24 फ़रवरी 2017

ये परदा हटा दो


की करदा नी ! की करदा, तुसी पुछोखां दिलवर की करदा ।
इकसे घर बिच वसदयां रसदवां, नहीं हुदा बिच परदा । 1
बिच मसीत नमाज गुजारे, बुतखाने जा बङदा । 2
आप इक्को, कई लाख घर अन्दर, मालिक हर घर घर दा । 3
मैं जितबल देखां, उतबल ओही । हर एक दी संगत करदा । 4
मूसा ते फ़रौन बना के, दो हो के क्यों लङदा । 5

1 एक ही घर में रहकर पर्दा नही किया जाता । मगर मेरा स्व-रूप मेरे दिल-रूपी घर में रहते हुये पर्दे में छुपा हुआ है । इसलिये ए लोगो ! तुम इस दिलवर (आत्मा) को पूछो कि - तू ये क्या लुक्कन छिप्पन खेल कर रहा है ।

2 कहीं तो मसजिद में छुपकर बैठा रहता है और उसके आगे नमाज होती है और कहीं मन्दिरों में दाखिल हुआ है जहाँ उसकी पूजा हो रही है । इसलिये ए लोगो ! दिलवर को पूछो कि - तू क्या कर रहा है ।

3 आप स्वयं तो एक अद्वितीय है मगर लाखों घरों (दिलों) के अन्दर प्रविष्ट हुआ हुआ हर एक घर का स्वामी बना हुआ है । इसलिये ए लोगो ! तुम दरयाफ़्त करो कि - यह दिलवर (प्यारा) क्या कर रहा है ।

4 जिधर मैं देखता हूँ उधर दिलवर ही नजर आता है । और हर एक के साथ वही (मिला बैठा) नजर आता है । इसलिये ए लोगो ! तुम दरयाफ़्त करो कि - दिलवर (ईश्वर) यह क्या कर रहा है ।

5 (मुसलमानों में हजरत मूसा और हजरत फ़रौन हुये हैं, जिनमें खूब झगङा हुआ था) इन दोनों को बनाकर या इस तरह से आप ही दो रूप होकर यह दिलवर क्यों लङता लङाता है ? 
इसलिये ए लोगो ! तुम दरयाफ़्त करो कि - यह दिलवर क्या करता है ?
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दिया अपनी ‘खुदी’ को जो हमने उठा,
वह जो पर्दा सा बीच में था, न रहा । 
रहे पर्दा में अब न वह पर्दानशीं,
कोई दूसरा उसके सिवा न रहा ।
न थी हाल की जब हमें अपनी खबर, 
रहे देखते औरों के एबो-हुनर ।
पङी अपनी बुराईयों पर जो नजर,
तो निगाह में कोई बुरा न रहा ।
‘जफ़र’ आदमी उसको न जानियेगा,
गो हो कैसा ही ‘साहिबे-फ़ैहो-जका’ ।
जिसे ऐश में यादे-खुदा न रही,
जिसे तैश में ‘खौफ़-खुदा’ न रहा ।
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बिना ज्ञान जीव कोई मुक्ति नही पावे । 
चाहे डार माला, चाहे बांध मृगछाला ।
चाहे तिलक छाप, चाहे भस्म तू रमावे । बिना..
चाहे रच के मन्दिर मठ, पत्थरों के लावे ठठ ।
चाहे जङ पदार्थों को सीस नित्य नवावे । बिना.. 
चाहे बजा गाल चाहे शंख, और बजा घङियाल ।
चाहे ढप चाहे डौरू झांझ तू बजाबे । बिना..
चाहे फ़िरे तू ‘गया’ ‘प्रयाग’, काशी में जा प्राण त्याग ।
चाहे गंगा यमुना चाहे सागर में नहावे । बिना.. 
द्वारका अरु रामेश्वर, बद्रीनाथ पर्वत पर ।
चाहे जगन्नाथ में झूठो भात तू खावे । बिना..
ज्ञानियों का कर ले संग, मूर्खों का तज दे संग ।
फ़िर तुझे मुक्ति का ठीक साधन आवे । बिना.. 
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