05 फ़रवरी 2017

स्वात्माराम

आदिसृष्टि से ही करोङों जन्मों तक अपनी कश्ती को अगम, अथाह, अपार भवसागर के पार या किनारे ले जाने के इच्छुक भटकते हुये व्यग्र आत्मविद्या के शोधार्थियों के चिन्तन, मनन हेतु गूढ रूपक !
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लौकिक (रूपक)
एक मद्रासी जो कम्बल और उपानहों (जूतों) से युक्त बूढ़े बैल के समान गुण धर्म वाला होने से जरद्‌गव वाहीक था । अपने घर के द्वार पर बैठकर मद्र देश में प्रसिद्ध गीतों को गाता था । उसे कोई ब्राह्मणी जो कि लहसुन से शान्त होने वाले रोगग्रस्त पुत्र के साथ किसी आवश्यक कार्य से समुद्र की ओर जाने वाली थी और साथ साथ वहाँ पर पुत्र का जीवन भी चाह रही थी ।
‘यह (मद्रासी) लवण समुद्र की ओर से आया है’ लोगों से यह सुनकर अत्यन्त आदरपूर्वक सम्बोधित करती हुयी पूछती है - हे राजन ! लवण समुद्र में लहसुन का भाव क्या है ?
(अर्थात क्या वहाँ लहसुन सस्ता है या महंगा है ?)
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पारमार्थिक भाव -
कम्बल के समान आवरण करने वाली अविद्या से तथा पादुकाप्राय लिंग शरीर से चक्षु आदि द्वारों पर विषय-भोग के लिये स्थित हुआ बूढ़े बैल के समान यह जीव वैषयिक स्त्री, पुरुष आदि के मंगल गीतों को बहिर्मुख होकर गाता है (अपने स्व-रूप को बिलकुल नही देखता)
उसे इस प्रकार पाकर ‘पुनामक संसार-नरक’ से उद्धार करने वाले ब्रह्मात्मरूपता ज्ञानस्वरूप पुत्र की इच्छा कर रही ब्राह्मणी की तरह ब्रह्म सम्बन्धिनी ‘श्रुति’ उससे पूछती है - हे राजन ! (अर्थात स्वयं प्रकाशरूप से विराजमान और अपने चैतन्य से सम्पूर्ण जगत को रंजित करने वाले हे आत्मदेव ! सभी विद्या, काम और कर्म के बीजों का विनाशक होने से समुद्र की तरह ऊषरप्राय, परमशुद्ध तुम्हारे स्वरूप के रहते हुये अत्यन्त अपवित्र होने से ब्राह्मणों द्वारा अभोग्य लहसुनतुल्य भोज्यों के विषय में तुम मूल्य ही क्या विचारते हो ?
अतः बाह्य दृष्टि छोङकर ‘स्वात्माराम’ हो जाओ ।
इसी आशय से वह पूछती है - यह आत्मा कौन है जिसकी हम लोग उपासना करते हैं (वह कौन सा आत्मा है) ?
जगत के ‘कारण ब्रह्म’ का क्या स्वरूप है । हम कहाँ से उत्पन्न हुये ?
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अन्त में माथापच्ची -
आत्मा (आ-त्मा) का सही शब्दार्थ, भावार्थ क्या है ?
संकेत - आ-जीवन, आ-मरण, आ-शंका, आ-भास आदि ।
अब सरल ही है !
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इसी लेख में प्रयुक्त ‘समुद्र की तरह ऊषरप्राय’ का क्या भाव है ?
संकेत - चित्रपट !
अब तो सरल है ।
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