरू होते ही यदुवंश आपस में लड़ लङ के मर गया था ? ऐसे ही 2500 करोड़ को कथित " स्टेच्यू आफ यूनिटी " की जगह गरीवों की उन्नति में लगाया जाये । तो क्या गलत होगा ?  मैं मोदी के सांप्रदायिक संतुलन के कारण वढा समर्थक हूँ । मगर मोदी भी तुष्टीकरण करने लगे हैं । गोपालगढ़ भरतपुर घटना व सलमान खान के साथ [   जो कल तक खलनायक वनाया हुआ था । साथ पतंग उड़ाते ही भला हो गया ? जो आर्य समाजी अभी सत्य कहने का साहस नहीं रखते । वे मोदी के पी एम बनने के बाद तो अपना अस्तित्व ही खो बैठेंगे । कापी पेस्ट ।
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इस दुनिया में सम्मान से जीने का सबसे महान तरीका है कि हम वो बनें । जो हम होने का दिखावा करते हैं - सुकरात ।

16 मई 2010

मुंहफ़ट पूनम

वो एक मुँहफट लङकी थी । जिसका नाम पूनम था । पूनम सुन्दर और युवा थी । फ़िर भी हर जगह से उसकी शादी के लिये " ना " हो जाती । और इसकी मात्र एक ही वजह थी कि वो मुँहफट नाम से मशहूर लङकी थी । उसका बाप बङा परेशान था । लङकी पहाङ की तरह फ़ैलती जा रही थी । मां बाप के सीने पर बोझ के समान थी । और उसके हाथ पीले करना मुश्किल हो रहा था । बात ज्यादा ही गम्भीर थी । कन्या ज्यादा ही मुँहफट थी । कौन है । कब है । क्या है । क्या स्थिति है । क्या माहौल है ? इससे कोई मतलब नहीं । बस जो उचित बात लगी । फ़ौरन मुँह पर मार दी । हालांकि बात एकदम सच कहती थी । आरपार की बात कहती थी । पर जमाना उसको सहन नहीं कर पाता था ।
पङोस में गुप्ता जी मर गये । तो ये माँ के साथ शोकसभा में गयी । और जब औरतें सम्वेदना ( अक्सर झूठी ) प्रकट कर रही थी । इसने कहा - तो भी बहुत दिन जी लिये । वरना इतना शराबी और कुकर्मी आदमी तो अपने कर्मों से बीस साल पहले ही मर जाता ।
इसी तरह ये पङोस की कन्या राधा, जो इसकी सहेली ही थी । की शादी में शामिल होने गयी । और महिलाओं के बीच में बोली - ठीक हुआ । राधा की शादी समय पर हो गयी । वरना ये देवेश के साथ भाग जाती ।
लोगों ने पूनम के पिता सलाह दी कि तुम बताते ही क्यों हो कि लङकी मुँहफट है । अरे शादी कर दो ।  पर पूनम का बाप इसके लिये तैयार नहीं था कि किसी को जानबूझ कर धोखा दो । और कन्या चार दिन बाद वापस घर आकर बैठ जाय ।
लेकिन किसी ने सच कहा है । हम लोग तो सिर्फ़ कोशिश करते हैं । वास्तविक सृष्टा जोङी तो ऊपर वाला पहले ही कर देता है । इस तरह पूनम का पिता जब एक सौ इकतीसवें द्वार पर रिश्ता लेकर गया । और फ़ोटो देखते ही वर पक्ष ने हाँ कर दी । तब उसने हाथ जोङकर कहा कि वैसे तो मेरी पूनम लाखों में एक है । लेकिन...? 
- भाईसाहब ! हम ऐसी कन्या से हरगिज शादी नहीं कर सकते । तुरन्त जबाब मिला ।
तब उदय प्रताप जो इस बात को सुन रहा था । उदय प्रताप ने इस बात को चैलेंज के रूप में लिया कि एक कन्या से लङके इसीलिये शादी नहीं कर रहे कि वो मुंहफ़ट है । शर्म की बात है । पूरे पुरुष समाज के लिये । उसने बिना किसी से ( घर वालों से ) कोई बात किये तत्काल फ़ैसला सुनाया कि - मैं शादी करूँगा । तो सिर्फ़ पूनम से ही ।
खैर उदय के घर वालों का रोना धोना हटा दें । तो पूनम का पिता बेहद खुश हुआ । और शादी की तैयारी में जुट गया । इधर उदय प्रताप अपनी शादी में जाने की विशेष तैयारी करने लगा । उसने दूल्हे की कटार थोङी बङी और खतरनाक स्टायल की चुनी । सेहरा भी अलग । सेहरे की कलंगी भी ऐसी । मानों कोई राजा भयंकर रण के लिये प्रस्थान कर रहा हो । कहने का आशय उसने दुल्हाई मेकअप इस तरह का किया कि दूल्हा कम लङाका ज्यादा लगे । इस सबसे अलग उसने एक काले रंग की तेल चुपङी हुयी लाठी । जिसके ऊपर के हिस्से में पीतल का दहाङते हुये शेर का मुख था । विशेष रूप से ली । घरवाले पहले ही नाखुश थे । उन्होने इस स्पेशिलिटी का कोई विरोध नहीं किया । जो मरजी आये कर । नहीं मानता तो मर ।
पूनम का ये दूल्हा बेहद चर्चा का विषय बना । बारात जब दरबाजे पर पहुँची । तो औरतें मुँह में पल्लू दबाकर हँसी । और पूनम की सखियों ने इसे हैरत से देखा ।
दौङकर दुल्हिन बनी पूनम को बताया कि जीजा बहुत बङा लठ्ठ लेकर आया है । पूनम अंदर तक काँप गयी । कुछ ने कहा - लुक्का मालूम होता है । बङी बूढियों ने कहा - भगवान ठीक ही न्याय करता है । जा मोंहफटिया के लैं चहिएऊँ । ऐसो ई ठस बुद्धी को । जेई ठीक करि पैये । जा मुंहफट कों..?
इस तरह अनजानी आशंकाओं से सहमी पूनम अपने इस वर को घूंघट की ओट से देखती रही । एक नारी स्वभाव के आंकलन से पूनम हर तरह से श्रेष्ठ थी । बस कमी एक ही थी ।
विवाह की रस्म के दौरान उस समय हल्ला मच गया । जब कन्या पक्ष की औरतें सूप में अनाज रखकर कुछ रीति रिवाज का पालन कर रही थीं । और सूप में अनाज के हिलने से छन..छन..छन की आवाज हुयी ।
तब उदय प्रताप ने कहा - सूप नीचे रख दो ।
औरतें घबरा गयीं । पर कुछ न समझते हुये वर की बात मानकर सूप नीचे रख दिया गया ।
उदय की सास ने प्यार से पूछा - बेटा क्या बात है ?
उदय ने कहा - आप लोगों से कोई बात नहीं । इस सूप से बात है । छन.छन मुझे कतई पसन्द नहीं I और लठ्ठ मारकर सूप तोङ दिया । पूनम का कलेजा धाङ धाङ करके बजने लगा ।
इसी तरह द्वाराचार ( दरबज्जे ) के समय बर्तन किसी तरह खटक गये । उदय ने लठ्ठ उठा लिया । और बर्तन तोङ डाले । खटर..पटर..मुझे बिलकुल बर्दाश्त नहीं..I
इसी तरह विवाह में कोई कुत्ता किसी कारणवश कांय कांय करने लगा । उदय ने उसके भी दो लठ्ठ ( मगर झूठमूठ ) के लगा दिये - कांय कांय मुझे कतई पसन्द नहीं I
पूनम जैसे बोलना ही भूल गयी । मन में सोच रही थी कि सांस लेने की आवाज पसन्द करता है या नहीं ? जैसे तैसे शादी हो गयी ।
पूनम ने बेहद धङकते । बेहद सहमते हुये ससुराल में कदम रखा । कदम कदम पर ख्याल रखा कि लठ्ठाधारी पति किसी ध्वनि से डिस्टर्ब न हो । एक महीने बाद पूनम की चौथी यानी पहली विदा निकली ।
बेहद डरता डरता पूनम का पिता ये सोचकर बेटी को बुलाने गया कि पता नहीं क्या क्या..सुनने को मिलेगा ? एक तरह से वह चांद पर तबा बांधकर खुद ही पिटने को तैयार होकर गया । आखिर एक मुँहफ़ट लङकी का बाप था बेचारा ।
पर आशा के विपरीत समधी और समधिन ने बङे लाङ से उसे झिङकते हुये कहा - आप भी गजब करते हो समधी जी । जो हमारी गऊ जैसी सुशील बहू के लिये जाने क्या क्या कह रहे थे । जबसे आयी है । हमने उसकी आवाज तक नहीं सुनी । और आप कह रहे थे कि मुंहफट है । 
पूनम के बाप ने सोचा कि - या तो ये व्यंग्य कर रहे है । या अवश्य कोई चमत्कार हुआ है ?
उसका ध्यान उदय की ओर गया । उसने सोचा निश्चय ही ये चमत्कार जमाई राजा का है । सो मौका मिलते ही उत्सुक पूनम का बाप उदय को एक तरफ़ ले गया । और बोला - सही सही बताना..बेटा ! ये चमत्कार कैसे हुआ ?
उदय ने बताया । ससुर जी ने पगङी उतारकर उसके पैरों में रख दी । और बोले - एक कृपा और कर दो बेटा । मेरी डुकरिया ( पूनम की माँ ) को भी सही कर दो । तो जीवन के बचे दिन । मैं भी कुछ चैन से जी लूँ । वो भी बिलकुल ऐसी ही है मुंहफट ।
उदय उसे एक कुम्हार के घर ले गया । उसने एक कच्ची मलईया । और एक पकी हुयी मलईया ( छोटे साइज के घङे ) ली । और दोनों को फ़ोङ दिया । फ़िर बोला - यदि आप दोनों को फ़िर से ज्यों का त्यों बना दें । तो में सासूजी को सुधार दूँगा ।
उसका ससुर बोला - कच्ची तो दोबारा बन जायेगी । मगर पकी कैसे बनेगी ?
तब उदय ने कहा - इसी तरह ससुरजी ! पूनम कच्ची थी । उसमें सुधार हो सकता था । मगर सासूजी पक चुकी हैं । इसलिये उनमें सुधार संभव नहीं । इसलिये उन्हें सहने के अलावा और कोई चारा नहीं ।

10 मई 2010

क्रोध को कैसे जीतें काम को कैसे जीतें ?


1 बार बाबा फरीद कहीं जा रहे थे । एक व्यक्ति उनके साथ चलने लगा । उसकी जिज्ञासा ने उसे बाबा के साथ कर दिया था । व्यक्ति ने बाबा से पूछा - क्रोध को कैसे जीतें । काम को कैसे जीतें ?
ऐसे प्रश्न लोग बाबा से पूछते रहते थे । बाबा ने बड़े स्नेह से उस व्यक्ति का हाथ पकड़ा । और बोले - तुम थक गए होगे । चलो किसी पेड़ की छाया में विश्राम करते है ।  बाबा बोले - बेटा ! समस्या क्रोध और काम को जीतने की नहीं । उन्हें जानने की है । वास्तव में न हम क्रोध को जानते हैं । और न काम को । हमारा यह अज्ञान है कि हमें बारबार हराता है । इन्हें जान लो । तो समझो जीत पक्की है । जब हमारे अंदर क्रोध प्रबल होता है । काम प्रबल होता है । तब हम नहीं होते हैं । हमें होश ही नहीं होता है । इस बेहोशी में जो कुछ होता है । वह मशीनी यंत्र की भांति हम किया करते हैं । बाद में केवल पछतावा बचता है । बात तो तब बने । जब हम फिर से सोयें नहीं । अंधेरे में पड़ी रस्सी सांप जैसी नजर आती है । इसे देखकर कुछ तो भागते हैं । कुछ उससे लड़ने की ठान लेते हैं । लेकिन गलती दोनों ही करते है । ठीक तरह से देखने पर पता चलता है कि वहां सांप तो है ही नहीं । बस जानने की बात है । इस तरह इंसान को अपने को जानना होता है । अपने में जो भी है । उससे ठीक से परिचित भर होना है । बस । फिर तो बिना लड़े ही जीत हासिल हो जाती है । उस व्यक्ति को अपने सवाल का जवाब मिल गया ।
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हमेशा याद रखो । जो कुछ भी मैं तुम्हें कहता हूं । तुम उसे 2 तरह से ले सकते हो । तुम उसे मेरे अधिकार से ले सकते हो । यह निश्चित ही सत्य होगा । तब तुम कष्ट देखोगे । तब तुम विकसित नहीं होओगे । जो कुछ भी मैं कहता हूं । उसे सुनो । उसे समझने की कोशिश करो । अपने जीवन में उसको उतारो । देखो वह कैसे कार्य करता है ? और तब  तुम्हारी अपनी चेतना में यह आता है । हो सकता है । वह वही हो । वह ना भी हो । वे ठीक वैसे ही नहीं हो सकते । क्योंकि तुम्हारा अलग व्यक्तित्व है - अद्वितीय चेतना । जो कुछ भी मैं कह रहा हूं । वह मेरा अपना है । वह निश्चित ही मेरे भीतर गहरे जमा होगा । हो सकता है
कि तुम ठीक वैसे ही निष्कर्ष पर आओ । लेकिन वे ठीक वैसे ही नहीं हो सकते । इसलिए मेरा निष्कर्ष तुम्हारा निष्कर्ष नहीं होना चाहिए । तुम्हें मुझे समझने का प्रयास करना चाहिए । तुम्हें सीखने का प्रयास  करना चाहिए । लेकिन तुम्हें मेरे से जानकारी इकठ्ठी नहीं करनी चाहिए । तुम्हें मेरे से निष्कर्ष इकठ्ठे नहीं करने चाहिए । तब तुम्हारा मन  शरीर विकसित होगा । एक बार तुम मन शरीर से पार हो जाते हो । तब पहली बार तुम जानते हो कि तुम मन नहीं हो । बल्कि साक्षी हो । मन से नीचे तुम्हारा उससे तादात्म्य बना रह जाता है । एक बार तुम जानते हो कि विचार, मानसिक कल्पनाएं और भाव बस वस्तुए हैं । तुम्हारी चेतना में तैरते बादल हैं । तुम उनसे तत्काल विभक्त हो जाते हो । तुम शरीर के पार हो जाते हो । तुम अब और अधिक शरीर में सीमित नहीं रहे । तुम जानते हो कि तुम शरीर नहीं हो ।
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जीवन कमाना होता है । मिलता नहीं । जीवन साधना है । जन्म के साथ जीवन नहीं मिलता । जन्म के साथ अवसर मिलता है । साधो । तो जीवन मिल जाएगा । न साधो । कभी न मिलेगा । तुमने जन्म को ही जीवन समझ लिया है । और इसीलिए तो तुम इतने परेशान हो कि भुलाने के लिए शराबों की जरूरत है । सदियों से मंदिर और मस्जिद ने शराब का विरोध किया है । चर्च और गुरुद्वारे ने शराब का विरोध किया है । लेकिन शराब जाती नहीं । मंदिर मस्जिद उखड़ गए हैं । मधुशाला जमी है । मंदिर मस्जिदों में कौन जाता है अब ? जो जाते हैं । वे भी कहां जाते हैं ? वे भी कोई औपचारिकता पूरी कर आते हैं । जाना पड़ता है । इसलिए जाते हैं । वहां बैठकर भी वहां कहां होते हैं ? मन तो उनका कहीं और ही होता है । यह जरूरत अपने को भुलाने की इसीलिए है कि तुम्हें अपना पता ही नहीं । और जो तुमने अपने को समझा है । वह कांटे जैसा चुभ रहा है । तुम्हें मैं वही दे देना चाहता हूं । जो तुम्हारे पास है । और जिससे तुम्हारे सम्बन्ध छूट गए हैं । उसको पा लेना ही सिद्ध हो जाना है । सिद्ध को भुलाने की कोई जरूरत ही नहीं रह जाती । ओशो ।
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संत के पास दूर दूर से लोग आते हैं । पर संत का पडोसी और उसके गांव के लोग कभी नहीं आते । ओशो ।
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आकार ( जैसे गणित में let x  मानते हैं ( है ) नहीं । लेकिन न हो । ऐसा भी नहीं । दर्शन का महत्व है । दर्शन शब्द का अर्थ - दर्शन शब्द पाणिनीय व्याकरण के अनुसार " दृशिर प्रेक्षणे " धातु से ल्युट प्रत्यय करने से निष्पन्न होता है । अतएव दर्शन शब्द का अर्थ दृष्टि या देखना, जिसके द्वारा देखा जाय या जिसमें देखा जाय, होगा । दर्शन शब्द का शब्दार्थ केवल देखना या सामान्य देखना ही नहीं है । इसीलिए पाणिनी ने धात्वर्थ में " प्रेक्षण " शब्द का प्रयोग किया है । प्रकृष्ट ईक्षण, जिसमें अन्तर्चक्षुओं द्वारा देखना या मनन करके सोपपत्तिक निष्कर्ष निकालना ही दर्शन का अभिधेय है । इस प्रकार के प्रकृष्ट ईक्षण के साधन और फल दोनों का नाम दर्शन है । जहाँ पर इन सिद्धांतों का संकलन हो । उन ग्रन्थों का भी नाम दर्शन ही होगा । जैसे - न्याय दर्शन, वैशेषिक दर्शन मीमांसा दर्शन आदि आदि । दर्शन ग्रन्थों को दर्शन शास्त्र भी कहते हैं । यह शास्त्र शब्द " शासु अनुशिष्टौ " से निष्पन्न होने के कारण दर्शन का अनुशासन या उपदेश करने के कारण ही दर्शन शास्त्र कहलाने का अधिकारी है । दर्शन अर्थात साक्षात्कृत धर्मा ऋषियों के उपदेशक ग्रन्थों का नाम ही दर्शन शास्त्र है । Ram Joshi 

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