09 अक्तूबर 2011

बुद्ध पुरुष के मित्र नहीं होते

तुमने पूछा है कि वास्तविक प्रमाणिक मैत्री क्या है ? तुम मैत्री का स्वाद चख सको । इसके लिए तुम्हारे अंदर महान रूपांतरण की आवश्यकता है । जैसे अभी तुम हो । उसमें तो मैत्री एक दूर का सितारा है । तुम दूर के सितारे को देख तो सकते हो । तुम इस संबंध में बौद्धिक समझ भी रख सकते हो । पर यह समझ केवल बौद्धिक समझ ही बनी रहेगी । यह कभी अस्तित्वगत स्वाद नहीं बन सकता । जब तक तुम मैत्री का अस्तित्वगत स्वाद न लो । तब तक यह बड़ा मुश्किल होगा । लगभग असंभव कि तुम मित्रता और मैत्री में अंतर कर सको । तुम ऐसा समझ सकते हो कि मैत्री प्रेम का सबसे पवित्र रूप है । यह इतना पवित्र है कि तुम इसे फूल भी नहीं कह सकते । तुम ऐसा कह सकते हो कि यह एक ऐसी सुगंध है । जिसको केवल अनुभव किया जा सकता है । और महसूस किया जा सकता है । पर इसे तुम पकड़ नहीं सकते । यह मौजूद है । तुम्हारे नासापुट इसे महसूस कर सकते हैं । तुम चारों ओर इससे घिरे हुए हो । तुम इसकी तंरगें महसूस कर सकते हो । पर इसको पकड़े रखे रहने का कोई मार्ग नहीं है । इसका अनुभव इतना बड़ा और व्यापक है । जिसके मुकाबले तुम्हारे हाथ इतने छोटे पड़ जाते हैं । मैंने तुमसे कहा कि तुम्हारा प्रश्न बड़ा जटिल है । ऐसा तुम्हारे प्रश्न के कारण नहीं । पर तुम्हारे कारण कहा था । अभी तुम ऐसे बिंदु पर नहीं हो । जहां मैत्री एक अनुभव बन सके । स्वाभाविक और प्रामाणिक बनो । तब तुम प्रेम की सबसे विशुद्ध गुणवत्ता को जान सकते हो । प्रेम की एक सुगंध । जो हमेशा चारों ओर से घेरे हो । और इस विशुद्ध प्रेम की गुणवत्ता मैत्री है । मित्रता किसी व्यक्ति से संबंधित होती है । कोई व्यक्ति तुम्हारा मित्र होता है । एक बार किसी व्यक्ति ने गौतम बुद्ध से पूछा कि क्या बुद्ध पुरुष के भी मित्र होते हैं ? उन्होंने जवाब दिया - नहीं । प्रश्न कर्ता अचंभित रह गया । क्योंकि वह सोच रहा था कि जो व्यक्ति स्वयं बुद्ध हो चुका । उसके लिए सारा संसार मित्र होना चाहिए । चाहे तुम्हें यह जानकर धक्का लगा हो । या न लगा हो । पर गौतम बुद्ध बिलकुल सही कह रहे हैं । जब वे कह रहे हैं कि बुद्ध पुरुष के मित्र नहीं होते । तब वे कह रहे हैं कि उनका कोई मित्र नहीं होता । क्योंकि उनका कोई शत्रु नहीं होता । ये दोनों चीजें एक साथ आती हैं । हां ! वे मैत्री रख सकते हैं । पर मित्रता नहीं । मैत्री ऐसा प्रेम है । जो किसी अन्य से संबंधित या किसी अन्य को संबोधित नहीं है । न ही यह किसी तरह का लिखित या अलिखित समझौता है । न ही किसी व्यक्ति का व्यक्ति विशेष के प्रति प्रेम है । यह व्यक्ति का समस्त अस्तित्व के प्रति प्रेम है । जिसमें मनुष्य केवल छोटा सा भाग है । क्योंकि इसमें पेड़ भी सम्मिलित हैं । इसमें पशु भी सम्मिलित हैं । नदियां भी सम्मिलित हैं । पहाड़ भी सम्मिलित हैं । और तारे भी सम्मिलित हैं । मैत्री में प्रत्येक चीज सम्मिलित है । मैत्री तुम्हारे स्वयं के सच्चे और प्रामाणिक होने का तरीका है । तुम्हारे अंदर से मैत्री की किरणें 

निकलने लगती हैं । यह अपने से होता है । इसको लाने के लिए तुम्हें कुछ करना नहीं पड़ता । जो कोई भी तुम्हारे संपर्क में आता है । वह इस मैत्री को महसूस कर सकता है । इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारा कोई शत्रु नहीं होगा । पर जहां तक तुम्हारा संबंध है । तुम किसी के भी शत्रु नहीं होते । क्योंकि अब तुम किसी के मित्र भी नहीं हो । तुम्हारा शिखर । तुम्हारा जागरण । तुम्हारा आनंद । तुम्हारा मौन । बहुतों को परेशान करेगा । और बहुतों में जलन पैदा करेगा । यह सब होगा । और यह सब बिना तुम्हें समझे होगा । वास्तव में बुद्ध पुरुष के शत्रु ज्यादा होते हैं । बजाय अज्ञानी के । साधारण जन के कुछ ही शत्रु होते हैं । और कुछ ही मित्र । पर इसके विपरीत लगभग सारा विश्व ही बुद्ध पुरुष के विरोध में दिखाई देता है । क्योंकि अंधे लोग किसी आंख वाले को क्षमा नहीं कर सकते । और अज्ञानी उसे माफ नहीं कर सकते । जो ज्ञानी हैं । वे उस आदमी से प्रेम नहीं कर सकते । जो आत्यंतिक कृतार्थता को उपलब्ध हो गया है । क्योंकि उनके अहं को चोट लगती है ।
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रूपांतरण की गुह्य विधियां - सेक्स या काम निम्नतम चक्र है । और शहस्त्रार उच्चतम । और काम ऊर्जा इन दोनो के बीच गति करती है । काम केन्द्र से इसे मुक्त किया जा सकता है । जब वह काम केन्द्र से छूटती है । तो तुम किसी को जन्म देने का कारण बनते हो । और जब वही ऊर्जा सहस्त्रार से मुक्त होकर ब्रह्मांड मे समाती है । तो तुम अपने को नया जन्म देते हो । यह भी जन्म देना है । लेकिन जैविक तल पर नही । तब यह आध्यात्मिक पुनर्जन्म है । तब तुम्हारा पुनर्जन्म हुआ - ओशो । 
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अरे नर ध्यान धर घट में । व्यर्थ क्यों जनम खोता है । अरे नर ध्यान धर घट में । व्यर्थ क्यों जनम खोता है । विषय के सूल झूले में । क्यों दुःख के बीज बोता है । क्यों दुःख के बीज बोता है । व्यर्थ क्यों जनम खोता है । गया तू भूल चेतन का । प्रपंची बन गया जग में । ना जाने देह को नश्वर । सदा सुख नींद सोता है । सदा सत्संग कर प्यारे । दमन कर पञ्च विषयो को । सजग हो आत्म चिंतन में । समय सम्पूर्ण होता है । शरण गुरुदेव की रहकर । श्रवण कर सत्य शिक्षा को ।  बने आतम तभी निर्मंल । अभय पद प्राप्त होता है । अविद्या भाव तब नाशे । लखे चहू और अमृत को । समावे आप में शंकर । तभी सुख रूप होता है । जय श्री नाथ ।
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जब तुम शून्य हो जाओगे । वह उतर आता है । शून्यता में पूर्णता ऐसी ही उतर आती है । जैसे बूंद सागर में खो जाए । तुम शून्य हुए कि पूर्ण होने के अधिकारी हुए । तुम मिटे कि परमात्मा हुआ - ओशो ।
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रहना नहीं देश विराना है ।
यह संसार कागद की पुङिया बूंद परे गल जाना है ।
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क्यों कर जोड़े है खड़ा तू उसके । वो तो अन्दर बसता है ।
है भ्रम में तू उसको लेकर । वो महँगा नहीँ वो सस्ता है ।
तू समझ बैठा उसको है कहीं । तू भागम दौङ में लगा हुआ ।
जो देखा होता नजर खोल । तो बात दूर की नहीं थी ये ।
कोई जगह नहीं जहाँ नहीं है वो । फिर भी पागल भटका है तू ।
तू आँख खोल तू आँख खोल । हर तरफ है वो हर तरफ है वो ।
वो सागर है आकाश है वो । वो कण कण में वो जीवन में ।
वो देख के तेरा पागलपन । वो करुणा और प्रेम में हँसता है ।
क्यों कर जोड़े तू खड़ा है उसके । वो तो अन्दर बसता है ।
है भ्रम में तू उसको लेकर । वो महँगा नहीं वो सस्ता है ।
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पहले अंग्रेजो की गुलामी की । फिर राजा महाराजाओ की गुलामी की । और अब कुछ कुर्सी के कीडे की गुलामी करते हैं । आजादी के पैंसठ साल के बाद भी कया हम सही मायनों में आजाद हुए । हम ही गधों को तख्तो ताज पर बिठाते हैं । सपने दिखाओ । और राज करो । जो जितना सपने दिखाने में माहिर होता है । वो उतना ही अच्छा नेता होता है । लेकिन भारत सपने देखने वालों का देश है । इसलिए नेताओं की दुकानें फलफ़ूल रहीं हैं । नेता नहीं चाहते कि आप सपने से जागो ।
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सच्चा भिखारी - पूर्ण दीनतामय भाव के सूक्ष्म सूत्र का अवलम्बन करके ही भाव स्वरूप भगवान प्रगट होते है । पापियों के अत्याचार से जब पृथ्वी पर दीनता छा जाती है । पुण्य का पूर्ण अभाव हो जाता है । तभी भगवान का अवतार होता है । साठ हज़ार शिष्यों को साथ लेकर जिस समय ऋषि दुर्वासा वन में पांडवो की कुटिया पर पहुँचे । उस समय द्रौपदी के सूर्य प्रदत पात्र में अन्न का एक कण भी नहीं था । उस पूर्ण अभाव के समय पूरी दीनता के काल में द्रौपदी ने पूर्ण रूप प्रभु को कातर स्वर में पुकार कर कहा - हे द्वारकाधीश ! इस कुसमय में दर्शन दो ! दीनबन्धो ! विपत्ति के इस तीर हीन समुद्र में तुम्हे देखकर कुछ भरोसा होगा । द्रौपदी की आर्त प्रार्थना सुनकर जगत प्रभु स्थिर नहीं रह सके । ऐश्वर्य शालिनी रुक्मिणी और सत्यभामा को छोड़कर भिखारिणी दरिद्रा द्रौपदी की और दौड़े । द्वारका के अतुलनीय ऐश्वर्य स्तम्भ को देखकर अरण्यवासी पाण्डवों की पर्णकुटी में विभूति स्वरुप प्रखर प्रभा प्रकाशित हो गयी । द्रौपदी ने कहा - नाथ ! क्या इतनी देर करके आना चाहिये ? भगवान बोले - तुमने मुझको द्वारकाधीश के नाम से क्यों पुकारा था । प्राणेश्वर क्यों नहीं कहाँ ? जानती नही हो । द्वारका यहाँ से कितनी दूर है ? इसी से आने में देर हुई । जो हमारे प्राणों के अन्दर की प्रत्येक क्रिया को जानते हैं । उनके सामने माँगने के लिए मुहँ खोलना बुद्धिमानी नहीं है । भीख की झोली बगल में लेकर दरवाजे पर खड़े होते ही वे दया करते है । बस हमें तो चुपचाप उनकी सेवा करनी चाहिये - हनुमान प्रसाद पोद्दार भाईजी
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इंसानियत !   मत खेलो अदावत की होली । इंसानियत बिखर जाएगा । हर ज़र्रा ज़र्रा कायनात का । बगावत पर उतर आएगा । लहू से गहरा सुर्ख होता नही । कभी भी मज़हब का रंग । गर धर्म पे गिरेंगी लाशें । तो खुदा भी सिहर जाएगा । बुत परस्त हो या अजान परस्त । अगर न हो नेक इरादें । राम रहीम रहम न करेगा । सीधा दोज़ख में पसर जाएगा । शमा की इश्क में जल जलकर । जान लुटाते हैं परवाने । इश्क की गंगा में डुबकी लगा ले । जनम सुधर जाएगा । नशा वो हर्गिज़ नही । जो हर पल सर पे चढ़कर बोलता हैं । प्रेम का प्याला पी ले रे मन । दिल पे कर असर जाएगा । तन की मैल तो हर पल धोता । पोत रहा है रूह में कालिख । जिस दिन मैल धुले रूह की । तेरा जीवन संवर जाएगा । मालिक बैठा सबके अंदर । देख रहा सबका इल्म । नेकी का सबब बडा हैं - आनंद । इसमे ही खुदा नज़र आएगा - आनंद थापा ।
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कितना भी प्यार क्यों न हो तुम्हें मुझसे ।
जब तक " तुम " हो । तुम उब ही जाओगे मुझसे ।
जब भेजा था उसने । मुझे इस जहां में ।
कहा था फुसफुसाते हुये । बहुत धीरे से ।
अब ये प्यास बुझेगी नहीं ।
जब तक खुद । मिटोगे नहीं - तुम ।
तब से बनता हूं । मिटता भी हूं । 
पर मिट ही नहीं जाता हूं ।
और हर बार की तरह । प्यासा ही रह जाता हूं ।
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तुम कौन हो । तुम कौन हो ? जिसने यौवन का विराट आकाश समेट लिया है अपनी बाहों में । जिसने अपनी चितवन की प्रेरणा से ठहरा दिया है सांसारिक गति को । तुम कौन हो ? जिसने सौभाग्य की कुंकुमी सजावट कर दी है मेरे माथे पर । जिसने मंत्रमुग्ध कर दिया है जगत को कल कण्ठ की ऋचाओं से । तुम कौन हो ? जिसने मेरी श्वांस वेणु बजा दी है । और लय हो गयी है चेतना में उसकी माधुरी । जिसने अपने हृदय के कंपनों से भर दिये हैं मेरे प्राण, कँप गयी है अनुभूति । तुम कौन हो ? आखिर कौन हो तुम ? कि तुम्हारे सम्मुख प्रणय की पलकें काँप रही हैं । और मैं विलीन होना चाह रहा हूँ तुममें ।
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तुम कितने लायक हो ? यह जानने का एक ही तरीका है । तुम कितने नालायक हो - यह जानना ।
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प्रतीक्षा करो । प्रार्थना करो । आशा को जगाए रखो । आंख खोलकर पुकारते रहो । अंधेरा भी उसका है । प्रकाश भी उसका है । मृत्यु भी उसकी । जीवन भी उसका । इसलिए सब जगह उसे पहचानते रहो । ओशो ।
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Identify your painful thought, question it, and wake yourself up. No one else can.
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The reason why the universe is eternal is that it does not live for itself . it gives life to others as it transforms - LaoTzu

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IF YOU DENY THESE SINGING BIRDS THEN SOMETHING IN YOU IS DENIED -  OSHO

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OSHO
Never Born
Never Died
Only Visited this
Planet Earth between
Dec 11,1931-
Jan 19,1990

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Beautiful meditation by osho at the end - white robe brotherhood 
निवेदनो - ढम्म म म म म म म म म म...Beeeeeeeeee silent
Absolutely in - Close your eyes, No movement Just be still.
Feel the beauty of this moment..Feel the freshness .And the youth
Of this moment...Feel the bliss   And the dance.  In the deepest core of your being..  Everybody relax into death. Let the body breath,  Don't bother. You don't have to stop breathing,
You have to stop being out..Be in .And take the quantum leap.
From mind to no-mind. Feel the silent fragrance within..
This moment is a divine moment..This moment you are a Buddha.
Pin down your consciousness to this moment..
No head,  No heart  But just a pure consciousness..
You can come back to life   To new life   With new light . With new joy   . With new eyes to see.  With new senses to feel.   With new intelligence to understand.
निवेदनो - ढम्म म म म म म म 
Now come back -  As you r a buddha .
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