26 फ़रवरी 2017

भारत के पतन का कारण ?

प्रश्न - भारतवर्ष राजनैतिक हिसाब से इतना नीच क्यों है ? भारत के पतन का कारण वेदान्त है । 
उत्तर - बिलकुल गलत ! भारत की दुर्दशा का कारण वेदान्त का अभाव है । तुम जानते हो, राम ने तुमसे कहा है कि वह हरेक देश का है । राम भारतवासी की, हिन्दू की, वेदान्ती की हैसियत से नहीं आता है ।
राम राम होकर आता है । जिसका अर्थ है - सर्व व्यापक !
राम न तुम्हारी चुपङ करना चाहता है, न भारतवासियों की, राम भारत या अमेरिका या किसी वस्तु का पक्षपाती नही है ।
राम ‘सत्य’ ‘पूर्ण सत्य’ और ‘शुद्ध सत्य’ का हामी है ।  
और उस हेतु से, उस स्थिति बिन्दु से, राम कहता है । जो कुछ वह कहता है ।
राम न भारत की चापलूसी करना चाहता है और न अमेरिका की । सत्य यह है कि जब तक वेदान्त भारत की जनता में प्रचलित था । तब तक वह अपनी महिमा के उच्चतम शिखर पर था । तब उसका सर्वश्रेष्ठ राज्य था और वह समृद्धिशाली था ।
वहाँ (भारत में) एक ऐसा समय आया कि यह वेदान्त एक विशेष श्रेणी के लोगों के हाथों में पङ गया । और तब वह भारत की जनता में नही पहुँचने पाया । और तब भारत का पतन शुरू हुआ ।
वेदान्त जनता में नही पहुँचने पाया और भारतीय जनता एक ऐसे धर्म में विश्वास करने लगी ।
- मैं गुलाम हूँ,  मैं गुलाम हूँ, ऐ परमेश्वर !  मैं तेरा गुलाम हूँ ।
यह धर्म यूरोप से भारत में आया था । यह एक ऐसा कथन है जिससे ऐतहासिक और दार्शनिक कहे जाने वाले लोग चकित हो जायेंगे । जो यूरोपियनों को चकित कर देगा ।
किन्तु राम ने बिना समझे बूझे यह बात नही कही है । यह एक ऐसा बयान है जो गणित की सी निश्चयात्मकता के साथ सिद्ध व प्रमाणित किया जा सकता है । जो धर्म यह चाहता है कि हम अपने आपको व आत्मा को तुच्छ दृष्टि से देखें और आत्मा की निन्दा करें । और अपने को कीङे, नीच, अभागे, गुलाम पापी कहें । वह (धर्म) भारतवर्ष में बाहर से आया था ।
और जब वह जनता का धर्म बन गया तब भारत का अद्यःपात शुरू हुआ ।    
और यूरोपियनों तथा अमेरिकनों के क्या हाल हैं ?
यूरोपियन भी अपनी गुलामी में विश्वास करते हैं - ऐ परमेश्वर ! हम तेरे गुलाम है ।
(फ़िर) राजनैतिक और सामाजिक दृष्टियों से उनका पतन क्यों नही हुआ ?

इसके दृष्टांत स्वरूप एक कहानी है । जिसका जिक्र प्रकृतिवादी और विकासवादी लेखक प्रायः करते हैं । उनका कहना है कि - कभी कभी कमजोरी बचाव का कारण हो जाती है । हमेशा योग्यतम ही नही बचते ।
दृष्टांत - टिड्डियों की बहुत बङी संख्या एक ओर को उङी जा रही थी । कुछ टिड्डियों के पंख जाते रहे और वे गिर पङीं । बाकी टिड्डियां जो भली चंगी थीं । वो उङती गयीं । किन्तु जब वे एक पहाङी पर पहुँची तो पहाङी जल रही थी । और सब टिड्डियां नष्ट (खत्म) हो गयीं । इसमें दुर्बल बच गया और योग्यतम नष्ट हो गया ।
भारतवासी कोई बात कहते हैं तो मन से कहते हैं । वे सच्चे हैं और धर्म को सर्वस्व मानते हैं । वे भीतर बाहर एक से थे ।
जब उन्होंने प्रार्थना की - ऐ परमेश्वर ! मैं तेरा अधम गुलाम हूँ । ऐ परमेश्वर ! मैं पापी हूँ ।
भारतवर्ष की जनता जब इस तरह प्रार्थना करने लगी, वह सच्ची थी ।
और कर्म की अटल, निष्ठुर कर्म व्यवस्था के अनुसार उन्हें अपनी आकांक्षाओं और अभिलाषाओं को पूर्ण होते देखना पङा । और उनकी कामनायें और इच्छायें सफ़ल हुयीं ।
वे गुलाम बना दिये गये । किसके द्वारा ?
तुम कहते हो - उन्हें परमेश्वर ने गुलाम बना दिया ।
क्या परमेश्वर की कोई शक्ल है, कोई आकृति है ?
यह परमेश्वर अपने निराकार रूप में आकर उन पर शासन नही कर सकता था । परमेश्वर आया । कौन परमेश्वर ! प्रकाशों का प्रकाश, श्वेत स्वरूप, श्वेत रूप अंग्रेजों के स्वच्छ चमङे में आया और उन्हें गुलाम बना दिया । गलत समझी हुयी ईसाईयत या गलत समझे गये गिर्जाघरपन ने भारतवर्ष का पतन सम्पादित किया ।
जाओ और भारतवर्ष का हाल देखो । और जो कुछ राम कहता है उसका तुम्हें विश्वास हो जायेगा । भारत के दूसरे स्वामी या दूसरे साधु जो कहते हैं । केवल उस पर यदि आप विश्वास करेंगे तो आप धोखा खायेंगे ।
भारत के पतन का कारण केवल वेदान्त का अभाव है । और गुलामी की उसी भावना के कारण यूरोपियन गुलाम क्यों नहीं हुये ?
यूरोपीय लोग धर्म की अपेक्षा धन की अधिक परवाह करते हैं । उनकी प्रार्थनाओं में, उनके धार्मिक मामलों में, जैसा कि पहले आपको बताया जा चुका है, ईश्वर केवल एक फ़ालतू चीज है । उसको उनके कमरे बहारने और साफ़ करने पङते हैं । धर्म केवल तस्वीरों या चित्रों की तरह केवल बैठक सजाने के लिये है । 
जो प्रार्थनायें ह्रदय और सच्ची अन्तरात्मा से निकलती थीं, वे प्रार्थनायें गुलामी के लिये नही थीं । बल्कि दौलत, सम्पत्ति और सांसारिक लाभ के लिये थीं । इसलिये उनका उत्थान हुआ । यह कर्म के नियम के अनुसार है । इतिहास हमें बताता है कि जब तक भारत के जन साधारण में वेदान्त प्रचलित था तब तक भारत समृद्धिशाली था ।
एक समय में फ़िनीशिया (phoenicians) के रहने वाले बङे शक्तिशाली थे । किन्तु उन्होंने भारत पर कभी चढ़ाई करके विजय प्राप्त नही की । मिस्री बङी उच्च स्थिति में थे किन्तु वे भारत पर अपनी हुकूमत नही जमा सके । ईरान का सितारा एक दिन बुलन्दी पर था परन्तु भारत पर दुश्मनी की नजर डालने की उसकी कही हिम्मत नही हुयी ।
रोमन सम्राट, जिसका गिद्ध प्रायः सारे संसार में उङता था, सम्पूर्ण ज्ञात प्रथ्वी पर जिसका शासनाधिकार था, भारत को अपने शासन में लाने का साहस न कर सके । यूनानी जब शक्तिशाली हुये तब सदियों तक एक बुरी दृष्टि भारत पर न डाल सके ।
सिकन्दर नाम का एक सम्राट वहाँ (भारत) आया । गलती से उसे महान सिकन्दर कहते हैं । उन दिनों में वेदान्त की वृत्ति तब तक जनता में प्रचलित थी । वह जन से चली नही गयी थी ।  
भारतवर्ष जाने से पहले उसने अपना जाना हुआ सारा संसार जीत लिया था । महा शक्तिशाली सिकन्दर जिसका बल बढ़ाने को विपुल ईरानी सेना थी । सम्पूर्ण मिस्री सेना का जो अध्यक्ष था, भारतवर्ष जाता है । और एक छोटा भारतीय राजा पुरुस उसका सामना करता है और डरा देता है ।
इस भारतीय राजा ने इस महान सिकन्दर को नीचा कर दिया और उसकी सब सेनाओं को चलता कर दिया । सब सेना पस्त कर दी और महान सिकन्दर लौटने को लाचार हुआ । 
यह इसलिये हुआ था क्योंकि उन दिनों भारत की जनता में वेदान्त प्रचलित था ।
तुम इसका प्रमाण चाहते हो । प्रमाणस्वरूप भारत का वृत्तांत पढ़ो । जो उन दिनों के यूनानी छोङ गये हैं । इतिहास में उस समय के यूनानियों, सिकन्दर के साथियों का लिखा हुआ हाल पढ़ो ।
तुम देखोगे कि जन साधारण में असली वेदान्त का प्रचार था और लोग बलिष्ठ थे ।
महान सिकन्दर को लौटना पङा था ।
एक ऐसा समय आया, जब एक साधारण आक्रमणकारी ने जो महमूद गजनवी कहलाता था, सत्रह बार भारतवर्ष को लूटा । सत्रह बार वह भारत से सारी दौलत ले गया । जो उसके हाथ में आयी ।
उन दिनों का जनता का वृत्तांत पढ़िये और आप देखेंगे कि जन साधारण का धर्म वेदान्त के ठीक विरुद्ध ध्रुव पर (अर्थात नितांत विरुद्ध) था । 
वेदान्त प्रचलित था किन्तु कुछ चुने हुये लोगों में । जनता उसे त्याग चुकी थी और इस तरह भारत नीचा हुआ ।
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