22 अक्तूबर 2011

हम जीवन भर उसमें दबे दबे जीते है

लाओत्से कहता है - सुख का द्वार 1 को जानना है । दुख का द्वार अनेक को जानना है । अनेक की जानकारी होगी । दुख बढ़ेगा । 1 का बोध होगा । सुख बढ़ेगा । क्यों ? क्योंकि जितनी दिशाओं में हमारा ज्ञान बंटता है । उतने ही भीतर हम बंट जाते हैं । और बंटा हुआ आदमी दुखी होगा । खंडित, टूटा हुआ आदमी दुखी होगा । आपको पता नहीं कि आप कितने खंडित हैं ? आप दुकान पर होते हैं । तो आप और ही तरह के आदमी होते हैं । अगर एकदम से आपकी प्रेयसी वहां आ जाए । तो आपको बड़ी अड़चन होगी । क्योंकि प्रेयसी के साथ आप जैसे आदमी होते हैं । वैसे आदमी आप दुकान पर नहीं हैं । वह ग्राहक के साथ जैसे आदमी होते हैं । वह बिलकुल दूसरा आदमी है । अगर प्रेयसी एकदम से आ जाए । तो आपको सब भीतर का सरंजाम बदलना पड़ेगा । आपको सब भीतर के सामान फिर से आयोजित करने पड़ेंगे । आपको आंख और ढंग की करनी पड़ेगी । चेहरे पर मुस्कुराहट और ढंग की लानी पङेगी । हाथ पैर और ढंग से चलाने पड़ेंगे । सब आपको बदल देना पड़ेगा । आपकी भाषा, सब । क्योंकि ग्राहक के साथ आप और ही व्यवस्था से काम कर रहे थे । आपका 1 खंड काम कर रहा था । प्रेयसी के सामने दूसरा खंड काम करता है । यह जो खंडित व्यक्ति है । यह सुखी नहीं हो सकता । क्योंकि सुख अखंडता की छाया है । जितना भीतर अखंड भाव होता है कि - मैं 1 हूं । उतनी ही शांति और सुख मालूम होता है । दुख का कारण होता है - भीतर के लड़ते हुए खंड । और भीतर खंड प्रतिपल लड़ रहे हैं । क्योंकि विपरीत हैं । आप इस तरह के आयोजन कर लिए हैं जीवन में । जो एक दूसरे के विरोधाभासी हैं । अगर आपको धन इकट्ठा करना है । तो धन प्रेम का विरोधी है । जितना ज्यादा धन इकट्ठा करना हो । उतना ही आपको अपने प्रेम पूर्ण हृदय को रोक लेना पड़ेगा । लेकिन आपको प्रेम भी करना है । क्योंकि प्रेम के बिना जीवन में कोई तृप्ति नहीं । और जब प्रेम करना है । तो वह जो धन की पागल दौड़ थी । उसे 1 तरफ हटा देना होगा । मगर अड़चन है । हमारे मन में ऐसे खयाल हैं कि लोग प्रेम के लिए भी धन इकट्ठा करते हैं । वे सोचते हैं कि जब धन होगा पास । तो प्रेम भी हो सकेगा । लेकिन धन इकट्ठा करने में वे इतने आदी हो जाते हैं 1 खास ढांचे के । जो कि अप्रेम का है । घृणा का है । शोषण का है कि जब प्रेम का मौका आता है । तो वे खुल ही नहीं पाते । उनका दुकानदार इतना मजबूत हो जाता है कि वे उससे कहते हैं - हट ! लेकिन वह नहीं हटता । वह बीच में खड़ा हो जाता है । ओशो
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विश्राम व शांति के सूत्र - ध्यान । इधर मनुष्य के जीवन में निरंतर पीड़ा दुःख और अशांति बढ़ती गई है । बढ़ती जा रही है । जीवन के रस का अनुभव, आनंद का अनुभव विलीन होता जा रहा है । जैसे 1 भारी बोझ पत्थर की तरह हमारे मन और ह्रदय पर है । हम जीवन भर उसमें दबे दबे जीते है । उसी बोझ के नीचे समाप्त हो जाते हैं । लेकिन किसलिए यह जीवन था ? किसलिए हम थे ? कौन सा प्रयोजन था ? इस सबको कोई अनुभव नहीं हो पाता है । यह कौन सा बोझा है ? जो हमारे चित पर बैठकर हमारे जीवन का रस सोख लेता है । कौन साभार है । जो हमारे प्राणों पर पाषाण बनकर बोझिल हो जाता है ? यह भार क्या है ? यह वेट क्या है ? जो आपकी जान लिए लेता है । मेरी जान लिए लेता है । सारी दुनियां की जान लिए लेता है । यह कौन सा पाषाण भार है । जो आपके कंघे पर है ? कौन सी चीज है । जो दबाए देती है । ऊपर नहीं उठने देता । आकांक्षायें तो आकाश छूना चाहती हैं ।
लेकिन प्राण तो पृथ्वी से बंधे हैं । क्या है । कौन सी बात है ? कौन रोक रहा है ? कौन अटका रहा है ? किसने यह सुझाव दिया है कि इस पत्थर को अपने सिर पर ले लेना ? किसने समझाया ? शायद हमारे अहंकार ने हमको भी फुसलाया है । शायद हमारी अस्मिता ने ईगो ने, हमको भी कहा है कि भर सिर ले लो । क्योंकि इस जगत में जिसके सिर पर जितना भार है । वह उतना बड़ा है । बड़े होने की दौड़ है ।
इसलिए भार को सहना पड़ता है । लेकिन सारी दुनिया, सारे मनुष्य का मन कुछ ऐसी गलत धारणा में परिपक्व होता है । निर्मित होता है कि जिन पत्थरों को हम अपने ऊपर अपने हाथों से ही रखते हैं । कौन सी चीजें हैं । कौन सा केंद्र है ? जिस पर भर को रखने वाले हाथ मेरे ही है । कौन सी चीजें हैं । कौन सा केंद्र है ? जिस पर भार इकट्ठा होता है । कौन से तत्व हैं ? जिनसे पत्थर की तरह भार संग्रहीत होता है । उनकी ही मैं आपसे चर्चा करना चाहता हूं । केंद्र है - मनुष्य का अहंकार । केंद्र है - मनुष्य की यह धारणा कि मैं कुछ हूं । केंद्र है - मैं का बोध । और यह मैं इस जगत में सबसे ज्यादा असत्य, सबसे ज्यादा भ्रामक, सबसे ज्यादा इलुजरी है । यह मैं कहीं है ? नहीं । यह मैं कहीं है ? नहीं । इस शैडोई, इस अत्यंत भ्रामक, इस अत्यंत भ्रमपूर्ण मैं के लिए सारी दौड़
चलती है । जो कहीं है ही नहीं । ओशो
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