17 अक्तूबर 2011

मैं सिर्फ द्रष्टा मात्र हूं

सब जुड़ा है । संयुक्त है । कहीं कोई अंत नहीं आता । तुम्हारे होने का । तुम उतने ही बड़े हो । जितना यह बड़ा अस्तित्व है । इससे रत्ती भर कम नहीं । इससे रत्ती भर भी तुमने अपने को कम जाना । तो तुम दुखी रहोगे । और नर्क में रहोगे । क्योंकि असत्य में कोई कैसे सुख को उपलब्ध हो सकता है ? असत्य दुख है । लेकिन सारी राजनीति तुम्हें तोड़ती है । लोग मेरे पास आते हैं । वे कहते हैं - मैं हिंदू । आदमी होना काफी था । पर्याप्त तो नहीं था बहुत । लेकिन फिर भी बेहतर था - हिंदू होने से । हिंदू तो बीस ही करोड़ हैं । आदमी कम से कम चार अरब । थोड़े तो बड़े होते । लेकिन अगर वह आदमी से खोजबीन करो । तो वह कहता है कि हिंदू भी मैं राम को मानने वाला हूं । कृष्ण को नहीं मानता । राजनीति ने और काटा । अब वह पूरा हिंदू भी नहीं है । बीस करोड़ लोगों के साथ भी उसका तादात्म्य नहीं है । अब दस करोड़ के साथ ही उसका तादात्म्य रह गया है । ऐसा आदमी टूटता जाता है । और फिर हजार पंथ हैं । घर घर पंथ हैं । संप्रदाय हैं । और आदमी छोटा होता जाता है । कम से कम आदमियत से जुड़ो । आदमियत कोई बहुत बड़ी घटना नहीं है । क्योंकि पृथ्वी बड़ी छोटी है । सूरज इससे साठ हजार गुना बड़ा है । और सूरज - बहुत मध्यवर्गीय अस्तित्व है उसका । उससे हजारों गुने बड़े सूरज हैं । पृथ्वी का तो कहीं कोई पता नहीं है ।
और पृथ्वी पर भी आदमी केवल चार अरब हैं । थोड़ा मच्छरों की सोचो । कितने अरब हैं ? आदमी चार अरब हैं । फिर और कीड़े पतंगों की सोचो । क्या आदमी की हैसियत है ? तुम नहीं थे । तब भी मच्छर थे । तुम नहीं रहोगे । अगर राजनीतिज्ञों की चली । तो तुम ज्यादा नहीं रह पाओगे । इस सदी के पूरे होते होते सब समाप्त हो ही जाएगा । मच्छर फिर भी रहेंगे । उनका गीत गूंजता ही रहेगा । कितने प्राणी हैं ?
अगर थोड़े बड़े होना है । और छोटे होने से तुम्हें पीड़ा हो रही है । फिर भी तुम बड़े होना चाहते । क्षुद्र होने से तुम्हें कष्ट हो रहा है । ऐसे जैसे बड़े आदमी को छोटे बच्चे के कपड़े पहना दिए जाएं । ऐसी तुम्हारी तकलीफ हो रही है । छोटे बच्चे का जांघिया पहने खड़े हो । पीड़ा हो रही है । बंध हो । कसे हो । लेकिन और छोटे होने की आकांक्षा बनी है । सब संप्रदाय राजनीति हैं । क्योंकि तोड़ते हैं । हिंदू, जैन, बौद्ध, ईसाई सब राजनीति हैं । क्योंकि तोड़ते हैं । धर्म तो जोड़ता है । तो पहले तो धर्म तुम्हें जोड़ेगा मनुष्यता से । फिर जोड़ेगा प्राण से । प्राण से जुड़ो । और फिर जोड़ेगा - अस्तित्व से । जब तुम अस्तित्व से जुड़ जाओगे । तभी तुम ब्रह्मज्ञान को उपलब्ध हुए । तब तुम उतने ही बड़े हो जाओगे । जितना बड़ा यह सारा होना है । इससे तुम रत्ती भर छोटे न रहोगे । तभी तो उपनिषद के ऋषियों ने कहा है- अहं ब्रह्मास्मि । मैं ब्रह्म हूं । यह कोई अहंकार की घोषणा नहीं है । यह तो निरहंकार की परम उदघोषणा है । मैं हूं ही हनीं । जब ऋषि ने कहा - अहं ब्रह्मास्मि । उसने मैं की बात ही नहीं की । मजबूरी है । तुम्हारी भाषा का उपयोग करना पड़ता है । इसलिए अहं शब्द का उपयोग किया - मैं ब्रह्म हूं । अन्यथा मैं तो वह है ही नहीं । जब तक मैं है । तब तक तो ब्रह्म का अनुभव हो ही नहीं सकता । अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है - मैं नहीं हूं । ब्रह्म है । मैं तो रहूंगा । तो छोटा ही रहूंगा । तुम्हारी कोई न कोई सीमा रहेगी । तुम कहीं न कहीं समाप्त होओगे । तुम्हारी कोई न कोई परिभाषा होगी । अब अपरिभाष्य के साथ । असीम के साथ एक हो जाना ही परम आनंद है । सारे ज्ञानी एक ही इशारा कर रहे हैं कि तुम छोटे से पोखरे हो गए हो । छोटी सी तलैया हो । सड़ रहे हो नाहक । जबकि सागर की तरफ बह सकते हो । तो पहला काम है - बहो । और दूसरा काम है - सागर में डूब जाओ । और इसकी पीड़ा तुम्हें भी अनुभव होती है । तुम समझ पाओ । न समझ पाओ । यह दूसरी बात है - ओशो ।
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सभी का मूल स्रोत एक है । एक दिन एक कुत्ता गार्ड की आंख बचाकर एक खाली घर के अंदर जाकर कोने में बैठ गया । गार्ड ने दरवाजा बंद किया । तब भी वह कुत्ता चुपचाप बैठा रहा । पर सुबह जब दरवाजा खोला गया । तो वह कुत्ता मरा पाया गया । दीवारों और फर्श पर चारों ओर खून ही खून था । पड़ोसियों ने कहा - हम लोग भी रात भर परेशान रहे कि कुत्ते कहाँ भौंक रहे हैं ? जिस कमरे में कुत्ता बंद था । उसमें चारों ओर शीशे लगे हुये थे । और गार्ड गलती से रोशनी खुली छोड़ गया था । वह कुत्ता जरुर बहुत बुद्धिजीवी रहा होगा । इसलिये स्वाभाविक रूप से कमरे में घूमते हुये अपने अनेक प्रतिबिम्ब देखकर वह सोचने लगा । माय गाड । इतने सारे कुत्ते ? और दरवाजा बंद है । उसे लगा । वह कुत्तों के गिरोह द्वारा घेर लिया गया है । वह प्रतिबिम्बों पर हमला करने लगा । और उसने स्वयं अपने आपको समाप्त कर लिया । 
रहस्य के इस संसार में सबसे आवश्यक और आधारभूत समझ यही है कि हम अपने चारों ओर अपने को जिन मनुष्यों से घिरा पा रहे हैं । वह हमारे ही प्रतिबिम्ब हैं । हम उनसे व्यर्थ ही उलझ रहे हैं । उनसे झगड़ा फसाद कर रहे हैं । उनसे भयभीत हो रहे हैं । आज पूरी दुनिया में इसी तरह का भय है । एक के पास परमाणु अस्त्र होने से अन्य सभी भय से उन्हें इकठ्ठा कर रहे हैं । कुत्ता एक ही है । और बाकी सब उसकी छायायें हैं । इसलिये चेतना । तू बौद्धिक मत बन । समस्याओं के बारे में सोचना छोड़ दे । नहीं तो तू उनमे उलझ कर ही रह जायेगी । सिर्फ उनकी साक्षी हो जा । सजग होकर सिर्फ उन्हें देख । उनसे कोई रिश्ता कायम मत कर । उनके प्रति तटस्थ हो जा । साक्षी हो जा ।
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एक सूफी फकीर हुआ । उसके दो बेटे थे - जुडवां बेटे । बड़े प्यारे बेटे थे । और बड़ी देर से बुढ़ापे में पैदा हुए थे । उसका बड़ा मोह था उन पर । वह एक दिन मस्जिद में प्रवचन देकर लौटा । घर आया । तो वह आते ही से रोज पूछता था कि आज बेटे कहां हैं ? अक्सर तो वे मस्जिद जाते थे । आज नहीं गए थे सुनने । उसने पूछा पत्नी से - बेटे कहां हैं ? उसने कहा - आते होंगे । कहीं खेलते होंगे । तुम भोजन तो कर लो । उसने भोजन कर लिया । भोजन करके उसने फिर पूछा कि - बेटे कहा हैं ? क्योंकि ऐसा कभी न हुआ था । वे भोजन उसके साथ ही करते थे । तो उसने कहा - इसके पहले कि मैं बेटों के संबंध में कुछ कहूं । एक बात तुमसे पूछती हूं । अगर कोई आदमी बीस साल पहले अमानत में कुछ मेरे पास रख गया था । दो हीरे रख गया था । आज वह वापिस मांगने आया । तो मैं उसे लौटा दूं कि नहीं ?
फकीर ने कहा - यह भी कोई पूछने की बात है ? यह भी तू पूछने योग्य सोचती है ? लौटा ही देने थे । मेरे से पूछने की क्या बात थी ? उसके हीरे उसे वापिस कर देने थे । इसमें हमारा क्या लेना देना है ? तू मुझसे पूछने को क्यों रुकी ?
उसने कहा - बस ठीक हो गया । पूछने को रुक गई थी । अब आप आ जाएं ।
वह कमरे में ले गई । दोनों बेटे मुर्दा पड़े थे । पास के एक मकान में खेल रहे थे । और छत गिर गई । फकीर ने देखा । बात को समझा । हंसने लगा । कहा - तूने भी ठीक किया । ठीक है । बीस साल पहले कोई हमें दे गया था । अदृश्य, दैवयोग, परमात्मा या जो नाम पसंद हो । आज ले गया । हम बीच में कौन ? जब ये बेटे नहीं थे । तब भी हम मजे में थे । अब ये बेटे नहीं हैं । तो हम फिर वैसे हो गए । जैसे हम पहले थे । इनके आने जाने से क्या भेद पड़ता है । तूने ठीक किया । तूने मुझे ठीक जगाया । जो भी हो रहा है । वह मेरे कारण हो रहा है । इससे ही " मैं " की भ्रांति पैदा होती है । जो हो रहा है । वह समस्त के कारण हो रहा है । मैं सिर्फ द्रष्टा मात्र हूं । ऐसी समझ प्रगाढ़ हो जाए । ऐसी ज्योति जले - अकंप, निर्धूम, तो साक्षी का जन्म होता है ।

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