22 फ़रवरी 2017

जो कोई रूह आपनी देखे

जिस तरह स्वाभाविक ही सहजग्राह्य होने से सगुण भक्ति और उसकी उपाधियां हिन्दू आदि जनमानस में लोकप्रिय हैं और निर्गुण निराकार ब्रह्म ‘समझ से परे’ होने के कारण अटपटा और नीरस लगता है । इसलिये सहज ही हिन्दू उसको समझने का झंझट ही नही चाहते ।
उसी तरह मुस्लिम धर्म परम्परा में भी सूफ़ी सिद्धांतों, मतों को हर-समय हर-स्थान पर उनका माकूल मुर्सिद न होने से (उन कठिन शब्दों के भाव और उनका पता, ठिकाना न मालूम हो सकने से) 
‘एकेश्वर’ और ‘निराकार’ का ठोस स्थापित सिद्धांत होने के बावजूद भी अधिकांश आम मुस्लिम अनुयायी हिन्दुओं की पूजा-पाठ की भांति ही नमाज, रोजे रखना और कुछ मजहबी क्रियाकलापों, जलसों, त्यौहारों से अतिरिक्त जानकारी नही रखते । 
सीधी सी बात है कि इस स्तर तक बताने वाले, समझाने वाले, अनुभव कराने वाले हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई आदि समुदायों में न के बराबर ही हैं । अतः उनकी कोई गलती भी नही है ।
- यह लेख ऐसे ही कुछ ‘शब्दों व स्थानों’ की जानकारी देता है ।
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खुदा के सौ नाम हैं । निन्यानवे नाम सगुण हैं और एक नाम निर्गुण है । लेकिन असली मुक्ति देने वाला ‘निर्गुण अल्लाह नाम’ ही है । वही खुद-खाविंद का नाम है । 

विशेष - राम नाम से ‘अल्लाह’ नाम निकला है । राम के मकार का रकार हुआ, आगे का पीछे आया तब ‘अर’ हुआ । अर ‘रा’ के पीछे आया तब अर राम हुआ । रल के अभेद से ‘अल्ला’ हुआ ।
व्याकरण, वर्ण विकार, वर्णकार, वर्ण विपर्यय, पृषोदरादि पाठ से सिद्ध शब्द को साधन के वास्ते प्रसिद्ध है । (यह वर्णन ठीक से समझ में नहीं आया)
जुलमत नासूत मलकूत में, फ़िरिस्ते नूर जल्लाल जबरूत में जी ।
लाहूत में नूर जम्माल पहिचानिये, हक्क मकान हाहूत में जी ।
बका बाहूत साहूत मुर्सिदवा रहै, जो रब्ब राहूत में जी ।
कहत ‘कबीर’ अविगत आहूत में, खुद खाविन्द जाहूत में जी । 
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प्रकाश ब्रह्म - लामकान, 
मुसलमानों में पाँच मुकाम के दो नाम हैं - नासूत को आलम, अजसाम - शरीरधारी ।
मलकूत को आलम - मिसाल फ़िरिस्तों की दुनियां (देवलोक)
जबरूत को आलम - प्रथ्वी, जल, तेज, वायु ।
लाहूत को आलम - नूर ।
हाहूत - मुकाम मुहम्मदी (जहाँ मुहम्मद पहुँचे)
जिकर नासूत ‘लाईला हईलाहू’
जिकिर मलकूत ‘इलिल्लाहू’
जिकिर जबरूत ‘अल्ला अल्ला’
जिकर लाहूत ‘अल्लाह’
जिकिर हाहूत ‘हूंहूं’
(इनका दिन रात में पाँच हजार जप करे)
तब क्रम से ‘मजकूर’ पहुँचे अर्थात नूर, अल्लाह (निराकार - हँस स्वरूप)
पीरानपीर साहब के पास पहुँचे ।
पनाह अता (कवित्त)
देह नासूत सुरै मलकूत औ जीव जबरूत की रूह बखानै ।
अरबी में निराकार कहै, जेहि लाहुतै मानि कै मंजिल ठानै ।
आगे हाहूत लाहूत है जाहूत, जाहूत खुद खाबिंद जाहूत में जानै ।
सोई श्री राम पनाह, सब जगनाह पनाह अता यह गाने ।
तजै कर्मना सूत लहि, निरखै तब मलकूत ।
पुनि जबरूतौ छोङि कै, दृष्टि परै लाहूत ।
इन चारो तजि आगे ही, पनाह अता हाहूत ।
तहाँ न मरे न बीछुरै, जात न तहँ यमदूत ।
औ ‘जुलजलाल अव्वल’
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बेचूनै जग राचिया, साईं नूर निनार ।
तब आखिर के बखत में, किसका करो दीदार ?
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बाप पूत दोऊ भरम, आधकोश नव पाँच ।
बिन गुरु भरम न छुटे कैसे आवै सांच ?
कलमा बांग निमाज गुजारै, भरम भई अल्लाह पुकारे ।
अजब भरम यक भई तमासा, ला मुकाम बेचून निवासा ।
बेनमून वह सबके पारा, आखिर ताको करौ दीदारा ।
रगरै महजिद नाक अचेत, निंदे बुत परस्त तेहि हेत ।
बाबन तीस बरन निरमाना, हिन्दू तुरक दोऊ भरमाना ।
भरमि रहे सब भरम महँ, हिन्दू तुरक बखान ।
कहहिं ‘कबीर’ पुकार कै, बिनु गुरु को पहिचान ।
भरमत भरमत सब भरमाना, रामसनेही बिरला जाना ।
साई नूर दिल एक है, सोई नूर पहिचान ।
जाके करते जग भया, सो बेचून क्यों जानि ।
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आधकोश - अधामार्त्री (मुसलमानों का गुरुमन्त्र - ला एला इलिल्लाह मुहम्मदुर्रसू लिल्लाह !)
ला मुकाम - स्थान रहित । बेचून - निराकार । बेनमून - अदृश्य ।
बाबन तीस बरन (52 हिन्दी वर्णमाला 30 उर्दू)
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सरूप अखण्डित व्यापी, चैतन्य अचैतन्य ।
ऊँचे नीचे आगे पीछे, दाहिन बाँये अनन्य ।
बङा ते बङा छोटते छोटा, मीही ते सब लेखा ।
सबके मध्य निरन्तर साईं, दृष्टि दृष्टि सों देखा ।
चाम चश्म सों नजरि न आवै, खोजु रूह के नैना । 
चून चगून बजूद न मान तैं सुभा नमूना ऐना । 
ऐना जैसे सब दरसावै, जो कछु वेश बनावै । (ऐना - आइना)
ज्यों अनुमान करै साहिब को, त्यों साहिब दरसावै ।
जाहि रूह अल्लाह के भीतर, तेहि भीतर के ठाईं ।
रूप अरूप हमारि आस है, हम दूनहु के साईं ।
जो कोई रूह आपनी देखे, सो साहिब को पेखा ।
कहैं ‘कबीर’ स्वरूप हमारा, साहिब को दिल देखा ।
रेख रूप जेहि है नही, अधर धरो नहि देह ।
गगन मंडल के मध्य में, रहता पुरुष विदेह ।
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बहु परचै परतीत दृढ़ावै, सांचे को बिसरावै ।
कलपत कोटि जनम युग वागै, दर्शन कतहुं न पावै ।
परम दयालु परम पुरुषोत्तम, ताहि चीन्ह नर कोई ।
तत्पर हाल निहाल करत हैं, रीझत है निज सोई ।
बधिक कर्म करि भक्ति दृढ़ावै, नाना मत को ज्ञानी ।
बीजक मत कोई बिरला जानै, भूलि फ़िरे अभिमानी ।
कहि ‘कबीर’ कर्ता में सब है, कर्ता सकल समाना ।
भेद बिना सब भरम परे, कोई पूछे सन्त सुजाना । 
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यदि इससे आपको ‘अर्थ’ समझने में सुविधा होती है तो लेख सार्थक है ।
- मुझे स्वयं इस्लामी शब्दों के बारे में ठोस सुनिश्चित जानकारी नही है । अतः यदि किसी बन्दे को इस लेख में कोई गलती या जोङ, घटाने जैसा लगे तो कृपया टिप्पणी में लिखें । उसको संशोधित कर दिया जायेगा ।
- इसके अतिरिक्त आपके पास ऐसी कोई सन्तवाणी या लेख है जो ‘आत्मज्ञान’ के गूढ़ रहस्यों पर हो । तो भी कृपया हमें बतायें ।
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अन्त में एक पहेली 
पूर्व द्वार - आनन्दवन, पश्चिम द्वार - वृन्दावन ।
उत्तर द्वार - जनकपुर, दक्षिणद्वार - चित्रकूट ।
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