01 फ़रवरी 2017

पूर्ण परमेश्वर और उनकी इच्छा ?

परमेश्वर को कोटि कोटि नमन !
प्रणाम राजीव जी !
मेरी भी एक Help करो जी, बहुत परेशान हूँ । मेरे 5 Question हैं जी, प्रभु के भय में, उनका
Answer दो जी ।
1- सत्य क्या है और उसको पाने का सही मार्ग क्या ?
2- अविनाशी जीवन पाने के लिये क्या करें ?
3- जब सबसे बङी Tension ये हो जाये कि बस सत्य को पहचानना है जितना जल्दी हो सके और कुछ न मिले, क्योंकि जहाँ देखो मार्ग भटकाने वाले साधन हैं तो क्या करें ?
4- पूर्ण परमेश्वर कौन है और उनकी इच्छा क्या है ?
5- परमेश्वर सर्व समर्थवान है तो, जीव, जगत और ब्रह्म में ये व्यवस्था बिगङी क्यों हुयी है ?
कृपया दया करें जी बतायें । (प्रश्नकर्ता - प्रकाश मान)
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प्रश्न - सत्य क्या है और उसको पाने का सही मार्ग क्या ?
उत्तर - स्वयं (प्रकाश मान) से लेकर दृष्ट, अदृष्ट, गम्य, अगम्य, वैचारिक, अवैचारिक यानी परमात्मा, सृष्टि और जीव आदि आदि ये जो कुछ भी अनुभूत हो रहा है । यह सभी सत्य ही है, इसमें असत्य और जङ कुछ नही है । यह सर्वत्र सिर्फ़ शाश्वत चेतन परमात्मा ही है । यही सत्य है, इसके सिवाय और कोई दूसरा सत्य नही ।

पाने का सही और एकमात्र मार्ग - देह और मन का निरन्तर अध्यास (दोनों के प्रति अभिमान रहित होना) और ‘स्व या आत्मा’ का कई या स्व-उपर्युक्त कोई एक विधि से पुनः पुनः निरन्तर अभ्यास ।
फ़िर जैसे घनी, मोटी परत वाला कोहरा (मैं शरीर या मन हूँ यह अज्ञान) सिर्फ़ सूर्य के उदय (प्रकाशमान आत्मा) होने से बिना प्रयास ही छंट जाता है । वैसे ही तुम भी सत्य और स्वयं को जानोगे । यानी स्व-बोध और उसका अनादि सत्य ।
विशेष - जीव की पात्रता अनुसार कभी कभी ‘ध्यान-समाधि’ जैसी यौगिक क्रियायें भी विशेष सहायक होती है ।
तथा यह भी एक सरल सहज उपाय है । नीचे -
बंधे को बंधा मिला, छूटे कौन उपाय ।
कर सेवा निरबंध की, पल में लेय छुङाय ।
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प्रश्न - अविनाशी जीवन पाने के लिये क्या करें ?
उत्तर -
मोह सकल व्याधि कर मूला, जासे पुनि उपजत भवशूला ।
जीवन सदैव अविनाशी ही है । सिर्फ़ ‘मध्य की कल्पनायें’ ही उत्पन्न होती मरती हैं । निःयोग से एक बार चित्त को पूर्ण खाली कर दो । बस यह खाली चित्त ही अपने आप में ‘विशेष’ है । एक बार खाली हो जाने पर यह नित्य बर्ताव से बनी भोग के बाद की शेष वासनाओं को खुद ही नष्ट कर देता है और काल्पनिक जन्म-मरण से सर्वदा रहित होकर मोक्ष (मोह-क्षयी) को प्राप्त अविनाशी ही हो जाता है । इसमें थोङा भी संशय नही ।
ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुखराशी ।
जङ चेतन ग्रन्थि परि गयी, जद्यपि मृषा छूटत कठिनई ।
जनक के ऐसे ही प्रश्न के उत्तर में अष्टावक्र ने कहा था - नींद में दिखने/अनुभव होने वाला स्वपन कुछ क्षणों का है और जीवन भी (खुली आँखों से अनुभूत) एक बङा स्वपन ही है । और स्वपन जब कष्टदायक हो तो ‘नींद से जागना’ ही एकमात्र उपाय है ।
सपने में सिर काटे कोई, बिनु जागे दुख दूर न होई ।
ये स्वपन भयानक बंधन के समान कष्टकारी इसलिये हुआ कि तुम बन्दर की भांति मुठ्ठी के चने (माया, सांसारिक आसक्तियां, मोहजनित राग) छोङना नही चाहते और बिना मुठ्ठी खोले हाथ उस छोटे लोटे से बाहर नही आयेगा । अर्थात (स्व) विराट के विस्मृत हो जाने के कारण (तुच्छ) जागतिक अंश में फ़ंसे हो और स्वयं ही फ़ंसे हो, क्योंकि तुम्हारे और तुम्हारी (सभी सांसारिक) कल्पनाओं और वासनाओं के अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नही, जो तुम्हें बांधे ।
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प्रश्न - जब सबसे बङी Tension ये हो जाये कि बस सत्य को पहचानना है जितना जल्दी हो सके और कुछ न मिले, क्योंकि जहाँ देखो मार्ग भटकाने वाले साधन हैं तो क्या करें ?
उत्तर - किसी भी चीज का ‘कृमबद्ध ही ज्ञान होना’ प्राकृतिक नियम है । कोई भी चीज स्व-तप (निरन्तर अनुसंधान) के बिना कभी भी ‘होने’ की स्थिति में नही हो सकती । फ़िर भले ही वह आपके घर में ही रखी हो या आपके माता, पिता जैसे अति निकट सम्बन्धियों से प्राप्त हो सकती हो, तो भी बिना तप प्राप्त नही होगी ।
अब अपने इन शब्दों पर विशेष गौर करिये - क्योंकि जहाँ देखो मार्ग भटकाने वाले साधन हैं तो क्या करें ?
और इससे ठीक ऊपर आपने ही लिखा कि - कि बस सत्य को पहचानना है जितना जल्दी हो सके ।
इसका सीधा सा अर्थ है कि आपने बहुत से असत्य को स्वयं ही पहचान लिया है और सत्य को जानने की ओर अग्रसर हैं ।
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प्रश्न - पूर्ण परमेश्वर कौन है और उनकी इच्छा क्या है ?
उत्तर - जैसा कि पहले उत्तर में बताया कि - यह कण कण ‘सब कुछ’ स्वयं पूर्ण परमेश्वर ही है और वह (पैर के नख से सिर तक) और कोई नही स्वयं तुम्ही हो । और यह इन्द्रियादि अनुभवों का बाह्य स्थूल जगत महज तुम्हारा वासना प्रकाशन यानी कल्पनाओं का साकार होना ही है ।
सिर्फ़ भ्रांतिवश, मायावश, निद्रावश, अज्ञानवश या इन सभी के मूल मोहवश तुम अपनी स्वयं-सत्ता भूल गये हो इसलिये यह प्रमाद (दुःख) उत्पन्न हुआ ।
मोहनिशा सब सोवनहारा, देखिअ सपन अनेक प्रकारा ।
दुनियां में फ़ंसकर वीरान हो रहा है । 
खुद को भूलकर हैरान हो रहा है ।
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प्रश्न - परमेश्वर सर्व समर्थवान है तो, जीव, जगत और ब्रह्म में ये व्यवस्था बिगङी क्यों हुयी है ?
उत्तर - कोई व्यवस्था न तो बिगङी है न सुधरी है । बल्कि वह जैसी है, है । केवल जिनके मन अनुसार नही हो पा रहा । उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है ।
जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत देखी तिन तैसी ।
अर्थात जैसा तुम चाह रहे हो वैसा ही सब (मगर तय और पूर्व नियत कृम में) हो रहा है । पर दरअसल अपने को भूल जाने के कारण तुम ‘अस्थिर चित्त’ हो गये । इसलिये यह दुःख उत्पन्न हुआ ।
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अब एक माथापच्ची - कभी आपने सोचा कि ये ‘माया’ क्या है ?
संकेत - <0> = 0 = .
अब तो आसान है ।
(लेकिन निश्चय ही कठिन फ़ंस गये)
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