23 फ़रवरी 2017

जोगिया रे !


जोगी (साधु) का सच्चा रूप !

प्यारे ! क्या कहूँ ‘अहवाल’ की, अपने परेशानी ?
लगा ढलने मेरी आँखों से, इक दिन खुद ब खुद पानी ।
यकायक आ पङी उस दम, मेरे दिल पर यह हैरानी ।
कि जिसकी हो रही है यह, जो हर इक ‘जा’ ‘सनाख्वानी’ ।
किसी सूरत से उसको देखिये - कैसा है वह जानी ! 1
चढ़ा इस फ़िक्र का दरिया, भरा इस जोश में आकर ।
कि इक इक लहर उसकी ने, ले उङाया हवा ऊपर ।
‘करारो होशो अक्लो सबरो दानिश’ बह गये यक्सर ।
अकेला रह गया आजिज, गरीबो बेकसो ‘बेपर’ ।
लगा रोने कि इस मुश्किल की, हो अब कैसे आसानी ? 2
यह सूरत थी कि ‘जी’ में इश्क ने, यह बात ला डाली ।
मंगा थोङा सा गेरू, और वहीं कफ़नी रंगा डाली ।
बिना मुद्रे गले के बीच ‘सेली’ बरमला डाली ।
लगा मुँह पर भभूत, और शक्ल जोगी की बना डाली ।
हुआ अवधूत जोगी, जोगियों में आप गुरु ज्ञानी । 3
उठाई चाह की झोली, प्याला चश्म का खप्पर ।
बना कर इश्क का कंठा, तलब का सिर पै रख चक्कर ।
मुंडासा गेरुआ बांधा, रक्खा त्रिशूल काँधे पर ।
लगा जोगी हो फ़िरने ढ़ूंढ़ता, उस यार को घर घर ।
दुकां बाजार ओ कूचा ढ़ूंढ़ने की, दिल में फ़िर ठानी । 4
लगी थी दिल में एक आतिश, धुंआं उठता था आहों का ।
तमाशे के लिये ‘हलका’ बन्धा था साथ लोगों का ।
तलब थी यार की, और गरम था बाजार बातों का ।
न कुछ सिर की खबर थी, और न कुछ होश था पाओं का ।
न कुछ भोजन का अन्देशा, न कुछ ‘फ़िकरे-अमल’ पानी । 5
फ़िर इस जोग का ठहरा, अजब कुछ आन कर नक्शा ।
जो आया सामने मेरे, तो कहता उससे, सुनता जा ।
- कहो प्यारे ! हमारे यार को तुमने कहीं देखा ?
जो कुछ मतलब की वह बोला, तो उससे और कुछ पूछा ।
‘वगर’ यूं ही लगा कहने, तो फ़िर देना ‘अनाकानी’ । 6
कभी माला से कहता था, लगा कर जप से “ए माला” !
हुआ हूँ जब से मैं जोगी, तू ही उस यार को बतला ।
कभी घबरा के हँसता था, कभी ले स्वांस रोता था ।
लवों से आह, आँखों से, बहा पङता था दरिया सा ।
अजब जंजाल में चक्कर के, डाले है परेशानी । 7
कोई कहता था - बाबाजी ! इधर आओ, इधर बैठो ।
पङे फ़िरते हो रात दिन, टुक बैठो सस्ताओ ।
जो कुछ दरकार हो ‘मेवा मिठाई’ हुक्म फ़रमाओ ।
न कहना उससे - ले आओ, न कहना उससे - मत लाओ ।
खबर हरगिज न थी कुछ उस घङी, अपनी न बेगानी । 8
बङी दुविधा में था उस दम - कहाँ जाऊँ, कहाँ देखूँ ?
किसे देखूँ, किसे पूछूं, किधर जाऊँ, कहाँ ढ़ूंढ़ूं ?
करूँ तदवीर क्या ? जिससे मैं उस दिलदार को पाऊँ ।
निशां हरगिज न मिलता था, पङा फ़िरता था ज्यों मजनूं ।
अजब दरिया-ए-हैरत की हुयी थी, आ के तूफ़ानी । 9
उसी को ढ़ूंढ़ता फ़िरता हुआ, मस्जिद में जा पहुँचा ।
जो देखा वहाँ भी है, रोजों नमाजों का ही इक चर्चा ।
कोई जुब्बे में अटका है, कोई डाढ़ी में है उलझा ।
तसल्ली कुछ न पाई जब, तो आखिर वहाँ से घबराया ।
चला रोता हुआ बाहर, व अहवाले-परेशानी । 10
यही दिल में कहा - टुक मदरसे को झांकिये चल कर ।
भला शायद उसी में ही, नजर आ जाये वह दिलवर ।
गया जब वहाँ तो देखी ‘वाह वा’ कुछ और भी बदतर ।
किताबें खुल रही हैं, मच रहा है, शोरो-गुल अक्सर ।
हर इक मसले पै, फ़ाजिल कर रहे हैं - बैहसें-नफ़सानी । 11
चला जब वहाँ से घबरा कर, तो फ़िर यह आ गयी जी में ।
कि यह जगह तो देखी, अब चलो टुक ‘दैर’ भी देखें ।
गया जब वहाँ तो देखा, मूर्ति और घन्टों की झंकारें ।
पुकारा तब तो रोकर - आह ! किस पत्थर से सिर मारें ?
कहीं मिलता नही वह शोख, काफ़िर दुश्मने-जानी । 12
कहा दिल ने कि - अब टुक तीरथों की सैर भी कीजे ।
भला वह दिलरुबा शायद, इसी जगह पै मिल जावे ।
बहुत तीरथ मनाये, और किये दर्शन भी बहुतेरे ।
तसल्ली कुछ न पाई, तब तो हो लाचार फ़िर वहाँ से ।
मुहब्बत छोङ कर बस्ती की, ली फ़िर राह बियावानी । 13
गया जब ‘दशतो-स्वहरा’ में, तो रोया - आह ! क्या करिये ।
कहाँ तक ‘हिज्र’ में उस शोख के, रो रो के दिन भरिये ।
किधर जाईये, और किसके ऊपर आश्रय धरिये ?
यही बेहतर है अब तो, डूबिये या जहर खा मरिये ।
भला जी जान के जाने में, शायद आ मिले ‘जानी’ । 14
रहा कितने दिनों रोता, फ़िरा हर दशत में ‘नाला’ ।
गरीबो बेकसो तन्हा, मुसाफ़िर बे-वतन हैरान ।
पहाङों से भी सिर पटका, फ़िरा शहरों में हो ‘गिरया’ ।
फ़िरा भूखा प्यासा ढ़ूंढ़ता, दिलवर को सरगर्दान ।
न खाने को मिला दाना, न पीने को मिला पानी । 15
पङा था रेत में और धूप में, सूरज से जलता था ।
लगी थी दिल की आँखें यार से, और जी निकलता था ।
उसी के देखने के ध्यान में, हर दम निकलता था ।
वले महबूब से कुछ हाय ! मेरा वश न चलता था ।
पङे बहते थे आँसू ‘लालांगू’ लाले-बदखशानी । 16
जब इस अहवाल को पहुँचा, तो वह महबूब बेपरवाह ।
वही सौ बेकरारी से, मेरी ‘बालीन’ पै आ पहुँचा ।
उठा कर सिर मेरा जानूं पै, अपने रख के फ़रमाया ।
कहा - ले देख ले, जो देखना है, अब मुझे इस ‘जा’ ।
अयां है इस घङी करते, तेरे पै ‘भेदे-पिन्हानी’ । 17
यह सुन रख - पहले हम आशिक को अपने आजमाते हैं ।
जलाते हैं, सताते हैं, रुलाते हैं, बुलाते हैं ।
हर इक अहवाल में, जब खूब साबित, उसको पाते हैं ।
उसी को आके मिलते हैं, उसी को मुँह दिखाते हैं ।
उसे पूरा समझते हैं, हम अपने ध्यान का ध्यानी । 18
सदा महबूब की आयी, ज्यूंही कानों में वां मेरे ।
बदन में आ गया जी, और वहीं दुख दर्द सब भूले ।
फ़िर आँखें खोलकर, दिलवर के मुँह पर, टुक नजर करके ।
जमीनों-आसमान “चौदह तबक” के खुल गये परदे ।
मिटी इक आन में सब कुछ, खराबी और परेशानी । 19
हुयी जब आके यकताई, दुई का उठ गया पर्दा ।
जो कुछ ‘वहमो-दगा’ थे, उङ गये इक दम में हो पारा ।
‘नजीर’ उस दिन से हमने, फ़िर जो देखा खूब, हर इक ‘जा’ ।
वुही देखा, वुही समझा, वुही जाना, वुही पाया ।
बराबर हो गये हिन्दू-मुसलमां, ‘गिबरो-नुसरानी’ । 20     
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